प्रहलाद भगत की कथा । भक्त प्रह्लाद की कहानी । Prahlada । Prahlada Story


प्रह्लाद की माता का नाम कयाधू और पिता का नाम हिरण्यकश्यप था । हिरण्यकश्यप ने लम्बे समय तक तपस्या कर अलौकिक शक्ति प्राप्त की थी, परन्तु वह उसे सत्कार्य में उपयोंग न कर सका । वह दुराचारी और नीच प्रकृति का मनुष्य था ।

प्रह्णाद के तीन भाई और थे, किन्तु वे सभी स्वभाव में अपने पिता के ही समान थे पर प्रह्लाद सर्वथा दोष-रहित, भगवद्ग भक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, तत्वज्ञानी, सहनशील, दयालु और परोपकारी पुरुष थे। उनमें अपने पिता और भाइयों का एक भी दुर्गण दिखाई न देता था । वे परम ब्रह्मनिष्ठ और सद्गुणी थे। उन्हें देख सबको आश्चर्य होता था, कि दानव-कुल में यह देवचरित्र बालक कैसे उत्पन्न हुआ ? इसका स्वभाव इतना विलक्षण क्यों है ?

जिस समय हिरण्यकश्यप तप करने गया, उस समय दानवो को शक्तिहीन पाकर देवताओं ने उन पर आक्रमण कर दिया। बिना सेनापति के सेना रण-क्षेत्र में कदापि नहीं ठहर सकती। उसकी अनुपस्थिति में दानवो की घोर पराजय और देवताओं की विजय हुई। निरुपाय दशा में दानवो ने पलायन करना ही श्रेयस्कर समझा । वे अपना धन-धाम और सर्वस्व ज्यों-का-त्यों छोड़, प्राण बचाकर भागने लगे । देवताओं ने हिरण्यकश्यप का राजमन्दिर और समूचा नगर लूट लिया ।

उन्हीं दिनों कयाधू गर्मवती थी। न वह अपने प्राण दे सकी और न भागकर आत्म रक्षा कर सकी। देवराज इन्द्र ने उसे अपने साथ अमरावती ले जाना तय किया। जब वे उसे ले चले, तब मार्ग में कहीं वींणापाणि नारद से भेट हो गयी । नारद ने पूछा – “हे देवराज ! एक तो यह पर-नारी और दूसरे गर्भवती है । इसे ले जाकर क्या करोगे ?”

इन्द्र ने कहा – “हम लोगों ने दानवो को समाप्त करना तय किया है। अतः इस के गर्भ से जो बालक उत्पन्न होगा, उसे भी मार डालेंगे और बाद मे इसे छोड़ देगे।"

नारद ने कयाधू की ओर देखा । उसकी दीन और मलिन मुख-मुद्रा देख, उन्हें दया आ गयी । वे बोले,- राजन् ! इसे इसी समय छोड़ दीजिये । मैं विश्वास दिलाता हूँ, कि इसके उदर से जो पुत्र उत्पन्न होगा, यह महान् ईश्वर-भक्त, सदाचारी और सचरित्र होगा। उसके द्वारा देवताओं का कभी अनिष्ट न होगा ।“

किसकी सामर्थ्य थी, जो नारद की बात टाल सके ?

देवराज ने तत्काल कयाधू को बन्धन-मुक्त कर दिया । नारद ने उसे सम्बोधित कर कहा, - "पुत्री ! मुझ यह भली भाति पता है, कि तुम साध्वी और सती रमणी हो। जब तक तुम्हारे पति लौट न आयें, तब तक चलो, सानन्द मेरी कुटी में निवास करो ।“

कयाधू ने कहा - “आपने मेरी रक्षा की है। अतः आप मेरे पिता के समान हैं। आप जो कहें, मैं वही करने को तैयार हूँ।“

कयाधू की यह बात सुन, नारद को परम सन्तोष प्राप्त हुआ। वे सानन्द उसे अपने आश्रम में ले गये। वहीं साध्वी कयाधू तपस्विनि की भाँति पवित्र जीवन व्यतीत करने लगी। उसकी नित्यचर्या से प्रसन्न हो, नारद ने उसे आत्मधर्म और निर्मल भक्ति का उपदेश दिया। इसका प्रभाव गर्भस्थ बालक पर भी पड़ा। यथा-समय प्रहलाद पैदा हुए। दो- तीन वर्ष की अवस्था में प्रहलाद के अलौकिक गुण प्रकट होने लगे। लोग उन्हें देखकर चकित हो जाते थे। उन्हें इस बात का पता न था, कि हिरण्यकश्यप के वंश मे जन्मा बालक नारद मुनि के संस्कार द्वारा परिवर्तित हो गया था ।

प्रहलाद के हृदय में भक्तिभावना का जो बीज नारद मुनि ने उत्पन्न किया था, वह अब अकुरित और पल्लत्वित हो चला था । प्रहलाद की अवस्था पाँच वर्ष की भी न थी, कि उनमें भक्ति प्रकट होने लगा । एक दिन हिरण्यकश्यप ने उन्हें बढ़े प्रेम से गोद में बैठा कर पूछा,-"पुत्र ! कहो, तुम्हें संसार में कौन-सी बात सबसे प्रिय मालूम होती है ?"

प्रहलाद ने कहा - "पिताजी ! मुझे यह दुनियांभर की हाय-हत्या और मिथ्या बात बिलकुल पसन्द नहीं। मेरे जी में तो यही आता है, कि एकान्त अरण्य में बैठ भगवान का भजन करूँ। यही मुझे सर्वाधिक प्रिय है।"

प्रहलाद की बात सुन, हिरण्यकश्यप चौंक पढ़ा । वह त्याग की अपेक्षा भोग का आसन अधिक ऊँचा समझता था । खाना, पीना और सुख भोग करना; इसे ही वह जीवन का उद्देश्य मानता था। अपने अबोंध बालक के मुँह से उपयुक्त शब्द सुनकर उसने पूछा – “पुत्र ! तुम्हें यह उलटी बाते किसने सिखायी हैं ?”

प्रहलाद ने कहा - "किसी ने नहीं, पिताजी ! जो मैं कहता हूँ, वह वास्तव में मुझे प्रिय है।

हिरण्यकश्यप चुप ही रहा सोचने लगा, “ मालूम होता है, कि किसी ने मेरा अनिष्ट करने के उद्देश्य से इस अबोध बालक की बुद्धि भ्रष्ट कर दी है। अनेक ब्राह्मण इधर-उधर घूमा करते हैं । शायद उन्हीं में से किसी ने यह कार्य किया हो। यह भी सम्भव है, कि मेरे शत्रुओं ने इसे ऐसी शिक्षा दी हो । मैं अपने जीते जी इसे गलतमार्ग ने न जाने दूँगा। जिन देवताओं ने मेरी अनुपस्थिति में मेरा सर्वस्व हरण कर लिया था, यह उन्हीं की उपासना करे ! यह मैं सहन नहीं कर सकता। अभी यह बालक है। इसका हदय कोमल है जिधर झुकाने की चेष्टा की जायेगी, उधर मुड जायेगा इसे शिक्षा देकर ऐसा बना दूँगा, कि जो मैं कहूँ, वही करे । शत्रुओ का षड़यन्त्र मैं कदापि सफल न होने दूँगा "

ऐसे ही अनेक तक-वितर्क कर हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को गुरुकुल भेजना तय किया। दानवों के कुलगुरु शुक्राचार्य थे, किन्तु उन दिनों वे तपस्या करने चले गये थे। इसलिये हिरण्यकश्यप ने शुक्राचार्य के पुत्र शंद और अमर्क को बुलावा भेजा। हिरण्यकश्यप ने उनसे कहा – “देखो, तुम स्वयं समझदार हो। अतः विशेष कहना व्यर्थ है। बालक प्रह्लाद को तुम्हें सौपता हूँ। इसे ले जाकर अपने विद्यालय में रखो और समुचित शिक्षा दो । यदि इसे सब प्रकार की नीति सिखा कर देव और दानवों-पर शासन करने योग्य बना दोगे, तो मैं तुम्हें यथेष्ट धन प्रदान कर सन्तुष्ट कर दूँगा।"

हिरण्यकश्यप की आज्ञा से शंद और अमर्क प्रह्लाद को अपने विद्यालय में ले गये। प्रहाद ने अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर पट्टी पर सबसें प्रथम भगवत-नाम लिखा, जिसे देखते ही उसके गुरु गरज उठे - " प्रह्लाद ! तुझे यह किसने सिखाया ! खबरदार ! अब कभी यह नाम न लिखना ।“

दूसरे दिन शंद और अमर्क ने जब प्रह्लाद से कुछ लिख लाने को कहा, तथ उन्होंने समूची पट्टी राम-नाम से रँग-कर रख दी। देखतेही गुरू झल्ला उठे। बोले - "फिर तूने वही काम किया ?"

प्रह्लाद ने दबी ज़बान से पूछा – “ गुरुदेव ! क्यों न लिख़ूँ ? इसमें क्या दोष है ?"

गुरूओ में उत्तर देने की सामर्थ्य न थी । भगवान के नाम को वे बुरा कैसे प्रमाणित करते ? बोले -"पहले यह बता, कि किसी पापी ने तेरी बुद्धि पलट दी है, या तू आप ही इस दशा को प्राप्त हुआ है ?"

प्रह्णाद ने कहा -"मुझे किसी ने कुछ नहीं सिखाया, पर भूल हो, तो आप बता दीजिये ।"

"अच्छा ले बताता हूँ,"-यह कह कर गुरुदेव ने प्रह्लाद के पाँच-सात छड़ियाँ जमा दीं। प्रह्लाद की आँखों से आसू बह चले । कोमल शरीर पर छडियों के दाग बन गये पर अन्त तक वे यह न समझ सके, कि राम नाम क्यों न लिखना चाहिये।“

शंद और अमर्क ने इसी प्रकार बहुत चेष्टा की, कि राम-नाम लिखना छोड़ दे, पर वे इस चेष्टा में विफल रहे। अन्तर में वे ऊब गए । उन्हें मालूम हो गया, कि जिस लड़के को हम पढ़ाने बैठे हैं, वह हमें पड़ा सकता है। निदान वे प्रह्लाद को लेकर हिरण्यकश्यप के पास पहुँचे। बोले,"लीजिये, जो कुछ हो सका, वह इसे पढ़ा दिया। पर यह लड़का इतना हठी और दुराम्रही है, कि इससे हमें हार माननी पड़ी । राजन् ! अब इसे सम्हालना और पढ़ाना हमारे अधिकार के बाहर की बात है।"

गुरुओं की यह बात सुन, हिरण्यकश्यप ने सक्रोध प्रहलाद की ओर देखा। वे प्रह्लाद शान्त थे । पूछा, -"कहो पुत्र ! तुमने विद्यालय में क्या सीखा? " प्रह्लाद ने कहा,"पिताजी ! 'राम' नाम के सिवा और कुछ न सीख सका ।“

प्रह्लाद के ये शब्द सुनते ही हिरण्यकश्यप के नेत्र लाल हो गये और होठ फड़कने लगे। उसने गुरुओ की ओर दृष्टि कर कहा -"तुमने इस बालक को क्या शिक्षा दी है ? मित्र होकर तुमने हमारे साथ शत्रु का काम किया है ? यदि मेरे गुरूपुत्र न होकर तुम और कोई होते, तो तुम्हें इस कर्म का ऐसा प्रतिफल चखाता, कि जन्म-भर याद करते ।"

हिरण्यकश्यप की डॉट सुनकर गुरु कॉप उठे । वें बोले,-"राजन् ! यह आपका पुत्र जो कुछ कह रहा है, वह इसे न तो हमने पढ़ाया है, न किसी दूसरे ने । इस लड़के की बुद्धिही ऐसी है।"

गुरुपुत्रों का वक्तव्य समाप्त हो जाने पर हिरण्यकश्यप ने उन्हें विदा कर दिया । बाद मे प्रह्लाद को डपट कर पूछा-"रे दुष्ट ! सच बता, तेरी मति किसने इस प्रकार भ्रष्ट कर दी ? "

प्रह्लाद ने कहा, "किसी ने नहीं; पिताजी ! मैं जो कहता हूँ, उसमें बुरा क्या है ?"

इतना कह प्रह्लाद चुप हो गये। सुनते ही प्रह्लाद जल-भुन कर राख हो गया। उसने राक्षसो से कहा,-"इसे इसी क्षण मेरी आँखों के सामने से हटा लो और कहीं ले जाकर मार डालो । यह अपने कुल को छोड़, चचा के मारने वाले, विष्णु के चरणों की पूजा करता है !"

इतना कह, हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से फिर पूछा - "क्यों मूढ़ ! अब भी राम का नाम लेगा ?"
प्रह्लाद ने कहा,-"पिताजी ! कैसे कहूँ, कि न लूँगा ? श्रीराम ही तो मेरे जीवनाधार हैं ।"
यह सुन, हिरण्यकश्यप ने गरज कर कहा - राक्षसो ! इसे इसी क्षण यही मार डालो । इसकी मृत्यु देखकर मैं अपना हृदय शीतल करूँगा ।"

यह सुनते ही अनेक राक्षस, त्रिंशूल ले लेकर प्रह्लाद पर टूट पड़े । पर यह क्या ? वे प्रह्लाद पर प्रहार करते हैं या फौलाद की दीवार पर ? त्रिशूलों की धारें मुङ गयी । प्रह्लाद विचलित न हुए, राक्षसों का सारा धैर्ये हट गया।

यह देख, हिरण्यकश्यप बड़ी चिन्ता में पड़ गया । कुछ देर के बाद उसने राक्तसों से कहा-"इसे पर्वत की चोटी से ढकेल दो । हाथीसे कुचलवा दो, पशुओं से नोचबा लो और इतने पर भी न मरे, तो विष दे दो । तो कैसे नहीं मरता है ?"

राक्षसों ने हिरण्यकश्यप की आज्ञा मानकर यह सब उपाय कर देखे, परन्तु प्रह्णाद का बाल भी बाँका न हुआ। जब पर्वत की चोटी पर से धकेल दिये गये, तब राम-राम कह कर इस प्रकार उठ बैठे, मानों निद्रा का परित्याग कर गद्दे परसे उठ रहे हों।

मदोन्मच हाथी छोड़ा गया, तो उसने उन्हें उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया और जब जंगली जानवरो आगे डाल दिये गये, तो वे पालतू कुते की भाति उनके हाथ-पैर चाटने लगे। इसके बाद प्रह्णाद के हाथ में विष का प्याला दिया गया। कहा गया, कि या तो राम-नाम लेना छोड़ दे या इसे पी जा।

प्रह्णाद राम नाम लेना छोड़ दें, यह असम्भव था। वे “राम राम” कहते- कहते ही वह विष पान कर गये ! उदर तक पहुँचते ही जो विष प्राण ले सकता था, वह प्रह्णाद के लिये अमृत हो गया । एक-एक कर तीन दिन व्यतीत हो गये पर प्रह्लाद का चेहरा तक न मुरझाया ।

अब हिरण्यकश्यप बड़ी चिन्ता में आ गए । उसे मालूम होने लगा, मानों प्रह्णाद अजर-अमर हैं। वह सोचने लगा, कि कहीं यह पुत्र मेरी ही मृत्यु का कारण न हो जाये ? अत: फिर प्रह्लाद को मार डालनेकी चेष्टा होने लगी। वे धूप में बैठाये गये, शीत में बैठाये गये, निराहार रखे गये, जल में दुबाये गये और काल-कोठरी में बन्द किये गये पर सभी व्यर्थ ! एक भी चेष्टा सफल न हुई। हिरण्यकश्यप का मुँह सूख गया । वह रात-दिन उदास रहने लगा । उसकी बहिन होलिका ने इसका कारण पूछा । हिरण्यकश्यप ने कुछ भी न छिपा कर सारी बात कह सुनाया| होलिका ने कहा – “ओह ! ज़रासी बात के लिये इतनी बड़ी चिन्ता । यह तो मेरे बाये हाथ का खेल है ! एक चिता तैयार करवाइये । मैं प्रह्लाद को गोद में ले, उसी पर बैठूगी। मैं वह विद्या जानती हूँ, जिससे मैं जल नहीं सकती। प्रह्लाद जल जायेगा और मैं जीती-जागती फिर निकल आऊँगी ।“

बहिन की यह बात सुन हिरण्यकश्यप के हृदय में आशा जागी । उसने तत्काल एक विशाल चिता का आयोजन किया । होलिका राक्षसनीं प्रह्लाद को उठा लायी और चिता में जा बैठी । राक्षसों ने उसमें आग लगा दी। प्रहलाद समाधिस्थ योगी की भाँति स्थिर बैठे थे ।

चिता की भीषण लपट आकाश तक जा पहुची । चारो ओर धुआ छा गया । राक्षसो ने समझा, आज उस प्रह्लाद का अन्त हो गया। किन्तु अग्नि शान्त होने पर सबने देखा, कि होलिका तो जलकर भस्म हो गयी है और प्रहलाद चिता-भस्मपर पद्मासन लगाये बैठे हुए हैं। उनके मुख से वही राम-नाम की ध्वनि अब भी निकल रही है।

यह दृश्य देखकर दानव-दल चकित और स्तम्भित हो गया। उसे यह न समझ पड़ा, कि यह स्वप्न है। या सत्य ? हिरण्यकश्यप भी अपने नेत्र मलने लगा । अन्त में उसने अपने आप हो कहा - "अच्छा, अब मैं स्वयं इसे यम-सदन भेजूँगा।"

हिरण्यकश्यप प्रह्लाद पर झपट पड़ा। प्रह्लाद अब तक चिताभस्म में उसी तरह वैठे हुए थे मालूम होता था, स्वयं भगवान् शंकर भस्म लगाए बाल ब्रह्मचारी के वेश में आसीन हों। हिरण्यकश्यप ने उन्हें हाथ पकड़ कर बाहर खींच लिया और गरजकर पूछा – “क्या अब भी तू राम-नाम लेना न छोड़ेगा ?"

प्रह्णाद ने उत्तर दिया,-"नहीं, कभी नहीं। चाहे प्राण ले लीजिये । यह आपके अधिकार की बात है ; किन्तु मैं राम-राम कहना नहीं छोड़ सकता ।“

हिरण्यकश्यप ने राक्षसों से कहा -"इसे पन्द्रह दिन के लिये घोर कारागार में बन्द कर दो ।देखो, इसके विचार परिवर्तित होते हैं या नहीं ? यह अन्तिम अवधि है। यदि पन्द्रह दिन में इसने अपना दुराग्रह न छोड़ा, तो मैं स्वयं इसे प्राण-दण्ड देकर राम-नाम लेने का मजा चखाऊँगा।"

इतना कह, हिरण्यकश्यप वहाँ से चला गया।

राक्षसो ने प्रह्लाद को कारागार में बन्द कर दिया। पन्द्रह दिन व्यतीत हो गये, परन्तु प्रह्लाद के विचारोंमें लेश-मात्रा भी अन्तर न पड़ा। सोलहवें दिन दैत्यराज ने राक्षसों को आज्ञा दी, कि प्रह्लाद को मेरे सम्मुख उपस्थित करो

राक्षसो ने वैसा ही किया। हिरण्यकश्यप ने देखा, कि अब भी प्रह्लाद राम का नाम ले रहा है । उसके क्रोध की सीमा न रही। सारा शरीर कॉप रहा था। होठ फड़क उठे। नेत्रों से मानों चिनगारियाँ निकलने लगीं । हिरण्यकश्यप की यह भाव देख, राक्षस समझ गये, कि आज कुछ अनर्थ अवश्य होगा सब के हृदय किसी अनिष्ट की आशंका कर काँप उठे ! इसी समय हिरण्यकश्यप की गर्जना सुनाई दी – “रे मतिमन्द ! कुलद्रोही ! दुराग्रह छोड़ दे । रामका नाम न ले। मेरा कहा मान अन्यथा समझ ले, कि आज तेरी जीवन अवधि समाप्त होती है।"

प्रह्लाद ने नम्र होकर कहा,-"आप जो कहेंगे, वही करूँगा; जिस तरह रखेंगे उसी तरह रहूँगा, पर भगवान का नाम न छोड़ सकूँगा। मैं उस अजर-अमर और सर्वंव्यापी परमात्मा को कमी न भूल सकूँगा ।"

हिरण्यकश्यप ने कढ़क कर कहा - "मूढ़ ! मेरे कानों को अपवित्र न कर । तेरे भगवान की अजरता, अमरता और व्यापकता में भलीभाँति जानता हूँ। मेरे मुख पर ही मेरे शत्रु की प्रशंसा करते तुझे लज्जा नहीं आती ? अच्छा, अब अपने किये का फल भोग कर । बुला अपने राम को ! देखें,कहाँ है तेरा राम ?"

प्रह्लाद ने कहा - "पिताजी ! उन्हें बुलाना न पड़ेगा। वे स्वयं सब कुछ देख और सुन रहे हैं। मूझमें, आपमें और सभी वस्तुओं में वे व्याप्त हो रहे हैं । ऐसा कोई स्थान नहीं, जहाँ ववे न हों। ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो उनसे रहित हो ।"

हिरण्यकश्यप झल्ला उठा । कहने लगा- 'मूर्ख ! ब भी बकवाद नहीं छोड़ता ? बोल, क्या इस खम्बे में भी तेरा भगवान है ?"

प्रह्लाद ने कहा,-"हा अवश्य । मैं उन्हें इस खम्बे में भी देख रहा हूँ।"

प्रह्लाद की यह बात सुन, हिरण्यकश्यप को वड़ा क्रोध हो आया। उसने उस खम्भे में एक ऐसा प्रहार किया, कि वह बीच से फट गया । फटते समय ऐसी विकट ध्वनि हुई, कि राक्षसों के दिल दहल गये ! हिरण्यकश्यप भी सन्न हो रहा। सब-के-सब बड़ी चिन्ता में पढ़ गये। किसी को यह न ज्ञात हो सका, कि यह ध्वनि कहा से आ रही है ? मालूम होने लगा, मानो प्रलय हो रहा हो।

किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक न रही। कुछ ही देर के बाद खम्मे से नरसिंह भगवान निकल पड़े । उनका भयानक शरीर, भीषण भाव और गदादि आयुध देख, दैत्यगण भय से ही मृतक-तुल्य हो गये।

किन्तु हिरण्यकश्यप सावधान था। वह समझ गया, कि प्रह्लाद का भगवान इस वेश में उपस्थित हुआ है। निदान अपनी गदा लेकर वह उन पर झपट पड़ा । नरसिंह भगवान ने उसके प्रहार को अनायास ही व्यर्थ कर उसके हाथ से गदा छीन ली। गदा छिन जाने पर हिरण्यकश्यप ने तलवार का वार किया परन्तु वह भी व्यर्थ हुआ। कुछ काल तक दोनों में युद्ध होता रहा। अन्त में सायंकाल के समय नरसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप पेट फाड़ दिया । फाड़ते ही उसके प्राण-पखेरू देहपिजर को छोड़ न जाने कहाँ चले गये।

दानवो मे कुछ तो प्राण लेकर भागे कुछ को जीवनदान दिया गया और कुछ युद्ध में मारे गये। जिसने जैसा किया, उसने वैसा फल पाया। प्रह्लाद की इच्छा थी, कि सांसारिक भोग में न पड़कर त्यागी की भाँति पवित्र जीवन व्यतीत किया जाये; परन्तु नरसिंह भगवान ने उन्हें शासन-भार ग्रहण करनेके लिये बाध्य किया। निदान बड़ी धूम-धाम से प्रह्णाद का अभिषक हुआ। इसके बाद नरसिंह भगवान अन्तर्धान हो गये। प्रह्लाद ने दीर्घकाल पर्यन्त दानवों परशासन कर अन्त में परम पद प्राप्त किया।

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