गुरु हर राय जीवन परिचय | गुरु हर राय हिस्ट्री | गुरु हर राय इतिहास | Guru Har Rai Ji History in Hindi

“प्रभकै सिमरनि रिधि सिधि नउनिधि प्रमकै सिमरनि गिश्रानु विश्रानु ततु बुधि, प्रभकै सिमरनि जप तप पूजा ।“


गुरु हर राय जी का जन्म १६३१ ई. में हुआ था । वे गुरु हरगोविन्द जी के बड़े पुत्र बाबा गुरुदित्ता के दूसरे पुत्र थे । सन् १६४५ ई. में जब वे गुरु-गद्दी पर आसीन हुए तो उनकी आयु केवल चौदह वर्ष की थी।

गुरु हरगोविन्द जी ने हर राय जी में गुरु नानक की आत्मा के दर्शन किए और स्वर्ग सिधारने से पूर्व करतारपुर में उन्हें गुरु-गद्दी दी । गुरु हर राय जी का स्वभाव शान्तिप्रिय था। उनका मन चिन्तनशील था और वे शान्त स्वभाव थे । युद्ध में उनकी रुचि नहीं थी, तथापि उनके काल में सिखों की सैनिक भावना में वृद्धि होती रही । उन्होंने पूर्वीपाय के रूप में २,००० की सेना बनाए रखी ।

वे प्रथम ऐसे गुरु थे, जिन्होंने गम्भीरता से मालवा में प्रचार कार्य आरम्भ किया । उन्होंने पंजाब के केन्द्रीय ज़िलों में भी प्रचार केन्द्र स्थापित किया । उन्होंने राजनीति में हस्तक्षेप नहीं किए । उन्होंने देश के विभिन्न भागों की यात्रा की । उन्होंने अपनी शान्तिवादी नीति का कठोरता से अनुसरण किया । अपने श्रद्धालुओं को वे हमेशा दया की दृष्टि से देखते थे ।

उन्होंने अपने पदों की रचना नहीं की, किन्तु वे प्रथम पाँच गुरुओं के पद सुरुचिपूर्वक उद्धृत करते थे ।

“पन्थ प्रकाश” में उल्लेख मिलता है कि एक बार वे उद्यान में घूम रहे थे कि उनकी चादर से कुछ पुष्प भूमि पर गिर पड़े । इससे वे बहुत आन्दोलित हुए और भविष्य में उन्होंने अपनी चादर को सावधानीपूर्वक संभाला । सन् १६४८ में गुरु हर राय जी ने एक औषधि भेजकर शाहजादा दारा शिकोह के प्राणों की रक्षा की, इससे उनके सम्बन्ध घनिष्ठ मित्रता में बदल गए । तत्पश्चात् उन्होंने अपनी एक सैनिक टुकड़ी औरंगज़ेब की सेना से लड़ने के लिए भेजी और इसी बीच दारा सुरक्षित स्थान तक पहुंच गया । औरंगज़ेब ने गुरु जी को दिल्ली बुला भेजा, किन्तु गुरु जी ने स्वयं न जाकर अपने पुत्र रामराय को सम्राट् के सम्मुख स्थिति स्पष्ट करने के लिए भेजा ।

औरंगज़ेब ने रामराय के साथ अच्छा व्यवहार किया । किन्तु रामराय ने सम्राट् के सम्मुख ग्रन्थ साहिब में से गुरु नानकदेव जी की रचना को सुनाते हुए उसकी एक पंक्ति में परिवर्तन करके गुरु जी को रुष्ट कर लिया । गुरु जी को इस बात से बहुत दुःख हुआ, और उन्होंने निश्चय किया कि रामराय गुरु बनने योग्य नहीं है । रामराय ने अपने पिता से क्षमा याचना की । उसने अपने चाचा धीरमल से भी अनुरोध किया कि वह गुरु जी को इस विषय में मनाए, किन्तु वह अपने पिता का निर्णय बदलवाने में सफल नहीं हुआ ।

मालवा में गुरु जी के निवास के समय काला तथा उसके मित्र उनका सम्मान करते रहे। गुरु जी ने फूलकियां रियासतों की भी नींव रखी । नाभा, जींद के राजा पटियाला के महाराजा उस परिवार के वंशज थे । वे बड़े महान्, प्रसिद्ध तथा धनी शासक हुए हैं। आगे चलकर उन्होंने शान्तिपूर्ण संगठन का कार्य अपने हाथ में लिया और कई प्रभावशाली परिवार सिख धर्म से सम्बद्ध हो गए ।

तैंतीस वर्ष तथा छः मास गुरु-गद्दी पर आसीन रहने के पश्चात् सन् १६६१ में करतारपुर मं गुरु हर राय जी का निधन हो गया, और गुरु-गद्दी के लिए उन्होंने अपने छोटे पुत्र हरकृष्ण को उत्तराधिकारी नियुक्त किया । गद्दी पर आसीन होने के समय गुरु हरकृष्ण जी की आयु केवल पांच वर्ष थी ।

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