गुरु अमरदास जी का जीवन परिचय | गुरु अमरदास जी के शब्द | Guru Amardas Ji History in Hindi


जो आरम्भ से तुम्हारे माथे पर लिखा गया है, उसे कोई मिटा नही सकता, नानक, जो लिखा गया, वह घटित होता है । जो ईश्वर की अनुकम्पा में रहते हैं वे इस सच्चाई का अनुभव करते हैं। -- गुरु श्रमरदास, श्लोक

सिक्खों के तृतीय गुरु अमरदास जी का जन्म जिला अमृतसर में बसरके नामक स्थान पर हुआ था । उनके पिता ताजभान, तथा उनकी माता सुलक्खां, रूढ़िवादी हिन्दू थे ।

२३ वर्ष की आयु में श्री देवचन्द की पुत्री, बीबी मन्शादेवी से श्री अमरदास जी का विवाह हुआ । उनके मोहन तथा मौहरी नामक दो पुत्र तथा धनजी तथा भानीजी नामक दो पुत्रियां हुई ।

गुरु अंगददेव जी से भेंट होने से पूर्व गुरु अमरदास जी का जाति-पांति तथा अस्पृश्यता में विश्वास था । एक बार हरिद्वार की यात्रा के समय दुर्गादत्त नामक एक पण्डित से उनकी भेंट हुई, उसने भविष्यवाणी की कि उन्हें निकट भविष्य में कोई बहुत उच्च पद प्राप्त होगा । उन्होंने दूर-दूर तक गुरु की खोज की और अन्ततः उनके अपने परिवार में उन्हें गुरु मिल गया ।

एक दिन उन्होंने बीबी अमरो जी, जिनका विवाह बसरके में उनके भतीजे से हुआ था, को प्रातःकाल भजन गाते हुए सुना । इन भजनों का उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा । यह जानकर उन्हें और भी प्रसन्नता हुई कि ये भजन गुरु नानक के हैं और प्रत्येक व्यक्ति के लिए हर समय सिक्ख धर्म का द्वार खुला है ।

उस समय अमरदास जी की आयु इकसठ वर्ष की थी । गुरु अंगद देव जी के दर्शन के लिए वे खडूर गए । यह जानकर उन्हें बड़ी हैरानी हुई कि वहां का वातावरण साम्प्रदायिक अथवा जाति-पांति के भेद-भाव से रहित था । वे भोजन करने बैठे । यद्यपि सामिष भोजन परोसा जा रहा था, तथापि गुरु अंगद देव जी के निर्देशानुसार उन्हें निरामिष भोजन परोसा गया । उनके मन की बात गुरु जी द्वारा जान लिए जाने पर उन्हें बड़ी हैरानी हुई । वे वहीं ठहर गए तथा उन्होंने गुरु जी के भजन तथा उपदेश सुने । उन्होंने लंगर में कार्य करना आरम्भ किया । वे प्रातःकाल उठकर गुरु जी के स्नान के लिए व्यास नदी से पीतल को एक गागर पानी से भरकर खडूर लाया करते थे ।

वृद्धावस्था होने पर भी उन्होंने सहर्ष यह कार्य किया । १५५२ में गुरु अंगददेव जी ने अपने पुत्रों, दातू तथा दासू के विरोध के बावजूद श्री अमरदास जी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया, तथा उन्हें गुरु नानकदेव जी की गद्दी पर आसीन किया ।

गुरु अमरदास जी ने गोइन्दवाल में अपना मुख्यालय स्थापित किया, तथा सत्य और ईश्वर के नाम के अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया । उन्होंने धर्म-निरपेक्ष मामलों की ओर ध्यान दिया । जो उनके दर्शन के लिए आते उन सभी को लंगर में भोजन खिलाया जाता । प्रतिदिन लंगर के लिए जो भी सामग्री प्राप्त होती, उसे रात्रि तक प्रयुक्त कर लिया जाता, अगले दिन के लिए कुछ न बचाया जाता । गुरु जी के सामने जाने से पूर्व प्रत्येक दर्शक के लिए लंगर में भोजन करना अनिवार्य था, इसका उद्देश्य अलग भोजन पकाने की रूढ़िवादी परम्परा को समाप्त करना था ।

गुरु अमरदास जी महान् सुधारक थे । उन्होंने पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों को भी धार्मिक सभाओं में सम्मिलित होने की अनुमति प्रदान की । उन्होंने पर्दा-प्रथा को समाज की बुराई माना । उन्होंने आदेश दिया कि उनके दरबार में स्त्रियां बिना पर्दे के आएं । उनके दरबार में रानियां तक भी बिना पर्दे के आती थीं । पर्दा का प्रथा पूर्णतः समाप्त कर दी गई । उन्होंने अपने अनुयायियों में सती की प्रथा का भी निषेध कर दिया । उन्होंने कहा कि वास्तविक सती वह है जो अपने पति की मृत्यु के पश्चात् पवित्र एवं संयम जीवन व्यतीत करती है । वे भी सती हैं जो अपने सतीत्व को रक्षा करती हैं, अपना जीवन संतोष से व्यतीत करती हैं, प्रतिदिन प्रातः उठकर ईश्वर की सेवा करती हैं तथा उसका नाम स्मरण करती हैं । उनके मतानुसार अपने शरीर की रक्षा करना मनुष्य का पवित्र कर्तव्य है ।

उनके अनुरोध पर सम्राट् अकबर ने सती की प्रथा के निषेध की आज्ञा दी । हिन्दू स्त्रियों की रक्षा के लिए पहल करनेवाले वे प्रथम व्यक्ति थे । उन्होंने संन्यास के मार्ग को भी अस्वीकार कर दिया, तथा अपने अनुयायियों को गृहस्थ जीवन व्यतीत करने का निर्देश दिया, धार्मिक जीवन के लिए उन्होंने इसे सर्वश्रेष्ठ माना । उन्होंने प्रचार किया कि मुक्ति प्राप्त करने का एकमात्र साधन गुरुवाणी है । उन्होंने बिखरे हुए सिखों को संगठित कर २२ क्षेत्रों में विभाजित किया और प्रत्येक क्षेत्र के लिए धार्मिक नेता नियुक्त किया, इनमें से कुछ नेता स्त्रियां भी थीं ।

उन्होंने “आदि ग्रन्थ” के लिए ६०७ पदों की रचना की, ये सभी पद ७३ से ९५ वर्ष की आयु के बीच लिखे गए । गुरु अंगद देव के जीवन के अन्तिम छः वर्षों में वे उनके साथ रहे ।

१५५२ में ७३ वर्ष की आयु में उन्होंने गुरु-गद्दी प्राप्त की । १५७४ में ९५ वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ । उन्होंने निर्देश दिया कि उनकी मृत्यु पर कोई शोक न मनाया जाए, केवल ईश्वर के भजन गाए जाएं ।


गुरु अमरदास जी के शब्द


अपनी सांसारिक सत्ता की समाप्ति से पूर्व गुरु अमरदास जी ने कहा - मेरे शिष्यो, पुत्रो तथा परिवार के सदस्यो ! मुझे ध्यान से सुनो । ईश्वर ने मुझे वापस बुलाना उचित समझा है। उसकी इच्छा मुझे प्रिय है, तथा ईश्वर मुझ पर प्रसन्न है । जो भाग्य में लिखा है, उसे टाला नहीं जा सकता । अतः मैं उसके पास जा रहा हूं । मेरे पश्चात् कोई न रोए तथा जो रोएगा, वह मुझे प्रिय नहीं लगेगा । जब किसी मित्र का सम्मान हो, तो उसके हितैषी प्रसन्न होते हैं । मेरे प्रियजनो सुनो ! ईश्वर मेरा सम्मान कर रहा है, इस कारण तुम सभी को प्रसन्न होना चाहिए। -- रामकली शब्द

उन्होंने मानव-समस्याओं पर भी विचार किया । उन्होंने अपनी रचना 'आनन्द साहिब' में कहा कि ईश्वरीय ज्ञान अन्धविश्वास पूर्ण रीति-रिवाजों के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता तथा इसकी प्राप्ति के बिना सन्देह दूर नहीं होता । ईश्वर के नाम के द्वारा ही मन को पवित्र किया जा सकता है । गुरु के मार्ग-दर्शन के बिना वास्तविक सुख का भेद नहीं जाना जा सकता । यदि मन स्वच्छ नहीं है, तो और सभी कुछ अस्वच्छ है, तथा रूढ़िगत स्नान से मन की मैल नहीं धुलेगी ।

आगे उनका कथन है -- लोभी व्यक्ति पर विश्वास न करो, क्योंकि वह तुम्हें धोखा देगा, तथा ऐसी स्थिति में पहुंचा देगा कि तुम असहाय हो जाओगे । जो आत्माएं ज्ञान से प्रकाशित होती हैं, वे नष्ट नहीं होतीं, वे ईश्वर की दिव्य ज्योति से अलंकृत होती हैं, तथा वे सर्वत्र ईश्वर को देखती हैं।

गुरु जी ने सांसारिक पदार्थों से निरन्तर विरक्ति का प्रचार किया । उनका कथन है -- संसार में सभी मोह मैंने झुठे पाए हैं । प्रत्येक व्यक्ति अपना सुख ढूंढता है, चाहे यह पत्नी हो अथवा कितना ही घनिष्ठ मित्र हो । संसार में प्रत्येक व्यक्ति कहता है 'वह मेरा है', 'वह मेरा है', जीवित रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति को बहुत स्नेह होता है, मृत्यु होने पर सभी मित्र तथा सम्बन्धी विरक्त हो जाते हैं ।

संसार के ढंग कितने निराले हैं । नानक कहते हैं, जीवन एक अन्धकारमय समुद्र है, तुम केवल तभी पार कर सकते हो, यदि तुम ईश्वर के भजन गाओगे ।

सारा संसार उनके पांवों पर पड़र पड़ता है जिन्हें ईश्वर महान् बनाता है । हमें भय होता है यदि हम स्वयं कोई बात करें, किन्तु स्रष्टा सभी चीजों में अपनी शक्ति डालता है । हे भाइयो यह उस प्रेम-पात्र का क्षेत्र है । जिसने अपनी शक्ति से सभी को अपने अभिभूत किया है ।

ईश्वर साधुओं की रक्षा करता है तथा कपटियों और शत्रुओं के मुंह काले करता है । सच्चे गुरु की महानता निरन्तर बढ़ती है, स्वयं भगवान् के भजन गाते हैं ।

रात दिन नाम का भजन करो, गुरु के शिष्यो ! सच्चे गुरु के माध्यम से अपने स्रष्टा को अपने हृदयों में बिठाओ । हे गुरु के सिक्खो, गुरु का भजन सबसे सच्चा होता है,

प्रिय ईश्वर गुरु के सिक्खों के मुखों को चमकाता है, तथा सारा संसार ईश्वर की विजय की कामना करता है । नानक ईश्वर का सेवक है, ईश्वर अपने सेवकों के सम्मान को रक्षा करता है । गुरु को अस्वीकार करने वालों का भाग्य जो अपने अन्दर विद्यमान गुरु का त्याग करते हैं, उन्हें गुरु के दरबार में प्रवेश नहीं मिलेगा ।

जो वे कहते हैं, उसे कोई नहीं सुनता, वे हमेशा भय से मरे जाते हैं । वे सच्चे गुरु की बड़ाई नहीं सुन सकते, वे इस संसार अथवा अगले संसार में स्थान नहीं पा सकते । जो भी सच्चे गुरु द्वारा शापित व्यक्ति को मिलने जाएगा, वह अपना शेष सम्मान खो बैठेगा ।

जिन्हें गुरु ने शाप दिया उन्हें कोढ़ हो गया, जो भी उन्हें मिलेगा उसे कोढ़ की लाग लग जाएगी । हे भगवान् जिनके हृदय माया के प्रति आसक्त हैं, मुझे उनके दर्शन न करने दो ।

स्रष्टा ने आरम्भ में जो स्वयं लिख दिया उसे मिटाया नहीं जा सकता । सेवक नानक, नाम की पूजा करो, इसके समान कोई नहीं है । इसकी महिमा महान् है और इसमें निरन्तर वृद्धि होती रहती है ।

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