स्तंभन मंत्र | बुद्धि स्तंभन मंत्र | मुख स्तंभन मंत्र | आसन स्तंभन मंत्र | Stambhan Mantra in Hindi | Budhi Stambhan Mantra | Mukh Stambhan Mantra


बुद्धि स्तंभन मंत्र | Budhi Stambhan Mantra


ओम् नमो भगवते शत्रूणां बुद्धिं स्तम्भय स्तम्भय स्वाहा।

उपरोक्त मन्त्र को उत्तम काल में एक लाख बार जाप कर सिद्ध कर लेवे और जब प्रयोग करना हो तो निम्न प्रकार से प्रयोग में लावे –

विशेष - मन्त्र में प्रयुक्त शत्रूणां शब्द के स्थान पर अभिलषित शत्रु के नाम का उच्चारण करना चाहिये और आवश्यकता के समय निम्न प्रकार से प्रयोग में लावे –

(१) उल्लू नामक पक्षी के विष्ठा को छाया में सुखाकर एक रत्ती १०८ बार उक्त मन्त्र से अभिमंत्रित कर पान में जिसे खिला दे, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है ।

(२) जमीकन्द, सहदेई, ओंगा, सफेद सरसों, वच, इन समस्त वस्तुओं को लोहे के पात्र में चूर्ण कर तिलक लगाकर शत्रु के सामने जाने से उसकी बुद्धि तत्काल नष्ट हो जाती है ।




ओम् नमो भगवते मम शत्रुबुद्धिं विनष्टाय आगच्छ स्वाहा ।

इस मन्त्र को पहले एक हजार बार जप करके सिद्धि कर लेवे । तत्पश्चात् जब प्रयोग करना हो तो निम्न प्रकार से करें । हरताल और हल्दी को जल के संयोग से पीस भोजपत्र पर अनार की कलम से उपरोक्त मन्त्र लिख ताबीज बना हरे वस्त्र में लपेट शत्रु के द्वार पर गाड़ देने से उसकी बुद्धि निष्क्रिय हो जाती है ।


मुख स्तंभन मंत्र | Mukh Stambhan Mantra


ओम् ह्रीं रक्षके चामुण्डे कुरु कुरु अमुक मुख स्तम्भय स्वाहा ।

(१) इस मन्त्र को किसी सरिता के निर्जन तट पर एक लाख बार जाप कर सिद्ध कर लेवें और जब प्रयोग करना हो तो पलाश की जड़ लाकर १०८ बार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर तालू में रख शत्रु के सामने जाने से उसकी बोलने की शक्ति नष्ट हो जाती है ।

(२) अर्जुन की छाल तथा जड़ को २१ बार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर मुख में रख जिसके सम्मुख जाय उसकी वाक्-शक्ति नष्ट हो जाती है ।


पति स्तंभन मंत्र


ओम् नमो भगवते वासुदेवाय मम पुरुषस्य स्तम्भय कुरु कुरु स्वाहा |

उपरोक्त मन्त्र को किसी निर्जन स्थान में दस हजार बार जप कर सिद्ध कर लेना चाहिये और जब प्रयोग करना हो तो शनिवार को गोरोचन, केशर, महावर की स्याही बना भोजपत्र पर उक्त मन्त्र लिख ताबीज गले में धारण करने से पति स्तम्भन होता है ।


सिंह स्तंभन मंत्र


'क्रीं ह्रीं ओम् ह्रीं ह्रीं ।

उपरोक्त मन्त्र को किसी निर्जन स्थान में दस हजार बार जाप करके सिद्धि करने के पश्चात् जब प्रयोग करना होवे तो लोहे का एक टुकड़ा लेकर उसे १०८ बार मन्त्र से अभिमंत्रित करके सिंह के सामने फेंक देने से उसकी शक्ति स्तम्भित हो जाती है ।




ओम् वं वं वं हं हं हं ध्रां ठः ठः ।

इस मन्त्र को किसी सरिता के तट पर दस हजार बार जाप कर सिद्धि कर लेनी चाहिये और जब प्रयोग की आवश्यकता हो तो रविवार या मंगलवार को निगोही के बीज लाकर इक्कीस बार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर सिंह के सामने फेंक देने से उसकी आक्रामक शक्ति एवं गर्जन शक्ति स्तम्भित हो जाती है और वह निष्क्रिय हो जाता है ।




ओम् ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं स्वाहा ।

इस मन्त्र को किसी उत्तम एकान्त स्थान में पूर्ण मनोयोग पूर्वक दस हजार बार जाप करके सिद्धि कर लेने के पश्चात् जब प्रयोग करना हो तो बाण या कोई अन्य शस्त्र अथवा लोहे का कोई टुकड़ा १०८ बार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर सिंह के सम्मुख फेंक देंवे तो उसका स्वर एवं आक्रामक शक्ति स्तम्भित होती है ।


आसन स्तंभन मंत्र


ओम् नमो दिगम्बराय अमुकासन स्तम्भन कुरु कुरु स्वाहा ।

इस मन्त्र को प्रथम किसी सरिता या सरोवर के तट पर एकान्त में दस हजार बार जाप करके सिद्धि कर लेनी चाहिये और आवश्यकता के समय निम्न प्रकार से प्रयोग में लाना चाहिये -

(१) मरघट की अग्नि लाकर नमक की आहुति देते हुये उपरोक्त मन्त्र से १०८ आहुति दे, हवन करें और अमुक के स्थान पर अभिलषित व्यक्ति का नाम उच्चारण करें तो वह व्यक्ति स्तम्भित होता है ।

(२) कोई सरिता जिस स्थान पर समुद्र में गिरती हो उस संगम स्थल की मिट्टी लाकर उसमें कुत्ते की पूँछ के बाल मिला करके गोली बनावें और १०८ बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर अंकोल के तेल में डाल करके जिसका स्तम्भन करना हो उसे दिखाने से वह व्यक्ति उक्त स्थान को त्याग अन्यत्र तब तक नहीं जा सकता जब तक गोली अंकोल के तेल से न निकाली जावे ।

(३) मरघट से किसी मृतक व्यक्ति की खोपड़ी लाकर उसमें सफेद घुंघुची के बीज बो देवे और नित्य प्रति उसको दूध से सींचता रहे और वृक्ष उत्पन्न होने पर उसकी डाली, जड़ तथा लता को १०८ बार मन्त्र से अभिमंत्रित करके जिस व्यक्ति के सन्मुख डाल दिया जायेगा वह अपने स्थान को त्याग कहीं न जायेगा । यह अद्भुत स्तम्भन मन्त्र कभी निष्फल नहीं होता ।

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