दधीचि ऋषि की कथा । Dadhichi Story In Hindi


मदिरा क़े प्यासे, अधिकारलोलुप असुरों ने पृथ्वीतल पर अधिकार-विस्तार कर स्वर्णमयी स्वर्ग पर अपनी दृष्टि लगा दी थीं । उनके गुप्तचरों ने अद्भुत स्वर्गलोक का जो मधुरिमापूर्ण वर्णन किया था, वैभवों की जो कथा कही थी, उस पर “असुरराज वृत्र” (वृत्रासुर) का मन मचल पड़ा । रात-दिन की लालसा के उत्तेज ने उसे अधीर बना दिया। असुरराज वृत्र ने, जब सारे सुर निश्चिन्त होकर मैनाक-विहार करने गये थे, घरों पर देवियों क़े अलावा के कोई देव न था, भीषण आक्रमण कर स्वर्ग पर अपना अधिकार विस्तार कर लिया । जब सुरगण स्वर्ग लौटे, तब दुर्ग द्वारो पर ही असुरों ने उन्हें मार-मार कर भगा दिया। सुरों के घर-द्वार, धन-सम्पत्ति, स्त्री-सन्तान सब लुट गये। उन्हें अपनी किसी वस्तु का भी मुँह देखने का सुयोग नसीब नहीं हुआ । वे दुःखित होकर निर्जन वनवास करने के लिये मजबूर हुए।

स्वर्ग का राज्य पाकर “वृत्र” (वृत्रासुर) ने सुरों की स्त्रियों की बेइज्ज्ती की। नये करों के नाम से उनको अनेक प्रकार का पीड़न दिया। इन्द्र और उनका सारा बल एक साथ मिलकर भी वृत्र के फौलादी पंजों से स्वर्ग का उद्धार न कर सका और न अपनी प्रजा को विपत्ति से बचने में सहायता दे सका । सब हैरान थे, कि स्वर्ग को कैसे बचाव पाया जा सकेगा। आखिर सुर और मानव, सबकी सम्मिलित शक्ति से असुरों पर आक्रमण करने की योजना हुई। अनन्त जनसमुद्र, विविध अस्त्र –शस्रों से सुसज्जित हो कर स्वर्ग का उद्घार करने के लिये उमड़ा ।

वृत्रासुर ने भी इस चढ़ाई की खबर सुनी । वह निश्चित था, क्योंकि वह अपनी मृत्यु से अभव था । बचपन से ही महत्त्वकांक्षाओ से प्रेरित होकर उसने घोर साधना और अटूट संयम द्वारा अक्षय बल प्राप्त कर लिया था और शरीर को इतना मजबूत बना लिया था की तीर-तलवार किसी की भी चोट उस पर असर न कर सके । असुरों की संगठन शक्ति में ही उसका सागबल था। उसके पसीने की एक बूँद पर उसके अनुयायी सौ रक्त की बूँदें टपका देने के लिये तैयार रहते थे, इसलिये असंगठित, शक्ति-विस्मृत सुरो की उछल-कूद का समाचार पाकर भी वह विचलित न हुआ। उसने अपनी सैनिको की दल को एक साथ भेजा तथा स्वयं दुर्ग-रक्षा पर रहकर सुरो का खुब सामना किया ।

त्रिपिष्टप की सीमा पर हुई सुर और असुरों की यह लड़ाई अनन्त काल से मशहूर है। इस दिन अनन्त सुरों को चन्द असुरों से पुनः जिस बुरी तरह से पराजित और अपमानित होना पड़ा था, वह कभी न भूलने योग्य घटना है। स्वयं देवराज इन्द्र अपनी समस्त शक्तियों से वृत्र (वृत्रासुर) पर आक्रमण करके भी उसका कुछ न बिगाड़ सके थे और दीर्घकाल की लड़ाई के बाद इस बुरी तरह से अपनी जान लेकर भागे, कि अपने अनुयायी सुरों की भी लौटकर सुध न ली। इस बार सुरगण सदा के लिये स्वर्ग की आशा छोड़ बैठे, पर सुरराज इन्द्र ने वृत्र के हाथों से जो हार पायी थी, उसका घाव उन्हें चुप बैठने के लिये मजबूर न कर सका । वे अब त्यागी- संन्यासी बनकर समस्त सुरों के साथ मातृभूमि स्वर्ग का उद्धार करने की चिन्ता में लगे थे। घोर विपत्ति के समय ही प्राणी को प्रभु का स्मरण हुआ करता है। इस बार समस्त सुरों को भगवान विष्णु का स्मरण हुआ। अत: आपस परामर्श कर वे क्षीरसागर की ओर चले ।

विष्णु ने व्यंग कें साथ कहा – “स्वदेश की भुमि ही जिनका जीवन है, वे भोग और विहारों में अपना समय नष्ट नहीं करते। सम्पत्ति वींरभोग्या है, जो भोगता है वही प्राण देकर उसकी रक्षा भी करता है । आप में यदि स्वदेशउद्धार की चिन्ता होती, तो कायरों की भॉति भाग कर मेरे पास न आते, वरन् देश के नाम पर अपने को बलि कर देते । परन्तु मालूम होता है, आप में वह जीवन ही नहीं रह गया है। अमृत पीकर जो अमर हो गये हैं, वे ही बलिदान का साहस न कर सके और अंत मे मेरी शरण ग्रहण करने आये हैं ? आपको अपनी धन-सम्पत्ति, स्त्री-बालकों का मोह है, जिनके मोह से आप स्वर्गोद्वार का उपाय मुझसे पूछने आये हैं। यदि मातृ-भूमि की भक्ति भी होती, तो वृत्र का अधिकार ही स्वर्ग में नहीं जम पाता ।

वृत्र (वृत्रासुर) अजेय है। उसने अखंड ब्रह्मचर्य की साधना की है। तप से मौत को जीत लिया है। उसे अस्त्र-शस्र नष्ट नहीं कर सकेंगे । उसका विनाश उस मनुष्य के शरीर का वज्र कर सकता है, जिसके शरीर की हड्डियों, उससे अधिक ब्रह्मचर्य-पुष्ट हों, जिसने अनन्त काल तक अपने को तपस्या की मिट्टी में तपाया हो । यदि वही आत्मदान कर-तुम्हें अपने शरीर की अस्थि दे और उसका विश्वकर्मा की कुशल-प्रतिभा से वज्र निर्माण करे, तो उसी वज्र की एक चोट से, न केवल वृत्र वरन् उसका समस्त सैन्यदल तक भस्म हो सकता है।“

सुरलोग इस उपाय को सुनकर स्तम्भित रह गये । कौन है ऐसा ? जिसने अनन्त युगतक तपस्या की हो और कल्पों तक ब्रह्मचर्य धारण किया हो ? मिथ्या बात है ! सुरों ने नितान्त सत्यता से कह दिया, कि “ऐसा व्यक्ति सृष्टि भर में दुर्लभ है ।“

विष्णु ने फिर कहा – “मेरी सृष्टि में दुर्लभ कुछ नहीं है। इन्द्र ! जाओ, तुम्हारा यह कर्त्तव्य है, कि ऐसे पुरुष की खोज करो । जब तक स्वदेश के लिये तुम इतना कष्ट न उठाओगे, तब तक उसका उद्धार होना असम्भव है । “

इन्द्र ने नीचे सिर करके कहा, -"जो आज्ञा ।"

दिन-पर-दिन बीत गये, महीनों-पर-महीने और बरसों के बाद इन्द्र ने त्रिभुबन का एक-एक कण खोज डाला, पर कहीं विष्णु द्वारा निर्दिष्ट लक्षण वाला विशिष्ट व्यक्ति नहीं मिला। अब यह निराश मुख देवताओं को कैसे दिखाया जायेगा, यही सोच रहे थे की कि त्रिभुवन-विहारी नारद ने अकस्मात् उपस्थित होकर इन्द्र का दुखड़ा सुना । उत्तर में उन्होंने कहा - "हिमालय की अधित्यका पर दधीचि ही ऐसे ऋषि हैं, जो विष्णु-द्वारा बताए गए लक्षणों से सम्पूर्ण विशिष्ट हैं । आप उन्हीं के पास जाकर यह असम्भव भिक्षा माँगिये ।“

इन्द्र के निराश प्राणों में आशा का उम्मीद जागी। वे पिछले परिश्रम की दुख को भूलकर रात-दिन एक करते हिमालय पर जा पहुँचे| दूर पर अनेक शिष्यगण से घिररकर बैठे महर्षि दधीचि का उन्हें दर्शन हुआ । इन्द्र को उनके दर्शन-मात्र से ही शान्ति मिली। मानों इस जगत के दधीचि ही अधीश्वर हों।

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इन्द्र ने थोड़ी ही देर में देखा, कि उनके अनेक आत्मचर विविध लोकों से प्राणियों की विपत्ति-कथा का समाचार लेकर आते हैं और ऋषि वर उन्हें सुन-सुनकर, तत्काल हल करने का प्रयत्न करते हैं । इसीलिये इन्द्र की दूर-दृष्टि से ऐसा मालूम हुआ, कि ऋषि की रक्षा में अनन्त प्राणियों का आशिर्वाद नियुक्त है । उन्हें कोई भी घातक वायु स्पर्श नहीं कर सकता। विनाश-पूर्वक उनकी हड्डीका पा सकना तो नितान्त असम्भव बात है।

बहुत देर के सोच-विचार के बाद इन्द्र दुखी स्थिति मे दधीचिं के सम्मुख पहुँच । साष्टांग प्रणाम कर बैठे । ऋषी ने उनके आने का कारण पूछा । इन्द्र ने संक्षेप में उत्तर दिया कि - "आप जैसे परोपकार परायण परमार्थी की सेवा का पुण्य प्राप्त करने के लिये आया हूँ।" दुधीचि मुस्करा दिये, महीनों की एक मनसे की हुई आश्रम-परिचर्या के बाद ऋषि इन्द्र को आशीर्वाद देने के लिये तैयार हुए। इन्द्र ने ऋषि को स्वर्ग विनाश की कथा कही और वृत्रासुर के अत्याचारों का वर्णन किया। सुरों के गृहभ्रष्ट होकर निजन वनवास का बखान किया। ऋषि ने कहा – “आखिर मेरे द्वारा इस विपत्ति का किस प्रकार निदान होगा ?"

वही बताता हूँ कह कर इन्द्र ने विष्णु के उपदेश और नारद का निर्देश कह सुनाया और बाद मे ऋषि के उत्तर की अपेक्षा में चुप हो रहे । “

दधीचि ने कहा – “देवेन्द्र ! सुर मेरे सजातीय और स्वर्ग-भूमि मेरी आदि-जननी है । स्वजाति और स्वदेश का दुःख मेरा दुःख है। इसके लिये आत्मर्पण करना मेरा पहला कर्तव्य है। एक दिन इस देह का बिनाश अवश्य है। अत: यह रोग-शय्या पर सड़-सड़ कर नष्ट हो, उससे पूर्व तो स्वजाति और स्वदेश के हितार्थं ही त्यागा जाए, इसको अमरता प्राप्त होना है। मैं अभी इस शरीर को भस्म करता हूँ, तुम मनचाही अस्थियाँ लेकर सुरकाज सँवारो ।"

इतना कहते-कहते, इन्द्र के उत्तर की बिना प्रतीक्षा किये ही ऋषि ने तप प्रभाव से तेज प्रकट किया और इन्द्र के देखते-देखते दधीचि अस्थि मात्र रह गये । क्षण-भर में ही इस अकल्पित घटना को होते देख इन्द्र स्तम्भित रह गये। वे कहाँ है, क्या हो रहा है ? इसका उन्हें तनिक भी ज्ञान न रहा। बहुत देर बाद उन्हें स्मरण हुआ, तब वे दुधीचि के त्याग का महत्व समझ सके। सचमुच पृथ्वीतलमें उन्हें दधीचि सा स्वदेश और स्वजाति-सेवी दिखाई नहीं दिया। जिनका स्वर्ग से प्रत्यक्ष और अतिनिकट सम्बन्ध था ।

इन्द्र ने दधीचि की अस्थियों को विश्वकर्मा को ले जाकर दीं। विश्वकर्मा ने बहुदिनव्यापी परिश्रम के बाद उन अस्थियों का ऐसा अद्भूत वज्र निर्माण किया, जिसकी चमक से विश्व चमत्कृत हो जा सके। इन्द्र ने उसी वज्र को लेकर, ऐरावत पर सवार हो, असुरों को जा ललकारा।

असुर इस समय विलासिता में मस्त हुए भोग, भोग रहे थे । वृत्र (वृत्रासुर) देवतओ को पहले जैसा अबल समझकर बिना पूरी तैयारी के ही इन्द्र का सामना करने चला । इन्द्र ने उसको सामने देखते ही वज्र पूरे पराक्रम से घुमाकर फोंका, जिसके पहले आघात से ही वृत्र मारा गया, साथ ही उस वज्र ने एक-एक असुर को ढूँढ़ दूढ़ कर मारा। स्वर्ग स्वाधीन हुआ। सुरों ने पुनः अपना देश और गृह पाये । उस दिन के बाद से आज तक, केवल स्वर्ग ही नहीं, वरन् त्रिभुवन में दधीचि का यह देह-दान अलौकिक और महान त्याग माना गया। आज भी स्वदेश और स्वजाति पर बलि होने वालों में “दधीचि” प्रथम माने जाते है।

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