गुरु हरगोविंद सिंह की जीवनी | गुरु हरगोबिंद साहिब जी हिस्ट्री | Guru Hargobind Singh Ji | Guru Hargobind Singh Ji Shabad

हे मेरे मित्र, अपने हृदय में दूसरों के प्रति दुर्भाव न रखो, तो तुम्हें कोई कष्ट न होगा । (गौड़ी का वार)


गुरु अर्जुनदेव जी तथा माता गंगा के अनेक बार प्रार्थना करने पर १६ जून, १५६५ को वदालो नामक स्थान पर गुरु हरगोविन्द का जन्म हुआ । सिखों के छठे गुरु के रूप में गद्दी पर आसीन होने के समय उनकी आयु ग्यारह वर्ष थी ।

गुरु हरगोविन्द सिंह हमेशा अपने पिता की आज्ञा मानते थे, तथा उनका बहुत आदर करते थे । उनका चाचा लाला पिरथी मल्ल, जो गुरु-गद्दी छीनना चाहता था, उन्हें घृणा करता था । उसने तीन बार उनका वध करने का प्रयास किया - एक बार एक मदारी से उनके निकट सांप छुड़वाया गया; एक बार उन्हें विष दिया गया, किन्तु ईश्वर की कृपा से गुरु जी बच गए । बचपन में उन्हें चेचक भी हुई, किन्तु वे पूर्णतः स्वस्थ हो गए ।

अपनी बाल्यावस्था में ही गुरुजी ने धनुष-बाण चलाने तथा बन्दूक चलाने में कुशलता प्राप्त करने के चिह्न प्रदर्शित किए । वे सिख इतिहास का रुख बदलकर सिखों को शान्तिवाद से हटाकर युद्धप्रिय बनाना चाहते थे । अपने इस आदर्श को क्रियान्वित करने के लिए वह पीरो तथा मोरी - आध्यात्मिक एवं सांसारिक प्राधिकार के चिह्नों के रूप में दो कृपाणें धारण करते थे । उन्होंने प्रबल सिक्ख आन्दोलन की आवश्यकता अनुभव की | ताकि उनके अनुयायी शासकों के अत्याचारों का प्रतिरोध कर सकें । इसलिए उन्हें शस्त्र बड़े प्रिय थे । उन्होंने अपने दशमांश संग्राहकों को कहा कि वे बन्दूकें, अन्य शस्त्र, घोड़े तथा धन प्राप्त करें ताकि सिख आक्रान्ताओं से अपनी रक्षा कर सकें । वे नियमित अभियानों पर भी जाते थे ।

एक बार वे सम्राट् जहांगीर के साथ आखेट अभियान पर गए । कनिघम के अनुसार उनके पास ८०० घोड़े, ३०० घुड़सवार, तथा ६० तोपची थे, जो युद्ध-विद्या में प्रशिक्षित थे । यहां तक उल्लेखनीय है कि अपने जीवन में उन्होंने जो भी युद्ध लड़े वे केवल आत्म-रक्षा के लिए थे । जहांगीर उनकी सैन्य शक्ति को देखकर शंकित हो गया, उसने उन्हें ग्वालियर के दुर्ग में बन्दी बना लिया, किन्तु कुछ समय के पश्चात् अन्य अनेक बन्दियों के साथ उन्हें भी मुक्त कर दिया गया ।

उनके काल में सिखों तथा मुसलमानों के बीच शत्रुता अपने शिखर पर थी । गुरु हरगोविन्द सिंह जो ईश्वरोपासना की सभी पद्धतियों का सम्मान करते थे । उनके काल में योगियों, भक्तों तथा फकीरों की संख्या में बहुत वृद्धि हुई । उन्होंने स्वर्ण मन्दिर के निकट अकाल तख्त के निर्माण कार्य को पूरा किया ।

उनके जीवन काल में अपने साहस के लिए सिखों ने बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की, तथा जनता को मुगलों के अत्याचारों तथा दमन से मुक्त कराने का कार्य उन्होंने अपने हाथ में लिया । वे बहुमुखी नेता, योद्धा तथा सन्त थे । गुरु नानकदेव जी के समान ही उन्होंने भी दूर-दूर तक यात्रा की । वे काश्मीर गए, वहां बहुत-से लोग उनके अनुयायी बन गए । वे उत्तर प्रदेश भी गए, तथा उन्होंने वहां गुरुद्वारों का निर्माण किया और संगतें बनाई।

सोने से पूर्व गुरु जी अपना शीश अपनी माता के चरणों में झुकाकर उनसे आशीष प्राप्त किया करते थे । वे अपने पिता के समान ही शान्त स्वभाव के थे । 'गुरु विलास' के अनुसार उनको न केवल अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेना था, अपितु मुसलमानों को सिख धर्म तथा सिखों के बाहुबल का सम्मान करना सिखाना था । उनका लक्ष्य जनता को अत्याचारियों के शासन से मुक्त करवाना था ।

एक बार यात्रा के समय एक स्त्री उनके पास आई, और पुत्र-प्राप्ति के लिए वर मांगा । गुरु जी ने कहा, “तुम्हारे भाग्य में पुत्र नहीं लिखा।" यह सुनकर वह स्त्री निराश हो गई । तब गुरु जी ने दया करके उसके माथे पर एक की संख्या लिखने का प्रयास किया, किन्तु लिखते समय घोड़े के हिल जाने के कारण एक की बजाय सात लिखा गया । किंवदन्ती है कि गुरु जी की कृपा से उसके सात पुत्र उत्पन्न हुए ।

अपने पूर्ववर्ती गुरुओं के समान गुरु हरगोविंद सिंह जी ने स्त्रियों के प्रति सभी प्रकार के सामाजिक अन्याय तथा भेद-भावों को समाप्त किया, और उन्हें समान मानव अधिकार प्रदान किए । वे एक महान् प्रचारक भी थे ।

जब वे शाहदुल्ला के पीर से मिले और उसने विवाहित मनुष्य द्वारा आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने की सम्भावना पर सन्देह अभिव्यक्त किया तो उन्होंने कहा, "स्त्री मनुष्य की अन्तरात्मा है।" उन्होंने अपने चरित्र के बल से मनुष्यों के भय का निवारण किया ।

पसिया का प्रसिद्ध इतिहासकार मोहसिन फानी, अमृतसर में गुरु हरगोविन्द जी से मिला । उनके सम्बन्ध में अपने निजी विचार लिखते समय वह सिखों के इस विश्वास का समर्थन करता है कि सभी छः गुरुओं में एक ही ईश्वरीय प्रकाश था, और वास्तव में वे विभिन्न शरीरों में एक ही आत्मा थे । गुरु जी ने अनेक वर्षों तक सैनिक जीवन व्यतीत किया तथा उन्होंने तीन सफल लड़ाइयाँ लड़ीं । पहली लड़ाई लाहौर के सूबेदार के साथ हुई जब उसने गुरु जी के कुछ घोड़े पकड़ लिए थे । दूसरी लड़ाई अमृतसर के निकट सन् १६२८ में लड़ी गई । गुरु जी ने सन् १६३१ में लड़ाई जीती । अप्रैल, १६३४ में करतारपुर के निकट मुगल सेना, जिसका नेतृत्व गुरु जी का ही एक भूतपूर्व सैनिक पायंदा खान रहा था, के साथ तीसरी लड़ाई हुई । मुगल सेना पराजित हुई और इसका सेनापति कालाखान, स्वयं गुरु जी के हाथों मारा गया । मुगल सेना अपने हताहतों को छोड़कर भाग खड़ी हुई । इन लड़ाइयों में विजय प्राप्त करने से सिक्खों में आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ और साहस की वृद्धि हुई ।

सैनिक जीवन को सिख गुरुओं में वे ही प्रथम थे, जिन्होंने अपनाया । इसके कारण निम्नलिखित थे -

(१) अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध,
(२) जैसा कनिंघम ने लिखा है, साहस कर्म तथा प्रेम के प्रति चित्तवृत्ति,
(३) मुगल शासन को नष्ट करके अपने अनुयायियों को अत्याचारों से मुक्त करवाना; तथा
(४) अपने चचेरे भाई धीर मल्ल, जिसके पिता को गुरु अर्जुनदेव जी के गद्दी पर आसीन होने के कारण गुरु गद्दी से वंचित रहना पड़ा था, से अपनी स्थिति की रक्षा।

गुरु हरगोविन्द जी एक महान् संगठनकर्ता तथा राजनीतिज्ञ थे, और हमेशा परिस्थितियों के अनुसार कार्य करते थे । गार्डन के अनुसार उन्होंने गुरु नानक के शान्तिपूर्ण अनुयायियों को सिपाहियों में परिवर्तित कर दिया ।

कनिंघम का कथन है, "अनेक पूर्ववर्ती सम्प्रदायों के समान सिख भी पुनः हिन्दू धर्म में समा सकते थे । उन्होंने उन्हें अन्य सभी सम्प्रदायों से पृथक् करके समाप्त होने से बचा लिया।"

उनकी सभी लड़ाइयाँ आत्म-रक्षा के लिए थीं । मैत्काल्म का कथन है कि गुरु जी ने अनेक लड़ाइयों में विजय प्राप्त की, किन्तु एक इंच भूमि पर भी कब्ज़ा नहीं किया । वे एक सन्त थे, और अपने धर्म के प्रचार के लिए उन्होंने अनेक पग उठाए । निर्धन एवं ज़रूरतमंद वर्गों के प्रति उनमें अतीव सहानुभूति थी ।

उन्होंने अपने खर्च पर मुसलमानों के लिए करतारपुर में एक में मस्जिद बनवाई । मियां मीर, जो एक मुसलमान पीर थे, गुरु जी के सिद्धान्तों का बहुत आदर करते थे । गुरु जी में योग्यता के लिए सूक्ष्मदर्शी दृष्टि थी ।

गुरु जी ने अपने जीवन के अन्तिम दस वर्ष ईश्वर के चिन्तन में व्यतीत किए, और बहुत सादा जीवन व्यतीत किया । उन्होंने जीवन के साधारण गुणों के महत्त्व पर बल दिया । अन्ततः वह करतारपुर में रहने लगे ।

अपने पौत्र हरिराम की साधुता तथा उसके चरित्र-बल के कारण उन्होंने उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया ।

सन् १६४५ ई. में करतारपुर में गुरु हरगोविन्द जी का देहान्त हो गया । करतारपुर का स्थान उन्हें काहलू के पहाड़ी राजा ने दिया था ।

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