लेनिन की जीवनी । लेनिन का जीवन परिचय । Vladimir Lenin


सोये हुए मजदुरों और किसानों को जगाने के लिये लेनिन जैसे महापराक्रमी व्यक्ति की आवश्यकता थी । लेनिन की भीम-प्रतिज्ञा, दृढ़ इच्छा और कार्य शक्ति उन मजदुरो को उठा सकती थी ।

लेनिन सदा मजदुरों के साथ रहता और उनका संगठन किया करता था । उन्होने मजदुरो से कहा -"तुम्हीं भूमि के स्वामी हो !" लेनिन की यह हुकार-ध्वनि मनुष्यों के बीच में गूँज उठी। समग्र रूस के श्रमजीवी लेनिन की ओर आशा से देखने लगे । उसने तीस वर्ष के अन्दर अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और शक्ति से ज़ारशाही को तहस नहस कर डाला और फिर मजदुरों की साम्यवादी सोविएट-शासन प्रणाली ऐसी स्थापित की, जो आज समस्त दलित देशों के लिये एक अपू्र्ण आदर्श हो रही है । एक मनुष्य के जीवन का कार्य कितना महान मालूम होता है ।

सन् १९१७ के नवम्बर मास में, जब कि वोल्शेविक विजयी हुए, यदि लेनिन चाहता, तो अखिल रूस का शहन्शाह बन सकता था और ऐसा शहन्शाह, जिसे रूसी प्रजा खुशी से मान लेती, पर लेनिन स्वार्थी या लोभी नहीं था, कि राजसिंहासन के लिये वह साम्यवाद के साथ विश्वासघात करता । इसके पहले इतिहास में कभी किसी मनुष्य ने इतनी उदारता से जनता का राज्य जनता को नहीं सौंप दिया । निस्सन्देह लेनिन इस युग का एक सफल नेता, सुधारक और क्रान्तिकारी हुआ है । उसने अमीर शासको का नाश करके और दीन श्रमजीवियों का राज्य स्थापित करके इतिहास में एक नया पृष्ठ लिखा है ।


लेनिन का जन्म


लेनिन का पूरा नाम था - ब्लाडिमीर युलिओनोव इलिच निकोलाय लेनिन था । पर संसार में वह केवल लेनिन के ही नाम से विख्यात है । यही तीन अक्षरों का नाम समस्त दलित मनुष्यों को जगाने के लिये काफीहै । लेनिन का जन्म सन् १८७० की २२ अप्रैल को सिम्बरस्क नगर (रूस) में हुआ था । उसके माता-पिता बड़े ही विद्वान थे । उनके पिता सम्राट जार के शिक्षा-विभाग के प्रधान संचालक थे । लेनिन की माता मेरिया एलक जंड्रोबना उच्च कोटि की विदुषी महिला थी, जो अपने बच्चों के लालन-पालन और पठन-पाठन का पूरा ध्यान रखती थी । लेनिन का एक बड़ा भाई भी था, जिसका नाम था-एलकजेण्डर युलिओनोव और तीन बहने थीं । ये पाँचों भाई-बहन विद्या प्रेमी थे; साथ ही पढ़ते-लिखते थे । एलकजेंडर युलिओनोव स्वयं दिन-रात अध्ययन करते और अपने भाई-बहनों को भी शिक्षा देते थे । किन्तु सम्राट जार की हत्या करने के षड़यंत्र में वह पकड़ा गया और बाद में उसे फॉसी दे दी गयी । वह यदि चाहता, तो सरकार से माफी माँग कर छूट भी सकता था; पर उसके जैसा महापुरुष शत्रुओं से माफी माँगनेके लिये नही पैदा हुआ था । लेनिन की आयु उस वक्त सत्रह वर्ष की थी । भाई को प्राणदण्ड मिलने पर लेनिन कुछ भी विचलित न हुआ । वह राजधानी सेण्ट पीटर्सबर्ग में न्यायशास्त्र का अध्ययन करना चाहता था पर वह एक भयंकर षड़यन्त्रकारी का भाई था; इसलिये उसे आज्ञा नहीं मिली । तब वह काज़ान के विद्यालय में गया; पर वहाँ विप्लवकारी विद्यार्थियों के आन्दोलन में भाग लेने के कारण उसे वहाँ से भी निकलना पड़ा । लेनिन ने हर तरह की बाधाओं तथा असुविधाओं का सामना करते हुए अन्त मे बैरिस्टरी पास कर ही ली पर बैरिस्टरी के पेशे में उसका चित्त न लगा और उन्होने मुशकिल से दो-तीन दिन बैरिस्टरी की होगी । उसे अदालत की कानूनी कार्रवाइयों में बड़ी दिल्लगी मालूम होती थी । वह बहुत दिनों के बाद भी अपने मित्रों में अदालती दिनों की चर्चा दिल्लगी के साथ करते और हँसते थे ।


लेनिन के कार्य


वह जर्मन साम्यवादी महात्मा कार्ल मार्क्स के शिष्य थे और उन्हे अपने गुरु का बड़ा अभिमान था । उस पूज्य गुरु से बढ़कर संसार में किसी को अनुभवी न समझते थे, उन्हीं सिद्धान्तों के आधार पर वह अपनी तर्क-प्रणाली आरम्भ करते थे । उन्होने मार्क्स के आर्थिक सिद्धान्तों की खूब खरी आलोचनाएँ लिखी है, जिन्हें पढ़कर युरोप के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री दंग रह जाते थे । उस समय एक फ्रेंच अर्थशास्त्री ने कहा, कि "यह लड़का (लेनिन) एक दिन प्रलय कर देगा !” उस ज़माने में कितने ही साम्यवादी नेता, अमीरों की ओर से मजदुर-सभाओं मे घुसे हुए थे, जो मजदुरों को गुमराह करते थे । लेनिन ने अकेले ही विभिन्न अवसरों पर उन स्वार्थी नेताओं से बहसें की और उन्हें परास्त करके अपना 'मार्किस्ट' साम्यवादी सिद्धान्त स्थिर किया । वह केवल रूस में ही नही बल्कि युरोप के समस्त देशों में घूमकर मजदुरों का आन्दोलन बढ़ाते और उन्हें गुप्त संगठन के उपाय बताते थे । लेनिन रूसी मजदुरों में क्रान्ति की ऐसी आग भड़का दी थी, कि सम्राट जार की सरकार ने उन्हे एक बहुत ही खतरनाक षड़यंत्रकारी समझा; इसलिये सन् १८६० में उन्हे कारावास की सजा दी गयी । उन पर जितना ही दमन किया जाता, वह उतने ही निर्भीक और उद्दण्ड होकर उग्र आन्दोलन करते थे । उन्होने विदेशों की भी यात्रा खूब की थी और हर जगह के मजदुरों के आन्दोलन का उन्होने यथेष्ट ज्ञान एव अनुभव प्राप्त किया था ।

सन् १९०३ में उसने "इस्करा" (चिनगारी) नाम का एक पत्र निकला । इस पत्र के द्वारा उन्होने मजदुर-आन्दोलन और रूसी क्रान्ति का पूरा कार्यक्रम जनता के सामने पेश किया; उन्होने मजदुरों की माँगे बहुत ही सरल और सीधी भाषा में लिखकर पेश कीं, जिन्हें जनता पसन्द करती और उत्साहित होती थी । साथ ही लेनिन ने अन्दोलन-कार्य भी प्रचण्ड रूप से जारी रखा । सन् १९०७ में उन्होने दूसरी बार विदेशों की यात्रा की । लेनिन ने इस बार जेनेवा और पेरिस से दो गैर-क़ानूनी पत्र निकाले थे । इन पत्रों की भाषा, अमीरों के लिये गाली-गलौज़ से अधिक भरी रहती थी । लेनिन उस समय फ्रान्स की राजधानी पेरिस में रहते थे । सन १९१० में लेनिन के हाथ में तीन साम्यवादी पत्र थे, जिनसे वह क्रान्ति गदर और बग़ावत करने के लिये मजदुरों को भड़काते थे । रूसी पालैमेए्ट "ड्यूमा" के भी कई प्रतिष्ठित सदस्य लेनिन के दल में मिल गये थे, जो रूस में क्रान्ति भड़काने का काम करते थे । सन् १९१२ के जनवरी मास में साम्यवादियों ने प्रेग में एक सभा की । लेनिन उस समय अपने कई सहयोगियों सहित क्राको के किसी गुप्त स्थान में रहते थे और समस्त रूस के मजदुर आन्दोलन का संचालन करते थे ।


लेनिन की मृत्यु


लेनिन की धर्मपत्नि श्रीमती नेडजडा कोन्स्टरिटनोबनाक्रु पुस्का रूस की सर्वोच विदुषी महिला थी । लेनिन के समस्त कार्यो में श्रीमती क्रपूस्काने बड़ी सहायता की थी । लेनिन को दो बार गोलियाँ लगी थीं और इस दूसरी गोली के कारण उसका शरीर अधिक अस्वस्थ होने लगा । बीमारी बढ़ती गयी । सन् १९२४ की २२ जनवरी को उस महापुरुष का स्वर्गवास हो गया । उस दिन सारे संसार के साम्यवादी मजदुरो ने मातम मनाया था ।

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