मास्टर अमीर चंद | Master Amir Chand


सन १९०५ में बंगाल के विभाजन से भारत में जन-आंदोलन का सूत्रपात हुआ, पर १८५७ से ही क्रांतिकारी धारा चल पड़ी थी। जब सरकार ने इस जन-आंदोलन को दबाने की चेष्टा की तो यह गुप्त क्रांतिकारी आंदोलन में बदल गया। बंगाल में क्रांतिकारी आंदोलन की जड़ें बंग-भंग के विरुद्ध चलाए गए स्वदेशी आंदोलन में थीं, इस कारण वह दबाए नहीं दब सका। अंग्रेज सरकार की दृष्टि से स्थिति बिगड़ती ही चली गई।


दिल्ली का राजधानी बनाना


उन दिनों भारत की राजधानी कलकत्ता थी। अंग्रेजों ने सोचा बंगाल में राजधानी रखना ठीक न होगा, इस कारण वे कलकत्ता से राजधानी हटाकर दिल्ली ले आए। विचार यह था कि दिल्ली में राजधानी रखना सुरक्षित है, क्योंकि अभी तक उत्तर भारत में क्रांतिकारी आंदोलन नहीं फैला था। क्रांतिकारी भारत सरकार की इस चाल को समझ गए और वे उसे व्यर्थ कर देने पर तुल गए। वे अंग्रेज शासकों को यह पाठ पढ़ाना चाहते थे कि कलकत्ता छोड़ने से काम नहीं चलेगा, उन्हें भारत छोड़ना पड़ेगा।

१२ दिसंबर १९११ को दिल्ली दरबार किया गया। इसमें भारत के सारे राजे-महाराजे और नवाब ठाटबाट से हाथी, घोड़े, मखमल, सोना-चांदी, हीरे-मोती के साथ आए और उन लोगों ने ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि जार्ज पंचम के सामने झुककर राजभक्ति प्रकट की। इसी दरबार में यह घोषणा की गई कि अब राजधानी दिल्ली बना दी गई है।

घोषणा तो तब हुई, पर यह तय हुआ कि “उचित समारोह के साथ २३ दिसंबर १९१२ को वायसराय लार्ड हार्डिंग शानदार जुलस का नेतृत्व करते हुए दिल्लीवासियों को दर्शन दें और इस प्रकार नई राजधानी का उद्घाटन हो।

यथासमय वह जुलूस निकला। उसका उद्देश्य था जनता के दिल पर यह रौब बैठा देना कि ब्रिटिश साम्राज्य चिरस्थायी रहेगा और इसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। बात यह है कि कोई भी सम्राट या राजा रोब से ही राज्य करता है। सरकार क्रांतिकारियों पर ही नहीं दूसरों के मन पर रोब जमाना चाहती थी, कि इस साम्राज्य को स्वीकार कर लो | इसके विरुद्ध स्वप्न में भी विद्रोह या क्रांति करने की बात न सोचो।

क्रांतिकारी कुछ और ही सोच रहे थे।

२३ दिसंबर १९१२ को लार्ड हार्डिंग एक बहुत ऊंचे भव्य हाथी पर सवार थे, जिस पर बहुमूल्य होदा लगा हुआ था और हाथी का सारा शरीर कीमती कामदार कपड़े से ढका हुआ था। आखिर सम्राट के प्रधान प्रतिनिधि का जुलूस था, ऐसे सम्राट का जिसके साम्राज्य में सूर्य की क्या मजाल थी जो वह अस्त हो। दिल्ली महानगरी का इलाका किसी न किसी रूप में सैंकड़ों वर्षो से भारत की राजधानी रहा है।

पाटलिपुत्र कभी भारत की राजधानी रहा, पर अब वह एक प्रांतीय राजधानी मात्र था, पर दिल्ली फिर एक बार भारत की राजधानी के रूप में सामने आ रही थी। अब अंग्रेज दिल्ली की उस ऐतिहासिक शान में चार चांद लगाने वाले थे, क्योंकि केवल भारत के ही नहीं | आस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और जाने कितने छोटे-बड़े टापुओं और देशों के प्रतिनिधि अब दिल्ली को राजधानी बनाकर उसे फिर महानगरियों की रानी बना रहे थे। फिर एक बार दिल्ली के यश का सौरभ सारे संसार में फैलने वाला था। पर क्रांतिकारी भी कुछ सोच रहे थे। वे इस रौब को मिट्टी में मिला देना चाहते थे। लोगों के मन से भय निकालने के लिए ऐसा करना जरूरी था। भय जमकर बर्फ की तरह हृदय पर इस तरह बैठ गया था, कि उसमें क्रांति की लहर दौड़ नहीं सकती थी। इसलिए क्रांतिकारियों ने कुछ योजना बनाई, पर उसका पता सारे संसार को तब लगा, जब जुलूस निकला और उसके रंग में भंग हो गया।

उस जुलूस में राजे-महाराजे और नवाब थे। तड़क-भड़क, शान-शौकत की हद थी। साधारण जनता के मन में राजभक्ति हो या न हो, जनता तमाशा पसंद करती थी। इसलिए रोमन साम्राज्यवाद का नारा “जनता को तमाशे दिखा दो और रोटी दे दो, फिर उन पर राज्य करते रहो” | दरबार का तमाशा था पहले लगा, फिर आया यह दूसरा तमाशा। लाखो लोग एक झांकी के लिए बैचेन थे।

जब जुलूस चांदनी चौक की ओर बढ़ रहा था, तो बड़े जोर का धमाका हुआ। भगदड़ मच गई। हा-हाकार फैल गया। जब लोग कुछ संभले, तब उन्होंने समझा कि सम्राट के परम श्रेष्ठ प्रतिनिधि पर बम गिरा है अब की बार क्रांतिकारियों ने स्वयं वायसराय पर हमला किया था। लार्ड हार्डिंग तो बाल-बाल बच गए, पर उनके अंगरक्षक मारे गए।

लाखों रुपये खर्च करके वर्षों से योजना बनाकर विराट तमाशे का यह जाल फैलाया गया था, पर क्रॉतिकारियों ने बम फेंककर उसका मजा किरकिरा कर दिया। जाल की धज्जिया उड़ गई और उसमें मछलियां फंसना तो दूर, जालसाजी का पर्दाफाश हो गया। लोगों के मन में यह धारणा एक किरण के रूप में आ गई, कि स्वतंत्रता के सूर्य का उदय होगा और हम भी कभी स्वतंत्र होंगे। जिस काम का शुभ सूत्रपात १८५७ में हुआ था, वह एक मंजिल और आगे बढ़ गया। क्रांतिकारियां का डंका बज गया। राजाओं, महाराजाओं और अंग्रेजों का यह षडयंत्र व्यर्थ गया।

इस बम के पीछे कौन से लोग थे? जब अंग्रेजों की पुलिस इस रहस्य के पीछे पड़ी तो धीरे-धीरे भेद खुला। यह बम बवसंतकुमार विश्वास ने फेंका था। पर अकेले बसंतकुमार क्या करते ? एक ऐसे कार्य के पीछे बड़ा संगठन होता है। बसंतकुमार तो सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी रासविहारी बोस के आदमी थे, पर दिल्ली में इनको किन लोगों ने रास्ते बताए, छिपाकर रखा और सब तरह से सहायता दी।

जब पुलिस ने खोज की तो धीरे-धीरे प्याज के छिलके की तरह रहस्य की परतें खुलती चली गई। लाला हरदयाल का एक क्रांतिकारी गुट था, जिसमें सबसे प्रमुख रत्न थे - मास्टर अमीर चंद (Master Amir Chand)। अन्य प्रमुख सदस्य थे - भाई बालमुकुंद, अवधबिहारी, हनुमंत सहाय और बलराज भल्ला।

मुकदमा चला। नेता रासविहारी पकड़े नहीं जा सके। वह भागकर जापान पहुंच गए और वहीं बस गए। वहां वह जापानी भाषा सीखकर भारत पर पुस्तकें लिखते रहे। अंत में जब मौका आया और द्वितीय महायुद्ध छिड़ा, तो उन्होंने आज़ाद हिंद फौज का संगठन किया वह एक न्यारी ही कहानी है।

मुकदमें में मास्टर अमीरचंद, भाई बालमुकुंद, अवधविहारी और बसंतकुमार विश्वास को फांसी हुई, जिसे उन लोगों ने बड़े साहस से ग्रहण किया। इस समय दिल्ली में जहां आज़ाद मेडिकल कालेज है, वहां जेल थी, उसी में उनमें से प्रथम तीन को और बसंतकुमार विश्वास को अंबाला जेल में फांसी हुई।


मास्टर अमीर चंद का जन्म


मास्टर अमीर चंद का जन्म १८६९ में हुआ था। उनके पिता राय हुकमचंद हैदराबाद दक्खिन (उस समय देशी राज्य) की लेजिस्लेटिव असेंबली के सेक्रेटरी थे। वह इंग्लैंड गए तो कहते हैं, महारानी विक्टोरिया ने उनकी सराहना की थी। उनकी विधि संबंधी जानकारी इतनी थी कि कहते हैं उनकी एक पुस्तक बैरिस्टरों और वकीलों की पाठ्य पुस्तक थी।


मास्टर अमीर चंद की शिक्षा


अमीरचंद बचपन से दयालु स्वभाव के थे, उन्होंने मिशन स्कूल और कालेज में शिक्षा पाकर मिशन स्कूल में शिक्षक का पद ग्रहण कर लिया। उन्हें लड़कों को पढ़ाने में बड़ी रुचि थी। वह छात्रों को आर्थिक तथा अन्य सहायता भी देते थे। मिशन स्कूल में नौकरी करते-करते उन्हें पता लगा, कि संस्कृत स्कूल नाम से एक स्कूल खत्म होने को है, तब उन्होंने उसका प्रशासन संभालना और उसका मुख्याध्यापक बनना स्वीकार किया। उनके आते ही संस्कृत स्कूल की फिर से तरक्की होने लगी। इन्हीं दिनों जब रामजस स्कूल खुला, तो अमीर चंद उसमें भी बिना वेतन लिए छात्रों को पढाते रहे।


मास्टर अमीर चंद के कार्य


जब बंगाल में बंग-भंग के फलस्वरूप स्वदेशी आंदोलन चला, तो मास्टर अमीर चंद के पृष्ठपोषण और सहायता से किंनारी बाजार में स्वदेशी स्टोर खुला, इस प्रकार शिक्षा क्षेत्र के बाहर उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र में कदम रखा। वह शिक्षा के साथ-साथ स्वदेशी का प्रचार भी करने लगे।

सन् १९०७ में दिल्ली में ट्राम चलने लगी। मास्टरजी तथा अन्य कई लोगों ने इसका स्वागत नही किया, बल्कि इसमें बिट्रिश सरकार की चाल देखी। जिस तरह रेल चलाकर विद्रोह कठिन किया गया था, उसी के रूप में मास्टर अमीर चंद ने उसी का एक लघु रूप पाया। इसके अलावा ट्राम कंपनी विदेशी थी, लाभ सारा विदेश जाता था। मास्टरजी और हैदर रजा यह भाषण देते रहे कि ट्राम चालू करने का उदेश्य दिल्ली के लोगों को पंगु बनाना है। उस वक्त दिल्ली कोई बड़ा शहर नही था, फिर लोगो के पास समय भी था, इस कारण पंगु बनाने का तर्क एक हृद तक सही था। यह भी संभव है कि वह तर्क असलियत को छिपाने के लिए पेश किया गया हो।

स्वदेशी स्टोर में देश की बनी चीजें बेचने के अलावा राष्ट्रीय नेताओं के चित्र और उनकी जीवनियां भी उस स्टोर में उपलब्ध थी। पर इससे काम नही चला। मास्टरजी को आगे बढ़कर एक नेशनल वाचनालय खोलना पड़ा, जिसमें पाठकों के लिए देशभक्तिमूलक साहित्य प्रस्तुत किया जाता था पर लोग वाचनालय के आदी नहीं थे, इस कारण घर-घर जाकर लोगों में वाचनालय में आने का चस्का भी मास्टर साहब को पैदा करना पड़ा।

विदेशी सरकार को यह बात पसंद नहीं थी, इस कारण मास्टर साहब के पीछे खुफिया विभाग पड़ गया। सरकार नहीं चाहती थी कि लोग वाचनालय में जाएं या देशभक्तिमूलक साहित्य पढ़ें। सच तो यह है कि उस समय देशभक्ति से ओतप्रोत कोई साहित्य हिंदी-उर्दू में नहीं था। या तो धार्मिक साहित्य था या श्रृगार का कुछ किस्से-कहानियां भी थी, पर निम्न स्तर की। तब मास्टर साहब को साहित्य सृजन की ओर झुकना पड़ा। नेशनल वाचनालय की तरफ से कुछ पुस्तिकाएं छापी गई, पर जब पुलिस पीछे पड़ी तो प्रेस के मालिक इन पुस्तिकाओं को छापने से इनकार करने लगे।

उन्हीं दिनों “आफताब” नामक अखबार और आफताब प्रेस बंद कर दिए गए थे, जिससे लोगों में, विशेषकर प्रेस वालों में, डर पैदा हुआ। स्थिति ऐसी आ गई कि अपना छापाखाना हो, नहीं तो काम बंद कर दिया जाए। मास्टर साहब ने यह चुनौती मान ली और उन्होंने नेशनल प्रेस नाम से एक छापाखाना भी चालू कर दिया | अब प्रेस खुल गया तो काम नहीं, क्योंकि लोग इस प्रेस को काम देने में घबड़ाते थे। अपनी पुस्तिकाओं को छापने से प्रेस का पेट नहीं भरता था। इस कारण मास्टर साहब ने गणेशीलाल खसता को संपादक बनाकर “आकाश” नाम से एक उर्दू पत्र शुरू कर दिया। सरकार ने इस निडर देशभक्त पत्र पर कई हमले किए। इस पर कई बार मुकदमे चलाए गए, जिनकी पैरवी और दौड़-धूप में बहुत पैसे खर्च हुए। मास्टर साहब आदर्शवादी थे, इस नाते पत्र में विज्ञापन नहीं छापा जाता था | पत्र घाटे पर चलता रहा, पर मास्टर साहब ने किसी से कुछ न मांगा, वह स्वयं ही चुपचाप सारा घाटा झेलते रहे। उनका यह विचार था कि यदि लोगों से चंदा मांगा गया, तो वे बिदकेंगे। फिर चंदा मांगने का अधिकारी वही है जो पहले अपने को लुटा दे। यह था क्रांतिकारी चंदे का रहस्य।

मास्टर साहब को स्वामी रामतीर्थ के भाषणों में देश के उत्थान के बहुत सुंदर तत्व दिखाई पड़े। रामतीर्थ राम बादशाह कहलाते थे और उनके अंग्रेजी भाषण बड़े ओजस्वी होते थे | मास्टर साहब ने स्वामी रामतीर्थ के शिष्य स्वामी नारायण से बातचीत की और उन्होंने रामतीर्थ के भाषणों का एक संग्रह “इन द उड्स आफ गाड रिएलाइजेशन” यानी “ईश्वर उपलब्धि के अरण्य में” नाम से प्रकाशित किया।

मास्टरजी की देखरेख में १९०९ में दिल्ली में एक स्वदेशी नुमाइश खोली गई। इसमें सारे भारत से दुकाने आई और देशी कला-कौशल का अच्छा प्रदर्शन हुआ। लाला लाजपत राय ने इस प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। मास्टर अमीर चंद इस नुमाइश के कोषाध्यक्ष थे। पर ऐन मौके पर एक दिक्कत पैदा हुई। नुमाइश की कार्यकारिणी लालाजी के आगमन के जोश से पैसे बनाना चाहती थी| उन्होंने कहा कि लालाजी के भाषण पर टिकट लगाया जाए। पर मास्टर अमीर चंद इसके विरुद्ध थे। वह चाहते थे कि सब लोग लालाजी का भाषण सुनें और सब लोग उनका दर्शन करें। उस युग की दृष्टि से टिकट का जो मूल्य एक रुपया चार-चार आना रखा गया, वह ज्यादा था। गरीब लोग यह रकम दे नहीं सकते थे। जब कमेटी वालों ने उनकी बात नहीं मानी, तो वह इस कार्य से अलग हो गए। उन्होंने समिति को लिखा कि समिति टिकट इस कारण लगा रही है कि नुमाइश की विदेशी ठाट की सजावट पर जो खर्च उसने कराया, उसकी पूर्ति हो। पर इस टिकट के कारण हजारों गरीब भाई न तो नेता का दर्शन कर सकेंगे और न उनकी ओजस्वी वाणी सुन सकेंगे, फिर इस नुमाइश से क्या लाभ? जब जनता नेता की वाणी और दर्शन से वंचित रह जाएगी, तो यह उचित ही है कि मैं भी उससे वंचित रहूं।


मास्टर अमीर चंद के सामाजिक कार्य


नवजागरण के इन कार्यों के साथ-साथ उन्होंने यह जरूरी समझा कि सामाजिक नवचेतना का भी संचार किया जाए। उन्होंने विधवा सभा नाम से एक संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य विधवाओं की उन्नति करना और हो सके तो उनके पुनर्विवाह की व्यवस्था करना था। इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने एक पत्रिका भी निकाली।

जब १९१३ में गोपालकृष्ण गोखले यह खबर लेकर दिल्ली पधारे कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर अत्याचार हो रहा है और उन्होंने इस संबंध में दिल्ली में भाषण दिया, तो मास्टर अमीर चंद ने गोखले की तरह महज़ प्रतिवाद तक अपने को सीमित न रखते हुए यह आवाज उठाई कि यदि वहां की सरकार भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार जारी रखती है तो भारत सरकार से हम मांग करते हैं कि वह भी दक्षिण अफ्रीका के गोरों के साथ वही व्यवहार करे, नहीं तो हम यहां सत्याग्रह करेंगे।

उस जमाने में जब तब वेश्याओं का नाच कराया जाता था, जिससे धन का नाश होता था और लोगों में दुवर्यसन फैलता था। मास्टरजी ने इसके विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाई और सार्वजनिक विवेक पैदा कर दिया |

सन् १९१२ में जब वाइसराय पर हमला हुआ, तो पुलिस बहुत हैरान थी, कि यह किन लोगों का कार्य है। धीरे-धीरे तहकीकात करते-करते पुलिस को कुछ सुराग लगा। १९ फरवरी १९१४ को मास्टर साहब गिरफ्तार कर लिए गए, यानी वारदात के १४ महीने बाद। गिरफ्तारी के समय तक वह रामजस हाईस्कूल में निःशुल्क अध्यापन करते रहे।


मास्टर अमीर चंद का पारिवारिक विवरण


उनके व्यक्तिगत जीवन के संबंध में पता लगता है कि उनकी शादी कम उम्र में कर दी गई थी जैसा कि उन दिनों रिवाज़ था। उनकी पत्नी का जल्दी देहांत हो गया तो लोगों ने दूसरी शादी करने को कहा क्योंकि कोई बच्चा भी नहीं था, पर उन्होंने कहा कि जब स्त्रियों का पुनर्विवाह नहीं हो सकता तो पुरुषों का क्यों हो। इसी पर उन्होंने विधवा विवाह का सामजिक कार्यक्रम चालू किया था।


मास्टर अमीर चंद को फांसी की सजा


गिरफ्तारी के बाद मुकदमा कई महीनों तक चलता रहा। सबसे मजे की बात यह रही कि उनके एक निकट का रिश्तेदार उनके विरुद्ध सरकारी गवाह हो गया, पर वह अविचलित रहे। उनके साथी बालमुकुंद, अवधबिहारी और बसंतकुमार विश्वास परम साहसी व्यक्ति थे। ८ मई १९१५ को मास्टर अमीरचंद, बालमुकुंद और अवधबिहारी को दिल्ली जेल में फांसी हुई।

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