सम्राट विक्रमादित्य का जीवन परिचय | सम्राट विक्रमादित्य की कहानी | राजा विक्रमादित्य की कहानी | राजा विक्रमादित्य कहानी | Vikramaditya Ki Kahani | Vikramaditya Kon The


एक गांव में एक चरवाहा बालक रहता था । वह अपने साथियों के संग अपनी भेड़ें चराने चारागाह जाया करता था । जब भेड़ें चारागाह में चरने लगतीं तो चरवाहा बालक अपने मित्रों के साथ खेलने में व्यस्त हो जाता । खेलते समय चरवाहा बालक प्रतिदिन मिट्टी के एक टीले पर बैठ जाता तथा अपने को राजा कहने लगता । उसके मित्रों को भी इस खेल में मजा आता । वे उसकी प्रजा बनकर फरियादें लेकर आते और अपने राजा से न्याय की मांग करते ।

चरवाहा बालक भी किसी राजा की भांति ही अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय सुनाता । धीरे-धीरे गांववासियों को भी इस बालक की प्रतिभा का पता चला । जब भी उनके मध्य किसी प्रकार का विवाद होता, जिसका निपटारा वे स्वयं नहीं कर पाते, वे उस विवाद को लेकर उस चरवाहे बालक के पास न्याय के लिए जाते । चरवाहा बालक उसी मिट्टी के टीले पर बैठकर गांववासियों की समस्या ध्यान से सुनता तथा उस पर अपना निर्णय देता । उसका निर्णय दोनों दलों को मान्य होता तथा वे सन्तुष्ट होकर वापस लौटते ।

धीरे-धीरे यह बात चारों ओर फैल गई तथा उस समय के शासक राजा भोज देव को भी इसकी सूचना मिली । उसने उस चरवाहे बालक को राजदरबार में बुलाकर उसकी न्याय प्रतिभा की परीक्षा की तथा इस निर्णय पर पहुंचा कि वह एक साधारण बालक के समान ही था ।

" मैंने तो तुम्हारी न्याय प्रतिभा के बारे में बहुत कुछ सुना था, परन्तु तुम तो एक साधारण बालक निकले" - राजा भोज देव ने कहा ।

राजा भोज देव की बात सुनकर चरवाहा बालक बोला - "महाराज, मैं एक अशिक्षित साधारण बालक ही हूं । परन्तु महाराज, आपके राज्य के उत्तर-पश्चिम के पहाड़ी क्षेत्र में मिट्टी का एक टीला है । जब मैं उस टीले बैठता हूं तो न्याय प्रतिभा स्वयं ही मुझमें आने लगती है । मैं स्वयं को राजा अनुभव करने लगता हूं।"

राजा भोज देव को बालक की बातों का अर्थ समझते देर नहीं लगी । उसने उस बालक से वह मिट्टी का टीला दिखाने के लिए कहा । वहां पहुंचकर उसने चरवाहे बालक से मिट्टी के टीले पर बैठने के लिए कहा और उसके सम्मुख एक अत्यन्त पेचीदा मसला निर्णय के लिए रखा । वह यह देखकर भौचक्का रह गए कि बालक ने उस मसले को बहुत सरल ढंग से सुलझा दिया ।

अन्त में राजा भोज देव इस नतीजे पर पहुंचे कि बालक में नहीं, बल्कि उस मिट्टी के टीले में ही कोई अदृश्य शक्ति छिपी हुई है ।

अतः उन्होने अपने मन्त्रियों को उस स्थान की खुदाई करवाने का आदेश जारी किया । तुरन्त मजदूर बुलाए गए । उन्होंने उस स्थान की खुदाई करनी आरम्भ कर दी । एक घंटे की खुदाई के बाद एक मजदूर की कुदाल किसी धातु से जा टकराई । धातु से टकराने की ध्वनि ने राजा भोज देव को चौकन्ना कर दिया, क्योंकि वह स्वयं अपनी निगरानी में उस स्थान की खुदाई करवा रहा था । उसने अपने मन्त्रियों से कहा कि वे मजदूरों को उस स्थान की बहुत धीरे और सावधानीपूर्वक खुदाई करने का आदेश दें । लगभग एक घंटे की खुदाई के बाद उस स्थान से एक भव्य स्वर्ण सिंहासन निकला ।

राजा भोज देव तो सिंहासन की चकाचौंध को देखता रह गया । “हे भगवान! जब अभी इस सिंहासन का ऐसा भव्य रूप है तो जब इसे साफ करके चमका दिया जाएगा तब तो इसकी छटा देखते ही बनेगी” - राजा भोज देव ने सोचा ।

सूर्य ढलने वाला था । स्वर्ण सिंहासन को साफ कर चमका दिया गया था । सिंहासन पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें उसे स्वर्णिम छटा प्रदान कर रही थीं । सिंहासन को अत्यन्त सावधानीपूर्वक राजा भोज देव के दरबार में लाया गया ।

सभी दरबारी सिंहासन के इर्द-गिर्द जमा होकर सिंहासन की छटा देखने लगे । सिंहासन सोने का बना हुआ था तथा उसमें विभिन्न आकारों के विभिन्न प्रकार के हीरे-जवाहरात जड़े हुए थे । सभी दरबारी यह देखकर एक स्वर में बोले कि यह तो इन्द्र देवता का सिंहासन लगता है ।

राजा भोज देव ने अपने ज्योतिषियों से कहा कि वे उसके सिंहासनारूढ़ होने का शुभ दिन तथा समय निकालें । ज्योतिषियों ने तारों तथा ग्रहों का अध्ययन कर हिसाब लगाया तथा यह बताया कि सम्राट मंगलवार को पूर्णमासी की रात के प्रथम प्रहर में सिंहासन पर बैठें ।

अब राजा भोज देव बहुत बेसब्री से उस दिन की प्रतीक्षा करने लगा । पूर्णमासी की रात के प्रथम प्रहर में पूजा तथा यज्ञ कर राजा स्वर्ण सिंहासन पर बैठने के लिए अग्रसर हुआ, परन्तु उस समय उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उसने नारी स्वर में एक साथ कुछ स्त्रियों के खिलखिलाकर हंसने की आवाज सुनी । सम्राट ने मुड़कर राजदरबार में उपस्थित लोगों पर नजर डाली । प्रत्येक लोग चकित थे ।

राजा भोज देव ने आगे बढ़कर स्वर्ण सिंहासन का नजदीक से मुआयना किया और जो कुछ उसने देखा उस पर किसी अन्य की दृष्टि नहीं पड़ सकी थी । सिंहासन के दोनों हत्थों पर कठपुतलियां बैठी थीं । सम्राट ने गिना, प्रत्येक हत्थे पर सोलह कठपुतलियां थीं । इसके पश्चात् सम्राट ने जैसे ही सिंहासन पर बैठने का प्रयत्न किया, खनकती हुई हंसी दोबारा सुनाई दी । इस बार सम्राट सिंहासन के बहुत निकट पहुंच चुका था । उसने कठपुतलियों को हिलते-डुलते तथा खिलखिलाते देखा तो आतंकित हो उठा । उसने कहा, "तुम सब कौन हो ? क्यों हंस रही हो? तुम सब नहीं जानतीं कि मैं राजा भोज देव हूं? मुझे देखकर हंसना अपराध है । तुम्हारी हंसी में तिरस्कार है । चाहूं तो तुम सबको दंड दे सकता हू |

"नहीं, महाराज नहीं। कृपया आप ऐसा न सोचें हमने आपका कभी अनादर नहीं करना चाहा । हां, हम आपको एक बात जरूर स्पष्ट रूप से बताना चाहती हैं कि इस सिंहासन पर, जो कभी हमारे महान सम्राट विक्रमादित्य का था, आप बैठने के अधिकारी नहीं हैं।" दाएं हत्थे पर बैठी प्रथम कठपुतली ने कहा ।

राजा भोज देव पर कठपुतली की बात वज्र के समान गिरी । उसने अपने को सम्भालते हुए कहा, "मैं तुम्हारी बात सुनकर सचमुच विस्मित हूं । परन्तु इससे पहले कि तुम मुझे महान सम्राट विक्रमादित्य के विषय में विस्तार से बताओ, मैं तुम सबका परिचय चाहता हूं।"

"अवश्य महाराज ! मेरा नाम मंजरी है। कृपया मेरा अभिवादन स्वीकार करें।"

उसके पश्चात् उसने धीरे-धीरे अन्य कटपुतलियों का भी परिचय करवाया, जिनके नाम थे - 1. मंजरी, 2. चित्ररेखा, 3. रतिभामा, 4. चन्द्रकला, 5. लीलावती, 6. काम कंदला, 7. कामदा, 8. पुष्पावती, 9. मधुमालती, 10. प्रेमावती, 11. पद्मावती, 12. कीर्तिमती, 13. त्रिलोचनी, 14. रुद्रावती, 15. अनूपवती, 16. सुन्दरवती, 17. सत्यवती, 18. रूपलेखा, 19. तारा, 20. चन्द्रज्योति, 21. अनुराधा, 22. अनूपरेखा, 23. करूपावती, 24. चित्रकला, 25. जयलक्ष्मी, 26. विद्यावती, 27. जगज्योति, 28. मनमोहिनी, 29. वैदेही, 30. रूपवती, 31. कौशल्या और 32. मैनावती ।

सभी कठपुतलियों का परिचय करवाने के पश्चात् मंजरी ने राजा भोज देव से सम्राट विक्रमादित्य की कथा सुनने का आग्रह किया –

महाराज, धारा नगरी में भर्तृहरि नामक राजा का शासन था । भर्तृहरि एक अय्यास राजा था । यही कारण था कि उसका भाई विक्रमादित्य राज्य छोड़कर चला गया । अब तो राजा भर्तृहरि पहले से अधिक आजाद हो गया । राजा भर्तृहरि की छः रानियां थीं जिनमें सबसे छोटी थी रानी पिंगला ।

राजा भर्तृहरि रानी पिंगला से अथाह प्रेम करता था । परन्तु राजा अपनी इन्द्रियों से अत्यधिक विवश होने के कारण रानियों के अतिरिक्त वेश्याओं के पास भी आया-जाया करता था । उन्हीं वेश्याओं में एक थी चित्रसेना, जिसे भर्तृहरि बहुत प्रेम करता था । वह चित्रसेना के प्रेमपाश में ऐसा बंधा हुआ था कि उसने अपने राज्य का कार्यभार अपने मन्त्रियों पर छोड़ रखा था तथा उसके साथ दिन-रात रंगरलियां मनाता रहता था।

मंजरी ने एक क्षण रुक राजा भोज देव की ओर ध्यान से देखा और उसे तल्लीनता से कहानी सुनता देख आगे बोली, “समय धीरे-धीरे बीत रहा था । एक दिन एक ब्राह्मण राजा भर्तृहरि के दरबार में उपस्थित हुआ । उसने राजा को एक फल देते हुए कहा कि इस फल का सेवन करने वाला दीर्घजीवी तथा नीरोगी होगा । राजा भर्तृहरि फल पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ, परन्तु उसने फल स्वयं खाने के बजाय रानी पिंगला को दे दिया ताकि पिंगला लम्बे समय तक अपना यौवन कायम रख सके । परन्तु रानी पिंगला भी राजा भर्तृहरि की भांति ही अय्यासी का जीवन व्यतीत करती थी तथा चुपके-चुपके राजा के रथ चालक से प्रेम करती थी । उसने वह फल रथवान को दे दिया । रथ चालक ने उस फल को चित्रसेना को भेंट कर दिया - वह भी भर्तृहरि की भांति चित्रसेना के पास लुक-छिपकर जाया करता था ।

चित्रसेना थी तो वेश्या किंतु उसके मन में अपने निकृष्ट जीवन से घृणा थी । उसका मानना था कि समाज और देश के लिए उसका जीवन व्यर्थ है । अतः अपने अन्तःकरण के धिक्कारने पर उसने वह फल राजा को यह सोचकर दिया कि राजा भर्तृहरि उस फल का सेवन कर लम्बे समय तक युवा एवं नीरोगी रहेगा तथा देश की अधिकाधिक सेवा कर सकेगा । परन्तु उसे उस समय घोर आश्चर्य हुआ जब राजा भर्तृहरि उस फल को उसके पास देखते ही क्रोधित हो उठे ।

राजा भर्तृहरि ने चित्रसेना के पास फल होने के कारणों की जांच करवाई और जब उसे वास्तविकता का पता चला तो उसने चित्रसेना तथा रथचालक दोनों को अपने हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया ।

परन्तु इन सभी घटनाओं से उसको भारी आघात पहुंचा और उसने संसार त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया ।

जब विक्रमादित्य को भर्तृहरि के संन्यास लेने की सूचना मिली तो वह तुरन्त वापस लौट आया । विक्रमादित्य को राज्य की कोई लालसा नहीं थी । उसने तो राज्य की बागडोर केवल इसलिए सम्भाली कि कहीं राजा की अनुपस्थिति में प्रजा विद्रोह न कर दे या शत्रु आक्रमण न कर दे । चूंकि राजा विक्रमादित्य अपने भाई के समान स्वभाव वाला नहीं था तथा ऐसे कार्यों से बहुत दूर रहता था जो निकृष्ट या अनैतिक समझे जाते हों, इसीलिए शीघ्र ही वह मन्त्रियों तथा अपनी प्रजा में लोकप्रिय हो गया । राजा विक्रमादित्य अपनी निष्पक्षता तथा न्याय-विवेक के लिए प्रसिद्ध था । उसके शासनकाल में देश की बहुत उन्नति हुई । कहा जाता है कि भगवान शिव ने उसकी विशेष रूप से रचना की थी । यही कारण था कि उसके शासनकाल में कभी देश पर प्राकृतिक आपदाएं नहीं आईं-जैसे सूखा या बाढ़ आदि । देश की जनता सुखी थी । राजा ने ऐसा प्रबन्ध कर रखा था कि राज्य में दूध, मक्खन तथा अनाज की कोई कमी नहीं थी । राज्य का गरीब से गरीब व्यक्ति भी भूखा नहीं रहता था ।

राजा विक्रमादित्य ने चालीस वर्ष तक अपने देश पर शासन किया । उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र जैतपाल को राजा नियुक्त किया गया । राज्याभिषेक के बाद जैतपाल ने जैसे ही सिंहासन पर बैठना चाहा, वह बेहोश हो गया । एक रात्रि राजा विक्रमादित्य ने स्वप्न में प्रकट होकर राजा जैतपाल से कहा कि वह सिंहासन पर नहीं बैठे क्योंकि केवल कोई योग्य शासक हो उस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है । उसने अपने पुत्र से उस सिंहासन को भूमि में गाड़ देने के लिए कहा । राजा जैतपाल ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए सिंहासन को उसी स्थान पर गाड़ दिया जहां से आपने खुदाई करवा कर इस सिंहासन को निकलवाया है ।

मंजरी ने कहानी समाप्त की और कहा, "तो महाराज, अब तो आप जान गए कि राजा विक्रमादित्य कौन था । अब आगे राजा विक्रमादित्य की महानता सिद्ध करने के लिए हममें से प्रत्येक आपको एक-एक कहानी सुनाएगी । प्रत्येक कहानी में राजा विक्रमादित्य की महानता का वर्णन होगा । प्रत्येक कहानी के अन्त में आपसे कहा जाएगा कि आप राजा विक्रम से अपनी तुलना कीजिए । आप सिंहासन पर तभी विराजमान हो सकते हैं जब आपको पूर्णरूप से यह विश्वास हो जाए कि आप सचमुच राजा विक्रमादित्य के समकक्ष हैं । चूंकि हमारी संख्या बत्तीस है अतः हमें अपनी कहानियां समाप्त करने में बत्तीस दिन लगेंगे ।"

राजा भोज देव ने कठपुतलियों से बत्तीस दिनों तक विभिन्न कथाएं सुनीं और इस परिणाम पर पहुंचा कि वह राजा विक्रमादित्य से अपनी तुलना नहीं कर सकता ।

तैंतीसवें दिन राजा भोज देव ने स्वर्ण सिंहासन को उसी स्थान पर गड़वा दिया जिस स्थान से उसे खोदकर निकाला गया था ।

यहा हम सबसे पहले राजा विक्रमादित्य और बेताल द्वारा सुनाई गई कहानियो का उल्लेख करेंगे -



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