राजा विक्रम की कथा | राजा विक्रम का कहानी - सज्जनता की मिसाल | Raja Vikramaditya ki kahani hindi mai


राजा विक्रम इस भागदौड़ में काफी परेशान हो गया था । किन्तु वह भी हार मानने वाला नहीं था बल्कि उसने सोच लिया था कि देखता हूं बेताल कब तक बाज नहीं आता ।

उसने योगी को वचन दिया था और अपना वचन उसे हर कीमत पर निभाना था । दुनिया जानती कि राजा विक्रम वचन का बहुत पक्का है ।

जब राजा विक्रम कुछ रास्ता पार कर गया, तो बेताल बोला, “हे राजा विक्रम ! आदमी में ऐसी क्या चीज है, जो उसे दूसरे प्राणियों से अलग बनाती है और वह वीरों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।"

बेताल के इस प्रश्न का राजा विक्रम ने कोई जवाब न दिया वह चुपचाप बेताल को कसकर कंधे पर रखकर चलता ही गया । अपने सवाल का जवाब न पाकर बेताल बोला, "सुनो राजा विक्रम ! एक कहानी सुनाता हूं ।

मगध देश में शूरसेन नाम का एक राजा था । वह अत्यन्त प्रतापी, मेधावी और तेजस्वी था । उसका यश दूर-दूर तक फैला था । लोग दूर-दूर से उसके दर्शनों के लिए आते थे । उसका सामीप्य पाकर ही लोग धन्य हो जाते थे । उसका महल अत्यन्त वैभवशाली था । लोगों का कथन था कि उसके महल की शोभा के आगे राजा इन्द्र का दरबार भी फीका है ।

एक बार राजा शूरसेन शिकार खेलने गया । खेलते-खेलते वह दूर निकल गया । राजा शूरसेन का घोड़ा हवा से बातें करने वाला था । अतएव जब राजा शूरसेन एक सुन्दर हिरण का पीछा कर रहा था, तो उस समय कोई उसका साथ न दे सका । उसके सैनिक पीछे रह गए । अंत में उनका फासला इतना बढ़ गया कि राजा शूरसेन सैनिकों को दिखाई देना भी बंद हो गया ।

लंबी-लंबी छलांगे भरकर वह हिरण घनी कंटीली झाड़ियों में न जाने कहां छिप गया, कुछ पता न चला । राजा ने घोड़ा रोक लिया । देखता क्या है कि वह घोर बियाबान जंगल में है । दूर-दूर तक किसी आदमी का नामोनिशान न था | उसे यह एहसास भी हुआ कि अपने आदमियों से वह काफी दूर निकल आया है । उसका मन विचलित हो गया । महाप्रतापी शूरसेन कुछ पल रुककर विचार करता रहा कि उसे किस दिशा में बढ़ना चाहिए ? कुछ पलों बाद वह अनुमान से ही एक ओर चल पड़ा ।

चलते-चलते दिन ढलने को आ गया पर वह बियाबान जंगल खत्म न हुआ । कहीं भी आदमी क्या...आदमजाद का कोई निशान न दीख पड़ रहा था । अंधेरा बढ़ चला । राजा शूरसेन भूख-प्यास से व्याकुल भी होने लगा । बहुत परेशान हो गया ।

दिल ढलते ही जंगली जानवरों की सरगर्मियां बढ़ गई थीं । शेर दहाड़ रहे थे । चीते घूम रहे थे । हाथी चिंघाड़ रहे थे । बंदर भालू उछल-कूद कर रहे थे । राजा शूरसेन को इन सबसे किसी प्रकार का खतरा न था । उसे अपने बाहुबल पर पूरा विश्वास था । किन्तु भूख-प्यास से कैसे निपटे, यही बात उसकी समझ में नहीं आ रही थी । दूर-दूर तक पानी का पता न था । खाने योग्य जंगली कंदमूल फल भी न दीख रहे थे । रात का अंधेरा गहराने लगा ।

राजा शूरसेन जब थक गया तो उसने अपने घोड़े को पेड़ से बांध उसकी जीन का बिस्तर बना सावधानी के साथ अपनी तलवार पास में रखकर लेट गया । महलों में गद्देदार बिस्तर पर सोने वाला राजा साधारण जमीन पर घोड़े की जीन का बिस्तर बनाकर लेटा था ।

भूख-प्यास के अलावा यह चिंता भी सता रही थी कि वह कहां आ गया है । किस देश में है और यह बियाबान जंगल कहां जाकर खत्म होगा ? वह सो भी तो न सकता था क्योंकि जानवरों का खतरा हर पल था । इस प्रकार उधेड़बुन में पड़े राजा शूरसेन ने आधी रात काट ली ।

आधी रात के बाद बियाबान जंगल का माहौल और भयानक हो गया । एक शेरनी के कारण दो शेरों में भयानक युद्ध होने से सारा बियाबान दहाड़ों से थरथरा गया । सोए पंछी पेड़ों पर से फड़फड़ाकर उड़े और विचलित से एक ओर को भाग गए । जंगल में अफरातफरी मच गई । छोटे-छोटे जानवर भारी संकट आया देख यत्र-तत्र भागने लगे । पेड़ के नीचे तब महाबली शूरसेन उठकर बैठ गया ।

वह तलवार हाथ में ले यह रोमांचकारी मुठभेड़ देखने लगा । दोनों शेर बलशाली थे और जी-जान से एक-दूसरे की हत्या करने का प्रयास कर रहे थे । एक-दूसरे की हत्या करके ही वह उस शेरनी पर अधिकार जमा सकते थे । शेरनी पास खड़ी गुर्रा-गुर्राकर तमाशा देख रही थी ।

अचानक शेरनी वहां से भाग निकली । तब दोनों शेर लड़ना छोड़कर उसके पीछे दौड़ गए । वे तीनों जंगल में गायब हो गए । चारों ओर शांति छा गई ।

अब तो राजा शूरसेन से भूख-प्यास बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं हो रही थी । लेकिन वह कर भी क्या सकता था । आधी रात से ज्यादा का समय बीत गया था । राजा शूरसेन बहुत बेचैन होकर सूर्य के उदय होने की प्रतीक्षा कर रहा था । वह भूख-प्यास से बेहाल था । इतना प्रतापी और यशस्वी राजा भी उस रात जंगल में भूखा-प्यास था ।

एकाएक शूरसेन चौंक पड़ा । उसे अपने आस-पास ही आहट सी महसूस हुई थी । उसने फौरन म्यान से तलवार निकाल ली । तभी एक मनुष्य की कांपती थरथराती आवाज उसके कानों में पड़ी-"कौन हो भाई तुम ?"

इस बियाबान जंगल में रात के सन्नाटे में मनुष्य का स्वर सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हो गया । उसने बहुत नम्रता और मिठास से पूछा -"पहले तुम बताओ, कौन हो तुम ?"

"मैं एक राहगीर हूं...पर तुम तो कोई राजपुरुष मालूम पड़ते हो, यहां कैसे आ गए ?" उसके स्वर में घबराहट और दीनता थी ।

“तुमने कैसे जाना, मैं राजपुरुष हूं।"

‘‘तुम्हारी पोशाक और गले में पड़ी हीरे-मोतियों की माला बता रही है कि आप राजपुरुष हैं।"

‘‘तुमने ठीक पहचाना । मैं मगध नरेश शूरसेन हूं ।" फिर उसने पूरी घटना कह सुनाई कि वह किस प्रकार इस बियाबान जंगल में आ फंसा । वह आदमी राजा शूरसेन के पास आ गया । बोला—"हे राजा तुम चिन्ता मत करो । रास्ता मैं जानता हूं । आपको पहुंचा दूंगा । जो रूखा-सूखा मेरे पास हैं, आप ग्रहण करें।'' कहकर उसने अपनी पोटली से सूखी रोटियां खोलकर राजा के सामने रख दीं । रोटियों पर ही सब्जी रखी थी ।

वह सूखी रोटियां भी इस समय राजा शूरसेन को अमृत के समान लगीं । रोटियां खाकर पानी पीकर राजा शूरसेन को आराम मिला । वह नवयुवक बोला—" हे राजन! आप विश्राम करें। मैं पहरा दूंगा ।

तब राजा शूरसेन निश्चिन्त हो गया । उस युवक ने बतलाया कि उसका नाम गुणाधिप है । मां बाप नहीं रहे । बड़े भाई ने लालन-पालन किया है । भाभी ने आवारा कहकर घर से निकाल दिया है । अब वह नौकरी की तलाश में जा रहा है ।

राजा शूरसेन ने रात में कुछ न कहा । वह थक गया था । अतः रोटियां खाते ही उस पर नशा-सा छा गया और वह आराम से सो गया ।

सुबह होने पर उसने उस युवक को अपने पीछे ही घोड़े पर बैठा लिया और उसके बतलाए मार्ग पर चल पड़ा । तब कहीं दोपहर होने तक वह अपनी राजधानी पहुंचा ।

सैनिक शाम होने पर ही लौट आए । और उन्होंने राजा के जंगल में बिछुड़ जाने की बात भी सभी को बता दी थी । यह जानकर पूरे राज्य में गम की लहर दौड़ गई थी । किन्तु राजा को आया देखकर पूरे राज्य में खुशियां मनाई गईं । राजधानी में हर्षोल्लास छा गया । राजा गुणाधिप को लेकर राजमहल में आया और सम्मानपूर्वक उसे वहां ठहरा दिया ।

सायंकाल राजा शूरसेन ने गुणाधिप को अपने सलाहकार पद पर नियुक्त कर उसके लिए महल, दास-दासियों की व्यवस्था कर दी । उसका वेतन भी काफी भारी रखा गया । गुणाधिप की तकदीर खुल गई ।

हे राजा विक्रम ! इस प्रकार गुणाधिप के दिन बड़े सुखपूर्वक बीतने लगे । बेताल कहता जा रहा था ।

राजा विक्रम चुपचाप सब सुनता चल रहा था । बियाबान जंगल का रास्ता पार हो रहा था । कुछ रुककर बेताल बोला - एक दिन की बात है, गुणाधिप नगर भ्रमण पर निकला । नगर में एक सरोवर था । वह सरोवर के किनारे रुककर उसकी शोभा देखने लगा ।

अचानक उसकी नजर सरोवर में स्नान करती एक अत्यन्त रूपवती युवती पर पड़ी । पहली नजर में ही गुणाधिप उस पर मोहित हो गया । वह सुन्दरी भी गुणाधिप का आकर्षण देखकर उसके पास आ गई । बोली-"क्या मैं तुम्हें पसंद हूं?"

"हां।" गुणाधिप बोला ।

"मुझसे विवाह करोगे ?"

"हां।"

“तब कल इसी समय आना।" वह सुन्दरी बुदबुदाकर बोली । फिर चली गई । सुन्दरी तो चली गई किन्तु गुणाधिप को उसका वियोग सहन न हुआ । उसका मन विचलित हो गया ।

फिर बड़े ही दुखी मन से वह वापस चल दिया । विचार करने लगा, इस संबंध में क्या करे । उसने अंत में सब कुछ राजा से बतला देने का निर्णय किया । वह सीधे राजमहल में आया । उसने राजा से सारा हाल बतलाया ।

राजा शूरसेन उसकी सारी बातें सुनकर बोला-"कल मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।"

गुणाधिप निश्चिन्त हो गया । फिर भी वह उस सुन्दरी को भुला न पाया । उसकी ही चाह में उसका सारा समय बीत गया । वह रात को सो न सका ।

अगले दिन गुणाधिप राजा शूरसेन के साथ उसी सरोवर तट पर आया । सुन्दरी उसी प्रकार स्नान कर रही थी । गुणाधिप को देखकर वह पास आ गई । उसने गुणाधिप के साथ राजा शूरसेन को देखा तो पूछा- "यह कौन है ?"

गुणाधिप ने राजा शूरसेन का परिचय दे दिया ।

वह सुन्दरी तत्काल बोल उठी-"मैं तो राजा शूरसेन से विवाह करूंगी।"

राजा शूरसेन चौंक पड़ा ।

गुणाधिप को भी बहुत आश्चर्य लगा । वह सुन्दरी राजा शूरसेन से अपना प्रेम निवेदन करने लगी ।

गुणाधिप की ओर शूरसेन देखने लगे । कुछ देर के बाद गुणाधिप बोला—“महाराज आप ही इससे विवाह कर लें।"

अपनी बात कहकर गुणाधिप उनसे दूर हो गया ।

राजा शूरसेन होंठ काटने लगे । गुणाधिप भी अपनी ओर से निवेदन करने लगा । उससे विवाह कर लें । इतनी सुन्दर युवती शूरसेन के ही योग्य है ।

राजा शूरसेन कुछ देर बाद बोला-"नहीं गुणाधिप! इसके साथ तुम्हारा ही विवाह होगा।"

वह सुन्दरी इन्कार करने लगी ।

“कल तो तुम सहमत थीं।"

"हां।"

'अब अपना विचार क्यों बदल दिया ?" शूरसेन ने पूछा ।

"मैं महल में रहना चाहती हूं।"

"तुम्हें महल ही मिलेगा।" शूरसेन ने कहा- "गुणाधिप को मैंने एक महल दिया है।"

वह मान गई । इस प्रकार हे राजा विक्रम ! गुणाधिप और उस सुन्दरी का विवाह हो गया । गुणाधिप प्रसन्नतापूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगा ।

विक्रम बेताल के सवाल जवाब

बेताल के सवाल :

अब बोलो ! इसमें किसकी सज्जनता ज्यादा है ? गुणाधिप की या राजा की ? गुणाधिप ने राजा का विवाह उस युवती से करने की इच्छा खुशी-खुशी प्रकट की ? या फिर राजा की जो स्वयं उस सुन्दरी पर मोहित था, किन्तु फिर भी उसने उसे नहीं अपनाया ? बताओ विक्रम ! तुम एक न्यायप्रिय राजा हो इसका न्याय करो।"

विक्रम बेताल का सवाल सुनकर चुप ही रह गया ।

“बोलो ना राजा विक्रम! बड़े न्याय करने वाले हो ।"

राजा विक्रमादित्य के जवाब :

तब राजा विक्रम ने कहा-“तुमने एक सवाल पूछा था कि आदमियों में ऐसी क्या चीज है, जो उसको और प्राणियों से अलग कर श्रेष्ठ बनाती है।"

"पूछा था, राजा विक्रम।"

“यह उसी सवाल का जवाब है।" विक्रम ने कहा -"जो शेर एक शेरनी के लिए जंगल में खूनखराबा कर रहे थे ?"

"हां, मैंने बताया है।" बेताल बोला।

“बस। यहीं पर आदमी जानवरों व अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है।" विक्रम ने कहा- "इसका कारण है उसकी सज्जनता । आदमी की सज्जनता ही उसे श्रेष्ठ बनाए हुए है।"

बेताल बोला—"तुम ठीक कहते हो राजा विक्रम ।"

और वह अपलक अट्टहास करता राजा विक्रम के कंधे पर से उतर कर भाग गया । राजा विक्रम चौंक पड़ा । हालांकि उसने उसे मजबूती से पकड़ा हुआ था, मगर फिर भी वह भाग लिया ।

“फिर भागा।"

और वह बेताल के पीछे दौड़ा । अभी वह ठीक से भाग भी न पाया था कि राजा विक्रम ने उसे पकड़कर दबोच लिया और अपने कंधे पर रखकर चल पड़ा । वह शीघ्र श्मशान पहुंच जाना चाहता था ।

बेताल बोला—"बड़ी जल्दी कर रहे हो, राजा विक्रम!"

"तुम बहुत परेशान कर रहे हो बेताल।"

"तुम व्यर्थ ही चिंतित हो रहे हो विक्रम ! मैं तुम्हें इसीलिए तो यह कहानियां सुना रहा हूं कि तुम्हें थकावट न महसूस हो और मजे-मजे में रास्ता भी कट जाए । आखिर तुम मेरा विश्वास क्यों नहीं करते | विश्वास करो राजा विक्रम, तुम समय पर उस साधु के पास पहुंच जाओगे, वह घड़ी तो आने दो।"

"रात्रि के दो पहर बीत गए हैं । तीसरे पहर की समाप्ति से पहले पहुंचना है।"

"पहुंच जाओगे।"

"रास्ता लम्बा है।"

"कहानी सुनो।" बेताल बोला-"रास्ता कट जाएगा।"

विक्रम कुछ न बोला।

बेताल बोला, "सुनो राजा विक्रम !

अवंतीपुर में एक तपस्वी मुनि थे। शंखधर नाम था उनका । अपने आश्रम में एक परम सुन्दरी को देखकर वह उस पर मुग्ध हो गए । उनका मन डोल गया । युवती साक्षात अप्सरा थी । वह मुनि को देखकर मुस्करा पड़ी । उसने कटाक्ष भी किया । मुनि डोल गए पर यकायक उनको अपनी तपस्या का ध्यान आया । वह क्रोध में भर गए । तब उन्होंने अपनी तपस्या को भंग कर देने वाली उस अप्सरा को शाप दिया ।

"तू बुढ़िया हो जा।"

वह अप्सरा वृद्धा हो गई । अपनी हालत पर वह विलाप करते हुए बोली-"मुनिवर! आपने यह कैसा शाप दिया है। मेरा क्या अपराध है ?"

“तू मेरी तपस्या भंग करने आई थी।"

“तू मेरी तपस्या भंग करने आई थी।"

“तो अपने चित्त पर आपको नियंत्रण रखना था।"

किन्तु मुनि ने उसकी बात का कोई उत्तर न दिया और चुपचाप अपनी राह चले गए ।

विक्रम बेताल के सवाल जवाब

बेताल के सवाल :

अब बोलो राजा विक्रम क्या मुनि का यह शाप देना न्यायोचित था ? क्या मुनि का यह शाप तपस्वी का पाप नहीं है?''

राजा विक्रमादित्य के जवाब :

राजा विक्रम मौन रह गया, बेताल ने फिर पूछा, तो राजा विक्रम ने जवाब दिया–“सुनो बेताल।

मुनि का यह कदम उचित था। तपस्वी को अगर वह कटाक्ष न करती तो ठीक था । उसे कटाक्ष का अधिकार न था । रूप-यौवन मात्र पर मुनि फिसलता तो अपराध मुनि का था, पर उस सुन्दरी ने कटाक्ष क्यों किया ? इसका ही फल उसको मिला।"

"तुम ठीक कहते हो राजा विक्रम।" बेताल बोला, पर इस बार वह भागा नहीं कंधे पर लटका रहा ।

उसके इस सज्जनतापूर्ण व्यवहार पर राजा विक्रम चकित था । वह तेज-तेज कदमों से बढ़ चला । बेताल कंधे पर लटका था । सारा वातावरण बराबर भयानक ही बना था ।


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