माधव श्रीहरि अणे | Madhav Shrihari Aney


माधव श्रीहरि अणे (Madhav Shrihari Aney) गांधी युग के महान राजनीतिज्ञ थे। तिलक, गोखले, मालवीय, दास, नेहरू - इन पांचो धुरंधर राजनीतिज्ञों के कार्यकलापों में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया| गांधीजी से उनका सौहार्द था और उनके कार्यक्रमों में वह भरसक सहयोग भी देते थे, पर जहां मतभेद होता, अपनी स्पष्ट सम्मति बताने में उन्हें कभी संकोच न हुआ। बिना लाग लपेट के अपना अभिमत प्रकट करने का उनमें अनुपम साहस था। जनता श्रद्धा से उन्हें लोकनायक के नाम से संबोधित करती थी। जैसे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक वैसे ही उनके प्रधान शिष्य लोकनायक बापूजी अणे भारत के एक गौरवशाली पुरुष थे।


माधव श्रीहरि अणे का जन्म


यवतमाल के इस वीर योद्धा ने उसी जिले की वणी तहसील के मुख्य स्थान वणी में २९ अगस्त १८८० को जन्म लिया था। उनके पिता श्रीहरि अणे उच्चकोटि के विद्वान थे। पुत्र की प्रतिभा से वह बड़े प्रभावित हुए और उनकी शिक्षा-दीक्षा में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई।


माधव श्रीहरि अणे के कार्य


पहले नागपुर और बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर वह १९०४ से १९०७ तक अमरावती के एक स्कूल में अध्यापक थे। १९०८ में उन्होंने यवतमाल में वकालत शुरू की और इस क्षेत्र में बड़ा नाम पैदा किया।

१९०२ में जब तिलक नागपुर गए थे, तो अणे जी की उनसे प्रथम भेंट हुई और अणे जी अनुनय के कारण तिलकजी ने जो भाषण दिया, उससे अणे जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में अपना कदम दृढ़ता से आगे बढ़ाया। वह इतने प्रभावित हुए थे, कि उन्होंने देश सेवा का व्रत लेने का निश्चय किया। इन्हीं दिनों मुश्किल से २८ वर्ष की उम्र में वह लोकमान्य तिलक के पत्र “केसरी” और “मराठा” से बड़े प्रभावित हुए। जब तिलक १९१४ में जेल से छूटकर आए, तो पूना में सबसे पहले उनसे मिलने वालों में अणे जी भी थे। १९१६ में अणे यवतमाल की जिला कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।


माधव श्रीहरि अणे का राजनीतिक जीवन


माधव श्रीहरि अणे ने सक्रिय राजनीति में भाग लेना आरंभ किया। लोकमान्य तिलक की अणे पर परम कृपा थी। जब उन्होंने ऐनी बेसेंट के सहयोग से “होमरूल लीग” स्थापित की, तो अणे उसके उपाध्यक्षों में एक थे। १९२१ से १९३० तक अणे विदर्भ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। १९२४-२५ में एक साल के लिए और बाद में १९३१ से १९३४ तक वह कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य रहे। १९३३ में गांधीजी ने उन्हें कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया | उन्होंने वन सत्याग्रह आंदोलन का नेतृत्व किया और जेल गए। अमृतसर कांग्रेस में जब तिलक दलबल समेत शामिल हुए, तो अणे भी उनके साथ थे, वहीं उनका परिचय देशबंधु दास तथा अन्य कई तिलक भक्तों से हुआ।

सन् १९२१ के सत्याग्रह आंदोलन में पकड़े गए नेता जब जेल से छूटे, तो गया में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। कौसिलों में जाने के प्रश्न पर मतभेद होने के कारण देशबंधु दास और मोतीलाल नेहरू ने “स्वराज्य दल” की स्थापना की, जिसका लक्ष्य विधान सभाओं में जाकर सरकार को स्वराज्य देने के लिए बाध्य करना था। अणे जी तो पहले से ही इस मत के समर्थक थे। कुछ काल बाद तो कांग्रेस ने भी कौसिलों में जाने के प्रश्न पर अपनी सहमति दे दी, पर कोई सरकारी पद न ग्रहण करने की शर्त लगा दी।

मांटफोर्ड योजना के अधीन नौकरशाही के पृष्ठपोषक और नरम दल वाले प्रांतीय कौंसिलों और असेंबली में घुस आए थे। नए चुनाव के बाद उनका दौर समाप्त हो गया| यद्यपि उनमें सी.वाई. चिंतामणि जैसे प्रतिभाशाली मंत्री अपवाद स्वरूप थे। अब तो वास्तविक जन नेता सच्चे अर्थो में देश का प्रतिनिधित्व करने लगे थे, देशबंधु दास ने अपने दल का नाम “स्वराज्य पार्टी” रखा। अखिल भारतीय स्वराज्य दल के नेता और महामंत्री पूर्ववत दास और नेहरू बने रहे। असेंबली के कार्यकाल में इस दल के प्रमुख वक्ता थे - मोतीलाल नेहरू, सत्यमूर्ति, जयकर, केलकर, अणे, मुंजे, शशमल और टी. प्रकाशम। अणे जी को रेल, मुंजे को रक्षा और सत्यमूर्ति को कानूनी मामलों का बड़ा ज्ञान था।

अणे जी हिंदू दायभाग कानून पर विशेष वक्ता माने जाते थे। माधव श्रीहरि अणे जी यह निश्चय करते कि कौन क्या बोले और किसका किस विषय पर विशेष अधिकार है। इसमें संदेह नहीं कि दल के सभी सदस्य उनकी निष्पक्षता पर पूरा भरोसा करते थे। साथ ही अणे जी स्वराज्य दल के भी मंत्री थे।

१९२४ में देशबंधु की मृत्यु होने पर दल बिखरने लगा। अणे जी अपने स्वभाव और प्रेम से इसे एक सूत्र में पिरोए रखते थे।

असेंबली में आए दिन स्वराज्य के लिए गर्जन-तर्जन और प्रभावशाली भाषणों से ऊब कर तत्कालीन भारतमंत्री लार्ड बर्केनहेड ने इंग्लैंड की पालर्लियामेंट में भारत के इन नेताओं को चुनौती दी और कहा कि ये नेता बकवास करते हैं। आज तक ये यह नहीं बता सके कि कैसा स्वराज्य ये चाहते हैं, कोई योजना हो तब तो कहें? तब जाकर इन नेताओं को यह ध्यान आया कि विद्वद्वर डा. भगवानदासजी ने असहयोग आंदोलन के प्रारंभिक दिनों में ही यह कहा था कि हमें कोई योजना या विधान बना लेना चाहिए। फल यह हुआ कि मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई, जिसमें चक्रवर्ती विजयराघवाचारी जैसे जाने-माने विधिवेत्ता थे। अणे जी उस कमेडी के भो मंत्री बने।

साइमन कमीशन का सारे भारत ने एक स्वर से बहिष्कार किया। असेंबली में सर्वप्रथम मालवीयजी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि उसमें एक भी भारतीय नहीं लिया गया है। यह एक बड़ी भूल अंग्रेज सरकार की थी कि जिन भारतवासियों के लिए रूपरेखा या विधान बनाया जा रहा हो, उनका उसमें प्रतिनिधित्व ही न हो। अणे जी ने अपने भाषणों में इस दुर्नीति की निंदा की। नमक कानून को तोड़ने के अवसर पर उन्होंने देश का साथ दिया और जेल गए। एक बार वह सत्याग्रह के “डिक्टेटर” भी बने। गांधीजी ने जब अपना प्रसिद्ध अनशन अछूतों को हिंदुओं से अलग करने के विरोध में किया, तो अणे जी ने अंग्रेजों की बड़ी भर्त्सना की। साइमन कमीशन के अवसर पर १९२७ में लाला लाजपतराय की और १९३१ में मोतीलालजी की मृत्यु के पीछे अणे जी कांग्रेस में अवश्य बने रहे, पर कांग्रेस की “मुस्लिम परक नीति” से वह दूर हटते जा रहे थे।

इतने में ही रेम्से मैक्डोनल्ड के कम्युनल आवार्ड ने आग में घी डाल दिया। कांग्रेस ने विचित्र रुख अपनाया। अवार्ड का न निषेध किया न स्वीकार । बंबई कांग्रेस के अधिवेशन में मालवीयजी के प्रभावशाली भाषण के बाद भी कांग्रेस अपनी नीति में परिवर्तन करने को जब तैयार न हुई, तो मालवीयजी के साथ अणे जी भी उससे अलग हो गए और कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी के नाम से नया दल बनवाया। नए चुनाव में जब मालवीयजी चुनकर न आ सके और वाग्मी शशमल का अकस्मात देहांत हो गया, तो अणे जी ने इस दल का नेतृत्व सम्हाला।

१९२४ और १९४२ के बीच कई वर्षों तक वह राज्य विधान सभा के सदस्य रहे। सन् १९४१ से १९४३ तक अणे जी बड़े लाट की कार्यकारिणी के सदस्य रहे। इस अवसर पर उन्होंने अपनी कोठी से पहरा उठा लिया। कारण यह था कि उनके एक मित्र को पहरेदारों ने घुसने न दिया। गृह सदस्य के यह कहने पर भी कि युद्ध का अवसर है और आपकी रक्षा जरूरी है, अणे जी न माने। जब सरकार ने “भारत छोड़ो” आंदोलन के सिलसिले में महात्मा गांधी को पकड़ा, तो अणे जी ने विरोधस्वरूप, रोषपूर्ण पत्र लिख, सदस्यता छोड़ दी।

अगस्त १९४३ से जुलाई १९४७ तक वह लंका में भारत के उच्चायुक्त (हाई कमिश्नर) रहे। १९४७ में वह संविधान सभा के सदस्य चुने गए, पर शीघ्र ही बहार के राज्यपाल बनाए गए और इस पद पर १९५२ तक रहे। वहां भी उन्होंने पहरा हटवा दिया था। १९५९ से १९६७ तक लोकसभा के सदस्य रहे।


माधव श्रीहरि अणे को प्राप्त सम्मान | माधव श्रीहरि अणे की मृत्यु


२९ जनवरी १९६८ को राष्ट्रपति ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया, किंतु राष्ट्र उनका समादर करने का सौभाग्य भी नहीं पा सका। २६ जनवरी १९६८ को वह सदा-सदा के लिए इस नश्वर संसार को छोड़कर चले गए।


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