श्री संपूर्णानंद | डॉ संपूर्णानंद का जीवन परिचय | Sampurnanand



संपूर्णानंद का जन्म


संपूर्णानंद जी का जन्म १ जनवरी १८९० को बनारस के एक बड़े प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था| इनके पिता श्री विजयानंद जी सरकारी नौकरी में थे। उन्हें अपने चरित्र बल के कारण समाज में बहुत ही आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इनके पितामह बख्शी सदानंद जी काशी नरेश के यहां दीवान थे। सदानंद जी के नाम के पहले बख्शी क्यों लगता था इसका ठीक-ठीक पता नहीं और यह भी नहीं मालूम कि फिर उनके वंशजों ने अपने नाम के पहले बख्शी लगाना क्यों छोड़ दिया किंतु यह बात प्रसिद्ध है कि काशी के बहुत बड़े सिद्ध महात्मा ने, जिन्हें आज भी काशी निवासी बाबा कीनाराम के नाम से जानते हैं, किसी बात पर प्रसन्न होकर यह आशीर्वाद दिया था कि जब तक इनके परिवार में नाम के साथ आनंद लगा रहेगा वंश परंपरा चलती रहेगी। यही कारण है कि न केवल संपूर्णानंद जी के भाईयों के नाम में आनंद लगा हुआ है वरन् इनके लड़कों और पौत्रों आदि के नाम में भी आनंद शब्द चिरकाल के लिए जुड़ गया है।


संपूर्णानंद की शिक्षा


संपूर्णानंद जी को चरित्र की कई विशेषताएं अपने पिता से मिली थीं इनमें थी सत्य के प्रति निष्ठा, ईमानदारी और पुस्तकें पढ़ने का व्यसन। दस वर्ष की अवस्था तक संपूर्णानंद मूल तुलसीकृत रामायण तथा श्रीमद्भागवत और देवीभागवत के हिंदी अनुवाद पढ़ चुके थे। संपूर्णानंद बनारस के क्वींस कालेज में पढ़े और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से १९११ में बी.एस.सी. की डिग्री ली। बाद में एल.टी. अथवा अध्यापन कार्य करने की योग्यता का प्रमाणपत्र भी लिया। उन्होंने काशी के कटिंग मैमोरियल और हरिशचंद्र कालेज, वृंदावन (मथुरा) के प्रेम महाविद्यालय, इंदौर के डेली कालेज, बीकानेर के डूंगर कालेज और कुछ अन्य शिक्षा संस्थाओं में भी पढ़ाने का काम किया।

उत्कट देशभक्ति के कारण श्री संपूर्णानंद विदेशी शासन के अत्याचारों से क्षुब्ध हो उठते थे। बंग-भंग आंदोलन को जिस ऋ्रूरता से दबाया गया, उसके समाचारों से संपूर्णानंद जी इतना उत्तेजित हो उठे थे कि वह घर के कोठे पर एक कमरे में हवा में तलवार चलाकर अपना क्रोध निकालते। अपने कर्तव्य के विषय में निश्चय न कर सकने के कारण वह दुखी रहने लगे।


संपूर्णानंद के कार्य


सामाजिक जीवन में संपूर्णानंद तीन रूपों में दिखाई पडते हैं। वह शुरू में एक अध्यापक थे। राजनीति में प्रवेश करने के बाद भी, जब बनारस में काशी विद्यापीठ की स्थापना हुई, तो उन्होंने एक बार फिर से अध्यापन का काम किया था।

संपूर्णानंद जी को पढ़ने का व्यसन था। एक दिन कहीं पुरानी पुस्तक की दुकान में उन्हें युद्ध रचना और कौशल के ऊपर एक अंग्रेजी पुस्तक मिल गई। जब पं. बनारसीदास चुतुर्वेदी ने उनके हाथ में वह पुस्तक देखी तो उनका माथा ठनका और उन्होंने कहा कि अब आप राजनीति में निश्चय ही प्रवेश करेंगे। चुर्वेदी जी की यह भविष्यवाणी सत्यं सिद्ध हुई। किंतु इस पुस्तक के अध्ययन करने की एक पृष्ठभूमि भी है। उन दिनों प्रथम महायुद्ध चल रहा था और जिस प्रकार भारत को उसमें घसीटा गया था और अग्रेजों की जो नीति भारतीयों के प्रति, न केवल भारत में वरन्तु अन्य देशों में भारतीय प्रवासियों के प्रति थी, उससे इनके मन में बड़ी बेचैनी थी। उस बैचैनी को प्रकट करने का कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था और इनके मस्तिष्क में यही द्ंद् चल रहा था। यह संयोग की बात थी कि उसी समय राजनीति के आकाश में गांधीजी जैसे सूर्य का उदय हुआ और उनकी प्रभा से मंडित होकर असंख्य भारतीय उनके पीछे चल पड़े। उन्हीं में से संपूर्णानंद जी भी थे।

जुलाई १९२१ मे वह डूंगर कालेज बीकानेर से इस्तीफा दे, बनारस लौटकर मासिक पत्र “मर्यादा” के संपादक का काम करने लगे। १९२३ में वह काशी विद्यापीठ में तत्वज्ञान के प्रोफेसर बने। गांधीजी का नेतृत्व स्वीकार कर लेने के बाद फिर हिंसात्मक तरीकों से भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति की बात इनके मन से प्रायः समाप्त हो गई।

अपने राजनीतिक जीवन में संपूर्णानंदजी ने बड़ी कठोर तपस्या की और यातनाएं सही। वह न केवल स्वतंत्रता के लिए चलाए गए प्रत्येक आंदोलन में जेल गए, वरन राजनीतिक जीवन में प्रवेश करने के बाद उन्होंने आर्थिक दृष्टि से भी बड़ी कठिनाइयां झेली। उन्होंने एक बार कहा था कि राजनीतिक जीवन एक घर फूक तमाशा है और इसके संबंध में कबीर की यह वाणी कितनी सच्ची है : “कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ, जो घर फूके आपना चले हमारे साथ” राजनीति में प्रवेश कर संपूर्णानंदजी ने अक्षशः अपना घर फूंका और गांधी जैसे संत के आह्वान पर इन्होंने अपना सारा जीवन होम कर दिया था।

राजनीतिक क्षेत्र में काम करते समय न तो इन्हें अपनी गृहस्थी की चिंता थी और न ही इन्होंने अपने बच्चों का कोई ध्यान रखा। समय असमय इनकी संताने स्वस्थ और अस्वस्थ होती रहीं और प्रायः एक-एक कर परलोक भी सिधार गई, यहां तक कि एक बार अपने युवा पुत्र का दाह संस्कार करने के तुरंत बाद ही इन्होने जेल यात्रा की। आज इनकी संतानों में केवल इनके पुत्र श्री सर्वदानंद जी और कन्या श्रीमती शैलजा बची हुई है।

राजनीति में प्रवेश करने के बाद भी इन्होंने स्वाध्याय कभी बंद नहीं किया और संस्कृत और फारसी का बड़ा अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। अंग्रेजी और विज्ञान की शिक्षा तो इन्होंने कालेज में पाई ही थी, किंतु इतिहास, पुराण, दर्शन, राजनीति, समाजशास्त्र और न जाने कितने ऐसे छोटे-मोटे विषय थे जिनमें इनकी बहुत गहरी पैठ थी।

राजनीति में गांधीजी के परम अनुयायी होते हुए भी विवारों से ये समाजवादी थे और नरेंद्र देव जी के साथ इनकी परस्पर मैत्री का एक कारण यह भी था कि दोनों ही प्राच्य विद्या, संस्कृति और समाजशास्त्र के अच्छे विद्वान थे और दोनों की विचारधाराएं प्रायः एक-दूसरे से मेल खाती थी। किंतु जिन प्रश्नों पर इनमें मतभेद होता था उन पर घोर सैद्धांतिक मतभेद होने के बावजूद इनकी मैत्री पर कभी कोई आंच नहीं आई।

संपूर्णानंदजी और आठ अन्य व्यक्ति बनारस में १९३४ में मिले और उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही सोशलिस्ट पार्टी बनाने का निश्चय किया। उसी साल अक्तूबर में बंबई में कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर सोशलिस्ट पार्टी का पहला सम्मेलन संपूर्णानंदजी की अध्यक्षता में हुआ, जिसमें दल का संविधान स्वीकार किया गया।

श्री संपूर्णानंदजी तीन बार उत्तर प्रदेश कांग्रेस के सचिव चुने गए। १९४० में वह पूना में हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के २९वें अधिवेशन के अध्यक्ष थे। सन् १९३८-३९ में वह उत्तर प्रदेश सरकार में शिक्षामंत्री, १९४६ से १९५१ तक वित्तमंत्री तथा १९५१ से १९५४ तक गृहमंत्री रहे। १९५५ से वह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। १९६१ में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया।

अपने शासन काल में संपूर्णानंदजी ने प्रशासन को एक नई गति और नई विधि देने की पूरी कोशिश की। उन्होंने प्रशासन तंत्र में कई मौलिक सुधार किए। अंग्रेजों ने शासन का काम अविश्वास और रोक के सिद्धांत पर चलाया था। अंग्रेज अपने अधीन काम करने वाले प्रत्येक हिंदुस्तानी में अविश्वास रखते थे और उन्होंने ऐसी व्यवस्था कायम की थी किं हर व्यक्ति के काम में एक दूसरा व्यक्ति कुछ न कुछ रोक लगाने की हैसियत रखे। संपूर्णानंदजी ने इसके विपरीत “विश्वास और गति” के सिद्धांत को मान्यता दी और अपने शासनतंत्र को इसी सिद्धांत पर चलाने का सफल प्रयत्न किया। वह प्रत्येक सरकारी कर्मचारी चाहे वह उनके अधीन अथवा कहीं भी काम करता हो, विश्वास रखने के सिद्धांत के कायल थे। उनकी मान्यता थी कि जब तक हम प्रत्येक व्यक्ति में स्वभावतः विश्वास करने की आदत नहीं डालेंगे | तब तक न तो उसमें आत्मविश्वास का उदय होगा और न ही उसका चरित्र ऊंचा होगा।

जो व्यक्ति जहां काम कर रहा हो उसको अपने स्थान से अपने उत्तरदायित्वों को पूरी तरह निभाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए तभी शासन में गति आएगी। उनके शासनकाल में सरकारी कर्मचारियों का नैतिक बल बहुत बढ़ा और उनके अधीन काम करने वाले बहुत से कर्मचारियों के चरित्र का स्थायी निर्माण हुआ। भारतीय प्रशासन को उनकी यह सबसे बड़ी देन मानी जाएगी।


संपूर्णानंद की मृत्यु


मुख्यमंत्री के पद से हटने के कुछ ही दिनों बाद संपूर्णानंदजी राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त हुए। १९६७ के आम चुनावों के बाद तक वह उस पद पर बने रहे। जब वह राजस्थान में राज्यपाल के पद पर कार्य कर रहे थे, उसी समय उनका स्वास्थ्य गिरने लगा था और उनके पुराने रोग गठिया के साथ ही साथ उन्हें और कई प्रकार की व्याधियां सताने लगी थीं। वह धीरे-धीरे कृश होते गए और लगभग दो वर्ष की लंबी बीमारी के बाद उन्होंने १० जनवरी १९६९ में शरीर त्याग दिया।

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