औघड़ भैरव गिरी | चमत्कारी औघड़ बाबा | अघोरी बाबा का चमत्कार | Aughad Baba


घटना १४ मई, १९३२ की है । उन दिनों नैनीताल में एक अंग्रेज कर्नल विलियम स्मिथ रहता था । उसका बंगला शहर से दूर जंगल के सुरम्य वातावरण में बना था । विलियम एक चुस्त एवं लंबे कद का व्यक्ति था । उसकी उम्र चालीस वर्ष के आसपास थी । वह हमेशा सुबह के समय भ्रमण के लिए निकल जाया करता था ।

अंग्रेजों की सत्ता होने के कारण उन दिनों यह रिवाज था कि कोई अंग्रेज अफसर बाहर निकलता था, तो लोग उसके लिए रास्ता छोड़कर एक तरफ खड़े हो जाते थे तथा उसका अभिवादन करते थे । विलियम हमेशा की तरह भ्रमण से वापस लौट रहा था । रास्ते में उसे सड़क पर एक व्यक्ति बैठा मिला, जिसकी लंबी-लंबी जटा थी । शरीर पर वस्त्र के नाम पर मात्र लंगोट था । गले में हड्डियों की माला थी तथा पास ही एक नर कंकाल की खोपड़ी रखी थी । एक गंदे पात्र में मल-मूत्र भरा पड़ा था । वह अघोरी साधु दोनों हाथ घुटनों पर टेके हुए मस्ती से बैठा था ।

विलियम उसे देखते ही चिल्लाकर बोला - ‘अबे रास्ते में क्यों बैठा है ? चल उठ यहां से।' विलियम की बात का उस पर कुछ असर नहीं हुआ । वह उसी तरह मस्ती में बैठा रहा । विलियम ने साथ चल रहे एक हिन्दुस्तानी अनुचर से उसके बारे में पूछा । उस अनुचर ने कहा, 'साहब, यह औघड़ बाबा भैरवगिरी हैं । यह बहुत चमत्कारी हैं । आप कृपया इन्हें मत छेड़िए । अन्यथा...।'

अनुचर की बात सुनकर विलियम हंस पड़ा । वह साधु-संतों पर विश्वास नहीं करता था । विलियम की बदतमीजी पर औघड़ को गुस्सा आ गया । उसने पास रखे पात्र में हाथ डाला तथा चुल्लू भर मल-मूत्र विलियम के कपड़ों पर छिड़क दिया । इस पर क्रोधित होकर विलियम चिल्ला उठा, 'तुम्हारी यह हिम्मत ? मैं तुम्हें अभी गोली मार दूंगा ।' आश्चर्य! विलियम के मुंह से यह बात निकली ही थी कि उस साधु का सिर धड़ से अलग होकर करीब डेढ़ मीटर ऊपर उठ गया तथा पुनः आकर धड़ से जुड़ गया । यह क्रिया दस मिनट तक चलती रही ।

विलियम तथा उसका अनुचर यह अद्भुत चमत्कार आंखें फाड़-फाड़ कर देखते रहे । इसके बाद विलियम डर कर अपने बंगले लौट आया । उसने अपने कपड़े धोकर सुखा दिए । दूसरे दिन उसने जब उन कपड़ों को पहना, तो उनमें से एक अनोखी मनमोहक सुगंध आ रही थी, मानो किसी ने एक साथ कई इत्र की शीशियां उन कपड़ों पर उड़ेल दी हों । मल-मूत्र के छींटे किस तरह से इत्र की सुगंध में परिवर्तित हो गए, यह रहस्य विलियम समझ नहीं सका ।

अगले दिन उसी स्थान पर पहुंच कर विलियम ने देखा कि आज भी वह औघड़ वैसे ही वहीं बैठा है । विलियम चुपचाप उसकी तरफ बढ़ा तथा उसकी बांह पकड़ी । बांह पकड़ते ही विलियम का शरीर हवा में ऊपर वायुमंडल में उठने लगा । ऐसा लग रहा था, जैसे उसके दोनों हाथ पकड़ कर कोई व्यक्ति उसे उड़ाए लिए जा रहा है । वह एक गुब्बारे की तरह हवा में ऊपर उठकर अदृश्य हो गया । इस घटना की खबर चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल गई । कई सैनिक टुकड़ियां विलियम को खोजने में जुट गई, परन्तु न तो विलियम मिला तथा न ही उसका शव |

कर्नल विलियम के गायब होने का समाचार अखबारों में भी प्रकाशित कराया गया, पर कुछ परिणाम नहीं निकला । उस औघड़ बाबा भैरवगिरी की खोज की गई, तो वह भी नहीं मिला । इस घटना के ठीक एक माह बाद एक दिन अकस्मात देखा गया कि विलियम ठीक वहीं खड़ा है, जहां से वह गायब हुआ था । वह अपने बंगले पर लौट आया । कई लोगों ने पूछा कि वह कहां गायब रहा, किन्तु वह कुछ नहीं बोला । अपने निकटतम मित्रों के पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया ।

इस घटना के पश्चात् कर्नल विलियम अपने पद से इस्तीफा देकर इंग्लैंड लौट गया । वहां से उसने एक बार भारत में सेवारत अपने एक अंग्रेज मित्र को पत्र लिखा 'यदि तुम्हें कोई औघड़ साधु कहीं पर भी मिल जाए, तो भगवान के नाम पर उसे कदापि मत छेड़ना ।'

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