सुकरात का जीवन परिचय । Sukrat Ka Jivan Parichay | Socrates


प्राचीन परम्पराओं तथा रूढ़ियों में फॅसे हुए समाज निरन्तर अवनति और पतन की ही ओर जाते हैं । ऐसे समाज के धनी-मानी मनुष्य उन रूढ़ियाँ के पालन में बड़ी कट्टरता, तत्परता और भक्ति दिखाते हैं, उन्हें नवीन उन्नतिशील विचारों से बड़ी घृणा होती है, और चाहे जो कुछ हो जाये; पर वे नवीन विचारों का सदा ही विरोध करते और उनके मानने वालों का दमन करते हैं । ऐसे अन्ध परम्परानुगामी मूर्ख मनुष्यों का समाज, अपने महापुरुषों को भी नहीं पहचानता; क्योंकि उनके नेत्रों पर धर्मान्धता की पट्टी बंधी रहती है ।

आज से प्रायः दो हज़ार वर्ष पूर्व यूनान (ग्रीस) का शासन भी ऐसे ही कट्टर स्वेच्छाचारियों के हाथों में था, जो पुरानी रूढ़ियों में फंसे हुए हर तरह के अत्याचार तथा पापाचार करते थे। वे मिथ्या, ढोंगो, धर्म और ईश्वर के पुजारी थे । यूनानियों का सामाजिक तथा धार्मिक जीवन बहुत ही बिगड़ा हुआ था । सब तरह की कुरीतियाँ उनमें भर गयी थीं और अन्धविश्वास तथा मिथ्या अभिमान के कारण उनका सामाजिक विकास नष्ट-भ्रष्ट हो चुका था । यूनान को राजनीतिक शासन यद्यपि प्रजातन्त्रवादी (डेमोक्रेसी) था, तथापि शासक सब तरह के स्वेच्छाचार और अत्याचार करते थे । इसी कारण यूनान के सर्व सर्वश्रेष्ठ महापुरुष सुकरात(साक्रीटीज़) को ज़हर का प्याला पीना पड़ा, जिसके लिये उस समय यूनानी दुखी नहीं हुए । पर मानव-जाति आज भी सुकरात के उस जहर-पान से शोकाकुल होकर उन अत्याचारी शासकों को अभिशाप देती है । क्योंकि सुकरात केवल यूनान का ही नहीं, वरन् समस्त मानवजाति का एक श्रेष्ठ पुरुष था । जब तक संसार में विद्या, बुद्धि, ज्ञान, सत्य, धर्म, न्याय आदि का आदर रहेगा, तब तक सुकरात की याद भी विद्यमान रहेगी ।

सुकरात का जीवन-चरित्र कितने ही यूनानी और अन्य विदेशी लेखकों ने लिखा है; पर उसके शिष्य प्लेटो (अफ़लातून) और उसकी स्त्री जेनोक्रन ने जो कुछ उसके सम्बन्ध में लिखा है, वह विशेष रूप से प्रामाणिक है । सुकरात का जन्म काल ईसा के ४७० वर्ष पूर्व माना जाता है । सुकरात के पिता एक सङ्गतराश थे, और उनका नाम था-सोफरो निसकस । उसके माता का नाम फ्नेरेट था, जो दाई का काम करती थी। सुकरात के जीवन का प्रारम्भिक भाग प्रायः मिलता ही नहीं; पर ईसा से ४२८ वर्ष पूर्व सुकरात पोटिडिआ के युद्ध मे लडे थे, जब उसकी आयु चालीस वर्ष की थी ।

उस समय यूनान एक अत्यन्त उन्नतिशील देश था । वहाँ साहित्य, कला, कविता, इतिहास, व्यवसाय, राजनीति आदि की खुब उन्नति थी । यूनान की राजधानी एथेन्स मे अत्यन्त उच्च कोटि के विद्वान्, दार्शनिक और राजनीतिज्ञ रहते थे । यूनान की शासन-पद्धति प्रजातन्त्रवादी थी, जिसे हम आजकल की भाषा में प्रजा-प्रतिनिधि शासन-प्रणाली भी कह सकते हैं । उनकी एक शासनसभा (एसम्बली) थी; प्रत्येक स्वस्थ नागरिक उस शासन-सभा का सदस्य था और यही सभा यूनानी साम्राज्य पर शासन करती थी । प्रत्येक नागरिक को शासन-सम्बन्धी बातें सुनने का और उसमें योगदान देने का अधिकार था ।

यूनान के प्राचीन काल के जितने बड़े-बड़े विद्वान् पुरुष हुए थे, सुकरात ने उन सब के ग्रन्थों और विचारों का अध्ययन किया था; साथ ही वह एक बड़ा बलवान् योद्धा भी थे । ईसा से प्रायः ४३२ वर्ष पूर्व पोटीडिआ नामक अधीन देश में यूनान के विरुद्ध विद्रोह कर दिया गया था । इस विद्रोह का दमन करने के लिये जो यूनानी सेना गयी थी, उसमें सुकरात भी एक योद्धा थे और उसने बड़ी वीरता के साथ उस विद्रोह का दमन करने में साथ दिया था । सुकरात ने यूनान की ओर से और भी कई विकट संग्रामों में भाग लिया था । इसके बाद यूनान में विचारों की एक नवीन क्रान्ति हुई, जिसमें पुरानी रूढ़ियों का घोर खंडन किया गया उन आन्दोलनकारियों में सुकरात ने प्रमुख भाग लिया था ।


सुकरात के विचार | Sukrat Ka Vichar


सुकरात पुराने विचारों को अन्धा होकर मानने वाला नहीं था, किन्तु यूनान में उस समय धर्मान्धता इतनी बढ़ गयी थी, कि सुकरात के स्वतन्त्र विचारों को सुनकर कितने ही लोग उसके शत्रु हो गये । उसके एक मुख्य शत्रु एरिस्टोफेन ने उसकी बदनामी करने में कोई कसर न उठा रखी । वह कहा करता था, कि “सुकरात एक बड़ा ही दुष्ट कुकर्मी आदमी है, जो पृथ्वी के नीचे और आकाश के ऊपर की बातों का अन्वेषण किया करता है । वह बुरी बातों को अच्छे रूप में दिखाता है और लड़कों तथा नवयुवकों को माता-पिता की अवज्ञा करना सिखाता है ।“ किन्तु सुकरात एक बड़ा ही निर्भीक महापुरुष था, जो किसी भी भयानक शक्ति से डरना जानता ही न था। यद्यपि वह शासन-सभा एक सद्स्य था, तथापि अपनी आत्मा के विरुद्ध कोई काम न करता था ।

सुकरात प्रायः कहा करते थे कि "मैं केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने कार्यों से यह दिखाता हुं, कि मैं मृत्यु से बिल्कुल नहीं डरता, पर मैं कोई गलत काम करने से बहुत ही डरता हूँ ।" वह यह भी कहा करते थे, कि "ईश्वर ने मुझे मनुष्यों की परीक्षा करने के लिये भेजा है और मैं इससे पीछे नहीं हट सकता, क्योंकि ऐसा करना ईश्वर की अवज्ञा करना होगा ।" वह राह चलते शिक्षा दिया करते थे । लोगों से कड़ी बात करके उनकी परीक्षा लेते थे । वास्तव में वह एक अद्भुत तार्किक थे । जो कोई मनुष्य उसकी बातें सुनता, उसी से वह बाते करने लगते और उसे कोई-न-कोई उपदेश देते थे । वह कहते थे, कि “मै ज्ञान का भूखा हूँ । जहाँ कहीं और जिससे भी जो ज्ञान मिलेगा, मैं उसे अवश्य प्राप्त करूगा ।“ उनकी इस ज्ञान-पिपासा के विषय में अफ़लातून ने ग्रन्थ लिखा है, जिससे सुकरात के चरित्र का उत्कृष्ट परिचय मिलता है । वह शत्रु और मित्र को सचमुच समान दृष्टि से देखते थे । उस महान् पुरुष की तुलना किसी भी प्राचीन व्यक्ति से नहीं की जा सकती । वह कभी-कभी किसी एक स्थान पर खड़ा हुआ घण्टों विचार किया करते थे । एक समय वह रात भर खड़े-खड़े न जाने किन विचारों में निमम्न थे, जब प्रातःकाल हुआ और सुर्य निकला, तब उसने सूर्य को देखकर प्रणाम किया और मुँह से धीरे-धीरे कोई प्रार्थना पढ़ता हुआ वहाँ से चला गया । रण-क्षेत्र में उसकी अद्भुत शौर्य देखकर शत्रु और मित्र दोनों चकित रह जाते थे ।


सुकरात और धर्माचार्य मे बहस


यूनान के पुराने कट्टर धर्माचार्य, जो कुछ राजनीति या धर्मनीति-सम्बन्धी बातें सिखाते थे, सुकरात उनका विरोध करते थे । एक बार वह मार्ग से चले जा रहे थे, उन्होने देखा, कि एक पुराना धर्माचार्य खुब बढ़-बढ़ कर लोगों को गुमराह करने वाले उपदेश सुना रहे है । सुकरात ने भीड़ में पहुँचकर उस मुर्खो से बात करनी शुरू की, पर सुकरात के अकाट्य तर्को के सामने उस मनुष्य की एक न चली । सुकरात ने उससे बराबर इतने प्रश्न किये, कि अन्त मे वह घबरा गया और चुप हो गया । तथा सुकरात ने उससे कहा, -“Will you cease to get something out of nothing" अर्थात्, "तुम्हारे अन्दर जो कुछ भी शान नहीं है, तो क्या तुम उस 'कुछ नहीं मे से कुछ निकालना बन्द कर दोगे ?" वह मूर्ख धर्माचार्य लजित होकर चला गया !

सुकरात ने अपनी ज़बरदस्त दलीलों से पुराने धर्माचार्यो की निरर्थक युक्तियों तथा रीतिरिवाजों का घोर खंडन किया । उन पुराने लोगों की तरह सुकरात भी राजनीति, धर्मनीति, समाज-संगठन आदि विषयों पर विचार प्रकट करता था, पर उसके विचारों में ऐसी नवीनता थी, जो उन कट्टर लोगों ने पहले कभी नहीं सुनी थी । उसकी स्त्री जेनोफन कहती थी, कि वह (सुकरात) केवल मनुष्यों के सम्बन्ध में बाते करते है ।

वह सदा यही पूछा करते थे ,-"दया-धर्म क्या है ? सत्य क्या है ? पवित्रता क्या है ? आदर और सम्मान किसमें है ? मित्रता क्या है ? नीच कौन है ? न्याय और अन्याय किसे कहते हैं ? पागलपन क्या है ? साहस क्या है ? कायरता क्या है ? राज्य क्या है ? राजनीति क्या है ? सरकार क्या है ? कौन मनुष्य शासन करने योग्य है ?" आदि ऐसे ही प्रश्न वह किया करते थे और कहते थे , कि जो इन प्रश्नों के ठीक उत्तर दे सकते हैं, वे ही सज्जन पुरुष हैं और जो इन प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकते वे दासों और गुलामो से भी बदतर हैं ।

पुराने कट्टर धर्मान्ध लोग प्रकृति की बातों में बहुत मन लगाते थे; पर सुकरात मनुष्योचित कर्मो मं मन लगाते थे । वे प्रकृति की लीला देखने में मग्न रहते थे, पर सुकरात मनुष्यों की लीला देखते थे और उनकी भुले उन्हें सुझाता था । यूनानी जनता पुरानी गुमराही की बातों में ही मस्त रहती थी; पर सुकरात नवीन उन्नतिशील प्रणाली से विचार करने का आग्रह करते थे । पुरानी ग़लत बातों और गलत तरीक़ों को, जो यूनानी लोग वास्तविक ज्ञान समझे बैठे थे, उन्हें सुकरात पापाचार कहते थे । सारांश यह, कि वह केवल उसी सत्य और ज्ञान को मानते था, जो विवेक एवं तर्कयुक्ति के द्वारा सिद्ध किया गया हो । विवेक-रहित बातों को वह नहीं मानते थे ।

किन्तु पुरानी लकीर के फकीर यूनानी लोग सुकरात के सत्य-विवेक और ज्ञान से घबराते थे और उन्हें ऐसा मालूम होता था, कि सुकरात नास्तिकों की तरह उपदेश देकर सबको नष्ट-भ्रष्ट करना चाहते है । अज्ञान और पापाचार में डूबा हुआ एथेन्स अपने सबसे श्रेष्ठ पुरुष को न पहचान सका ।


सुकरात के खिलाफ अभियोग


ईसा से ३९९ वर्ष पूर्व यूनानी अदालत के सामने सुकरात पर कई संगीन अभियोग लगाये गये, जो इस प्रकार थे,-"सुकरात एथेन्स के देवताओं में विश्वास नहीं करता । वह नवयुवकों को बिगाड़ता है । वह यूनानी शासन पद्धति की निन्दा और आलोचना करता है । वह लड़कों से कहता है, कि अपने मां-बाप की आज्ञा मत मानो । वह बहुत तर्क करता है और कहता है, कि सम्मान उन्हीं लोगों का करना चाहिये, जो दूसरों के काम आए । वह सरकार को सुधारने के लिये तर्क करता है और कहता है, कि सरकार एक कला है और इस कला को वही लोग संभाले, जिन्हें उसकी शिक्षा, बुद्धि और ज्ञान है । वह राजनीतिक प्रश्नों को अशिक्षित लोगों के बहुमत पर नहीं छोड़ना चाहता । सारांश यह, कि सुकरात का सारा जीवन दूषित, अनैतिक और अपराधों से भरा हुआ है । ये अपराध लगाने वाले एथेन्स के तीन मनुष्य थे, जिनके नाम थे - मेलिटस, लाइकोन और एनिटस । ये तीनों मनुष्य उस अन्यायकारी दल के थे, जिनकी सुकरात खुलकर निन्दा किया करता था ।

मेलिटसन ने ईश्वर की शपथ करके उक्त अपराध लगाये थे । एथेन्स में उस समय 'ज्युरी' प्रथा के द्वारा न्याय होता था । मुकदमा सुनने के बाद जजों और ज्युरियों ने विचार किया और बहुमत से सुकरात पर सब अपराध प्रमाणित हो गये । सुकरात के पक्ष में २२० और विपक्ष में २८१ वोट आये । मेलिटस ने एक भाषण में सुकरात को प्राण-दण्ड देने के लिये कहा और बहुमत इस पर सहमत हो गयी । सुकरात यदि चाहता, तो वह अपने अपराधों के लिये क्षमा प्रार्थना करके तथा जजो की खुशामद करके आसानी से छूट सकता था; पर उनकी तरह के महापुरुष के लिये ऐसी बाते असम्भव थीं । सुकरात की अपूर्व योग्यता उस व्याख्यान से प्रकट होती है, जो उन्होने अदालत के सामने दिया था । वह मृत्यु की तो वह बिल्कुल परवाह ही न करते थे और कहते थे ,"किसी अच्छे मनुष्य को मृत्यु से भय नहीं करना चाहिये । मृत्यु एक शान्ति की निद्रा है मृत्यु एक यात्रा की तरह है, जो इस संसार से दूसरे संसार के लिये होती है । दार्शनिक मनुष्य मृत्यु का अध्ययन करते हैं, और वे इस शरीर को छोड़ देना ही पसन्द करते हैं; क्योंकि वे ज्ञान चाहते हैं, और ज्ञान की प्राप्ति मृत्यु के बाद ही होती है । जो मृत्यु से डरते हैं, वे ज्ञान से प्रेम नहीं करते; क्योंकि वे अपने शरीर, धन और सांसारिक सम्मान से प्रेम करते हैं ।"


सुकरात का दर्शन शास्त्र | Sukrat Ka Darshan


सुकरात ने आत्मा के अमरत्व पर भी विचार प्रकट किये हैं, और उसने गीता के उपदेश की तरह यह सिद्ध किया है, कि इस जीवन के पहले भी हमारी आत्मा का अस्तित्व था और मृत्यु के बाद भी रहेगा । सुकरात ने अपने अन्तिम भाषण में जिस ढंग़ से पैरवी की है, वह भी बड़ी मनोरंजक और अपूर्व है । आरम्भ में वह कहते है-"एथिनियन्स ! में नहीं कह सकता, कि मुझ पर अभियोग लगाने वालों ने तुम लोगों पर कैसा प्रभाव डाला है; पर मैं यह जानता हूँ, कि उन्होंने एक शब्द भी सत्य का नहीं कहा है । वे मुझे एक चतुर वक्ता बताते हैं; पर यदि सत्य कहना चतुराई है, तो मुझे दावा है, कि मैं उन सबसे कहीं बढ़कर महान सत्यवादी वक्ता हूँ । मेरी आयु इस समय ७० वर्ष के पार है, और यह पहला अवसर मुझे अदालत के सामने आने का है ।" इसके बाद उन्होने बुद्धि और ज्ञान के सम्बन्ध में कहा, -"एक बार मैने एक मनुष्य को ज्ञान की बाते करते हुए सुना और मैं उसके पास गया । वह अपने को बुद्धिमान कहा करता था और मैने समझा, कि मैं इससे कुछ ज्ञान की बाते सुनूँगा । मैंने उससे तर्क करने आरम्भ किये; पर वह एक राजनीतिज्ञ था । बातचीत करने के बाद मुझ मालूम हुआ, कि मैं उससे अधिक बुद्धिमान हूँ । वास्तव में बात यह है, कि मैं या वह सत्य को नहीं जानते; पर वह समझता है, कि सत्य ज्ञान को वह जानता है, और मैं समझता हूँ, कि मैं नहीं जानता, इसलिये मैं उससे अधिक बुद्धिमान हूँ । तब मैं एक दूसरे विख्यात बुद्धिमान मनुष्य के पास गया, और उसे भी मैंने वैसा ही मिथ्यावादी पाया । इस प्रकार मेरे शत्रुओं की संख्या बढ़ने लगी । राजनीतिज्ञो बाद मैं कवियों के पास गया, क्योंकि उन्हें अपनी कविताओं का बड़ा अभिमान था, इसलिये मैंने उनकी कविताओं का अध्ययन किया । पर मुझे यह कहते शर्म मालूम होती है, कि परिणाम विपरीत निकले । कवि लोग अपनी कविताएँ स्वयं नहीं समझते । वे कविताएँ लिखकर लोगों को चकित करते हैं, इसलिये समझते हैं, कि अन्य विषयों को भी वे जानते हैं । पर वास्तव में ऐसा नही है । इसलिये मैंने सोचा, कि जिस तरह राजनीतिज्ञों से बढ़कर मैं बुद्धिमान हूँ, उसी तरह कवियों से भी अधिक मुझे बुद्धि है । इस प्रकार मैं सभी भिन्न-भिन्न पेशेवाले आदमियों से मिला और हर बार मुझे अपना ही निर्णय ठीक मालूम हुआ । लोग मुझे बुद्धिमान कहते हैं; पर मैं समझता हूँ, कि बुद्धिमान केवल ईश्वर है और मनुष्यों की बुद्धि बिलकुल परिमित है । "


सुकरात को प्राणदंड


प्राणदण्ड की आज्ञा देने के बाद सुकरात कारावास में रखे गए । उस समय उनका एक भक्त शिष्य “क्रीटो” उनसे भेंट करने गया । कुछ बातचीत होने के बाद क्रीटो ने उनसे कहा, -"तुम यहां से भाग चलो । हमने तुम्हारे भागने का सब प्रबन्ध कर लिया है । मेरा धन तुम्हारे लिये हाज़िर है । किसी अन्य स्थान में तुम आकर रहना, जहां कोई आपदा न आयेगी ।"

किन्तु सुकरात ने यह बात न मानी और जेल से बचकर भागना उसने पसन्द नहीं किया । क्रीटो से इस विषय पर बहुत बहस हुई और अन्त में सुकरात ने कहा, कि-"मैं केवल विवेक का आदेश मानता हूँ । मैं एथिनियन्स की रज़ामन्दी के बिना कभी न भागुगा, जिस देश में पैदा हुआ, जहाँ मेरे पिता-माता रहे, जहाँ के अन्न-जल-वायु से मैं पला हूँ, उस देश की इच्छा के विरुद्ध मैं कोई कार्यवाही न करूगा।" इस तरह महापुरुष सुकरात ने उन दुष्ट देशवासियों की अवज्ञा करके भागना भी पसन्द नहीं किया, जो उनके प्राण ले रहे थे ।


सुकरात की मृत्यु | Sukrat Ki Mrityu Kaise Hui


प्राण-दण्ड पाने के एक दिन पहले, रात के समय सुकरात जेल की कोठरी में अपने कई शिष्यों तथा मित्रो से बाते कर रहे थे । बाते सत्य, ज्ञान और विवेक आदि विषयों पर हो रही थीं, और सुकरात अपने स्वभाव के अनुसार खुब तर्क करते हुए ज़ोरो में समझा रहे थे, उस समय क्रीटो ने आकर कहा,"जो मनुष्य आपको ज़हर पिलायेगा, वह आया है, और कहता है, कि सुकरात को मना करो, कि वह इतने जोर-ज़ोर से बातें न करे; क्योंकि ज़ोर से बोलने के कारण खुन गर्म हो जाता है, और फिर ज़हर नहीं चढ़ता । कातिल कहता है, कि पहले ऐसा अन्य कैदियों को भी हो चुका है और उन्हें दो, तीन बार ज़हर पिलाना पड़ा, तब उनके प्राण निकले !"

सुकरात ने कहा,-"जाओं, कातिल से कहो, कि वह अपने काम का ध्यान करे, और मुझे कई बार ज़हर पिलाने का इन्तज़ाम तैयार रखे !"

क्रीटो ने कहा,-"मैं आपका यह उत्तर जानता था, पर वह मनुष्य आग्रह करता है।"

"कुछ परवाह नहीं !" सुकरात ने कहा, -"जाओ, उस क़ातिल से यही कह दो !" इसके बाद सुकरात फिर अपने मित्रों से बाते करने लगा । ज़हर पीने के पहले उसने स्नान किया और अपने तीन पुत्रों तथा स्त्री से मिला । इसके बाद क़ातिल जहर का प्याला लाया; जिसे सुकरात ने बड़ी शान्ति से पी लिया ।

क्रीटो, पोलोडोरस और अन्य मित्र चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगे । चारों ओर शोक के दरिया उमड़ आये । सुकरात ने कहा,-"मेरे मित्रो, तुम लोग यह क्या करते हो ? इसीलिये तो मैंने स्त्री और बच्चो को यहाँ से भेज दिया, कि वे व्यर्थ रोयेगे !"

यह सुनते ही उसके शोकग्रस्त मित्र चुप हो गये । जहर पीकर सुकरात टहलता रहा । इसके बाद वह सदा के लिये लेट गया । इस तरह यूनान के एक सबसे बुद्धिमान, न्यायी और धर्मात्मा पुरुष का अन्त हो गया, जो आज भी संसार में परम भक्ति से याद किया जाता है।

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