विदुला । Vidula


कृष्ण ने युद्ध करने से पूर्व एक बार स्वयं कौरवों के पास जाकर उन्हें समझाना चाहा । युधिष्ठिर ने उन्हें रोकना चाहा और कहा – “वहाँ जाने से कुछ लाभ नहीं, दुर्योधन आपका कहना कदापि नहीं मानेगा ।“

परन्तु कृष्ण ने कहा - “मैं यह सब हाल जानता हूँ, समस्त संसार मिलकर भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता । मैं क्रोध में आऊँगा, तो सबको नष्ट कर दूँगा। मेरा जाना पहले तो व्यर्थ ही नहीं होगा, फिर व्यर्थ भी होगा, तो मेरे जाने से दुर्योधन पर नित्यका कलंक तो अवश्य ही रहेगा ।“ निदान भगवान गये और दरबार में पहुँचकर भीष्म-द्रोणाचार्य आदि के सामने ही कहने लगे – “राजन् ! मैं इस हेतु आया हूँ, कि जिसमें जन-विध्वंस की नौबत न आये। दूसरों के दुःख देखकर सुखी होना अच्छा नहीं । आप अपने पुत्रों को समझायें । मैं पाण्डवों को समझा लूगा । पांण्डवो से मेल करने में सबका भला है । इस समय सैंकडो क्या, हज़ारों ही राजा उनके साथ हैं । एक-से-एक वींर योद्धागण उनके लिये लड़ने को तैयार हैं, पर युधिष्ठिर ने धर्म की बातें समझा कर उन्हें रोक रखा है । आप भी सुलाह के लिये तैयार हो जाइये । आप जानते हैं, कि युधिष्ठिर का व्यवहार आप या आपके लड़कों के प्रति कैसा है ? उनका राज्य छीना गया, द्रौपदी का अपमान किया गया, वे वन-वन दुख उठाते फिरे, फिर भी धर्म एवं सत्य के पथ से कभी नहीं हटे । आप भी धर्म का ख्याल करके ऐसा काम करें, जिससे कि यह भयंकर कुलनाश न होने पाये ।“

सबने ही कृष्ण के इन वचनों को पसन्द किया और उसके समर्थन में किस्से-कहानियाँ सुना, धृतराष्ट्र को धर्म पर चलने की प्रेरणा दी । धृतराष्ट्र ने कहा - “ मैं भी यही चाहता हूँ, पर क्या करू ? मेरा कुछ वश नहीं है। दुर्योधन किसी तरह से नहीं मानता । ज़ितना सम्भव था, प्रयत्न किया गया। कृष्ण ने यह सारा वृत्तान्त कुन्ती को जा सुनाया, और पूछने लगे, कि अब तेरी क्या सम्मति है ? कुन्ती बोंली – “ युधिष्ठिर से जाकर कहो, तुम्हारा धर्म अब घट रहा है। तुम शायद धर्म के उल्टे अर्थ समझते हो । वेद में ऐसे धर्म की महिमा नहीं है। धर्म वहाँ रहता है, जहाँ बुद्धि और ज्ञान से काम लिया जाता है । क्षत्रियों को चाहिये, कि वे अपने भुज-बल पर भरोसा रखे, मैं विदुला का किस्सा तुम्हें सुनाती हूँ । युधिष्ठिर को जाकर सुना दो ।

वह किस्सा इस प्रकार है :-

“विदुला का जन्म क्षत्रियों के जिस शाश्वत वंश में हुआ था, उस कुल के क्षत्रियों का प्रण था - सिर जाये तो जाये, पर रणभूमि से बिना शत्रु-विजय किये न आयेंगे । विदुला में अपने कुल के सब गुण, उत्साह, वींरता आदि कूट-कूट कर भरे थे । उसकी शादी सुवीर राजा के साथ हुई, जो मारवाड़ से दक्षिण की ओरके राज्य का स्वामी था । उसके मर जाने के बाद उसका संजय नाम का पुत्र गद्दी पर बैठा । वह उत्साहहीन, अल्प बुद्धि और राजनीति से अनभिज्ञ था। सिन्ध के राजा ने यह देखकर उस पर चढ़ाई की। संजय परास्त होकर भाग गया और एक पर्वत के शिखर पर जाकर शरण ली । विदुला को जब यह समाचार विदित हुआ, तब उसके नेत्रों में खून भर आया, वह वहाँ चली गयी, जहाँ संजय पड़ा था ।

उसने उसे बड़े कठोर वचन कहे । जिन अग्निव्रत तीव्र शब्दों में विदुला ने अपने पुत्र को आह्वान किया, वह सुनने योग्य हैं –

"ओ शत्रुओं को प्रसन्नता देने वाला ! तू मेरा पुत्र नहीं है। इस कुक्षि (कोख) से वह अग्नि प्रकट होनी चाहिये थी, जो शत्रुओ को जला कर भस्म कर देती । तू किसके रक्त पैदा हुआ ? न तू अपने पिता का है न माता का । तुझमें अग्नि नहीं, तुझमें क्रोध नहीं - कौन तेरी गणना पुरुषों में करेगा ? क्या तु नपुंसक है ? जो रण-भूमि को त्याग कर यहाँ भाग आया है ? यह उदासीनता क्षत्रिय के लिये अनुचित है। यदि अपना कल्याण चाहता है, तो अपने भार को स्वयं सम्भाल । अपनी आत्मा को अपवित्र मत कर, अपमान का जीवन मृत्यु है । उठ ! अपने भय को त्याग ! क्षत्रिय-पुत्र सर्दव ऐश्वर्य का आकांक्षी रहता है। वह किसी के अधीन रहना नहीं चाहता । वह शेर की तरह वन में विचरता हुआ सबको अपने बलाधीन रखना चाहता है। नीचे या मध्य भाग में रहना वह पसन्द नहीं करता। वह सदैव वड़ाई और मान के शिखर पर दिखाई देता है। उचित है, कि तू एक बार फिर प्रज्ज्वलित होकर अग्नि की तरह भड़क उठ, न कि सिसक-सिसक कर तेरा दम निकले । यह क्या नीचता है ? तेरे जैसा कायर-नपुंसक क्या काम करेगा ? तुझे चाहिये था, कि हाथ में खड्ग लेकर रण भूमि में विद्ध्युत की भाँति कड़कता और चमकता हुआ नज़र आता-मरता या मारता; परन्तु लोग प्रशंसा करते न अघाते । जिसमें साहस नहीं,वह पुरुष नहीं, जिसमें लज्जा नहीं - वह निर्लज्ज न पुरुष न स्त्री, न उससे मित्रों को सहायता मिलेगी और न प्रजा को आश्रय मिलेगा । न वह पिता का नाम जीवित रखेगा और न माता की छाती शीतल करेगा । यह देश - निकाला, यह विपत्ति और सुख-सम्पत्ति से विहीनता किसको प्रिय है ? संजय ! तू पुरुष बन , स्त्रियो का वेश मत धारण कर। क्या तू मुझे स्त्रियो में लज्जित करेगा ? उठ खडग हाथ में ले और शत्रुदल में अग्नि-संचार कर दे ।“

संजय माता के ऐसे वाक्य सुनकर उठ खड़ा हुआ और इस प्रकार कहने लगा - "मातः ! इस संसार में तुझे क्या सुख मिलेगा, जब तेरा पुत्र ही इस लोक में न रहेगा ? जीवन के सब सामान फिर तेरे किस काम आयेगा ?

विदुला ने उत्तर दिया -"अल्पज्ञ लड़के ! मरना-जीना तो प्रति दिन का बना हुआ काम है, इसको कोई रोक महीं सकता। जो रण-भूमि में मरता है, वह स्वर्ग प्राप्त करता है । जो वहाँ से भागता है,वह नरकाधिकारी बनता है। क्षत्रिय जब तक युद्ध में लड़ कर अपने शौर्य का प्रकाश नहीं करता, तब तक वह माता-पिता का ऋणी रहता है । तू दुर्बल पुरुषों की भाँति व्यवहार मत कर । ऐसा हो, कि ब्राह्मण भिक्षुक तेरा आश्रय लें । तू क्यों किसी का भरोसा करता है ? जो भुज बल पर स्वाभिमान रखता हुआ संसार में काम करता है, वही लोक-परलोक दोनो में यश पाता है। माता मान से कहती है, यह मेरा पुत्र है - जिसकी आँख सिंह के सामने भी नहीं झपकती हैं ।

"यह माना, कि सिन्ध राज के पास सेना बहुत है, परन्तु एक वीर क्षत्रिय अपने देश में शत्रु को खेला-खेला कर मार सकता है ! इसलिये तू तैयार होकर तलवार हाथ में ले और अपनी सेना को एकत्र करके शत्रु का सामना कर । कायरों की भाँति मृत्यु से न डर ।“

संजय ने कहा – “कलह-प्रिय माता ! तुझे लड़ने-भिड़ने की सूझती है, तेरा दिल पत्थर का बना हुआ है, तेरा हृदय लोहे की भाँति है; तू इस तरह बातें करती है - जैसे मैं तेरा जाया पुत्र ही नहीं हूँ। और तू मेरी माता ही नहीं है। यदि मैं मारा गया, तो तू राज्य लेकर क्या करेगी ? "

विदुला ने उत्तर दिया – “मुझे राज-पाटका ख्याला नहीं है, तु कुल को कलंकित करने की राह पर चल रहा है। तेरे पिता, पितामह कभी इस राह पर नहीं चले । क्षत्रिय इसलिये पैदा होते हैं, कि सबकी रक्षा करें । क्षत्रिय की भुजाओं के बल पर ब्राह्मण, वैश्य तथा शूद्र तीनों के जीवन निर्भर हैं ! क्षत्रिय वह आग है, जिसे देखकर वन में के सिंह तक पास आने का साहस नहीं करते । यदि यह अग्नि शान्त हो जाये, तो फिर देश का क्या हाल होगा ? इस लिये तू जा और रण-भूमि की शत्रु- सेना को मार भगा, उनकी बहुसंख्या का ख्याला न कर ।

संजय ने कहा –“माता ! क्रोध न कर, कृपा की दॄष्टि कर, मै तेरी आज्ञा को भंग न करूगा।“ इस पर माता ने उत्तर दिया,-“ संजय ! अब मेरे दिल को शान्ति मिली है। मेरे तीव्र वचन इस भाव से थे, कि तेरे अन्दर साहस पैदा हो। मैं तेरी मान-प्रतिष्ठा करूगी। परन्तु उस समय, जब कि राजा सिन्ध की सेना को पददलित करेगा और लोक में विख्यात होगा, कि संजय ने अपने पिता के पद- चिह्न पर चलकर अपने धर्म को स्थिर रखा।

संजय ने पुनः पूछा,-"माता ! न मेरे पास धन है, न सेना। ऐसी अवस्था में विजय कैसे प्राप्त होगी ? अपनी अवस्था का विचार करके ही मैंने राज्य-चिन्तन छोड़ दिया है। तूही कह, कि मैं क्या करू और शत्रु पर कैसे विजय प्राप्त करूँ ? "

माता ने पुत्र को इस प्रकार उत्तर दिया, - “क्रोध, भय और कायरता - इन तीनों के कारण सब क्रिया निष्फल होती है । यदि कोई यह आशा रखे, कि क्रोघ से काम बन जायेगा, तो वह भी मूर्ख है । पुरुष को साहस और उद्योग से सब काम करने चाहिये और उसका फल ईश्वर पर छोड़ना चाहिये। जिस प्रकार सूर्य पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण सब ओर किरणों फैलाता है, तू भी उसी प्रकार अपने बल का विस्तार कर । तेरे राज्य में ऐसे पुरुष हैं, जिनमें देश का अभिमान है। वे शत्रु को अत्यन्त घृणा की दॄष्टि से देखते हैं । उनको अपनी राज्य-पताका के नीचे ला, धन की लालसा वालों को धन-लोभ दे और जो शत्रुओं से परास्त हैं तथा जो ईर्ष्या और द्वेष की अग्नि में जल रहे हैं, उन पर अपनी गूढ़ सहानुभूति प्रकट कर, वे सब तेरा साथ देंगे ।

जिस प्रकार मैंने तुझे कठोर वचन कहकर रणभूमि के लिये तुझे तैयार किया है, उसी प्रकार तू भी राजपूतों को बुलाकर उत्तेजित कर । प्रत्येक पुरुष की प्रकृति पहचान और उसी प्रकार उसके साथ व्यवहार करके उसे अपने अधीन रख । तेरे पास थोड़े ही दिनों में योद्धाओं की बहुत संख्या हो जायेगी । जहाँ तूने संकल्प किया, कि तेरे चारों ओर तेरी अनुकूल प्रकृति, प्रभाव और उत्तेजना वाले पुरुष इकट्ठ हो जायेगे । जब शत्रु-दल सुनेगा, कि तू इस प्रकार तैयार है, तो वह स्वयमेव ही विगत-शौर्य हो जायेगा । विपत्ति के समय राजा कभी नहीं घबराता । प्रजा, सैन्य और मन्त्री सभी डर जाते हैं । परन्तु राजा उनको ढाढ़स देता है । कुछ तो घबरा जाते हैं । कुछ शत्रु से जा मिलते हैं । परन्तु सबका प्रबन्ध राजा के हाथ में है । कई तेरी जाति के खयाल से तेरे मित्र बन जायेंगे, उन पर पूरा विश्वास रख, परन्तु इतना अधिकार मत दे, कि वे तुझे धोका दे सकें । भयभीत और चकित मत हो । अपने दुःख से दूसरों को उद्विनग्न मत कर । पर्वत के समान मन को दृढ़ रख। वे कभी तेरा साथ न छोड़ेगे। उठ, धीरज धर। मेरे पास निधि है, में सब- कुछ तुझे दूँगी, मेरी सब दौलत तू है, हीरे-पन्ने की तरह देदीप्यमान होकर शत्रु-सेना का संहार करके अपने माता-पिताके नाम को उज्जवल रख ।"

ऐसी बातें सुनकर संजय को ढाढ़स बँध गया । उसने कहा - "माता तू । मेरी सच्ची मन्त्रिणी है। मैं अब तक भयभीत था। तेरी बातों ने मेरे सोये दिल को जगा दिया। मैं जाता हूँ, लोहे-से-लोहा बजाता हूँ। या तो शत्रु-दल का संहार कर दूँगा या स्वयं प्राण दे दूँगा।"

यह कह कर संजय ने उस पर्वत-शिखर पर अपनी राज-ध्वजा खड़ी की। सहस्रों पुरुष एकत्र हो गये ।

उसने कहा – “मित्रो ! अपमान और दासता के जीवन से मृत्यु श्रेष्ठ है। जीते-जी अपने सम्बन्धियों को दुख में छोड़ना और देश को रिपु-सेना से पद-दलित कराना, कायरों का काम है । मै तुम्हारे लिये प्राण त्यागने चला हूँ । यह जान तुम्हारी और तुम्हारे देश की है और इसी पर बलिदान होने को तैयार है । देश-सेवा में मैं सबसे पहिला तुम्हारा अग्रगामी हूँ । कहो, तुम्हारी क्या सम्मति है ?" सबने एक स्वर से कहा, "हम सब युद्ध करने को उद्यत हैं । ऐसा नहीं, जो रण-भूमि से मुँह मोड़े " संजय ने कहा,-"शाबाश ! जहाँ हिम्मत है, वहाँ अवश्य जय होती है। आओ, अपने देश को दस्यु और तस्करों से साफ़ करें।"

इसके बाद वे जल-प्रवाह के समान शत्रु पर टूट पड़े । दुश्मनों के पैर उखड़ गये और संजय ने शत्रु के माल-सम्पत्ति तथा अपने देश पर अधिकार कर लिया । विदुला स्वयं रण-क्षेत्र में आयी और पुत्र का माथा चूमकर कहने लगी - "पुत्र ! अपने बाप का सक्चा पुत्र ! विदुला की ऑँखों का तारा ! तू ही राज्य करने का सच्चा अधिकारी है । "

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