आस्योज श्राद्ध | आसोज श्राद्ध | आशा भागोती को व्रत | आशा भागोती की कहानी | आशा भागोती का उजमन | Asyoj Shradh | Asoj Shradh | Asha Bhagoti fasting Story of Asha Bhagoti | Uzman of Asha Bhagoti


भादुवा की पूर्णमासी स आस्योज की अमावश तक “श्राद्ध” लाग । जिकी तिथि न पीतरां को श्राद्ध होव, ऊँ दिन ऊँना का नाम स ब्राह्मण न जिमाव। मर्दा की होते न ब्राह्मण न जिमा कर धोती, गमछो और दक्षिणा देव । लुगायां की होते न ब्राह्मणी न जिमा कर, साड़ी, ब्लाउज और दक्षिणा देव । खीर-पूरी या मन होव सो ही रसोई बनाव । जिमान क बाद पीतरा क नाम को तर्पण कर ।


आशा भागोती को व्रत | आशा भागोती की कहानी


आस्योज बदी की अष्टमी स “आशा भगोती” की पूजा शुरु कर । एक पाटा पर आठ कुणा को गोबर माटी को चोका । देव पिछ आहूँ कुणा पर और बीच म आठ-आठ रोली, मैहन्दी और काजल की टिक्की देव । पिछ नौऊँ जगा आठ-आठ गेहूँ । का दाना, आठ-आठ दूब, आठ-आठ चिटकी, आठ-आठ पीसा एक-एक सुहाली (बिना नमक की) एक-एक फल चढ़ाव और नोऊँ जगां एक-एक-दियो चा स ।

आठ गेहूँ का दाना लेकर आशा भगोती की कहानी सुन । ई तरियाँ आस्योज सुदी एकम तक पूजा कर । एकम क दिन व्रत कर । ई दिन पूजा तो रोज की तरियां ही कर, सिर्फ सुहाली नौऊँ कुणा पर चार मिठ्ठी और चार बिना नमक की सुहाली का बाणों काढ़ कर सासु जी न पगां लाग कर देव और आप खाना म एक बार चार मिठ्ठी चार बिना नमक की सुहाली और दूध फल खाव । ई तरियाँ आठ बरस तक आशा भगोती को व्रत कर । नौवां बरस म उजमन कर देव।


आशा भागोती का उजमन


उजमन कर जद अमावस्या तक तो उसी तरियाँ पूजा कर । एकम क दिन पूजा कर क आठ सुहाग पिटारी तो ब्राह्मणियाँ की और एक सासुजी की चढ़ाव । सुहाग पिटारी मंगला गौरी की कर उसी तरियाँ कर, सिर्फ चार मिठ्ठी और चार बिना नमक को सुहाली और घाल। आठ सुहागन ब्राह्मणियाँ न जिमाव और एक-एक सुहाग पिटारी, दक्षिणा देकर पगां लाग देव । सासुजी की सुहाग पिटारी और रुपिया सासुजी क पगां लाग कर दे देव । व्रत हर साल की तरियां ही कर ।


आशा भागोती की कहानी


एक हिमाचल राजा थो, वा क दो लड़कियाँ थीं । एक को नाम गोरा, एक को नाम पार्वती थो। एक दिन राजा आपनी दोनूँ लड़कियाँ न बुलाकर पूछ्यो कि क भाग को खाओ हो । पार्वती बोली कि म मेर भाग को खाऊँ हूँ और गोरा बोली कि म थार भाग को खाऊँ हूँ । राजा न ब्राह्मण बुला कर बोल्यो कि पार्वती तानी भीखारी और गोरा तानी राजा वर ढूंढियो । ब्राह्मण गोरा तानी तो इसरजी न नारियल दे दियो और पार्वती तानी शिवजी बुड्डा भिखारी को भेष कर बैठ्या था, नारियल दे दियो ।

पिछ गोरा की बरात आई, तो खूब खातिर करी, धूम-धाम स ब्याह करयो, भोत सारो धन दियो। पार्वती की बरात आई तो कुछ भी कोनी खरचयो, सिर्फ कन्यादान दे दियो। शिवजी पार्वती न लेकर कैलाश पर्वत पर जान लाग्या । रास्ता म जठ भी पार्वतीजी पैर रक्ख, बठ की ही दूब जल जाव । शिवजी पंडित न बुला कर पूछ्यो कि यो के दोष है । जद ब बोल्या कि पार्वतीजी और इना की भाभियाँ आशा भागोती को व्रत करती, व तो आप क पीरां म जाकर व्रत उजम दियो, पार्वतीजी कोनी उजमी । ये भी आप क पीरां म जा कर उजमन करसी तो इना का दोष मिट जासी ।

शिवजी बोल्या कि आपां पीरां चाल कर थारो उजमन करवा देवागां । खूब गाजा-बाजा स चालागां, नहीं तो बिन न के बेरो पटगो कि पार्वतीजी न इतनो सुख है । दोनूँ जना खूब गहना-कपड़ा पहन कर चाल्या । आगे गया, तो एक रानी क बच्चो होन वालो थो । भोत भीड़ होरी थी। पार्वतीजी पूछ्या कि इतनी भीड़ कैंया होरी है । शिवजी बोल्या कि रानी क बच्चो होन वालो है, वा भोत दुःख पाव है, जिक स होरी है। पार्वतीजी बोल्या कि टाबर होन म इतनी तकलीफ होव, सो मेरी तो कूख बान्द देवो ।

शिवजी बोल्या कि मत ना बंधवा, नहीं तो भोत पछतावोगी । आगे न गया तो एक घोड़ी को बच्चो होन वालो थो । पार्वतीजी देख्या, तो ओंरु बोल्या कि टाबर होन म भोत तकलीफ होत, सो मेरी तो कूख बांधो । शिवजी भोत समझाया, पर पार्वतीजी हट पकड़ लियो । बोल्यो कि म तो कूख बंधा कर ही अठ स चलूँगीं । शिवजी उना की कूख बाँध दी। बठी न गोरा आप क सासर म भोत दुःख पाती । शिवजी, पार्वतीजी खूब सज-धज कर पीरां पहुँचा । परां म माँ-बाप पहले तो उना न पहचाना ही कोनी, फेर देखकर भोत राजी होया । बाप पार्वतीजी न ओज्यूं पूछ्यो थे कि क भाग को खावो हो । पार्वतीजी बोली म तो मेर ही भाग को खाऊँ हूँ, जद ही इतनो राज करूँ हूँ । पीरां म भाभियाँ आशा भागोती को व्रत उजम थी । ऊँना न देख कर पार्वतीजी बोल्या कि मेर भी उजमन की तैयारी हो जाव, तो म भी व्रत उजम देऊ ।

भाभियाँ बोली कि थार के चीज की कमी है, शिवजी न बोलतां ही स तैयारी कर देगो । पार्वतीजी आपनी दासी न बुलाकर बोल्या कि शिवजी कुंवा की पाल पर बैठ्या है, ऊँना न जाकर कह दे कि पार्वतीजी आशा भगोती को उजमन करसी, सो तैयारी करनी है । दासी शिवजी न जा कर कहदी । शिवजी न सवा करोड़ को मुन्दड़ो दिया और बोल्या कि ई स तैयारी कर लेसी | पार्वतीजी मुन्दड़ा स भोत सारी तैयारी कर ली। आठ सुहाग पिटारी जिना म तीयल, गहना, पोली, नथ, चूड़ा, रोली, मैंहन्दी, हिंगलू, मैंन, काजल, टिक्की, दर्पण, कंघी और सुहाली घाल कर बनाई ।

एक सुहाग पिटारी सासुजी की बनाई । भाभियाँ देखी, तो बोली- आपां तो महिनां स तैयारी करां हा, जद भी इतनी तैयारी कोनी होई, ये तो जरा सी देर म सब कर ली । सब कोई खूब ठाट-बाट स उजमन करया । शिवजी, पार्वतीजी न कहायो कि अब आपां चाला, जद सुसरोजी शिवजी न जीमण बुलाया । शिवजी खूब गहना-कपड़ा पहन कर, छोटो स रूप धर कर, गाजा बाजा स जीमण गया । सुसरोजी भोत सारी रसोई बनवाई । शिवजी न देखकर सारी दुनिया बोली- भिखारी देखकर दियो थो, पण पार्वतीजी तो आप क भाग स राज कर है। शिवजी जीमण लाग्या तो सारी रसोई खतम कर दी । पार्वतीजी क लिये कुछ भी कोनी छोड़ यो । साग को उबाले ड़ो पीन्डियो पड्यो थो, बिन ही खाकर पानी पी कर बैठ स पाछा चाल्या । रास्ता म धूप पड़ थी, सो गाछ क बिच बैठगा । शिवजी, पार्वतीजी न पूछ्या कि थे के खाकर आया । पार्वतीजी बोल्या - थे खाया सो ही म खाई । थोड़ी देर म पार्वतीजी गाछ क बिच सोगा । शिवजी ऊँनाकी पेट की ढकनी उतार कर देख तो, साग को पीन्डियो और पानी पड्यो है । पार्वतीजी उट्या तो शिवजी औरू पूछ या कि थे के खाकर आया ।

ब बोल्या - थे खाया सो ही म खाई । शिवजी न हांसी आगी । बोल्या – थे तो साग पानी पी कर आया हो, म थारी पेट की ढकनी उतार कर देखी थी । पार्वतीजी बोल्या-महाराज थे मेरा तो पड़दा पास कर दिया लेकिन आग न कोई का मत करियो ।

म्हे सासर की बात पीहर म, पीहर की बात सासर म राखां हां । आग न चाल्या तो, रास्ता म दूब सूखी गी थी जिनकी पाछी हरी होगी । शिवजी सोच्यां कि दोष तो मिटगो और आग न गया तो वाई घोड़ी क पास बच्चो खेल थो । शिवजी बोल्या कि यो वाई घोड़ी को बच्चो है, जिकी दुःख पाव थी । जठ थे कूख बन्धाई थी । पार्वतीजी बोल्या - महाराज मेरी तो कूख खोलो । शिवजी बोल्या किं अब कैंया खुलसी, म तो था न पहले ही मना करयो थो । और आगे गया तो वाई रानी जलवा पूजन जाव थी । पार्वतीजी पुछ् या कि यो के होव है । शिवजी बोल्या-या वाईरानी है । जिकी दुःख पाव थी । इक लड़को होयो है सो जलवा पूजन जाव है । ऊँ न देखकर पार्वतीजी बोल्या-मेरी तो कूख खोलो । एक दम हट कर लियो, जद शिवजी जादुक बटुव म स मैंलका गणेशजी बनाकर पार्वतीजी न दिया। सारा नेग करवाया, जलवा पुजवाई ।

पिछ पार्वतीजी सारी नगरी म हेलो फिरवायो कि म सुहाग बाटूंगी । जितकी छोटी दुनिया थरी जिको तो भाज-भाज क भोत सो सुहाग लेगी । ब्राह्मण-बनियाणी श्रृंगार करन म लाग गी, तो देरी होन स सारो सुहाग बंटगो । वे आई तो शिवजी बोल्या कि ईना न तो सुहाग देनो पड़सी। जद पार्वतीजी नुवां म स मेहन्दी, मांग म स हींगलू टीका म स रोली, कोया म स काजल काड्यो और चिटली आंगली को छांटो दियो । सारी नगरी पार्वती जी क जय-जय कार करन लाग गी । हे पार्वतीजी ! जिसो सब न सुहाग दियो, बिसो म्हान भी दियो । कहतां, सुणतां, हुंकारा भरता न, आपना सारा परिवार न देइयो ।

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