उशीनर महाराज । राजा शिबि की कथा । Raja Shivi Ki Kahani | raja shivi ki katha


पुराणों में यह बात जहाँ-तहाँ देखने में आती है, कि जहाँ किसी मनुष्य ने कठोर तपस्या करनी आरम्भ की तो स्वर्गलोक के देवराज इन्द्र का आसन डोल गया। उग्र तपस्वी के तपश्चरण की वात सुनते ही वैभव-सम्पन्न देवराज का इन्द्रासन क्यों कॉप उठता है ? इसमें क्या रहस्य है ? बात यह है, कि तपस्या करने वाले के तपोबल की परीक्षा करते रहना ही इन्द्र का कर्तव्य है। वे न तो इस बात से डरते या घबराते हैं, कि उनका इन्द्रत्व छिन जायेगा और न उन्हें किसी की ओर से एकाएक होने वाले भयंकर आक्रमण की ही आशंका रहती है।

पुराणों की छान-बीन करने वाले यह बात भली भाँति जानते हैं, कि तपस्या के द्वारा जहाँ बड़े-बड़े प्रचंड राक्षसों ने तप सिद्ध होकर भी संसार में महान् अनर्थ और अन्धेर मचाये हैं, अपनी अजेय शक्ति से त्रिभुवन को कम्पायमान कर दिया है, वहाँ कितने ही कठोर तपस्वियों ने केवल संसार की कल्याण-कामना को ही अपना इष्ट माना है और कितने ही ऐसे भी उग्र तपस्वी हो गये हैं, जो समस्त ऐश्वर्य, वैभव और पार्थिव सुखो पर लात मारकर केवल भगवन चरणों की प्राप्ति को ही अपना परम ध्येय मानते थे । इससे यही मालूम होता है, कि तपस्या सर्वथा सउद्देश्य से प्रेरित होकर ही नहीं की जाती थी। अतः इस बात का पता लगाते रहने की भी आवश्यकता अनिवार्य सी थी, कि कौन व्यक्ति किस अभिप्राय को लेकर तपस्या किया करता है ? किसका क्या अभीष्ट है और कौन तपस्वी क्या चाहता है ? इस काम का भार देवराज इन्द्र पर सौंपा हुआ था। इसीलिये वे सदा सब तपस्वियों के विषय में सतर्क और सावधान रहा करते थे । जिस प्रकार आजकल कोई सरकार अपने शासन के अन्दर किसी प्रकार के आन्दोलन को देख कर सतर्क और सावधान होती है, उसी प्रकार कठोर तपस्या रूपी अन्दोलन की देख-भाल करने का काम यदि देवराज इन्द्र के हाथो में हो, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं ।

भारत-खण्ड में प्राचीन समय में उशीनर नामक एक धन-धान्य-सम्पन्न राज्य था । आज जिसे हम लोग उज्जैन कहते हैं, वही किसी समय उशीन के नाम से प्रख्यात था। उशीनरधिपति महाराज शिबि बड़े ही दयालु, विनम्र, अतिथि-परायण, दानी और पुण्यात्मा थे। इनकी प्रजा इनकी सुन्दर राज्य-व्यवस्था से परम सुखी थी। अभिमान और राजमद तो इन्हें छू तक नहीं पाया था। ये अपने प्रजाजनों को अपने प्राणों से भी बढ़कर मानते थे । प्रजा के सुख-सन्तोष की वृद्धि करना ही, ये अपना कर्तव्य समझते थे । राज्य-विभव सब कुछ इनके पास था, पर ये उसके मोह में नहीं पडे रहते थे । सत्कार्यो में ही ये अपने कोष के अवशिष्ट धन को व्यय करते थे । इनके व्यवहारों से यही जान पड़ता था, कि ये अपने को राजा नहीं वरन् राज-कार्य का प्रबन्धक समझते थे । अपने को प्रजाजनों का रक्षक और सेवक समझते थे। ऐसे समस्त सद्गुणों से सम्पन्न राजा के अपनी कोई सन्तान न थी। इस बात के लिये राजा जितने स्वयं चिन्तित रहते थे, उससे भी बहुत अधिक चिन्तित उनके प्रजाजन रहा करते थे।

एक बार देवर्षि नारद उनके पास गए । अतिथि-सत्कार में अपना समस्त मुक्त-हस्त होकर देने वाले राजा शिबि ने उनका खुब आदर-सत्कार किया। सर्वज्ञ नारद, राजा और राज्य के प्रजाजन का मनोकष्ट आसानी से समझ गये। उन्हें राजा शिबि के अपुत्र होने की बात मालूम हो गयी। उन्होंने समस्त विधि बताकर तपस्या करने का परामर्श किया । इसके बाद देवर्षि चले गये। महाराज शिबि देवर्षि नारद के आदेशानुसार कठोर तप साधन में लग गए ।

उधर देवलोक में इन्द्रादि समस्त देवताओं को महाराज शिबि की उग्र तपस्या का पता चल गया । देवराज इन्द्र उनके कठोर तपश्रण का उद्देश्य जानने के लिये व्याकुल हो उठे। किसी ने उनसे कहा, कि शिबि इन्द्रत्व की प्राप्ति के लिये ही यह कठोर तपस्या कर रहे हैं किसी ने कहा, नहीं यह बात नहीं है। शिबि कभी कोई ऐसा देव-द्विज विरोधी उद्देश्य लेकर तपस्या नहीं कर सकते । देव-ब्राम्हणो में उनकी अटूट श्रद्धा है। वे सदा सत्कर्मो में मग्न रहा करते हैं। उनके राज्य में सर्वत्र शान्ति है। लोभ-मोह आदि पापकर्म तो उनके पास भी नहीं फटक सकती।

इस प्रकार कीं द्विविध बातों से महाराज इन्द्र का सन्देह दूर न हो सका। उन्होंने महाराज शिबि की परीक्षा लेने का निश्चय किया, बिना पूरी तरह परीक्षा लिये किसी तपस्वी का मनोभाव मालूम नहीं हो सकता। पहले हलकी परीक्षाएँ ली गयी, जिनसे देवराज इन्द्र को यह मालूम हो गया, कि शिबि बहुत ही निरभिमान मनुष्य हैं। वे किसी साधारण व्यक्ति से भी अपने को बडा नहीं समझते । यद्यपि उनका ज्ञान बहुत ही विस्तृत था; तथापि वे अपने को बहुत ही सामान्य मनुष्य समझते थे।

परन्तु देवराज केवल इतनी सी बात से सन्तुष्ट होने वाले जीव नहीं थे।

एक दिन महाराज शिबि अपने नित्य कर्मो से छट्टी पाकर प्रकृति की सुरम्य वाटिका में विचरण कर रहे थे। मन ही-मन विश्व-व्रह्मान्ड की रचना और प्रकृति की लीला के विषय में आलोचना प्रत्यालोचना कर रहे थे । इतने में एक कबूतर फदफदाता और डरता-कॉपता हुआ उनके पैरों के पास आ गिरा। महाराज शिबि के हृदय में दया का समुद्र उमड़ आया। उन्होने झट उसे उठा लिया। कबुतर के हाव-भाव से ही वे समझ गये, कि या तो किसी शिकारी ने इसका पीछा किया होगा, या किसी हिंसक पक्षी ने इसे खदेड़ा होगा। आश्रय में आया हुआ जानकर, उन्होंने उसे अपनी गोद में छिपा लिया। बात-की-बात में एक भयंकर बाज़ भी वहाँ आ पहुँचा । उसे देख, महाराज शिबि समस्त घटना समझ गये। परन्तु उनकी धारणा कितनी भ्रान्ति-पूर्ण थी, यह उन्हें थोड़ी ही देर में मालूम हो गया, जब कि उस बाज़ ने उनके सामने आकर कहा - "महाराज ! यह मेरा आहार है। आप इस तरह यदि मेरे मुह का निवाला छीन लेगे, तो आप पर बड़ा भारी पाप लगेगा । और वह पाप आप के समस्त सद्गुणों और सत्कमों पर पानी फेर देगा। आप स्वयं सोच सकते हैं,कि ऐसा करना कितना बड़ा अन्याय है। आप यदि मेरा आहार नहीं देगे, तो आज से ही आप अन्यायी कहे जायेगे और एक अन्यायी राजा के राज्य में जैसे अन्धेर होते हैं, वैसे ही अन्धेर यहाँ भी होने लगेगे। फिर उसका परिणाम क्या होगा, यह तो आप स्वयं समझ सकते हैं।"

बाज़ के मुँह से ऐसी युक्ति-पूर्ण बातें सुन, राजा के आश्चर्य की सीमा न रही। वास्तव में वे बड़े असमंजस में पड़ गये । एक ओर आश्रित की रक्षा करना जहाँ उनका परम धर्म था, वहाँ दूसरी ओर एक का आहार उसके मुँह के आगे से छीन लेने का महान् अपराध था । परन्तु शिबि ऐसे-वैसे पुरुष नहीं थें रक्षा के लिये वे सब कुछ कर सकते थे । उन्होंने थोडी देर तक सोच-विचार करने के बाद बाज़ से कहा – “देखो, भूखे बाज ! तुम चाहे जो कोई क्यों न हो और चाहे जिस रूप में ही क्यों न हो, मैं आश्रित निर्दोष कबुतर के लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर दूँगा, पर इसे न दूगा । तुम मांसाहारी पक्षी हो। मांस मिलने से ही तुम्हारी भूख की निवृत्ति हो सकती है। अतएव तुम चाहो, तो मैं इस कबुतर के बराबर मांस वज़न करके दे सकता हूँ । आशा है, तुम इतने से ही सन्तुष्ट हो जाओगे "

बाज़ ने कहा - जैसा इस पक्षी का मांस है, वैसा ही दूसरे का हो तो मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं। पर आप मांस के लिये जब एक दूसरे प्राणी को कष्ट देंगे, तब क्यों नहीं इसे ही मेरी भूख की तृप्ति के लिये दे देते ?"

शिबि -"नहीं-नहीं, बाज़ ! मैं किसी भी प्राणी को कष्ट देना नहीं चाहता । मैं अपने ही शरीर से इसके बराबर मांस काट कर तुम्हें दे दूँगा । इसके लिये मुझे कुछ भी कष्ट नहीं होगा। अब बाज़ के पास कोई दलील नहीं रह गयी । उसने कहा - "अच्छी बात है। जब आप यहाँ तक करने को तैयार हैं, तब मुझे कुछ भी कहना नहीं है।"

महाराज शिबि ने उसी समय तुला मँगवायी और एक ओर उस कबुतर को बैठा दिया तथा दूसरी ओर अपनी जाँघ काट कर रख दी। पर यह क्या ? कबुतर इससे भी अधिक भारी है ? उन्होंने दूसरा अंग काटा, पर कबुतर फिर भी भारी रहा। अन्त मे राजा शिवि अपना विशाल वक्ष स्थल काटने के लिये तैयार हुए, आश्रित-रक्षा के लिये इस प्रकार अपना वक्षस्थल काटने करने को तैयार देख, बाज़ फौरन न जाने कहाँ गायब हो गया। कबुतर भी अन्तर्धान हो गया।

उनके स्थान में स्वयं देवराज इन्द्र और अग्नि देव दिखाई दिये। उन्होंने परम प्रसन्नता के साथ राजा शिबि को आशीर्वाद दिया और कहा, - "महाराज ! बस कीजिये । आपकी परीक्षा पूरी हो चुकी। हम आपको पहचान नहीं सके थे । इसीलिये इतना कष्ट दिया गया। आप धन्य हैं । दया और आश्रित-रक्षा-रूपी धर्म भी आपको पाकर धन्य हो गया ! आप क्या चाहते हैं ? किस लिये आप इतनी कठोर तपस्या कर रहे हैं ? आपको जिस वस्तु का अभाव है, वह अवश्य मिलेगी। आपकी तपस्या आज पूरी हो गयी। ईश्वर आपकी मनोकामना पूर्ण करे ।"

देवगण की कृपा से महाराज शिबि के कटे अंग फिर जुड़ गये। वे सानन्द घर आये और पुनः राजकार्य देखने लगे।

कुछ ही काल बाद रानी गर्भवती हुई और यथा- समय एक परम रूपवान पुत्र ने जन्म लिया। सारा राज्य आनन्द से खिल उठा । माता-पिता और परिजनों के आदर और लाड़-प्यार से बढ़ने लगा।

महाराज शिबि की चिंता अब जाती रही। वे अब इस लड़के को ही सारा राज्य-भार सौंपने के लिये उसे राजधर्म की समुचित शिक्षा देने लगे । वे यही सोच कर निश्चिन्त थे, कि जब यह राज्य-भार सम्हालने योग्य हो जायेगा, तब मैं परम-पद की प्राप्ति के लिये वानप्रस्थ जीवन व्यतीत करूँगा इसी उद्देश्य वे अभी से अपने आपको वानप्रस्थ जीवन में प्रवेश करने योग्य बना रहे थे। पुत्र-प्राप्ति के लिये उन्हें प्रसन्नता भले ही हो पर मद या अहंकार नहीं हुआ था । वे सब कार्य पुर्ववत करते थे । उनका वर्तमान जीवन राजर्षिका जीवन था।

इसी समय एक दिन कोई ऋषि राजा के अतिथि होकर आये । राजा ने उनका यथाविधि आदर- सत्कार किया। ऋषि ने कहा – “ राजन् ! मुझे महामांस खानेकी इच्छा हुई है। इसीलिये तुम्हारे यहाँ आया हूँ।"

राजा बड़ी चिन्ता में पड़े । रानी से परामर्श किया और कहा,-"ऋषिवर ! हम तीन ही प्राणी हैं मैं, मेरी स्त्री और तपस्या के द्वारा, देवकृपा से प्राप्त एक-मात्र पुत्र । कहिये, इनमें से आपकी सेवा के लिये किसका वध ! किया जाये ?"

ऋषि ने सोचकर कहा,-"राजन् ! राजकार्य सम्हालने के लिये तुम्हारा रहना परमावश्यक है। स्त्री का मांस निषिद्ध है । हाँ, यदि तुम मुझे सन्तुष्ट करना चाहते हो, तो उस बालक का ही मांस खिलाओ परन्तु देखो, तुम्हें यदि कष्ट हो, यदि तुम्हारी आँखों में पानी आ जाये, तो मैं उसे ग्रहण नहीं करूँगा ।"

राजा के लिये भयंकर परीक्षा का समय था । अन्त में उन्होंने कलेजे पर पत्थर रख कर ऋषि के आदेशानुसार उसी पुत्र का वध किया, जिसके लिये उन्होंने कठोर तपस्या की थी, जिसे राज्य भर के लोग प्यार करते थे । ऋषि के कहने से रानीं ने स्वयं उस प्राण प्यारे, आँखों के तारे एक-मात्र पुत्र का मांस पकाया। ऋषि के आगे थाली परोसी गयी।

अब ऋषि ने कहा -"आओ, राजन् तुम भी भोजन करो ।"

राजा ने पहले न कहां पर ऋषि के यह कहने पर कि “यदि तुम नहीं आते, तो मैं भी असन्तुष्ट होकर चला जाऊँगा ।“ बाध्य होकर उन्हें भी भोंजन के लिये बैठना पड़ा । एकाएक ऋषि ने बच्चे का नाम लेकर पुकारा । बच्चा दौड़ता खेलता हुआ वहाँ आ पहुँचा। सामने की थालियों में सात्विक अन्न-व्यंजन दिखाई दिये । ऋषि अब अपने सच्चे रूप में प्रकट हुए। वे स्वयं ब्रम्हा थे। राजा समझ गये, कि यह भी उनकी परीक्षा थी। वे ब्रम्हा के चरणों पर गिर पड़े । आश्रित की रक्षा के लिये और अतिथि के सत्कार के लिये इतनी उदारता का दूसरा उदाहरण संसार के इतिहास में नहीं मिलता।

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