प्राणशक्ति क्या है | पराशक्ति का अर्थ | pran shakti yoga | pran shakti kya hai | pran shakti kya hoti hai


'समष्टि-सृष्टि की महाकुण्डलिनी' के विषय में थोड़ा बताना चाहता हूँ जैसा धर्मग्रन्थों में वर्णित है ।

महाकुण्डलिनी वेदवर्णित जगद्व्यापिनी आद्याशक्ति ही ब्रह्मशक्ति है । अनन्तकोटि ब्रह्माण्डमय दृश्य प्रपंच उसी ब्रह्मशक्ति का विलास है । अग्नि की प्रकाशशक्ति जैसे अग्नि से पृथक् नहीं है, उसी प्रकार वह ब्रह्म-शक्ति भी ब्रह्म से पृथक् नहीं है । ब्रह्म में सदा लीन रहने वाली इस शक्ति का नाम ‘पराशक्ति' है । जब यह शक्ति 'एकोऽहं बहुस्याम्'-मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ- इस प्रकार इच्छा सम्पन्न होती है, तब यह ब्रह्म-आलिंगित महाशक्ति ही 'कारण' या 'माया-शक्ति' कहलाती है । क्रम से वही शक्ति, ब्राह्मी, वैष्णवी तथा रुद्रशक्तिरूप से जगत की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करती है। पश्चात् वह महाशक्ति और भी स्थूल रूप धारण करती हुई स्थूल जगत में अनन्त भाव तथा अनन्त रूप में अपनी लीला प्रकट करती रहती है । परन्तु तरंग के पीछे समुद्र के सदृश इन सब अनन्त विचित्र छोटी-बड़ी शक्तियों के पीछे वही एक अपार ब्रह्म-शक्ति या माया-शक्ति ही आधार रूप में स्थित रहती है । यही शक्ति व्यष्टि रूप से मनुष्य में 'जीवनी-शक्ति' है ।

'प्राणशक्ति' को ही जीवनी-शक्ति कहते हैं । शास्त्रों में इन प्राणशक्तियों के केन्द्रीभूत शक्ति को कुण्डलिनी-शक्ति कहा गया है । शरीरस्थ समस्त गति और क्रियाशक्ति के आधार भी कुण्डलिनी शक्ति है । समस्त शक्ति एक स्थल में कुण्डली बनाकर (सर्पवत एकत्रित होकर) रहती है, इसलिए इसका नाम कुण्डलिनी शक्ति है । यह शक्ति मातृ-गर्भस्थ-सन्तान में जाग्रत रहने पर भी सन्तान के भूमिष्ठ होते ही निद्रित-सी हो जाती है । मुमुक्षु साधक आत्मकल्याण के निमित्त इस कुण्डलिनी-शक्ति को सुषुम्णा नाड़ी के द्वारा ऊर्ध्व गतिवाली कर क्रम से षट्चक्र-भेदन कर सहस्रार में ले जाने के लिए प्रयत्नशील होता है । जब वह इस प्रकार करने में समर्थ होता है, तब उसका दिव्य नेत्र खुल जाता है और दिव्य ज्ञानशक्ति के बल से वह अपने स्वरूप को (आत्मा) देखकर कृतकृत्य हो जाता है, जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो जाता है ।

सुषुम्णा नाड़ी के नीचे के भाग में चतुर्दल त्रिकोणाकार एक कमल है । इस कमल पर कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार में कुण्डलिनी बनाकर स्थित है । यह भयरहित तथा सुवर्ण के तुल्य दीप्तीमती है और सत्त्व, रज तथा तमोगुणों की प्रसूति है । यह अग्निचक्र में साढ़े तीन लपेट लिये अपनी पूँछ, मुख में लिये सुषुम्णा नाड़ी के छिद्र को अवरोध करती हुई सर्प के समान अवस्थान करती है ।

'हठयोग प्रदीपिका' में कहा गया है कि जो कुण्डलिनी-शक्ति को जगाने की युक्ति जानता है, वही योग को यथार्थ जानता है । यही समाधि का तात्पर्य है । अतः जो पुरुष प्राण को दशम द्वार (सहस्रार) में ले जाना चाहता है, उसको उचित है कि एकाग्रचित्त होकर युक्तिपूर्वक उस शक्ति को जाग्रत करे ।

जिस प्रकार की कुण्डलिनी मनुष्य के शरीर में होती है वैसे ही महाकुण्डलिनी ब्रह्माण्ड में आदिकाल से व्याप्त है । इस समष्टि-सृष्टि की कुण्डलिनी को ही 'महाकुण्डलिनी' कहते हैं । सम्पूर्ण जगत को जो चलाती है वह 'अव्यक्त कुण्डलिनी' है और व्यष्टि रूप से जीव को चलानेवाली 'व्यक्त कुण्डलिनी' है । जो ब्रह्माण्ड में है, वही पिण्ड में है। 'कुण्डले' अर्थात् दो कुण्डल–इड़ा और पिंगला। बाईं ओर बहनेवाली नाड़ी है इड़ा और दाईं ओर बहनेवाली पिंगला है । इन दो नाड़ियों के बीच में जिसका प्रवाह है, वह है सुषुम्णा नाड़ी। कुण्डलिनी-शक्ति के व्यक्त होने के साथ वेग उत्पन्न होता है। उससे जो पहला स्फोट होता है उसको 'नाद' कहते हैं। नाद से प्रकाश होता है और प्रकाश का व्यक्त रूप महाबिन्दु है ।

नाद के तीन भेद हैं—महानाद, नादान्त और निरोधिनी । बिन्दु के भी तीन भेद हैं- इच्छा, ज्ञान और क्रिया, सूर्य, चन्द्र और अग्नि, ब्रह्मा, विष्णु और महेश । जीव-सृष्टि में उत्पन्न होनेवाला जो नाद है, वही ॐकार है। उसी को ‘शब्द-ब्रह्म' कहते हैं। इस प्रकार सृष्टि की रचना के आरम्भ में पहले ॐकार का नाद हुआ उसी को 'शब्द-ब्रह्म' कहते हैं ।

ॐ कार से बावन मातृकाएँ उत्पन्न हुईं जो हिन्दी की वर्णमाला अ से लेकर क्ष, त्र, ज्ञ, तक हैं । इनमें पचास अक्षरमय हैं, इक्यावनवीं प्रकाश रूप है और बावनवीं प्रकाश का प्रवाह है। उपर्युक्त पचास मातृकाएँ लोम-विलोम रूप से सौ होती हैं। ये ही सौ कुण्डल हैं। इन कुण्डलों को धारण किए हुई मातृकामयी कुण्डलिनी है। इस कुण्डलिनी शक्ति से चेतन्यमयजीव, देह, इन्द्रियाँ आदि से युक्त जीव रूप धारण करते हुए प्राणशक्ति को संग लिये स्थूल शरीर अर्थात् अन्नमय कोष का स्वामी होता है । इस जीव को जीवत्व की चेतना सहस्रारचक्र से अनाहत अर्थात् हृदय-चक्र में आने पर होती है। सहस्रार चक्र में अव्यक्त नाद है, वही आज्ञाचक्र में आकर ॐकाररूप से व्यक्त होता है। इस ॐकार से उत्पन्न होनेवाली पचास मातृकाओं की अव्यक्त स्थिति का स्थान सहस्रार चक्र है। इस स्थान को ‘अकुल स्थान' कहते हैं। यही शिव-शक्ति का स्थान है। श्री शिवशक्ति अर्द्धनारीनटेश्वर है, शक्ति व्यक्त और शिव अव्यक्त हैं ।

आज्ञा चक्र में ॐकार बीज से पहले स्वरोत्पत्ति, बाद में व्यंजनोत्पत्ति हुई । यही वर्णमाला नीचे अवतरित होने पर विशुद्धि चक्र, अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान और मूलाधार चक्रों के दलों पर विराजमान हो गई ।

हमारी ग्रहमाला (सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, मंगल, बुध, शनि, शुक्र इत्यादि) जिस विशिष्ट गति से अपने चारों ओर एवं सूर्य के चारों ओर घूमती है, उस गति से उत्पन्न होनेवाली सूक्ष्म ध्वनियाँ भी उस पुरुष को अनुभूत होती हैं, जिसकी दिव्य श्रवण-शक्ति जाग उठी है ।

इड़ा नाड़ी - जो मेरुदण्ड के बाईं ओर होती है, ब्रह्मरन्ध्र से आगे नासारन्ध्र में आने पर वह दाहिने नासारन्ध्र में सूर्य नाड़ी के रूप में चलती है। उसी प्रकार पिंगला, जो मेरुदण्ड के दाहिनी ओर होती है, नासारन्ध्र में आने पर बाईं ओर के नासारन्ध्र में चली जाती है और चन्द्र नाड़ी के रूप में चलती है ।

कुण्डलिनी का उत्थापन होने से षट्चक्र अपने-अपने वर्णों के साथ प्रकाशित हुए देख पड़ते हैं । ये षट्चक्र मेरुदण्डगत सुषुम्णा नाड़ी के भीतर वज्रा नाड़ी और ब्रह्मनाड़ी से संलग्न हैं ।

सहस्रार चक्र ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर चार अङ्गुल फैला हुआ है । दिव्य दृष्टि जिनकी हो चुकी है, वे ही इन चक्रों के नाना प्रकाशरूपी मातृकाओं को अनुभव करते हैं ।

कुण्डलिनी सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश कर, सहस्रार चक्र में पहुँचकर वहाँ जब शान्त होती है, तब उस अवस्था को 'समाधि' कहते हैं । योगी जब इस समाधि की स्थिति में होते हैं तब उनके शरीर विकाररहित होते हैं । उनके नाखून, केश आदि नहीं बढ़ते ।

आज्ञा चक्र तृतीय नेत्र का आधारभूत चक्र है । भगवान शिव का तीसरा नेत्र इसी स्थान में है ।

अनाहत-चक्र के समीप आठ दलों का निम्न मन-चक्र है । यह विषयों को अनुभव करनेवाला मन है । सहस्रार के नीचे षोडशदल सोमचक्र है । उसके नीचे द्वादशदल मनश्चक। उसी में विचार उत्पन्न होने का स्थान है। वह मूर्धास्थान के ऊपर है। इस प्रकार मन के दो भेद हैं-एक विचार करनेवाला मन, दूसरा विषयों को अनुभव करनेवाला मन।

कुण्डलिनी विश्व विद्युत की सजातीय अत्यन्त प्रचण्ड शक्ति है । कुण्डलिनी सर्पाकार या वलयान्विता शक्ति कही जाती है, क्योंकि इसकी गति वलयाकार सर्प की सी है। योगाभ्यासी यति के शरीर में यह चक्राकार चलती है और शक्ति बढ़ाती है। यह वैद्युत अग्निमय गुप्त शक्ति है । यह प्राक्तन शक्ति है जो सेन्द्रिय और निरीन्द्रिय सृष्ट पदार्थमात्र के मूल में है।

कुण्डलिनी की गति प्रकाश की गति की तुलना में अधिक तेज है। प्रकाश 185000 मील प्रतिसेकेण्ड की गति से चलता है और कुण्डलिनी 345000 मील प्रतिसेकेण्ड की चाल से।

मूलाधार के नीचे अग्निचक्र के अन्तस्थल में सर्पाकार अग्नि (कुण्डलिनी) रहती है और वहाँ यह युगानुयुग सोई रहती है, जब तक इसके जागने का कोई समय नहीं उपस्थित होता । सहस्रार जब पूर्ण रूप से जाग उठता है तब देहाभिमानी आत्मा में, जब चाहे देह से अपने आपको खींच लेने और जब चाहे देह में लौट आने की शक्ति आ जाती है। यह सब करते हुए चित्त में चैतन्य बना रहता है। इस स्वच्छन्द विहार को उपनिषदों में 'कामाचार' कहा गया है।

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