जॉन डी | जॉन डी इतिहास | ००७ जेम्सबांड जासूस | 007 James Bond


अपने समय का माना हुआ भविष्यवक्ता, भविष्य दृष्टा, तांत्रिक तथा सिद्ध पुरुष होने के बावजूद वह कभी भी साबित नहीं कर पाया कि वह झूठ नहीं बोल रहा । बहुत से लोग उसे दैवी पुरुष मानते थे, जिनमें से महारानी एलिजाबेथ-प्रथम भी एक थी, मगर इससे भी अधिक वे लोग थे, जो डॉक्टर जान डी को एक धोखेबाज तथा झूठा मानते थे ।

लंदन के पास ही मार्टलेक गांव में एक गरीब देहाती के घर में १३ जुलाई, १५२७ ई. में जॉन का जन्म हुआ । जॉन अपनी छोटी आयु में ही पढ़ने में बहुत होशियार थे । स्कूल से आने के बाद वह अकेले बैठ कर पढ़ते रहते | उनकी मेहनत का यही परिणाम मिला कि जॉन ने मात्र १५ साल की आयु में ही कैम्ब्रिज की परीक्षा पास कर ली ।

विश्वविद्यालय में पहुंच कर जॉन का मन पढ़ने में पहले से भी कहीं अधिक लगने लगा । इसी मेहनत से एक दिन उन्हें केवल २० वर्ष की उम्र में ही ट्रिनिटी विश्वविद्यालय की फैलोशिप मिल गई, किंतु इसे आप संयोग कहें या कुछ और कि जॉन जैसा युवक शिक्षा प्राप्त करते ही ज्योतिष विद्या के चक्कर में पड़ गया । वह ज्योतिष की बड़ी-बड़ी पुस्तकों का अध्ययन करने के पश्चात् यूरोप भ्रमण के लिए निकल पड़ा ।

यूरोप के हर देश में जाकर वह ज्योतिष ज्ञान पर भाषण देता । एक युवा के मुंह से जब लोग ज्योतिष ज्ञान की बातें सुनते, तो उन्हें बहुत आनंद आता था । सारे यूरोप में जॉन ने अपना सिक्का जमा लिया । बड़े-बड़े ज्योतिषी उनसे परामर्श करने के लिए आने लगे । इससे जॉन को अपने आप पर विश्वास होने लगा था ।

सन् १५५४ में उसने अपनी पहली भविष्यवाणी की । वह भविष्यवाणी यह थी - "महारानी ट्यूडर का शासन चार वर्ष के पश्चात् समाप्त हो जाएगा।" उस समय महारानी मैरी ट्यूडर ने अपने देश के लोगों पर खूब अत्याचार आरंभ कर रखी थी । उसके अत्याचारों से देश की जनता कांपती थी । जॉन ने महारानी के पतन की भविष्यवाणी कर डाली, महारानी ने जॉन को बंदी बना लिया । उस पर लोगों को शासकों के विरुद्ध भड़काने का आरोप लगाया गया, किंतु १५५५ में उन्हे छोड़ दिया गया ।

जेल से बाहर आते ही उसके श्रद्धालुओं ने उसे घेर लिया । कुछ लोग जॉन को इस बात पर मजबूर कर रहे थे कि वह अपना ज्योतिष का धंधा फिर से चलाएं और नई-नई भविष्यवाणियां करें । लोग महारानी के अत्याचारों से बहुत दुःखी थे । हर ओर निर्दोष जनता पर अत्याचार हो रहे थे । दुःखी लोग जॉन की ओर देख रहे थे । कुछ समय के पश्चात् जॉन ने नजरबंद राजकुमारी एलिजाबेथ के साथ पत्राचार के दौरान एक पत्र में लिख डाला था –

“महारानी के अत्याचार सारी सीमाओं को पार कर गए हैं । उनका भविष्य यही बताता है कि यह अत्याचार का दौर उनके जीवन के अंत के साथ ही समाप्त होने वाला है । यह मेरी भविष्यवाणी है । इसके पश्चात् में आपको कुछ और भविष्यवाणियां बताऊंगा । आप मेरे अगले पत्र का इंतजार करना ।"

मगर प्रकृति को तो कुछ और ही मंजूर था । भाग्यविधाता का ही यह खेल था कि किसी तरह से जॉन का यह पत्र महारानी के जासूसों के हाथ लग गया । दूसरे दिन ही जॉन को फिर पकड़ लिया गया और उस पर काले जादू का आरोप लगा कर मुकदमा शुरू कर दिया गया । आश्चर्य की बात तो यह थी कि इस दमनचक्र से डॉ. जॉन जरा भी नहीं घबराए और न ही उन्होंने धैर्य छोड़ा । वह तो जेल में भी बहुत खुश रहे । न ही उन्हें अपने किए पर कोई पश्चाताप था । उन्होंने तो यही कहा कि - "मैं केवल अपनी आत्मा की आवाज को सुन कर ही लोगों को बताता हूं । भले ही देश के शासक मुझे देशद्रोही कहें या अपना शत्रु समझें अथवा विद्रोही, मगर मैं जो कुछ भी हूं, अंदर और बाहर से एक हूँ । मैं सत्य को दबा नहीं सकता । अपनी आत्मा की आवाज को मार नहीं सकता । भले ही इसके बदले में मुझे मौत की सजा ही क्यों न मिले ।“

जॉन की इस बहादुरी और स्पष्टता को देख कर ही शायद रानी ने उसे जेल से छोड़ दिया । इसके पश्चात् जॉन छोटी-मोटी भविष्यवाणियां करके अपना काम चलाते रहे, उनके श्रद्धालुओं की संख्या बहुत बढ़ रही थी । अपना भविष्य जानने को उतावले लोग उसके घर के बाहर लाइनें लगा कर खड़े रहते । मगर जैसे एलिजाबेथ महारानी बन गई, तो डॉ. जॉन का सम्मान बहुत बढ़ गया । महारानी ने राजगद्दी पर बैठते ही डॉ. जॉन को अपना ज्योतिषीय सलाहकार तो बनाया ही था, मगर इसके साथ-ही-साथ अपना गुप्तचर बना कर दूसरे राजाओं के दरबारों में जा-जा कर जासूसी करने का काम भी दे दिया ।

कहां एक भविष्यवक्ता और कहां एक जासूस ? अपने पाठकों को एक और रहस्यमयी बात बता दूं कि डॉ. जॉन ही वह प्रसिद्ध जासूस थे, जिनके नाम से ००७ जेम्सबांड जासूस का नाम चला था । जासूसी साहित्य पढ़ने वाले लोग कभी भी ००७ जेम्सबांड के प्रसिद्ध पात्र को नहीं भूल सकते । मगर वे यह बात नहीं जानते थे कि यह उस प्रसिद्ध भविष्यवक्ता का ही उपनाम था ।

डॉ. जॉन को तो भविष्यवाणियों और रहस्यमयी बातों का ही अधिक शौक था । वे कोई -न-कोई नया काम करते ही रहते थे । जासूसी के धंधे में आनन्द न पाकर वे पुरानी कब्रों को खोदते और उनमें से सड़े-गले शवों को निकाल कर उन पर नए-नए प्रयोग करने लगे, ताकि लोगों का भविष्य जानने के लिए भटकती आत्माओं का सहारा लिया जा सके ।

यह कार्य वैधानिक नहीं था, इसीलिए इसे चोरी-चोरी किया जाता था । मगर एक बार ऐसा करते समय उन्हें पुलिस ने पकड़ लिया, किंतु महारानी का हाथ जिसके सिर पर हो, उसे कौन पकड़ सकता था । इसलिए डॉ. जॉन को महारानी के कहने पर छोड़ दिया गया । इन्हीं दिनों जॉन ने एक ऐसी भविष्यवाणी की, जिससे सरकार चौंक उठी । उनकी भविष्यवाणी इस प्रकार थी –

"इंग्लैंड पर एक विदेशी शक्ति सागर के रास्ते से आक्रमण करेगी और फिर स्कॉटलैंड की रानी को मृत्यु दंड मिलेगा ।"

यह भविष्यवाणी पूर्ण रूप से सत्य निकली, जिससे जॉन का नाम सारे देश में प्रसिद्ध हो गया । उन्हें एक सफल भविष्यवक्ता मान कर दूर-दूर से लोग उनके पास आने लगे । जॉन का एक सहायक “एडवर्ड कैली” था, जो प्रेतात्माओं से बातें करता था । इस प्रकार से वे दोनों ही मिलकर तांत्रिक का धंधा भी करने लगे ।भविष्यवक्ता के साथ-साथ जॉन एक तांत्रिक भी बन चुके थे ।

मगर प्रकृति यह लीला हुई कि उनका यह सहायक किसी कारणवश रूठ कर उनसे जुदा हो गया । यह १५८७ की बात थी । लेकिन एडवर्ड के चले जाने के पश्चात् ही जॉन की वह तंत्र शक्ति समाप्त हो गई । देवताओं और आत्माओं से बातें करने वाली जबान सदा के लिए बंद हो गई थी । वास्तव में वह जबान ही तो एडवर्ड थी, उसके जाते ही सारा खेल समाप्त हो गया ।

इससे जॉन के भक्तों को बहुत बड़ा धक्का लगा । बहुत से लोग उनसे निराश हो गए । धीरे-धीरे उनके श्रद्धालुओं की संख्या कम होने लगी थी । जॉन ने जब देखा कि लोगों के मन में उनके लिए श्रद्धा कम हो रही है, तो उन्हें महसूस हुआ कि यह लोग बहुत स्वार्थी हैं । जब तक मैं इनके हाथों खिलौना बना इन्हें भूतों-प्रेतों की बातें सुनाता रहा, उन प्रेतात्माओं की लीला से उनके मन को खुश करता रहा, तब तक तो यह सब-के-सब मेरी पूजा करते थे । किंतु जैसे ही इन्होंने यह देखा कि मैं इनके मन की नहीं कर सकता, इनकी इच्छाएं पूरा नहीं कर सकता, तो यह सब-के-सब मुझसे दूर भागने लगे हैं । सब स्वार्थी हैं । यह बात मन-ही-मन में उन्हें दीमक की तरह चाट रही थी । वह एकांत में बैठ कर यही सोचते रहते ।

अंत में १६०८ में एकांतवास में ही उनकी मृत्यु हो गई । जॉन के जीवन पर उनकी मृत्यु के पश्चात् ही बहुत सारी पुस्तकें एवं लेख प्रकाशित हुए ।

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