अरब मे मुर्तिपुजन । मुहम्मद का पैगम्बर बनना । मुहम्मद साहब की मृत्यु | Idol worship in Arabia | Muhammad's becoming a prophet | Muhammad's death

“हुबल”(Hubal), “लात्”, “मनात” (Manat), “उज्ज़”(Ujz) आदि अलग-अलग अनेक देव-प्रतिमाएँ, उस समय अरब के प्रत्येक क़बीले में लोगों की इष्ट थी । बहुत पुराने समय में वहाँ मृर्तिपूजा नही होती थी । “अमरु”(Amru) नामक काबा के एक प्रधान पुजारी ने “शाम” (Sham) देश में सुना, कि इनकी आराधना से दुष्काल से रक्षा और शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। उसी ने सबसे पहले “शाम” (Sham) से लाकर कुछ मूर्तियां काबा (Kaaba) के मन्दिर में स्थापित कीं। देखते-देखतें इसका प्रचार इतना बढ़ा कि सारे देश में मूर्ति-पूजा होने लगी । अकेले “काबा” (Kaaba) मन्दिर में ३६० देव मूर्तियाँ थीं, जिनमें हुब्ल (जो छत पर स्थापित थे) कुरैश (Quraysh) वंशियों का इष्ट था। “जय हुव्ल” उनका जातीय घोष होता था ।

लोग मानते थे की यह मूर्तियां ईश्वर को प्राप्त कराती और मिलाती है इसलिए वे उन्हें पूजते थे । अरबी में “इलाह”( Ilah) शब्द देवता और उनकी मूर्तियों के लिये प्रयुक्त होता है, परंतु “अल्लाह” (Allah) शब्द “इस्लाम” (Islam) काल से पहिले उस समय भी, एक ही ईश्वर के लिये प्रयुक्त होता था ।

“खदीजा” (Khadija) और उनके भाई “नौफ़ल”(Naoufal) मूर्तिपूजा विरोधी यहूदी धर्म (Judaism) के अनुयायी थे । अपनी यात्राओं में अनेक महात्माओं के सत्संग एवं लोगों के पाखण्ड ने उन्हें मू्र्ति-पूजा से दुर कर दिया । वह ईसाई भिक्षुओं की तरह “हिरा” की गुफा में एकान्त में रहने और ईश्वर मे ध्यान लगाने के लिए जाया करते थे । “इक्रा व- इस्मि रब्बिक” (पढ़ अपने प्रभु के नाम के साथ) यह प्रथम कुरान वाक्य पहिले वहीं पर, देवदूत “जिब्राइल” (Gabriel) द्वारा महात्मा मुहम्मद (Muhammad) को बताया गया। उस समय देवदूत के शरीर को देखकर क्षण भर के लिये वह मू्छित हो गये थे। जब उन्होंने इस घटना को “ख़दीजा” (Khadija) और “नौफल” ”(Naoufal) को सुनाया तो उन्होंने कहा – “अवश्य वह देवदूत था, जो इस अवतार को लेकर तुम्हारे पास आया था।“ इस घटना के समय महात्मा मुहम्मद की आयु ४० वर्ष की थी । यहीं से उनकी पैगम्बरी का समय प्रारम्भ हुआँ ।


मुहम्मद द्वारा इस्लाम का प्रचार और कष्ट सहना | Propagation of Islam by Muhammad and Suffering


ईश्वर के दिव्य आदेश को पाकर मुहम्मद (Muhammad) मक्का (Makka) के दाम्भिक पुजारियों और समागत यात्रियों को “कुरान” (Quran) का उपदेश सुनाना आरम्भ किया। मेला के खास दिनों (“इहराम” के महीनों) (Ihram) मे दूर से आये हुए तीर्थ-यात्रियों के समूह को, छल-पाखंड, और अनेक देवताओं की उपासना का खंडन करके वह एक ईश्वर (अल्लाह) की उपासना और शुद्ध तथा सरल धर्म के अनुष्ठान का उपदेश करते थे। “कुरैशी”(Qureshi)जाति के लोग, अपने इष्ट और आमदनी की इस प्रकार निन्दा होते और इस प्रकार का प्रहार होते देख, “हाशिम” (Hasihm) परिवार की शत्रुता के डर से, उन्हें मारने की हिम्मत न कर सकते थे । किन्तु इस नवीन धर्म के अनुयायी, दास-दासियों को तपतें रेत पर लिटाते, कोड़े-मारते तथा बहुत कष्ट देते थे । तो भी धर्म वह अपने धर्म को न छोड़ने के लिये तैयार थे। इस अमानवीय अत्याचार की दिन-व-दिन बढ़ते देखकर अन्त में महात्मा ने, अनुयायियों को “अफ्रीका” के “हब्श” नामक राज्य में जहाँ का राजा बड़ा न्यायपरायण था, चले जाने की अनुमति दे दी। जैसे-जैसे मुसल्मानों की संख्या बढ़ती जाती थी, “कुरैशी”(Qureshi) का द्वेष भी वैसे-वैसे बढ़ता जाता था । किन्तु “अबू तालिब” (Abu Talib)के जीते़जी खुलकर उपद्रव करने की उनकी हिम्मत न होती थी। जब “अबूतालिव” (Abu Talib) का देहान्त हो गया, तो उन्होंने खुलेतोर पर विरोध करने पर कमर बाँधी ।


मुहम्मद साहब का मदीना आना | Muhammad's coming to Medina


महात्मा मुहम्मद की उम्र ५३ वर्ष की थी। उनकी स्त्री “खदीजा” (Khadija)का भी देहान्त हो चुका था । एक दिन “कुरैशियों” ने महात्मा मुहम्मद की हत्या के लिए उनके घर को चारों ओर से घेर लिया, किन्तु महात्मा मुहम्मद को इसका पता पहिले से मिल चुका था । उन्होंने पहले ही वहाँ से 'यस्त्रिब' ( मदीना) (yastrib)नगर को प्रस्थान कर दिया था। वहाँ के शिष्यों ने श्रद्धा से गुरु सें मिलने की प्रार्थना की थी। पहुँचने पर उन्होंने महात्मा के भोजन, वासगृह आदि का प्रबन्ध कर दिया। जब से उनका निवास 'यस्त्रिब' (yastrib)में हुआ, तब से नगर का नाम मदीनतुन्नबी (madinatunnabi)या नबी का नगर (Nabi Nagar) प्रसिद्ध हुआ । उसी को छोटा करके आजकल केवल “मदीना” (Medina)कहते हैं ।

“फरान”(Faran) में तीस खण्ड हैं और वह ११४ “सूरतों” ( अध्यायों) में भी विभक्त हैं । निवास क्रम से प्रत्येक सूरत “मक्की” या “मदनी” नाम से पुकारी जाती है। अर्थात् मक्का में उतरी “सूरतै” मक्की और मदीना में उतरी “मदनी” कही जाती हैं।


मुहम्मद साहब की मृत्यु | Muhammad's death


मदीना में महात्मा मुहम्मद (Muhammad) अधिक दिन तक शान्तिपूर्वक विश्राम न कर सके थे कि वहाँ भी क़ुरैश उन्हें कष्ट पहुँचाने लगे । अन्त में आत्म-रक्षा का कोई अन्य उपाय न देख क़ुरैश और मदीना-निवासी यहूदियों के साथ उन्हें अनेक युद्ध करने पड़े, जिनकी समाप्ति, “मक्का” विजय और “काबा” को मूर्तिरहित करने के साथ हुई । महात्मा मुहम्मद ने अपने आगे का जीवन को मदीना ही में बिताया। उनके जीवन ही में सारा अरब एक राष्ट्र और एक धर्म के सूत्र में बंध गया और इस्लाम-धर्म में शमिल हो गया । ६३ वर्ष की उम्र में इस प्रकार महात्मा मुहम्मद (Muhammad) अपने महान जीवनोद्देश्य को पूर्णकर, शिष्यजनों को छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हुए ।

“क़ुरान” (Quran) के भाव को समझने में पद-पद पर उस समय की परिस्थिति और घटना अपेक्षित है । ४०वें वर्ष में “इक्रा बि-इस्मि रब्बिक” से लेकर मरने से १७ दिन (कुछ के अनुसार १२ दिन ) पूर्व “रव्विकल अक्रम” ( प्रभु तू अति महान है) इस वाक्य के उतरने तक, और भी बहुत कुछ महात्मा मुहम्मद द्वारा प्रचारित हुआ ।

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