विलियम हार्वे का जीवन परिचय | विलियम हार्वे कौन थे | विलियम हार्वे की खोज की | विलियम हार्वे आविष्कार | william harvey in hindi | william harvey biography in hindi



विलियम हार्वे का जन्म


विलियम हार्वे का जन्म १ अप्रैल, १५७८ को फोकस्टोन (Folkestone) इंग्लैन्ड में हुआ था, विलियम हार्वे के पिता का नाम टामस हार्वे था | वे एक सम्पन्न व्यवसायी थे |


विलियम हार्वे की शिक्षा


विलियम हार्वे को पढ़ने के लिए पहले किंग्स स्कूल कैण्टरवरी भेजा गया और उसके बाद जब उनकी उम्र २१ वर्ष की थी, तब सन् १५९७ में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए हार्वे पेडुआ (इटली) गये, जो उन दिनों औषधि विज्ञान (Medicine) का विश्व में सर्वाधिक प्रसिद्ध स्कूल था |

उस समय फेब्रिसियस (Fabricius) नाम के विद्वान वहाँ औषधि विज्ञान के प्रोफेसर थे, वे रक्त के भ्रमण से सम्बन्धित अनेक शोध सन् १६०३ में कर चुके थे | रक्त शिराओं में होकर बहता है, उनमें अनेक छोटे-छोटे द्वार (Valves) थे, जो केवल एक ओर खुलते थे, आदि | वहाँ पहुँच कर हार्वे ने शोध कार्य करके यह सिद्ध किया की ये वाल्व रक्त को केवल हृदय की ओर जाने देने के लिए खुलते थे |

पेडुआ में डाक्टर की उपाधि (Degree of Doctor of Medicine) लेने के बाद विलियम हार्वे वापस कैम्ब्रिज आ गए और वहाँ भी यह उपाधि प्राप्त की | विलियम हार्वे ने लन्दन में निजी तौर पर डॉक्टरी करना आरम्भ कर दिया | उन्हीं दिनों वह रानी एलिजाबेथ के चिकित्सक डॉ. लॉन्सीलॉट ब्राउन (Launcelot Browne) की बेटी एलिजावेथ ब्राउन से प्रेम करने लगे, और इसके बाद उनका विवाह हो गया |

सन् १६०९ में सेंट बार्थालोम्यू अस्पताल (St. Barthalomew Hospital) में चिकित्सक के रूप में हार्वे की नियुक्ति हो गई | अस्पताल में काम करते हुए विलियम हार्वे के ज्ञान भण्डार में काफी वृद्धि हुई | रोगियों का अध्ययन करते-करते उन्होंने अनेक उपयोगी आँकड़े एकत्र किये थे |

विलियम हार्वे ने विभिन्न प्रकार से प्रयोग एवं परीक्षण किये और अपनी नई मान्यता को सिद्ध करके देखा | अपने नये सिद्धान्त के प्रति पूर्णतः संतुष्ट होने के लगभग १२ वर्ष बाद, १६२८ में जब उन्होने अपनी पुस्तक प्रकाशित की, तो चारों ओर तहलका मच गया | इसके बाद उसकी मान्यता का परीक्षण विविध स्तरों पर किया गया और वह स्वीकार कर ली गई | उनके प्रति जितना भी विरोध था सब शान्त हो गया और उसकी आमदनी एकदम बढ़ गई, फलतः मरने के बाद हार्वे काफी सम्पत्ति छोड़ गए |

इसके बाद विलियम हार्वे को बादशाह के अन्तरंग में प्रवेश मिल गया, वह चार्ल्स का चिकित्सक नियुक्त कर दिया गए, बादशाह ने उसके शोध कार्य के प्रति गहरी रुचि दिखाई तथा शोध कार्य करने के लिए राजा ने हार्वे को विंडसर स्थित अपने पार्क तथा हैम्पटन कोर्ट (Hampton Court) में प्रयोग करने की सुविधा प्रदान कर दी | हार्वे ने अपनी पुस्तक बादशाह को समर्पित की, यह लिखकर कि राज्य में राजा की स्थिति वही होती है जो शरीर में हृदय की है - "The monarch was to his kingdom what the heart was to the body."

अगले वर्ष विलियम हार्वे को विश्वविद्यालय एम.डी. (Doctor of Medicine) की उपाधि प्रदान की | इन्हीं दिनों हवाइटहाल स्थित उसके निवास स्थान पर छापा मारा गया, घर की तलाशी ली गई और उसकी कई मूल्यवान पाण्डुलिपियाँ तथा विज्ञान सम्बन्धी कागज ले जाये गये | संसद विरोधी एक दल के प्रति सहानुभूति रखने के कारण उसकी नौकरी भी चली गई |


विलियम हार्वे की मृत्यु


ऑक्सफर्ड पर फैचरफैक्स का अधिकार हो जाने के बाद विलियम हार्वे सेवा निवृत्त होकर लन्दन वापस आ गया और अपने भाइयों के साथ उसने अपना समय व्यतीत किया | ६८ वर्ष की अवस्था में हार्वे को गठिया की तकलीफ हो गई थी, जिसके कारण वह बहुत परेशान रहा करते थे | उसका स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरने लगा था, ३ जून, १६५७ के दिन वह स्वर्गवासी हो गए | एसेक्स स्थित हैम्प्सटैड (Hempstead) में उनको दफना दिया गया |

हार्वे निस्संतान था, पत्नी पहले ही परलोकवासिनी हो चुकी थी, उन्होने अपनी सम्पत्ति का एक छोटा सा भाग अपने भतीजे और शेष भाग रॉयल कॉलेज ऑफ फिजीशियन्स को दान कर दी, इसके अलावा उन्होने अलग से इतनी धनराशि की व्यवस्था कर दी थी जिसके ब्याज से प्रतिवर्ष एक व्याख्यान कराया जाए, और यह व्याख्यान अब भी होता है |

कॉलेज के नाम अपनी वसीयत में हार्वे ने लिखा है कि इसके द्वारा प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन करने के लिए आवश्यक प्रयोग एवं शोध कार्य जारी रखा जाये, और इस व्यवसाय का सम्मान बनाए रखने के लिए शोध कार्य करने वाले सब लोग आपस में प्रेम से रहें |

सन् १६८३ में रॉयल कॉलेज आफ फिजीशियन्स से जुड़े हुए कार्यकर्ताओं ने विलियम हार्वे के अवशेषों को चर्च में नवनिर्मित हार्वे गिरिजाघर में स्थापित कर दिया और उसी के साथ उसकी समस्त रचनाओं के संकलन ग्रन्थ की एक प्रति भी रख दी |


विलियम हार्वे का व्यक्तित्व


विलियम हार्वे का व्यक्तित्व एक निरभिमानी व्यक्ति का तरह निर्मित था, सन् १६५४ में रॉयल कॉलेज आफ फिजीशियन्स (Royal College of Physicians) ने अपने सर्वोच्च अलंकरण प्रेसीडेण्ट आफ द कॉलेज (President of the College) से सम्मानित करने का प्रस्ताव किया था, परन्तु हार्वे ने उसको विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया | उसका कहना था कि मेरी इच्छा-पूर्ति के लिए आप चाहें तो एक ऐसा भवन बनवा दे जिसमें श्रेष्ठ पुस्तकों से युक्त एक पुस्तकालय, एक संग्रहालय और वार्ता भवन स्थापित किये जा सकें |


विलियम हार्वे की खोज की | विलियम हार्वे का योगदान


पिछले दो हजार वर्षों से शरीर में खून के दौरे के बारे में जो मान्यताएँ चली आ रही थीं, उनका निराकरण विलियम हार्वे ने किया और विश्व को इस संदर्भ में सही जानकारी प्रदान की | विलियम हार्वे के मतानुसार यह विचार सर्वथा भ्रांतिमूलक था कि रक्त दक्षिण वैट्रिकिल से चलकर शिराओं में होकर घूमा करता है, हार्वे ने समस्त समस्या का समाधान इस प्रकार प्रस्तुत किया - शरीर में दो भिन्न प्रकार के रक्त न होकर केवल एक ही प्रकार का रक्त होता है, शिराओं और धमनियों में एक ही प्रकार का रक्त होता है | हृदय द्वारा रक्त को पम्प किया जाता है और वह सारे शरीर में बार-बार चक्कर लगाता रहता है | रक्त का चालन समस्त शरीर में निरन्तर सर्वथा अबाध गति से होता रहता है, कहने का तात्पर्य यह है कि रक्त और उसके शरीर भ्रमण के सम्बन्ध में जिन मान्यताओं को मनुष्य समाज पूर्व दो हजार वर्षों से स्वीकार किए हुए थे, उनको हार्वे ने पूरी तरह धराशायी कर दिया |

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