मेसोपोटामिया सभ्यता | मेसोपोटामिया सभ्यता | Mesopotamia Civilization | Mesopotamia History


विश्व की सर्वप्रथम महान सभ्यता मसोपोटामिया ( Mesopotamia ) के संपन्न तथा मैदानों में विकसित हुई थी । यह क्षेत्र अब ईरान तथा ईराक की सीमाओं को जोड़ता है । यूफ्रेट्स नदी तथा टाइग्रिस नदी नामक दो नदियों के बीच यह सभ्यता विकसित हुई ।

३००० ई.पू. से भी पहले सुमेरियावासियों ने अनेक नगरों-राज्यों की स्थापना कर ली थी । ये वे श्याम वर्ण के लोग थे, जो पूर्व से आये थे और यूफ्रेट्स नदी तथा टाइग्रिस नदी के बीच की उपजाऊ जमीन पर बस गये थे । समय के साथ-साथ इन्होंने एक ऐसी सभ्यता का विकास किया, जो इनके बाद के राजाओं तथा शासकों के लिए एक आदर्श बन गयी । दुर्भाग्यवश, इन लोगों द्वारा संकरे मैदानों में बसाए गये, ये नगर आज कल्पित कथा-कहानियों के समान ही रह गये हैं । उस समय के दर्शनीय मंदिर तथा मीनारों के अब खण्डहर मात्र ही रह गये हैं ।


बेबीलोनिया की सभ्यता । बेबीलोन का इतिहास | हम्मूराबी की सभ्यता


यह अब भी माना जाता है कि बेबीलोनिया की सभ्यता अवश्य ही अस्तित्व में आयी थी तथा हम्मूराबी (Hammurabi) नामक महान् राजा यहां के मुख्य नगर बेबीलोन पर शासन करता था । बेबीलोन वर्तमान बगदाद नगर से ६० मील दक्षिण में स्थित था । उस राजा ने अपनी अनेक राजनैतिक तथा सैनिक गतिविधियों के द्वारा इस प्रदेश को एक महान् राष्ट्र एवं संस्कृति के रूप में संगठित किया ।

सम्राट हम्मूराबी (Hammurabi) की ख्याति एक महान विधि-निर्माता के रूप मे है । आज भी लोग उसकी न्यायपरायणता को भूले नहीं हैं । हम्मूराबी (Hammurabi) ने ४३ वर्ष तक शासन किया । अपने शासनकाल के पहले ३० वर्ष उसने पड़ोसी राज्यों से युद्ध कर उन पर अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने में व्यतीत किये । शेष अंतिम १३ वर्ष एक सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों की संहिता के निर्माण तथा अपने साम्राज्य के वास्तु-शिल्प की दृष्टि से सजाने-संवारने में व्यतीत किये ।

नवीनतम ऐतिहासिक खोजों से ज्ञात हुआ है कि हम्मूराबी (Hammurabi) द्वारा निर्मित संहिताएं, वास्तव में, प्राचीन सुमेरियावासियों द्वारा निर्मित न्यायपूर्ण सिद्धांतों एवम् प्रथाओं का विस्तार मात्र ही थी ।


बेबीलोन का समाज


बेबीलोनिया का समाज चार प्रमुख वर्गों में बंटा हुआ था - उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग, निर्धन-स्वतंत्र वर्ग तथा दास वर्ग । प्रत्येक वर्ग के लिए कुछ विशेष अधिकार निश्चित कर दिये गये थे । राजा हम्मूराबी की अनुबन्ध-पट्टिकाएं विशेष तथा हस्ताक्षरित पत्र, जो हाल ही में खोजी गयी हैं, उस समय की संस्कृति पर पर्याप्त प्रकाश डालती हैं ।


बेबीलोन में स्त्रियों की दशा


बेबीलोन में स्त्रियों की दशा भी बीसवीं शताब्दी के कुछ देशों से अच्छी थी । स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त थे । वे अपनी अलग संपत्ति रख सकती थीं । वे स्वतंत्र व्यापार कर सकती थीं तथा दास भी रख सकती थीं । बहु-विवाह प्रथा बहुत कम प्रचलित थी । फिर भी पुरुष अपनी पत्नियों को तलाक दे सकते थे, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें चांदी के रूप में मुआवज़ा (क्षतिपूर्ति) देना पड़ता था । क्षतिपूर्ति की राशि विभिन्न वर्गों के लिए अलग-अलग थी । दासों को भी संरक्षण प्रदान किया गया था । वे स्वतंत्र वर्ग में विवाह कर सकते थे और दास अभिभावकों की मृत्यु के बाद उनके बच्चों को चाकरी से मुक्त कर दिया जाता था । परिवार में पिता का सर्वोच्च स्थान होता था । उसकी मृत्यु के बाद सभी पुत्रों समान माना जाता था तथा सबसे बड़े पुत्र को कोई भी विशेष अधिकार नहीं दिये जाते थे ।


बेबीलोन की न्याय व्यवस्था


न्याय के क्षेत्र में, न्यायाधीश 'जैसे को तैसा' के सिद्धांत में विश्वास करते थे । सामाजिक तथा नैतिक मूल्यों के काफी विकसित हो जाने के बावजूद भी बेबीलोन की न्याय-संहिता तर्क-संगत होने की अपेक्षा आडम्बरपूर्ण अधिक थी । किसी व्यक्ति द्वारा अनजाने में किये गये अपराध तथा जानबुझकर किये गये अपराध में कोई भेद नहीं किया जाता था । दोनों अवस्थाओं में उसे समान दंड ही दिया जाता था ।


बेबीलोनिया की चिकित्सा व्यवस्था


बेबीलोनिया की चिकित्सा-कला, जो कि जादू-टोने से जुड़ी हुई थी, सुमेरिया से आयी थी । बेबीलोनिया में राज्यचालित चिकित्सा विज्ञान संबंधी विद्यालय थे । चिकित्सक धार्मिक नियमों द्वारा नियंत्रित होते थे तथा राज्य के प्रति उत्तरदायी होते थे ।


बेबीलोनिया और विज्ञान


आकाश तथा नक्षत्रों की गतिविधियों के अध्ययन को इस काल में विज्ञान की श्रेणी प्रदान की गयी । बेबीलोनिया की खगोल विद्या (Astronomy) ने भूमण्डलीय ज्ञान (Planetary world-picture), पंचांग (Calender) तथा काल गणना (Time Reckoning) की पद्धतियों के लिए आधार प्रदान किया । उनका गणित का ज्ञान सुमेरिया की सैक्सजैसिमल (Sexagesimal) तथा दशमलव पद्धति के विलयन (Fusion) से विकसित हुआ था ।

बेबीलोन की सभ्यता वस्तुतः उस भू-भाग में उत्पन्न हुई जहां कभी सुमेर तथा अक्कड़ साम्राज्य स्थापित थे । लोग इन्हें अक्कडियों के नाम से जानते हैं जबकि एक फ्रांसीसी जर्मन पुरातत्त्ववेत्ता ज्यूल्स औपर्ट ने इन्हें सुमेरियावासी कहा है । दोनों ही नाम अक्काडी तथा सुमेरियाई-उस शासक के नाम के आधार पर रखे गये हैं, जो अपने आपको "सुमेर तथा अक्कड़ का सम्राट" कहा करता था । विभिन्न पुरातत्त्वीय खोजों के आधार पर यह मान लिया गया है कि सभ्यताएं सुमेरिया की रहस्यात्मक "काले शीर्षों वाली सभ्यता" से ही उत्पन्न हुआ हैं ।


जिगुरत क्या है । What is Ziggurat


सुमेरिया की वास्तुकला बहुत शानदार तथा विशिष्ट थी । उन लोगों को कृत्रिम पर्वतों के आकार के भवन बनाने की आदत सी थी । नीचे से चौड़े और ऊपर की ओर पतले होते थे । ये भवन आकाश को छूते थे तथा इनके शीर्ष पर मंदिर बना होता था । इन्हें " जिगुरत " कहा जाता था । इनमें कई मंजिलें होती थीं । कुछ " जिगुरत " तो ३०० फुट तक ऊंचे थे । सबसे महान् " जिगुरत " बेबीलोन में था, जिसे समस्त विश्व में "बाबल की मीनार" के नाम से जाना जाता है ।

ये " जिगुरत " केवल वास्तुकला के श्रेष्ठ नमूने मात्र नहीं थे । सुमेरिया के लोग मानते थे कि उनके देवी-देवता सुदूर आकाश में नहीं, बल्कि इसी पृथ्वी पर रहते हैं । उनका विश्वास था कि ये देवी-देवता राजाओं के माध्यम से स्वयं विभिन्न नगरों पर शासन कर रहे हैं और इस कार्य के लिए देवताओं ने राजाओं को कुछ शक्तियां प्रदान की हैं । इसीलिए " जिगुरत " में सबसे ऊपर मंदिर बने होते थे और माना जाता था कि उनमें देवता रहते हैं । दूसरा मंदिर इन भवनों में सबसे नीचे की मंजिल पर बनाया जाता था ।

मसोपोटामिया की सभ्यता में लगभग ३० ऐसे " जिगुरत " पाये गये । ये " जिगुरत " भी मिस्र के पिरामिडों के समान ही प्रभावित करते हैं । आज तो हम इनके सौन्दर्य की केवल कल्पना ही कर सकते हैं क्योंकि इनमें से अधिकांश अब तक खण्डहर का रूप ले चुके हैं । अतः इन खण्डहरनुमा ढांचों का अध्ययन करना कठिन कार्य हो गया है । फिर भी इतिहासकार तथा पुरातत्त्ववेत्ता यह तो मानते ही हैं कि मसोपोटामिया के प्रत्येक बड़े नगर में एक जिगुरत अवश्य था ।

महान् अंग्रेज पुरातत्त्ववेत्ता सर लियोनार्ड वूली ने सन् १९२२ से सन् १९३४ के बीच "नुर" नामक स्थान पर जिगुरत का अन्वेषण किया । उन्होंने पाया कि इन जिगुरतों के निर्माण में आधुनिक वास्तुकला के सिद्धांत समाहित हैं । इन जिगुरतों का निर्माण भी आज ही की तरह हल्का-सा घुमाव देकर किया गया है । ऐसा शायद इसलिए किया गया होगा ताकि इन ऊंची इमारतों को प्रायः कमजोर पड़ जाने की संभावना से बचाया जा सके । इसके अतिरिक्त ऐसा इसलिए भी किया जाता होगा ताकि मध्य में प्रतीत होने वाले झुकाव को भी सुधारा जा सके ।

ब्रिटिश संग्रहालय में पच्चीकारी की एक ऐसी कृति भी है, जिसमें बेबीलोनिया के युद्धकालीन एवं शांतिकालीन जीवन को दर्शाया गया है । इस कृति में सीपियों तथा नीलमणि द्वारा मनुष्यों तथा पशुओं की आकृतियां बनायी गयी हैं । सुमेरिया के लोग न केवल वास्तुकला के क्षेत्र में अग्रणी थे, बल्कि वे लेखन-कला के आविष्कारक भी रहे हैं । चित्र-लेखन (Pictography) के स्थान पर उन्होंने अक्षरांकन की एक आधुनिक तथा विशिष्ट शैली विकसित की । यह उस लेखन-शैली की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था, जिसका प्रयोग हम आजकल करते हैं ।

हम्मुराबी तथा नेबचङ्रेजर (Nebuchadrezzar) जैसे शक्तिशाली तथा उदार राजाओं के होते हुए भी मसोपोटामिया की सभ्यता ने बुरे दिन भी देखे । जिस सभ्यता के न्यायपूर्ण कानूनों तथा सामाजिक मूल्यों का अनुगामी अनेक सभ्यताओं ने अन्धानुकरण किया, वही सभ्यता अन्ततः यूनानियों के आक्रमणों का शिकार हो गयी तथा इस सभ्यता के दुर्भाग्य को बढ़ाने में एक ओर भयंकर बाढ़ों तथा दूसरी ओर झुलसा देने वाली गर्मी का भी हाथ रहा । यद्यपि इसके धर्म, कला तथा बौद्धिक जीवन का पूर्णतः नाश कर दिया गया, फिर भी इस सभ्यता ने एस्सीरिया (Assyria) तथा निनवेह (Nineveh) नामक नए समृद्ध नगर के रूप में पुनर्जन्म लिया । निनवेह नगर का बेबीलोनिया से वही संबंध था, जो रोम का एथेन्स से था ।

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