गुरु तेग बहादुर बायोग्राफी | गुरु तेग बहादुर जीवनी | Guru Teg Bahadur Ji


गुरु तेग बहादुर जी योद्धा-गुरु, गुरु हर गोविन्द के छोटे पुत्र, तथा प्रथम सिक्ख शहीद, गुरु अर्जुनदेव के पौत्र थे ।

गुरु तेग बहादुर का जन्म संवत् १६७६ (१६२२ ईस्वी) में गुरु के महल अमृतसर में हुआ था । उनका विवाह करतारपुर के एक खत्री, लालचन्द की पुत्री गुजरी से हुआ था । वह ऐसे समय सिक्खों के नौवें गुरु बने, जब राजनीतिक सत्ता औरंगज़ेब के हाथों में पहुँच चुकी थी, और बाल-गुरु, गुरु हर कृष्ण की मृत्यु के पश्चात् सिखों में इस विषय में मतभेद था कि उनका गुरु कौन बने ।

तेग बहादुर सांसारिक सुखों में अनुरक्त नहीं थे । वे प्राय: अपनी मां को कहा करते थे कि सांसारिक सुख उन्हें झूठे प्रतीत होते हैं, सांसारिक खुशियों से कष्ट तथा पीड़ा उत्पन्न होती है । गुरु गद्दी, जिसके वे अधिकारी थे, भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकी । उन्हें उनकी माता, मक्खन शाह तथा अन्य सिखों ने अपने पूर्वजों की गद्दी पर आरूढ़ होने के लिए प्रेरित किया । अन्ततः उन्होंने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली, और गुरु नानक के उत्तराधिकार में नौवें गुरु के कर्त्तव्यों को निष्पन्न करना आरम्भ किया । अनेक अनुयायी उनके पास पहुंच गए, और उन्होंने करतारपुर में एक दुर्ग का निर्माण आरम्भ किया, और वहाँ उन्होंने अपना भव्य दरबार स्थापित किया ।

पाँच वर्ष की आयु में भी गुरु जी गम्भीर, शान्त, नम्र तथा सौम्य स्वभाव के थे । वे बहुत अल्पभाषी थे । इस अल्पायु में वे समाधिस्थ भी होते थे । एक बार उनकी मां ने अपने पति, गुरु हरगोविन्द के सम्मुख चिन्ता प्रकट की कि उनका पुत्र तेग बहादुर सांसारिक विषयों के प्रति उदासीन है, किन्तु गुरु जी ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा कि तेग बहादुर एक महान् धार्मिक नेता बनेगा और सिख धर्म के लिए अपने जीवन का बलिदान देने से भी नहीं घबराएगा । वास्तव में तेगबहादुर बहुत सादा, दयालु तथा नम्र थे । स्वभावतः ही, वे बहुत सरल किन्तु साहसी थे । जीवन-भर उन्होंने लोगों को ईश्वर का चिन्तन करने का उपदेश दिया, तथा उन्हें ईश्वरीय ज्ञान दिया । उन्होंने इस नश्वर संसार में आसक्ति को व्यर्थ बताया ।

उन्होंने अपने घर में एक समाधि-कक्ष का निर्माण करवाया, और ईश्वर में ध्यान लगाकर घण्टों इसमें बैठे रहते । वे भीड़ से घबराते क्योंकि प्रसिद्धि का शोर-शराबा उन्हें पसन्द नहीं था । वे हमेशा अत्याचार का प्रतिरोध करते, और मानव-जाति को मुक्त देखना चाहते थे । धर्म की रक्षा तथा अधर्म के विनाश के लिए अपने जीवन का बलिदान देकर उन्होंने कलियुग में अतीव शौर्य का प्रदर्शन किया । अपने पिता के समान ही उनका स्वभाव नम्र तथा मन उच्च था, तथा उनका हृदय पीडित मानवता के प्रति सर्वदा दया से परिपूर्ण रहता था ।

उन्होंने सैफाबाद, पैहोवा, बरना तथा करमखेड़ा नामक स्थानों की यात्रा की और ईश्वर के नाम का सन्देश देकर इन स्थानों के पीड़ित निवासियों को सान्त्वना दी । उन्होंने अपने को जनता के दुःखों से एकाकार कर लिया ।

एक बार सूर्य ग्रहण के अवसर पर गुरु जी कुरुक्षेत्र भी गए ताकि वहां एकत्र हज़ारों लोगों में ईश्वर के नाम का प्रचार किया जा सके । उन्होंने काहलूर के राजा देवोमाधो से कुछ भूमि खरीदी और करतारपुर के निकट वहां माखोवाल नगर का निर्माण किया । सिखों के लिए यह स्थान बहुत पवित्र है । रामराय अब भी उन्हें अपना शत्रु मानता था । धीरमल द्वारा उत्तेजित किए जाने पर उसने सम्राट् औरंगज़ेब के पास शिकायत की कि गुरु जी के इरादे राज्य के लिए हानिकारक हैं ।

इसके पश्चात् गुरु जी जयपुर के राजा के साथ पूर्व की ओर चले गए । गुरु जी ने ब्रह्मपुत्र के तट पर ईश्वर में ध्यान लगाया और पटना में निवास करने का निर्णय किया । वहां उन्होंने सिखों के लिए एक महाविद्यालय की स्थापना की । फिर वे पटना से आनन्दपुर लौट आए । तत्पश्चात् उन्होंने सभी महत्त्वपूर्ण हिन्दू धार्मिक स्थानों की यात्रा की, ताकि सिखों को संगठित किया जा सके, और सिख धर्म का प्रचार किया जा सके । यद्यपि गुरु जी शान्त जीवन व्यतीत करना चाहते थे, तथापि उनके विरोधियों ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया । धीरमल, जो अपने को गुरु-गद्दी का अधिकारी समझता था, ने एक बार गुरु जी पर गोली चलाई, किन्तु वे बच गए । ऐसी उत्तेजना के बावजूद, गुरु जी ने अपनी उदारता के कारण अपने आक्रान्ता को क्षमा कर दिया ।

सिखों की धर्म-साखियों में इस बात का अनेक उल्लेख मिलता है कि गुरु जी अपने आध्यात्मिक बल से बन्दीगृह की दीवारों को पार करके अपने शिष्यों से आ मिले तथा उनके साथ भोजन किया । एक बार गुरु जी अपने बन्दीगृह के शिखर पर खड़े थे । औरंगज़ेब ने इसे बहुत आपत्तिजनक माना तथा उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने उसके रनिवास की ओर देखने के उद्देश्य से ऐसा किया । जब गुरु जी को अपने आचरण के सम्बन्ध में स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया तो उन्होंने उत्तर दिया कि वे समुद्र पार से आते हुए फिरंगियों की ओर देख रहे थे, जो आकर उसके रनिवास के पर्दों को फाड़ देंगे और उसके साम्राज्य को नष्ट कर देंगे ।

जनरल निकलसन के अधीन सन् १८५७ में यह भविष्य वाणी सिखों के लिए युद्ध का नारा था, और सत्य निकली । नारायणसिंह ने अपनी पुस्तक 'Life of Guru Teg Bahadur' में इस घटना का उल्लेख किया है, और 'गुरु बंस प्रकाश' नामक रचना में भी यह अभिलिखित है । गुरु-गद्दी पर आसीन होने से पूर्व गुरु तेगबहादुर लगभग बीस वर्ष अमृतसर के निकट बकाला में एकान्त वास करते रहे थे । अपने काल में सिक्खों को सैनिक रूप से संगठित करने की दिशा में वे अधिक कार्य नहीं कर सके, क्योंकि घरेलू झगड़ों तथा औरंगज़ेब के अत्याचारों ने उन्हें इस ओर ध्यान नहीं देने दिया । कश्मीर के पण्डित आनन्दपुर में गुरु जी के पास आए और उन्होंने अपने दुःखों तथा विपत्तियों की कहानियां उन्हें सुनाई । उन्होंने गुरु जी से सहायता प्राप्त करने के लिए प्रार्थना की ।

उन पर होने वाले अत्याचारों को घटनाओं को सुनकर गुरु जी को बहुत दुःख हुआ और वे ध्यानमग्न हो गए । बालक गोविन्द भी वहीं था । उसने अपने पिता से पूछा, "इसका उपचार क्या है ?" गुरु जी ने उत्तर दिया, “किसी महान् तथा पवित्र व्यक्ति का बलिदान ।" बालक ने सुझाव दिया 'पिता जी !' आपसे अधिक महान तथा पवित्र कौन हो सकता है ! पिता जी, अपना बलिदान देकर मुगलों के अत्याचारों से इनकी रक्षा करो । अपने पुत्र से ये साहसपूर्ण शब्द सुनकर गुरु जी बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने पण्डितों को कहा कि कश्मीर की सरकार को सुझाव दिया जाए कि एक-एक व्यक्ति पर अत्याचार के क्रम को कुछ समय के लिए रोक दिया जाए, और गुरु तेगबहादुर को इस्लाम स्वीकार करने के लिए सहमत किया जाए, यदि वे ऐसा कर लेंगे तो अन्य व्यक्ति स्वयमेव उनका अनुसरण करेंगे ।

शीघ्र ही गुरु जी ने अपने परिवार के सदस्यों से विदा ली और पांच सिखों को साथ लेकर दिल्ली की ओर अपनी यात्रा आरम्भ की । मार्ग में गुरु जी तथा उनके पांच अनुयायी जिला करनाल में समाना के निकट गढ़ी नामक स्थान पर तथा खार और खतकर के गांवों में रुके । इस प्रकार उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी और पहले आगरा पहुँचे । मुगल सम्राट् के आदेशानुसार उन्हें वहां से बन्दी बनाकर दिल्ली लाया गया । सम्राट् ने गुरु जी को कहा कि वे इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें, अन्यथा उन्हें मृत्यु-दण्ड दिया जाएगा । गुरु जी ने मृत्यु-दण्ड स्वीकार किया । यह भी कथा प्रसिद्ध है कि सम्राट् ने उन्हें कोई करामात दिखाने के लिए कहा । किन्तु गुरु जी ने ऐसा करना स्वीकार नहीं किया । इस पर क्रुद्ध होकर सम्राट् ने तत्काल उनका वध किए जाने का आदेश दिया । जब जल्लाद ने उनका सिर धड़ से काट दिया तो उनके अन्तिम शब्द, जो उनकी मुट्ठी में एक कागज पर लिखे मिले, ये थे “सिर दिया पर धर्म न छोड़ा।" मैंने अपना शीष दे दिया है, किन्तु अपना धर्म नहीं छोड़ा ।

अत्याचारी औरंगज़ेब ने लोगों को डराने के लिए गुरु जी के मृत शरीर को दिल्ली को गलियों में प्रदर्शित किया । किन्तु गुरु जी के शिष्यों ने, अपनो चतुराई से, उनका शव प्राप्त कर लिया । गुरु जी की मृत्यु से सारे पंजाब में शोक तथा क्रोध की लहर दौड़ गई, और प्रतिरोध की ज्वालाएं भड़क उठीं । कहा जाता है कि गुरु जी की मृत्यु के पश्चात् तत्काल एक बड़ा तूफान आया । यह दुःखपूर्ण घटना संवत् १७३२ (१६७५ ई०) के मग्घर मास की है, उस समय गुरु जी की आयु ५३ वर्ष थी । जब एक रंग रेटा सिख गुरु जी का शीश लेकर आनन्दपुर पहुंचा, तो उनके पुत्र गुरु गोविन्दसिंह ने उनका दाह संस्कार किया । १७६० ई॰ में सरदार बघेलसिंह करोड़ सिंधिया ने महत्त्वपूर्ण स्थानों पर गुरुद्वारों का निर्माण किया । गुरु तेगबहादुर जी की शहीदी के स्थान पर भी एक छोटा गुरुद्वारा निर्मित किया गया और ४,००० रु० वार्षिक की एक जागीर इससे सम्बद्ध की गई । आगे चलकर ब्रिटिश शासन-काल में मुसलमानों द्वारा गुरुद्वारा शीशगंज को गिरवाकर उसके स्थान पर एक मस्जिद का निर्माण किया गया । रियासत जींद के राजा स्वरूपसिंह के अनुरोध पर ब्रिटिश शासन ने मस्जिद को गिरवाने की अनुमति दे दी और उसके स्थान पर पुनः गुरुद्वारा खड़ा किया गया । किन्तु मुसलमानों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय से डिग्री प्राप्त करके पुनः गुरुद्वारे के स्थान पर मस्जिद बनवा ली । राजा रणवीरसिंह मामले को प्रिवी काउंसिल में ले गए और वहां से जीतने पर १८६१ में पुनः गुरुद्वारे का निर्माण किया गया । इस गुरुद्वारे का वर्तमान भवन सन् १९३० में दिल्ली के सिखों के अंशदान से बनवाया गया था । मई, १९६८ में सरकार ने कोतवाली की संलग्न भूमि भी गुरुद्वारे से सम्बद्ध कर दी । हज़ारों व्यक्ति यहां आते हैं, और गुरु जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं । गुरु तेग बहादुर का बलिदान सिख धर्म के इतिहास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से है । हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी जान दी ।

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