जापानी सभ्यता । जापान सभ्यता । जापानी सभ्यता का इतिहास । Japanese Civilization | Japan Civilization | Japan Civilization Timeline


उन्हें अलग-थलग रहना अच्छा लगता था । ये आत्म-निर्भर थे तथा उन्होंने आरंभ से लेकर अंत तक स्वयं ही अपनी संस्कृति का निर्माण किया । वे कुशल नाविक थे । अतः पड़ोसी राज्यों के निवासियों से संपर्क रखना उनके लिये कठिन नहीं था, किन्तु पड़ोसी राज्यों से संपर्क होने पर भी उन्होंने अपनी परंपरा तथा संस्कृति को बनाये रखने का हर संभव प्रयास किया ।

ये जापान के निवासी थे, जो एकाकी तो रहे, किन्तु फिर भी जिन्होंने संसार के लिये अपनी संस्कृति तथा परंपराओं की विरासत छोड़ी और यही देश आज संसार का सर्वोच्च औद्योगिक राष्ट्र बन गया है । जापान, जिसे "उदय होते हुए सूर्य का देश" कहा जाता है, टापुओं का एक ऐसा समूह है, जो कोरियाई प्रायःद्वीप के दक्षिणी छोर से पूर्व की ओर लगभग ७०० मील लंबे क्षेत्र में फैला हुआ है और लगभग इतने ही क्षेत्र में उत्तर दिशा में भी फैला हुआ है । जापान का शीतल सागर इस टापू के साथ सटा हुआ है । अतः इस द्वीप-समूह के भीतरी भाग की जलवायु ठंडी तथा नम है । किन्तु जापान-प्रवाह (Japan Current) के कारण दक्षिणी-पश्चिमी जापान के प्रशांत तट की जलवायु ऊष्ण है । इस प्रकार की संतोषजनक जलवायु के कारण ही इस स्थान पर इस सभ्यता का विकास हो सका ।

संसार के विभिन्न भागों की सभ्यताओं में हुई प्रगति की रफ्तार की तुलना में जापान के सांस्कृतिक विकास की गति काफी धीमी रही । जापानी द्वीप समूह एशिया के बाकी भागों से बिलकुल कटा हुआ था, इसलिए जापान के सांस्कृतिक पिछड़ेपन के लिए उसकी अलग रहने की नीति को भी उत्तरदायी माना जाता है । सांस्कृतिक विकास की गति धीमी होने के कारण ही जापान ने नवपाषाण युग से धातु युग की ओर बहुत धीरे-धीरे प्रगति की ।

किसी को भी जापानी लोगों के उद्गम-स्थान (Origin) की जानकारी नहीं है । पुरातत्त्वीय तथा मानवशास्त्रीय अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि जापानी लोगों का उत्तर-पूर्वी एशिया के कोरियाई तथा तुंगुसिक (Tungusic) लोगों से निकट का संबंध था । भाषा-संबंधी अध्ययन तथा प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं, किन्तु मानव-जाति विज्ञान (Ethnography) संबंधी प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि नहीं करते । मानव जाति विज्ञान तथा पौराणिक कथाओं के अनुसार जापानी लोग दक्षिण चीन, मलेशिया तथा संभवतः पोलिनेशिया से संबद्ध थे । जापान के उद्गम के विषय में एक अन्य मान्यता यह भी है कि वे प्रारंभिक कौकेशियन (Caucasian) लोग हैं, जो जापान के उत्तरी पूर्वी भाग में बस गये थे और जिन्होंने जापान की जातीय संरचना के निर्माण में सहयोग दिया । इस प्रकार कहा जा सकता है कि यद्यपि पहले पहल जापानवासी मुख्यतः मंगोलियाई थे, लेकिन इसके साथ ही संभवतः उनमें दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा आयनू (Ainu) के रक्त का सम्मिश्रण है ।

आरंभ में जापान की सभ्यता नवपाषाणयुगीन थी । इसके पश्चात् लोहे, कांसे तथा मिट्टी के बर्तनों की संस्कृति विकसित हुई । इस काल के दौरान निर्मित वस्तुओं पर उत्तरी एशिया की छाप स्पष्ट दिखायी देती है । प्रागैतिहासिक जापानी सभ्यता ऐल्टेइक (Altaic) क्षेत्र से आई थी और चीन की सभ्यता से अत्यधिक प्रभावित थी ।

वास्तव में जापान का प्रथम प्रामाणिक विवरण तीसरी शताब्दी ई.प. के चीन के इतिहास में मिलता है । चीन के इतिहास के अनुसार जापान ऐसी छोटी-छोटी अनेक राजनैतिक इकाइयों में बंटा हुआ था, जहां प्रायः स्त्रियां शासन करती थीं । चीन के इतिहास से यह भी ज्ञात होता है कि ये इन छोटी-छोटी इकाइयों का कोरिया में चीन द्वारा स्थापित उपनिवेशों से सीधा संबंध था ।

पुरापाषाण युग से नवपाषाण युग तक की यात्रा कोई छोटी यात्रा नहीं थी । इस काल के मध्य जापानी द्वीप-समूह पर मानव-समूह बसे हुए थे जबकि विभिन्न प्रायःद्वीपों तथा द्वीपों के बीच विशेषतः कोरिया तथा सखालिन (Sakhalin) के बीच भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े थे । पुरातत्त्ववेत्ताओं को इन स्थानों पर पुरापाषाणयुगीन प्रमाण प्राप्त हुए हैं । अधिकांश प्राप्त वस्तुओं में बादाम के आकार के औजार प्रमुख हैं, जो पत्थर तथा लावा- कांच (Obsidian) से बने हैं । लावा-कांच ज्वालामुखी वाले क्षेत्र में पाया जाने वाला एक पदार्थ है ।


जोमोन काल । Jomon Period


इस युग के बाद मध्यपाषाण युग आया । यह दौर रसोई-संबंधी कूड़े-कर्कट की परतों तथा सीपों और मछलियों की अस्थियों के ढेर से पहचाना जा सका । मिट्टी के बर्तन केवल ७००० वर्ष पूर्व ही प्रयोग में लाये गये थे । मिट्टी के बर्तनों के निर्माण के साथ ही जापान में नवपाषाण युग शुरू हुआ । यह युग काफी समय तक रहा । इस काल में मिट्टी के बर्तनों को जोमोन (Jomon) कहा जाता है । जिसका अर्थ है-बंधा हुआ । इनका यह नाम रस्सी बांधने जैसी सजावट की वजह से पड़ा । इन वर्गाकार मुंह वाले बर्तनों पर तिरछी आंखों वाले निवासियों की आकृतियां बनी रहती थीं, जो संभवतः ईश्वर का प्रतिनिधित्व करती थीं ।

जोमोन का युग यद्यपि ५०० ई.पू. से ३०० ई.पू. के बीच रहा, लेकिन इससे उनकी अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं पड़ा और हजारों वर्षों तक जापानी लोग मिट्टी के बर्तन बनाने में, मछलियां पकड़ने तथा शिकार करने से जुड़े रहे । चूंकि उनके पर्यावरण ने भी उन्हें अपने जीने के ढंग को बदलने के लिये विवश नहीं किया इसलिये वह लोग वैसे ही जीते रहे । लेकिन इस युग के अंत में (५०० ई.पू.) में सर्वप्रथम कृषि किये जाने के चिह्न मिले हैं । खुदायी में प्राप्त चिकने पत्थर के फावड़े, मूसल तथा दरातियां इसी बात के प्रतीक हैं । संभवतः उस समय पर्वतीय क्षेत्रों में खेती की जाने लगी थी तथा सिचाई की जटिल पद्धतियों का प्रयोग भी आरंभ हो गया था । फिर भी उनका मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना ही बना रहा । इसके साथ ही साथ सूअर, भेड़, बकरी आदि भी पाले जाने लगे । घोड़ों और मवेशियों की संख्या सीमित थी ।

मछली पकड़ने के कुछ अतिरिक्त लाभ भी थे । अधिक संख्या में मछलिया प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक हो गया कि समुद्र के बीच में जाया जाय और इसके लिये अच्छी नावों का होना आवश्यक हो गया । एक बार ऐसी नावें बन जाने पर जापानियों के लिये अन्य स्थानों पर जाना भी सरल हो गया ।

भौगोलिक दृष्टि में जापान ऐसे स्थान पर स्थित था, जहां से अन्य स्थानों तक पहुंचना अपेक्षाकृत सरल था, अतः जापानियों के लिये अपने एकाकीपन से बाहर निकल पाना भी सरल हो गया तथा इसके साथ ही विशाल खुले समुद्र के कारण आक्रमणकारियों के लिये भी मार्ग खुल गया । ये दोनों ही बातें साथ-साथ हुई । जापानवासियों ने अपने धात् कर्म के लिये कच्चे माल तथा अन्य वस्तुओं का आयात किया और इसके साथ ही कांसे तथा लोहे की जानकारी भी जापान तक आ गयी । ३०० ई.पू. तक दूर दूर तक इन दोनों धातुओं का प्रयोग होने लगा । कांसे का प्रयोग मुख्यतः धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े सुसज्जित घंटों आदि के निर्माण के लिये किया जाता था ।


यायोई सभ्यता । Yayoi Period


कांस्य युग ने यायोई (Yayoi) नामक एक नयी संस्कृति को जन्म दिया । इस युग के दौरान एक ऐसे वर्ग का जन्म हुआ जो मछली मारने के साथ-साथ खेती का काम भी करता था । इन लोगों ने कांसे, पत्थर तथा लकड़ी का साथ-साथ ही प्रयोग किया । कांसे से उन्होंने सुसज्जित वस्तुएं बनाई जबकि पत्थर से उन्होंने चाकू बनाये तथा लकड़ी से उन्होंने पात्र बनाये । यायोई संस्कृति के लोगों ने चावल की खेती भी की तथा वे बर्तन बनाने के लिये प्रयुक्त चाक का प्रयोग करने में भी दक्ष थे ।

शारीरिक दृष्टि से यायोई लोग मंगोलो के समान थे । उनकी बादाम के समान छोटी आंखें थीं तथा शरीर पर एक भी बाल नहीं था । वह व्यक्ति जो जन कल्याण के कार्यों की देखभाल करता था उसे देवता मान लिया गया अर्थात् राजा में दैवी गुणों की स्थापना कर दी गयी । उसे मिकाडो (Mikado) कहा जाता था, जिसका अर्थ है "उन्नत द्वार"। सर्वप्रथम जिमुतेनो (Jimmu Tenno) नामक पौराणिक व्यक्ति को यह उपाधि दी गयी । माना जाता है कि उसने सातवीं शताब्दी ई.पू. में शासन किया था । उसके शासन काल की सही जानकारी के विषय में केवल अनुमान ही लगाये जा सके हैं ।

जापान की ऐतिहासिक पौराणिक कथा भावी शाही वंश के क्यूश (Kyushu) से यामातो (Yamato) के मैदानों की ओर स्थानांतरण का संकेत देती है । वे इंजुमों (Inzumo) नामक एक अन्य कबीले के साथ लड़े और जीत गये । यामातो नामक शाही कबीले ने पश्चिमी तथा मध्य जापान पर अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर ली । उन्होंने विभिन्न कबीलों के साथ अनेक युद्ध किये और अन्ततः सफलतापूर्वक अपने शासन की स्थापना कर ली । यह सारा वर्णन जापान की पौराणिक कथाओं में मिलता है । वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों की प्राप्ति २३० ई.पू. से हुई है, जब सूजिन (Sujin) सम्राट बना । ३६० ई. में जिंगो (Jingo) नामक साम्राज्ञी ने, जो अपने मृत पति के नाम से शासन कर रही थी, जापान की सीमाओं का विस्तार किया । उसने कोरिया पर आक्रमण किया । कोरियाई इतिहास में भी इन आक्रमणों का उल्लेख मिलता है ।

अंत में पांचवीं शताब्दी ई. तक जापान ने कोरिया पर अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर ली । जापान का कोरिया से संपर्क व्यर्थ नहीं गया । कोरिया के माध्यम से जापान ने चीन की सभ्यता से अनेक नयी बातें तथा चीनी भाषा सीखी । चीनी भाषा जापान में इतनी अधिक प्रचलित हो गयी कि जापान में इसे जापानी भाषा के बाद सरकारी तौर पर दूसरी संपर्क भाषा के रूप में अपना लिया गया । वस्तुतः आकृति लेखन (Character Writing) की यह लिपि सीधे चीन से ही लायी गयी थी ।

चीन से बौद्ध धर्म भी जापान पहुंचा । सम्राटों ने भी बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया क्योंकि उनका विचार था कि इससे वे लोग एक-दूसरे से जुड़ जायेंगे । इस प्रकार जापानी सम्राटों ने धर्म का प्रयोग एकता स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में किया । बौद्ध धर्म को सरकारी स्तर पर मान्यता दिये जाने के साथ ही जापान में एक नये युग की शुरुआत हो गयी । धर्म इतना प्रचलित हो गया कि सम्राट योमेई (Yomei) ने भी इसे अपना लिया ।

बौद्ध धर्म, कन्फ्यूशियसवाद, औषध-विज्ञान, खगोल विद्या, वास्तुकला की चीनी शैली तथा चीनी लेखन-कला इन सभी ने जापान में छठी तथा सातवीं शताब्दियों में प्रवेश किया । जापानी विद्वानों ने चीन की यात्रा की और शीघ्र ही जापान के प्रमुख राजाओं ने अपने राज्य को चीन के "तांग" (Tang) साम्राज्य की नौकरशाही के आधार पर ढाल लिया ।

६४६ ई. में ताइका (Taika) सुधारों की घोषणा की गयी । इन सुधारों की जानकारी भी चीन से ही प्राप्त की गयी थी । इन सुधारों में चावल उगाने वाली भूमि पर राजकीय नियंत्रण, सुव्यवस्थित कर व्यवस्था तथा शाही अधिकारियों के राष्ट्रव्यापी संगठन की व्यवस्था की गयी थी । चीन के समान राजधानी को ही मुख्य केन्द्र बनाया गया और वहां राजमहलों को मंदिरों तथा सार्वजनिक भवनों को जोड़ने वाली चौड़ी तथा सीधी सड़कों का निर्माण किया गया । ये सुधार वस्तुतः चीन की पृष्ठभूमि में ही उचित थे । जापान में शक्तिशाली प्रांतीय परिवार अत्यधिक स्वतंत्र बने रहे । अतः सरकारी सेवाओं में अनिवार्य रूप से भर्ती किये जाने की व्यवस्था व्यर्थ सिद्ध हुई । आरंभ से ही इन सुधारों को ज्यों का त्यों लागू करना लगभग असंभव सा प्रतीत होने लगा । अतः इन सुधारों में कुछ परिवर्तन किये गये । उदाहरण के लिये सिद्धांत में तो भूमि का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया, किन्तु व्यवहार में यह भूमि राजवंश के अधिकारियों को उनके सरकारी पद तथा प्रतिष्ठा के आधार पर वेतन के रूप में लौटा दी गयी ।

शासन के चीनी स्वरूप को अपनाते समय जापानियों ने उसमें एक परिवर्तन किया, जापान का राजकीय पद-सोपान वंशानुगत कुलीनतंत्र पर भी आधारित रहा और कुछ अपवादों को छोड़कर इस व्यवस्था में निम्न स्तर से ऊपर की ओर जाने की कोई संभावना नहीं होती थी । फिर भी इसे जापानी संस्कृति का गौरवपूर्ण युग माना जाता है । इस युग में गद्य तथा पद्य की रचना शुद्ध चीनी भाषा में की गयी । जापान का काव्य चरम उत्कर्ष पर था । कला के क्षेत्र में तांग कला ने जापान में अपनी जड़ें मजबूत कर लीं और जापानशास्त्रियों ने इसके अनेक श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किये । नारा (Nara) के होरयूती (Horyuti) मंदिर में निर्मित भगवान बुद्ध के एक भित्ति चित्र में सातवीं तथा आठवीं शताब्दी के समकालीन तांग चित्रों की विशिष्ट शैली स्पष्ट दिखायी देती है । इससे स्पष्ट होता है कि तांग तथा कोरियाई बौद्ध धर्म का उद्गम स्थान भारत देश है । जहां जापान में इस कला का कुछ अंश ही बच पाया है, वहां चीन से अभी तक इस तथ्य की पुष्टि कर पाने वाला कोई प्रमाण प्राप्त नहीं हो सका है ।

वास्तुकला के क्षेत्र में तोदाईजी (Todaiji) मंदिर के नन्दाइमोन (Naindaimon) नामक मुख्य द्वार की शानदार बनावट पर चीन की कला की स्पष्ट छाप दिखायी देती है । इस मुख्य द्वार को बनाते समय उस युग की दो प्रमुख विशेषताओ मजबूती और सादगी को मुख्य रूप से ध्यान मे रखा गया है । यह द्वार वास्तव में जापान तथा तांग चीन के बीच व्यापक सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है । इस युग की वास्तुकला विलक्षण है किन्तु प्रागैतिहासिक काल में बने भवनों के अवशेष विशेष रूप से दिलचस्प हैं । टोक्यो से ९० मील दक्षिण पश्चिम में शिजुओका (Shizuoka) के निकट टोरो (Toro) नामक स्थान पर हुई व्यापक खुदायी से सम्राट तथा जनसाधारण के बीच व्याप्त महान अंतर के प्रमाण मिलते हैं । यह अंतर खोदी गयी कब्रों में स्पष्ट दिखायी देता है । सम्राट मिन्तोक (Mintoku) (३११-३९९ ई.) की कब्र एक ४८० मीटर लंबे टीले पर पायी गयी है, जो पानी से भरी हुई एक खाई से घिरी हुई है । इस कब्र में पर्याप्त मात्रा में धन-संपत्ति भी मिली है । किसी भी प्रकार का बलिदान दिये जाने के कोई भी संकेत नहीं मिले हैं । सम्राटों की बड़ी-बड़ी कब्रों के विपरीत साधारण लोगों की कब्रे अत्यंत साधारण तथा छोटी पायी गयी हैं ।

जापान के इस स्वर्ण युग का शीघ्र ही अंत हो गया । राजमहल में घटित घटनाओं ने राजकीय शासन के लिये नये खतरे पैदा कर दिये । फूजीवरा (Fujiwara) नामक परिवार, जो कि सदियों से स्वामीभक्त सेवक के रूप में कार्य कर रहा था, अचानक महत्त्वाकांक्षी हो उठा । इस परिवार के सदस्यों ने राजमहल की नियुक्तियों पर विवाहादि को षड्यंत्र का हिस्सा बनाकर अपना कब्जा कर लिया । सन् ८४७ में फूजीवरा योशीफूजा (Fujiwara Yoshifusa) महामंत्री बन गया । शीघ्र ही उसका पोता शासक बना दिया गया और वह स्वयं उस बालक-शासक की ओर से शासन करने लगा । संपूर्ण ग्यारहवीं शताब्दी में शासन पर फूजीवरा परिवार का एकाधिकार रहा ।

राजमहल में हुई इन घटनाओं के साथ-साथ ही प्रांतीय परिवारों ने भी शक्ति के नये स्रोत प्राप्त कर लिये और सिर उठाया । कानून तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिये इन परिवारों ने स्थानीय सेनाओं में वृद्धि की और राजकीय नियंत्रण की पूर्णतया उपेक्षा की । ग्यारहवीं शताब्दी में इन शक्तिशाली होते हुए वर्गों की भनक राजमहल तक भी पहुंच गयी । राजदरबार ने इन खतरनाक विद्रोहियों के दमन के लिये तायरा (Taira) तथा मिनामोटो (Minamoto) नामक दो शक्तिशाली परिवारों को आमंत्रित किया । फजीवरा के राजदरबार ने इन परिवारों को एक खतरनाक काम सौंप दिया था, परिणामस्वरूप इसकी उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी । तायरा परिवार ने उनसे राजमहल तथा राजसिंहासन छीन लिया और स्वयं शासक बन बैठे । एक बार युद्धों तथा विद्रोहों की शुरुआत हो जाने पर उन्हें रोकना कठिन हो गया । मिनामोटो (Minamoto) परिवार इस प्रकार तायरा परिवार का शासक बन जाना सहन नहीं कर सका । अतः उसने विद्रोह कर दिया और सन् ११८० से सन् ११८५ तक ये दोनों परिवार निरंतर लड़ते रहे । अंत में तायरा परिवार की हार हुई और फिर मिनामोटो संपूर्ण जापान के स्वामी बन गये ।

जापान के Tale of Genji नामक प्रसिद्ध उपन्यास ने इस महान शक्ति-संघर्ष को अमर कर दिया है । जो सभ्यता प्रागैतिहासिक काल में अलग-अलग तथा शांतिपूर्ण रही तथा जिसका अपना एक लंबा इतिहास है, वही सभ्यता समय के साथ-साथ बदलती गयी और उस पर धीरे-धीरे युद्धों तथा षड्यंत्रों के काले बादल छा गये ।

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