डोलोरेस इबार्रूरी | डोलोरेस इबारुरीक | ला पसियोनारिया | Dolores Ibarruri | La Pasionaria


सन् १९९७ में स्पेन में गृह युद्ध के कारण सारे देश में एक जबरदस्त तनाव और अशांति का माहौल बना हुआ था । उसी दौरान एक साहसी और देश-भक्त महिला का नाम हर देशवासी की जुबान पर चढ़ा हुआ था । वह अपने अदम्य साहस प्राण-बल से देश सेवा में जुटी हुई थी । इसका नाम था - डोलोरेस इबार्रूरी (डोलोरेस इबारुरीक) (Dolores Ibarruri) । इसे स्पेन की जनता ला पसियोनारिया के रूप में जानती थी ।

खासतौर पर वह श्रमिकों में काफी लोकप्रिय थी । ला पसियोनारिया का आशय होता है “आवेश का फूल” । ला पसियोनारिया (डोलोरेस इबार्रूरी) ने १९८७ के आसपास स्पेन को राजनीति में स्वयं को उतारा था । उसकी उम्र तब मात्र ३१ वर्ष थी । इसके साहसिक कारनामों ने स्पेन की जनता को आश्चर्य में डाल दिया था ।

स्पेन की गृह युद्ध की आग को शांत होते देख, वहां की जनता और सरकार ने एक 'नारी श्रमिक सेना' का गठन इसी भावना से किया था, ताकि नारियां देश की सुरक्षा का भार अपने कंधों पर लेने में सक्षम हों । वास्तव में इस शांति सेना के गठन का कारण ला पसियोनारिया का भीतरी आवेग ही था । इस सैन्य दल के ही माध्यम से इस महिला ने स्वयं बंदूक चलाकर न केवल साहस का परिचय दिया था, वरन श्रमिकों की नारी सेना में उत्साह का संचार किया था । यही कारण था कि नारी सेवा युद्ध के समय मैदान में उतरी और सबको रोमांचित कर दिया ।

ला पसियोनारिया (डोलोरेस इबार्रूरी) एक वीरबाला होने के साथ-साथ सौंदर्य की भी प्रतिमूर्ति थी । उसकी मनोहारी छवि देखकर कोई भी मुग्ध हो जाता । स्वयं के व्यक्तित्व निर्माण में वह जागरूक थी, लेकिन अध्यापक की नौकरी से प्रारंभ किए जीवन से वह निराश हो गई थी । लेनिन और मार्क्स के साहित्य ने इसे नई दिशा दी । जब वह एक श्रमिक बस्ती में कपड़े धोने की दुकान चलाती थी, तब उसका मन श्रमिकों की दशा देखकर दुखी हो जाया करता था । मजदूरों का उत्पीड़न ला पसियोनारिया (डोलोरेस इबार्रूरी) को बार-बार उद्वेलित करता रहता था । अंत में उसने श्रमिकों की समस्याओं को समझा और हड़ताल का नेतृत्व किया । लेकिन श्रमिकों के लिए निरंतर संघर्ष करने वाली ला पसियोनारिया के जीवन में एक दुखद और कारुणिक मोड़ तब आया, जब स्पेन में प्रियादरिक्केरा की तानाशाही और भय मंडराने लगा । इस तानाशाही ने इस महिला को उसके पति के साथ लंबे समय तक कारागार में पड़े रहने को मजबूर कर दिया ।

इतना ही नहीं १९३४ में विद्रोह के समय इस महिला और उसके पति ने अपना घर तबाह होता देखकर रूस की ओर कूच कर दिया । रूस में इस नारी को आत्मिक शांति का अनुभव हुआ । १९३६ में डोलोरेस इबार्रूरी बनाम ला पसियोनारिया को तीसरी अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस का सदस्य चुना गया ।

ला पसियोनारिया को अपने साहस का परिचय देने का अवसर मिला । फरवरी १९३६ में, स्पेन में जब नई सरकार ने सत्ता हाथ में ली, तो तमाम राजबंदी रिहा कर दिए गए । मुक्ति की सांस लेने के बावजूद स्पेन की पूर्ववर्ती सरकार के खैरख्वाह एसल्ट गार्ड दल ने अपना रवैया नहीं बदला और वह पुरानी सरकार के कदमों पर चलने लगा । सिविल गार्ड दल भी ऐसा ही करने लगा । ये दल अपनी कठोरता का परिचय कुछ इस तरह देने लगे कि क्षमादान की श्रेणी में आने वाले राजबंदी और उनके रिश्तेदार किसी से भेंट तक नहीं कर सकते थे । यह अन्याय आगे तक नहीं चला, कैदियों ने कारागार का दरवाजा ही खोल दिया, लेकिन पहरेदारों ने अपनी क्रूरता का परिचय दिया और कैदियों को गोली से भून देने की धमकी दी और उन्हें कारागार के द्वार पर ही रोक दिया । आखिर ला पसियोनारिया अपने प्राणों की परवाह किए बगैर वीरांगना के रूप में सामने आ गई और कारागार की दीवार पर चढ़कर उसने सभी कैदियों को बाहर भाग जाने को कह दिया ।

इस महिला की ललकार पर कैदियों में एक अनोखा उत्साह पैदा हुआ और वे बाहर आ गए । ला पसियोनारिया की शिराओं में फासिज़्म के विरुद्ध गर्म रक्त दौड़ता था । वह स्पेन के गृह-युद्ध में न केवल वीरांगना के रूप में उभरी, वरन एक श्रमिक मसीहा के तौर पर भी उसकी पूजा होने लगी । संघर्ष ही उसके जीवन का मूलमंत्र था ।

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