विक्रम बेताल की कहानी | विक्रम बेताल की असली कहानी - उपयुक्त वर | 25 Stories of Vikram Betal


राजा विक्रम ने एक बार फिर बेताल को उठाकर अपने कंधे पर डाला और अपने रास्ते पर चल दिया । उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो, इस बार वह किसी भी कीमत पर नहीं बोलेगा । किन्तु बेताल अपनी आदत से कहां बाज आने वाला था ।

थोड़ा ही सफर तय हुआ था कि वह बोल उठा -"विक्रम ! क्या इतना लंबा रास्ता हम यूं ही खामोशी से तय कर लेंगे ?"

विक्रम खामोश रहा । उसे मालूम था कि यदि मैं बोला तो ये चला जाएगा ।

"खैर ! मैं जानता हूं कि तुम नहीं बोलोगे - चलो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं । इस प्रकार हमारा समय भी कट जाएगा और बोरियत भी महसूस नहीं होगी ।

ये किस्सा अवन्ति देश का है । अवन्ति नरेश की एक बेटी थी जिसका नाम शशिबाला था । अपने नाम के अनुरूप ही वह सुन्दर थी । युवा होने पर उसके रूप यौवन के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए । आस-पड़ोस तथा दूर-दराज के राज्यों के राजकुमारों के रिश्ते उसके लिए आने लगे ।

उसके पिता इन रिश्तों को पाकर जहां अत्यन्त प्रसन्न थे, वहीं स्तब्ध भी थे कि किस रिश्ते को स्वीकार करें और किसे नहीं । जब संदेशों का कोई उचित उत्तर नहीं मिला तो राजकुमार स्वयं अवन्ति प्रदेश में आने लगे । वे राजा के सम्मुख अपने गुणों की चर्चा करते और राजकुमारी का हाथ मांगते ।

एक दिन की बात है । अवन्ति के राजा अपने दरबार में बैठे थे, तभी खबर आई कि चोल देश के राजकुमार उनसे मिलना चाहते हैं । राजा ने तत्काल आदरपूर्वक चोल देश के राजकुमार को दरबार में बुलाया । सम्मानपूर्ण स्थान देने के बाद आने का कारण पूछा । राजकुमार ने राजकुमारी शशि से अपने विवाह की इच्छा प्रकट की ।

उन दिनों चोल राज्य काफी नामी, उन्नत और शक्तिशाली था । राजकुमार को इस प्रकार अनुरोध करते देख अवन्ति नरेश असमंजस में पड़ गए । न इन्कार करने की सूरत थी, न स्वीकार करने की ।

“राजकुमार । आप हमारे अतिथि भवन में निवास करें । हम राजकुमारी से राय लेकर ही अपना निर्णय देंगे । वैसे आपकी विशेषता क्या है ?"

इस पर चोल राजकुमार ने कहा — “महाराज ! मैं धनुर्विद्या में पारंगत हूं । शब्दभेदी बाण चला सकता हूं । मेरा निशाना कभी नहीं चूकता।" श्रद्धा से सिर नवाकर चोल कुमार ने कहा ।

"ठीक है पुत्र ! हम राजकुमारी से विचार-विमर्श कर लें। तभी कोई निर्णय करेंगे।" चोल राजकुमार को अतिथि भवन में सम्मानपूर्वक ठहरा दिया गया ।

इसके बाद तो राजकुमारी से विवाह करने के इच्छुक राजकुमारों का तांता लगने लगा । एक के बाद एक राजकुमार आकर प्रणय निवेदन करने लगे । वैशाली का राजकुमार आया । राजा ने पूछा- "तुम्हारी योग्यता क्या है।"

राजकुमार बोला—“राजन, मेरे बराबर उत्तम कपड़ा कोई तैयार नहीं कर सकता । रेशम के कपड़े का मैं इस सम्पूर्ण पृथ्वी पर अकेला ज्ञानी हूं ।"

उसने अवन्ति नरेश को ऐसा सुन्दर रेशमी वस्त्र उपहार में दिया कि देखने वाले उसकी चमक-दमक देखकर चकरा गए । वस्त्र राजकुमारी के पास भेज दिया गया और राजकुमार को सम्मानपूर्वक अतिथि भवन में ठहरा दिया गया ।

कुछ ही दिन बाद बंगदेश का राजकुमार आ गया । उसने भी राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की । अपनी योग्यता के बारे में उसने बतलाया कि वह उच्च कोटि का विद्वान है । सम्पूर्ण वेद-पुराण और गीता उसको कंठस्थ है । राजा ने उसे भी सम्मानपूर्वक अपने महल में ठहरा लिया ।

तब चेदि देश का राजकुमार आया और राजकुमारी से विवाह करने की इच्छा प्रकट की । उसने अपनी विशेषता में कहा कि वह शरीर के सम्पूर्ण अंगों का ज्ञाता है । राजकुमारी से उसका विवाह होने पर वह कभी भी शारीरिक कष्ट नहीं पा सकती । राजा ने उसे भी अपने अतिथिगृह में ठहरा लिया ।

इस प्रकार चार राजकुमार एकत्रित हो गए ।

महाराज ने राजकुमारी को सभी राजकुमारों के विषय में विस्तार से बताया, फिर बोले – “बेटी ! तेरे योग्य चार वर आए हैं । अब अंतिम फैसला तुम्हें ही करना है कि तुम किसे अपने पति के रूप में स्वीकार करती हो । वरमाला उठाओ और जाकर अपने पति का चुनाव कर लो ।"

पिता के आदेश पर राजकुमारी वरमाला लेकर अतिथिगृह में आई । चारों राजकुमार उत्सुकतापूर्वक उसकी राह देख रहे थे ।"

विक्रम बेताल के सवाल जवाब

बेताल के सवाल :

अब बताओ राजा विक्रम ! राजकुमारी किसके गले में वरमाला डाले । इसका उचित निर्णय करो, वरना तुम्हारी खोपड़ी फट जाएगी । यह मेरा श्राप है।"

बेताल अपनी बात कहकर चुप हो गया । विक्रम भी खामोश था । वह बेताल को अपने कंधे पर रखकर तेज-तेज चल रहा था ताकि उसे लेकर शीघ्रातिशीघ्र श्मशान तक पहुंच जाए ।

बेताल बोला—"जवाब दो राजा विक्रम। अपना न्याय करो।"

राजा विक्रमादित्य के जवाब :

विक्रम बोला—"सुनो बेताल, आदमी जन्म से नहीं, कर्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय और शूद्र होता है । राजकुमारी को अपना विवाह चोल देश के राजकुमार से करना चाहिए । कर्म से वही क्षत्रिय है । बाकी सब ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र हैं । राजकुमारी का उपयुक्त वर क्षत्रिय है।"

"तुम ठीक कहते हो, राजा विक्रम।" बेताल एकाएक भयानक हंसी हसा ।

अचानक वह विक्रम के कंधे से भागा, पर राजा विक्रम ने दौड़कर कुछ दूरी पर उसको पकड़ लिया । "बेताल ! तुम बड़े धोखेबाज हो।"

बेताल बोला—"मैं अपने वचन पर कायम हूं । तुम मुझे धोखेबाज क्यों मानते हो ?"

"तुम्हारी शर्त ही ऐसी है कि यदि मैं बोलूं तो भी मुश्किल और यदि न बोलूं तो भी मुश्किल । लेकिन मैं अब तुम्हें आसानी से जाने नहीं दूंगा।"

कहकर राजा विक्रम ने बेताल को फिर अपने कंधे पर रख लिया और तेजी से श्मशान की ओर चल दिया । वह शीघ्र श्मशान पहुंचना चाहता था । बेताल को उसने कसकर पकड़ रखा था । कुछ आगे जाने पर बेताल बोला—"विक्रम! कर्म से आदमी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होता है।"

"हां।" विक्रम ने कहा ।

"मुरदा ढोने वाला क्या कहलाएगा।"

"शूद्र"

"तब तुम इस समय शूद्र हो।" कहकर बेताल खिलखिलाकर हंस पड़ा ।

उसी क्षण वह कंधे से उछला और हवा के समान भागकर फिर पेड़ पर जाकर लटक गया । विक्रम दौड़कर गया । क्रोध के कारण वह अपनी तलवार से उसके टुकड़े-टुकड़े करने ही वाला था कि बेताल बोल उठा–“राजा विक्रम ! बड़ा नुकसान उठाओगे । मेरा कत्ल बहुत महंगा पड़ेगा।"

“तुम भागते क्यों हो?" विक्रम क्रोध से चीखा ।

"यह तो मेरा स्वभाव है।" बेताल बोला ।

विक्रम ने उसे फिर कंधे पर लटका लिया । मजबूती से पकड़कर ले चला । रात का सन्नाटा और गहरा हो गया था । सब ओर से सांय-सांय की ध्वनियां आ रही थीं । विक्रम तेज-तेज चल रहा था । बेताल कंधे पर लटका मुस्करा रहा था ।

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