Vikram Betal की कहानी Bhag 6 - असली पति कौन | सम्पूर्ण बैताल पचीसी हिंदी में


विक्रम उस स्थान पर पहुंचा जहां बेताल मुर्दा स्थिति में उल्टा लटका था ।

"तुम क्या समझते हो, मैं तुम्हारा पीछा छोड़ दूंगा – बेताल ! मेरा नाम विक्रम है और एक बार बात मैं सोच लेता हूं, उसे पूरा करके ही दम लेता हूं।" कहते हुए उसने उसे एक बार फिर अपने कंधे पर लाद लिया ।

"मैं तुम्हारे साथ चलने से कब इन्कार करता हूं । मगर तुम ही बोले बिना नहीं मानते और विवश होकर मुझे लौट आना पड़ता है।" बेताल ने कहा ।

विक्रम उसे मजबूती से पकड़े अपनी राह पर चलने लगा । इस बार उसने सोच लिया था कि एक पल के लिए भी अपनी पकड़ ढीली नहीं पड़ने देगा ।

बेताल उसे बातों में उलझाने की पूरी चेष्टा कर रहा था । वह चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था । वह जानता था कि यह बेताल बहुत चालाक है और इसे तांत्रिक के पास ले जाना कोई सरल कार्य नहीं है ।

"सुनो विक्रम ! इस प्रकार तो यह सफर बड़ा ही उबाऊ और थकावट वाला हो जाएगा, इसलिए इससे बचने के लिए मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं । सुनो –

उज्जयनी नगरी में एक सेठ रहता था, उसका एक ही पुत्र था जिसका नाम गंधर्वसेन था । गंधर्वसेन बेहद खूबसूरत और बुद्धिमान था । उसका रहन-सहन बिल्कुल राजकुमारों जैसा था । उसका नित्य का नियम था कि वह घोड़े पर सवार होकर नगर की सैर करता था । नगर की बहुत सी सुन्दरियां गंधर्वसेन पर मुग्ध थीं, मगर उनमें से कोई भी गंधर्वसेन को पसंद नहीं थी ।

एक बार की बात है कि गंधर्वसेन नदी किनारे चला गया, जहां घाट पर बहुत से धोबी कपड़े धो रहे थे । घाट पर एक कतार में बड़े-बड़े पत्थर रखे थे जिन पर धोबी कपड़े पटक-पटककर साफ कर रहे थे । वे मुख से तरह-तरह की आवाजें निकालकर एक दूसरे का हौसला बढ़ा रहे थे ।

तभी गंधर्वसेन की नजर एक युवती पर पड़ी जो बड़ी खामोशी से कपड़े धो रही थी । अपने काम में वह इस कदर खोई हुई थी कि आसपास की उसे कोई खबर ही न थी । उसका सांचे में ढला शरीर और रंग-रूप देखकर उसके राजकुमारी होने का भ्रम पैदा होता था । गंधर्वसेन मुग्ध होकर एकटक उसे देखे जा रहा था । फिर एकाएक ही उसने गहरी और ठंडी सांस ली, फिर वहीं बने एक मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गया ।

वह मंदिर देवी का था । सूर्यास्त होने तक गंधर्वसेन वहीं बैठा उस लड़की को देखता रहा । वह लड़की अपने परिवार के पुरुषों के साथ गधों पर सारा सामान रखकर अपने घर की ओर चल दी । गन्धर्वसेन देखता रहा ।

जैसे-जैसे वह लड़की अपने काफिले के साथ दूर होती जा रही थी, वैसे-वैसे गंधर्वसेन की उदासी बढ़ती जा रही थी । अन्त में वह लड़की उसकी आंखों से बिल्कुल ही ओझल हो गई । तब गंधर्वसेन ने एक ठंडी सांस लेकर अपने आस-पास देखा, अब वहां कोई नहीं था । कुछ दूरी पर एक वृक्ष के तने से उसका घोड़ा बंधा था । अचानक गंधर्वसेन के मन में न जाने क्या आया कि वह उठकर मंदिर के भीतर चला गया और वहां स्थापित देवी की प्रतिमा के समक्ष जाकर बोला – “मां ! यदि एक माह के भीतर मेरा विवाह इस लड़की से हो गया तो मैं अपना सिर काटकर आपके चरणों में अर्पित कर दूंगा।"

इस प्रकार की प्रतिज्ञा करके वह बड़े ही उदास मन से बाहर आया और अपने घोड़े पर सवार होकर घर की ओर चल दिया । उसकी मनोस्थिति बड़ी ही विचित्र थी ।

एक पल के लिए भी वह उस लड़की को नहीं भुला पा रहा था । उसकी भोली-भाली और मासूम सूरत बार-बार उसकी आंखों के सामने थिरक उठती थी । उदास सा वह अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर लेट गया । उस दिन से ही उसका खाना-पीना भी छूट गया ।

उसकी ऐसी हालत देखकर सारे परिवार में हलचल सी मच गई । उसके माता-पिता ने उससे बहुत पूछा कि क्या कारण है, वह ऐसा क्यों हो रहा है? किसी ने कुछ कह दिया है? किसी से कोई विवाद हो गया है ? मगर गंधर्वसेन ने किसी को कुछ नहीं बताया ।

वैद्य बुलाए गए, मगर उसका भी कोई लाभ नहीं हुआ । उसके माता-पिता चिंतित हो उठे । कोई लाभ न होते देखकर उसके पिता ने उसके घनिष्ठ मित्र देवदत्त को बुला भेजा । उनका खयाल था कि शायद देवदत्त को ही यह अपने मन की बात बता दे ।

सूचना मिलते ही देवदत्त दौड़ा चला आया और अपने मित्र की हालत देखकर बहुत दुखी हुआ । जब उन्हें एकान्त मिला तो देवदत्त ने उससे पूछताछ की । गंधर्वसेन ने उसे अपने मन की सारी बात बता दी ।

अपने मित्र को दिलासा देकर देवदत्त दूसरे दिन ही नदी किनारे जाकर उस लड़की के पिता से मिला । लड़की का नाम रूपमती था । रूपमती के पिता ने जब देवदत्त की बात सुनी तो बड़ा ही प्रसन्न हुआ । आखिर इतने बड़े घर का रिश्ता वह ठुकरा भी कैसे सकता था ?

रूपमती को जब सारी बात पता चली तो वह भी बहुत खुश हुई । सच तो यह था कि वह भी मन ही मन गंधर्वसेन को चाहती थी, मगर अपनी हैसियत देखकर उसकी कभी इस बात की जुबान पर लाने की भी हिम्मत नहीं हुई थी ।

फिर-देवदत्त के प्रयास से दोनों की शादी हो गई । गंधर्वसेन राग-रंग में डूब गया । वह तो रूपमती को एक पल के लिए भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देता था । इसी प्रकार एक महीना कब गुजर गया, इसका पता ही न चला ।

अचानक एक दिन गंधर्वसेन को अपनी प्रतिज्ञा याद आई और वह अपनी पत्नी तथा मित्र के साथ मंदिर की ओर चल दिया । अपनी प्रतिज्ञा के विषय में उसने अपने मित्र या पत्नी को कुछ भी नहीं बताया । गंधर्वसेन ने रूपमती और देवदत्त को मंदिर के बाहर ठहरने को कहा और मंदिर में जाकर अपनी तलवार से अपना सिर काटकर मां के चरणों में समर्पित कर दिया ।

देवदत्त और रूपमती बाहर खड़े उसकी प्रतीक्षा करते रहे । जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा था, वैसे-वैसे रूपमती और देवदत्त का आश्चर्य बढ़ता जा रहा था कि आखिर गंधर्वसेन मंदिर के अन्दर क्या करने गया है और इतनी देर उसे क्यों लग रही है ?

“आप यहीं रुकिए” जब काफी समय हो गया और गंधर्वसेन बाहर नहीं आया तो देवदत्त बोला- भाभी, मैं भीतर जाकर देखता हूं कि आखिर गंधर्वसेन भीतर क्या कर रहा है ।"

और जैसे ही देवदत्त भीतर गया, वैसे ही स्तब्ध रह गया । सामने ही उसके प्रिय मित्र की सिर कटी लाश पड़ी थी । यह सब क्या है ? कैसे हुआ ? क्यों हुआ ?

एकाएक उसके मन में आया कि कहीं ऐसा न हो कि उस हत्या का आरोप उसके सिर लग जाए । कहीं लोग ऐसा न सोच लें कि रूपमती को पाने की मंशा से मैंने अपने मित्र की हत्या कर दी ।

इस भय से उसने भी अपना सिर काटकर देवी के चरणों में अर्पित कर दिया ।

राजा विक्रम ! गंधर्वसेन के बलिदान और भक्ति के कारण देवी का सिंहासन डोल गया और वह साक्षात प्रकट हो गई ।

देवी ने उन दोनों के सिर जोड़कर उन्हें जीवित कर दिया । किन्तु इस कार्य में एक गड़बड़ हो गई । जल्दबाजी के कारण देवदत्त का सिर गंधर्वसेन के धड़ पर और गंधर्वसेन का सिर देवदत्त के धड़ पर रखा गया ।

दोनों जीवित हो गए ।

विक्रम बेताल के सवाल जवाब

बेताल के सवाल :

अब तुम ये बताओ राजा विक्रम कि रूपमती किसे अपना पति माने ? अगर वह गंधर्वसेन को अपना पति मानती है तो क्या उसे पाप नहीं लगेगा ?"

विक्रम खामोश था । उसे मालूम था कि यदि वह बोलेगा तो बेताल उड़ जाएगा । किन्तु वह यह भी जानता था कि उसे बोलना ही पड़ेगा । जहां न्याय की बात आएगी, वहां विक्रम खामोश रह ही नहीं सकता । उसने बेताल को कसकर पकड़ लिया ।

मगर बेताल भी बेताल ही था-वह भला कहां चुप रहने वाला था । वह लगातार बोल रहा था—“बोलो राजा विक्रम ! तुम तो बड़े न्यायप्रिय हो । इस संदर्भ में तुम क्या कहते हो । क्या यहां आकर तुम न्याय करने में असमर्थ हो ?"

राजा विक्रमादित्य के जवाब :

'नहीं।" विक्रम को बोलना ही पड़ा-“मैं असमर्थ नहीं हूं बेताल। असमर्थ नहीं हूं मैं-सुनो, रूपमती उसी शरीर को अपना पति माने, जिस पर गंधर्वसेन का चेहरा लगा है।"

'क्या यह पाप नहीं होगा ?"

"नहीं।"

"कैसे?"

"क्योंकि चेहरा ही मनुष्य का परिचय देता है । चेहरे से ही मनुष्य की भावनाओं को जाना जाता है । इसलिए गन्धर्वसेन का चेहरा महत्वपूर्ण है । शरीर तो मस्तिष्क का गुलाम है । मस्तिष्क जैसा कहेगा, शरीर वैसा ही करेगा । इस कारण रूपमती गंधर्वसेन का ही प्यार पाएगी ।"

बेताल की आंखों में राजा विक्रम के लिए प्रशंसा के भाव दिखाई देने लगे ।

वह बोला—“तुम्हारा न्याय प्रशंसनीय है राजा विक्रम । चेहरा ही मनुष्य की पहचान कराता है ।

लेकिन...।" कहकर उसने एक भयानक हँसी ली । विक्रम समझ गया कि अब ये भागने वाला है । उसने उसे कसकर पकड़ लिया मगर बेताल तो बेताल ही था । वह एक झटके से ऊपर उठा और हवा में तैरता हुआ विपरीत दिशा की ओर उड़ने लगा ।

विक्रम उसके पीछे दौड़ा । परन्तु बेताल उड़ता गया अपनी मंजिल की ओर । और फिर-कुछ देर बाद ही वह उसी पेड़ पर उलटा लटका हुआ था ।


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