सोहन सिंह भकना | Sohan Singh Bhakna


भारत के स्वतंत्रता संग्राम में १९१४-१५ के गदर आंदोलन का महत्वपूर्ण योगदान है। बाबा सोहनसिंह भकना (Sohan Singh Bhakna) इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से थे।


सोहन सिंह भकना का जन्म


बाबा सोहनसिंह का जन्म जनवरी २२ जनवरी १८७० में अमृतसर जिले के खुतराई खुर्दे गांव में हुआ था। वह परिवार के इकलौते बेटे थे और अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित ६५ एकड़ भूमि के स्वामी थे। वह जब एक साल के थे, उनके पिता करमसिंह की मृत्यु हो गई। करमसिंह ईमानदार और दयालु व्यक्ति थे और गरीबों की मदद करते थे। बाबा सोहनसिंह का परिवार सिख धर्म का पक्का अनुयायी था।


सोहन सिंह भकना की शिक्षा


सोहनसिंह को शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरुद्वारे भेजा गया, जहां केवल धर्म ग्रंथ ही पढ़ाए जाते थे। सोहनसिंह काफी कुशाग्र बुद्धि थे। शीघ्र ही उन्होंने सारे पाठ सीख लिए किंतु लिखने का ज्ञान उन्हें प्राप्त न हो सका। कारण ग्रंथ स्वयं इसमें कमजोर थे। इसके बाद ग्यारह वर्ष की अवस्था में वह एक प्राइमरी स्कूल में उर्दू पढ़ने गए। पढ़ने में तेज होने के कारण वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए।

जब वह युवा हुए तो खुशामदी दोस्तों की बुरी संगत में पड़ गए और उनको शराब की लत पड़ गई। शीघ्र ही अपनी सारी पूंजी गंवा बैठे। उनकी मां ने भी बेटे के प्रेम में पड़कर उनसे कभी ज्यादा आग्रह नहीं किया। जब वह २६ वर्ष के थे, उनके जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया।


सोहन सिंह भकना के सामाजिक कार्य


सोहनसिंह, बाबा केसरसिंह के निकट संपर्क में आए और उनके पिता की मृत्यु के वर्षो बाद दूसरी बार सोहनसिंह के यहां सत्संग हुआ। बाबा केसरसिंह के प्रभाव में आकर उन्हें शराब से घृणा हो गई। भकना गांव में प्रतिवर्ष होला त्यौहार मनाया जाता था, जिसमें नामधारियों के अलावा सभी संप्रदाय के लोग भाग लेते थे। सोहनसिंह इस मेले का सारा खर्च अपनी जेब से देते थे। इस प्रकार उन्होंने सत्संग से गांव में सामाजिक सुधार लाने की चेष्टा की।

इस मेले में अढ़ाई हजार रुपये तक खर्च हो जाया करते थे। १०-११ साल तक इस खर्चे के बोझ से वह कर्जदार हो गए। अब वह मेहनत करके रोजी-रोटी कमाना चाहते थे। किंतु कड़ी मेहनत का अभ्यास न होने के कारण वह जल्दी ही तंग आ गए और उन्होंने अमरीका जाने की तैयारी की क्योंकि उन्होंने यह सुन रखा था कि वहां खूब धन कमाया जा सकता है। सोहनसिंह के भारत छोड़ने से पूर्व लायलपुर और दूसरी जगहों में उपनिवेश बिल के विरोध में आंदोलन शुरू हो चुका था, जिसका नेतृत्व लाला लाजपतराय, सरदार अजीतसिंह और सूफी अम्बाप्रसाद कर रहे थे। इस आंदोलन से सोहनसिंह प्रभावित हुए बिना न रह सके।


सोहन सिंह भकना की अमेरिका यात्रा


सन् १९०७ में ४० वर्ष की उम्र में वह अमरीका रवाना हुए। चार अप्रैल को वह सीएटल के बंदरगाह पर उतरे। सोहनसिंह को कोनार्क मिल में नौकरी मिली, जहां पहले से ही करीब २०० पंजाबी काम कर रहे थे। काम बड़ा सख्त था और रोज की मजदूरी २ से ढाई डालर थी। शुरू-शुरू में उन्हें तकलीफ तो हुई, लेकिन बाद में वह अभ्यस्त हो गए। भारतीयों के अलावा वहां रूसी, तुर्क, चीनी व जापानी भी श्रमिकों का काम कर रहे थे। वे सब अपने देश में भुखमरी से बचने के लिए आए थे।

लेकिन अमरीकी मजदूर इनसे घृणा करते थे, क्योंकि ये सस्ते थे और वहां के मालिक इनका उपयोग हड़ताल तोड़ने के लिए करते थे।


सोहन सिंह भकना के कार्य


अमरीका में आजादी की हवा में खुलकर सांस लेने के बाद सोहनसिंह को महसूस हुआ कि स्वतंत्रता क्या होती है। १९१० से कनाडा ब्रिटिश उपनिवेश के रूप में स्वशासित था। भारतीयों के देश में आने पर कड़ी शर्ते लगा दी गई थीं। सोहनसिंह के पहुंचने से पूर्व लगभग ३७०० भारतीय वहां पहुंच चुके थे। उन्होंने वहां जाकर इन प्रतिबंधों के विरुद्ध संघर्ष किया। कनाडा सरकार भारतीयों से भेदभाव की नीति बरतती थी, क्योंकि कनाडा में स्थित श्वेतों की बड़ी संख्या उन गोरे अफसरों की थी | जिन्होंने भारत को गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहने में ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था। सरकार कनाडा को श्वेतों का देश बनाना चाहती थी। रोजी-रोटी के फेर में आए, भारतवासियों के लिए यह एक अच्छा सबक था। वे भी धीरे-धीरे साम्राज्यवाद की कुटिल नीतियों को समझने लगे और उनमें एकता की भावना दृढ़ हुई।

भारतीयों को अमरीका और कनाडा में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था और वे उन पर काबू पाने के लिए जी-तोड़ संघर्ष कर रहे थे। १९११ में जब इम्पीरियल कांफ्रेस बुलाई गई, तो भारतीय प्रतिनिधियों ने मौके का फायदा उठाकर अपनी मांगे पेश की और ब्रिटिश उपनिवेशों में भारतीयों पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने की मांग की किंतु लंदन की साम्राज्यवादी सरकार ने इन प्रतिवेदनों को कूड़े के ढेर में फेंक दिया। इस घटनाओं ने सोहनसिंह पर अत्याधिक प्रभाव डाला। अमरीका में उन्हें जगह-जगह पर गुलाम देश के नागरिक होने के कारण अपमानजनक बातें सुननी पड़ती थी। उस समय लाला हरदयाल जैसे क्रांतिकारी के प्रभाव में आकर उन्होंने अपने आपको “पैसेफिक कोस्ट हिंदी ऐसोसिएशन” Hindi Association of the Pacific Coast (प्रशांत सागर तटीय भारतीय संस्था) के रूप में गठित किया। बाबा सोहनसिंह इसके सभापति तथा लाला हरदयाल इसके मंत्री थे, इस अवसर पर तीन सदस्यों की एक गुप्त समिति बनाई गई। इनमें एक बाबा सोहनसिंह थे, सभी हिंदुस्तानी सभा के सदस्य बन गए। संस्था की ओर से १८५७ के स्वाधीनता संग्राम की स्मृति में भारतीय भाषाओं में “गदर पार्टी” नाम से पार्टी का साप्ताहिक पत्र नवंबर १९१३ में प्रकाशित हुआ। लाला हरदयाल इसके संपादक थे। संस्था की ओर से “गदर पार्टी” के अलावा “एलाने जंग”, “नया ज़माना” और “बैलेंसशीट आफ ब्रिटिश रूल” जैसी पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की गई। सभी प्रकाशनों में यह विचार प्रकट किया गया कि स्वाधीनता सशस्त्र विद्रोह द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है और इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए तैयारियां करनी है जिनमें राजनीतिक जन-आंदोलन, गुप्त संस्थाओं का गठन, शस्त् संग्रह और सेना के बीच कार्य शामिल होंगे।

हिंदी ऐसोसिएशन आगे चलकर “गदर पार्टी” में बदल गया। करतारसिंह सराबा कैलीफोर्निया में पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता थे। “गदर” के क्रांतिकारी लेखों ने भारतीयों में ब्रिटिश सरकार के प्रति बची-खुची वफादारी भी खत्म कर दी और सभी भारतीयों को गदर पार्टी के झंडे के नीचे खड़ा कर दिया। “गदर” के लेखों का भारतीयों पर जादुई प्रभाव पड़ा और वे कुछ ही महीनों में स्वाधीनता संग्राम के निडर सेनानी बन गए।

सन् १९१५-१६ में “गदर विद्रोह” का असफल प्रयास उस समय किया गया था, जब देश में राजनीतिक आंदोलन नहीं के बराबर था। इसकी असफलता का कारण जन-आंदोलन व क्रांतिकारी गतिविधियों के बीच तालमेल का अभाव था। भारत लौटकर अंग्रेजी राज उलटने के उद्देश्य से विद्रोह संगठित करने की तैयारियां १२ अप्रैल १९१४ को शुरू हुई। इस संबंध में आयोजित सभाओं में सोहनसिंह ने सक्रिय भाग लिया। १० मई १९१४ को कई स्थानों पर सभाएं बुलाई गई और उनमें भारत लौटकर अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए त्याग करने की अपीलें की गई।

यद्यपि गदर मुख्य रूप से पंजाब और बंगाल में आयोजित किया गया था, लेकिन मुख्य युद्ध-क्षेत्र पंजाब और उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहे। कैलीफोर्निया से लौटे गदर क्रांतिकारियों ने इसका नेतृत्व किया। बम की फैक्ट्रियां लगाने का काम रासबिहारी बोस के नेतृत्व में बंगाली क्रांतिकारियों ने किया। गदर क्रांतिकारी अलग-अलग जहाजों में वापस लौटे। लौटने वालों को पार्टी के सदस्यों ने अपनी गाढ़ी कमाई से हथियार दिए। इस कार्य में भकना ने सक्रिय योगदान किया था, उनका उद्देश्य भारत में विद्रोह की आग फैलाना था। गदर पार्टी के अध्यक्ष के रूप में सोहनसिंह को “कामागाटा मारू” जहाज के मुसाफिरों से संपर्क स्थापित करने के लिए कहा गया। वे कनाडा आने वाले प्रवासी थे लेकिन इन्हें कनाडा के अधिकारियों ने बंदरगाह पर उतरने की अनुमति नहीं दी। फलतः जहाज को वापस भारत रवाना होना था। सोहनसिंह ने मुसाफिरों को क्रांति का संदेश दिया और हथियार बांटे। “कामागाटा मारू” के मुसाफिरों ने पुलिस की ज्यादतियों का डटकर मुकाबला किया और अंत में उनकी पुलिस के साथ सशस्त्र मुठभेड़ हुई।

“कामागाटा मारू” के पीछे-पीछे सोहनसिंह “नामसंग” नामक जहाज में अक्तूबर १९१४ में कलकत्ता तट पहुंचे। उन्हें वहां तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर कैलीफोर्निया से नजर रखी जा रही थी। “कामागाटा मारू” कांड के बाद तो पुलिस और भी सजग हो गई थी। ब्रिटिश सरकार को उनकी सारी योजनाओं का सुराग मिल गया था | मार्च १९१५ तक अमरीका से लौटे ८९३ भारतीयों को नजरबंद कर लिया गया।

सन् १९१४ के अंतिम तथा १९१५ के शुरू के महीनों की कार्रवाई में सोहनसिंह भाग नहीं ले सके। यह कार्य पिंगले ने किया। गदर पार्टी के जर्मनी से संबंध स्थापित हो गए, योजना के बारे में सबसे पहले वही संदेश लाए थे । अडिग मनोबल, संगठन, योजनाबद्ध तरीके और आत्मबलिदान की भावना के बावजूद क्रांतिकारियों के प्रयत्न विफल रहे। इस कार्य में पुलिस को गुप्तचरों से काफी मदद मिली। सेना में काम करने वाले क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। उनमें से सैंकड़ों का कोर्टमार्शल हुआ तथा अनेकों को प्राणदंड दिए गए। बम फैक्ट्रियां और शस्त्र भंडार पकड़े गए तथा बंगाल, बिहार में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की गई। यही कारण है कि फरवरी १९१५ के अंतिम दिनों में “बलिदान दिवस” पर कोई विशेष घटना नहीं घटी।

मार्च १९१५ में लाहौर षड्यंत्र केसों की सुनवाई शुरू हो गई थी। बंगाल के क्रांतिकारियों ने १९१५ के बाद भी अपने प्रयास जारी रखे। सोहनसिंह को गिरफ्तार करने के बाद कलकत्ता में हवालात में डाल दिया गया। फिर उन्हें लुधियाना लाया गया और उसके बाद उन्हें मुलतान जेल भेजा गया। उन्हें वहां मानसिक पीड़ाएं दी गई किंतु उन्होंने उनका बड़े धैर्य से सामना किया। गुप्तचर विभाग उनसे गदर पार्टी के बारे में जानना चाहता था, किंतु उन्होंने उसकी एक न चलने दी। उन्होंने कहा – “मूझे फांसी मंजूर है लेकिन अपने साथियों के साथ विश्वासघात नहीं करूंगा।“

सोहनसिंह को मुलतान जेल से लाहौर सेंट्रल जेल में लाया गया। उनके अन्य कई साथी थे। पुलिस क्रांतिकारियों को सजा दिलवाने के लिए सारे सबूत इकट्ठे कर चुकी थी। उस समय पंजाब का गवर्नर माइकेल ओडायर बड़ा ही रक्त-पिपासु और धूर्त था। उसने सामान्य न्याय-व्यवस्था को निलंबित कर अपराध-पक्ष के तमाम कानूनी अधिकार छीन लिए। जजों का निर्णय अंतिम था और उसके विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती थी। अपराधियों के पास केवल एक चारा रह गया था - क्षमा याचना।

सारा मुकदमा एक जबर्दस्त चालबाजी थी। सोहनसिंह अच्छी तरह जानते थे कि उन्हें फांसी की सजा सुनाई जाएगी। मुजरिमों में से केवल आठ ही सरकारी गवाह बन पाए और उनकी गवाहियां सोहनसिंह को तख्ते पर पहुंचाने के लिए काफी थी। गुप्तचर विभाग शायद इन गवाहों के बयानों से संतुष्ट नहीं दीखता प्रतीत होता था, इसलिए उसने जेल में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। मुजरिमों को गवाह बनाने के लिए भयंकर यातनाएं दी गई। पहले और दूसरे लाहौर क्रांतिकारी केस के २४० लोगों पर मुकदमें चलाए गए। ४६ को प्राणदंड और १६० लोगों को अन्य सजाएं दी गई। इन ४६ में २४ गदर पार्टी के थे।

फांसी के दिन की पूर्वरात्रि देशभक्तों ने गाते हंसते गुजार दी। वे गदर के संगीत गाते और दुहराते। लेकिन सोहनसिंह और उनके साथियों को सवेरे जेलर ने बताया कि फांसी टाल दी गई है। बचाव पक्ष के वकील हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे थे। उन्होंने मोतीलाल नेहरू से मिलकर वाइसराय को मामले के सारे कानूनी पहलुओं से अवगत कराया जिससे सिर्फ छः को मृत्युदंड दिया गया और शेष १८ के दंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। इस प्रकार जागरूक लोगों की सक्रिय गतिविधि के कारण यह सामूहिक हत्याकांड रोका जा सका।


सोहन सिंह भकना को काले पानी की सजा


सोहनसिंह को आजीवन कारावास की सजा मिली और बाद में वह अंडमान की काल कोठरियों में भेजे गए। यहां एक नए संघर्ष की शुरुआत हुई। उन्होंने जेल में भी एक तरह का संगठन बनाए रखा और किसी भी बात के लिए वे संयुक्त रूप से निर्णय लेते थे। जेल में उनके साथ दुर्व्यवहार होता था। पर इन सब का सामना उन्होंने बड़े धैर्य और साहस के साथ किया। अंग्रेजों के जुल्मों के आगे एक कैदी शहीद भी हो गया। आखिर जेल की दशा सुधारने पर अधिकारियों को बाध्य होना पड़ा। १९२१ के मध्य में सोहनसिंह और उनके साथियों को कोयंबटूर जेल में लाया गया जहां उन्हें परिस्थिति से कोई खास संघर्ष नहीं करना पड़ा। बाबा सोहनसिंह बाद में यरवदा जेल में रखे गए। उस समय महात्मा गांधी भी उसी जेल में थे।

सन् १९२८ में बाबा सोहनसिंह भकना और केसर सिंह को लाहौर केंद्रीय जेल में लाया गया। वहां पहुंचकर उन्होंने शहीदों की शहादत की जगह पर सिर झुकाया। वहां भगतसिंह भी कैद मे थे और उन पर मुकदमा चल रहा था।


सोहन सिंह भकना का आमरण अनशन


इस तरह वह विभिन्न जेलों में रहे। आम तौर पर आजीवन कारावास की सजा १४ वर्ष की होती है किंतु ब्रिटिश सरकार उन्हें १६ वर्ष पश्चात् भी रिहा करने को तैयार नहीं थी। उन्हें वह जेल में सड़ाकर मार डालना चाहती थी। सोहनसिंह यह ताड़ गए और उन्होंने अनशन शुरू कर दिया। सोहनसिंह की हालत बिगड़ गई। जनता के दबाव के कारण सरकार उन्हें “मेयो अस्पताल” में दाखिल करने पर मजबूर हो गई। वहां भी उन्होंने अनशन जारी रखा जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ गया। यह आमरण अनशन ९० दिन चला। आखिर सरकार को झुकना पडा और उन्हें बिना शर्त रिहा कर दिया गया।

रिहा होने पर उनका वीरोचित स्वागत किया गया। प्रत्येक राजनीतिक दल ने उन्हें सम्मानित किया और उनके बलिदान, दृढ़ निश्चय तथा निस्वार्थ भावना की प्रशंसा की। रिहाई के बाद भी वह खाली नहीं बैठे रहे। तुरंत सक्रिय कार्य में जुट गए। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम अभी समाप्त नहीं हुआ है और जब तक हमें स्वतंत्रता नहीं मिलती, हमारा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष चलता रहेगा। उन्होंने अपने अन्य साथियों को भी आंदोलन की प्रेरणा दी। अपने लंबे कैदी जीवन के दौरान उन्हें सावरकर तथा बंगाली आतंकवादियों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ था। १९२९ में जब भगत सिंह और उंनके साथियों ने भूख हड़ताल की तो बाबाजी ने भोजन त्याग दिया था। जब उनसे कहा गया कि बुढ़ापे में उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए तो उन्होंने कहा था – “मेरा शरीर बूढ़ा दीखता है तो क्या हुआ, मेरे अंदर का क्रांतिकारी अभी भी जवान है।“

किसानों और काश्तकारों को संगठित करने में उनकी बहुत रुचि थी। पैदल ही वह दूर-दूर गांवों में जाया करते तथा किसानों से बातचीत कर उन्हें किसान सभा का सदस्य बना लेते थे। उन्हें संगठित कर वह कम्युनिस्ट पार्टी के कार्य में लग गए। दूसरा विश्वयुद्ध होने के बाद जब १९४० में सरकार ने सभी क्रांतिकारियों, वामपंथियों, कम्युनिस्टों तथा समाजवादियों को गिरफ्तार करने का सिलसिला चलाया, तो बाबा को भी जेल में ठूंस दिया गया।


सोहन सिंह भकना की मृत्यु


सन् १९४३ में रिहाई के बाद वह मृत्युपर्यंत दत्तचित्त होकर किसान सभा तथा साम्यवादी पार्टी के लिए कार्य करते रहे और २१ दिसंबर १९६८ स्वर्गवासी हुए। जब अमृतसर अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था तो राज्यपाल द्वारा प्रबंध कराए जाने पर भी उन्होंने विशेष वार्ड में जाने से यह कहकर इनकार कर दिया की - “मैं वही अपना इलाज कराऊंगा जहां आम जनता का होता है।“

बाबा सोहन सिंह भकना पर राष्ट्र गर्व कर सकता है। उनका जीवन सच्चे तथा निष्कलंक देशभक्त का जीवन था। उनकी समाजवाद में बड़ी आस्था थी और वह मृत्युपर्यंत इसके लिए कार्य करते रहे।

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