कस्तूरबा गांधी की जीवनी

Kasturba Gandhi Biography


कस्तूरबा गांधी जी की जीवनी, कस्तूरबा गांधी निबंध, कस्तूरबा गांधी जीवन परिचय

माता कस्तूरबा में जो विशेषता थी, वह भारत की महान स्त्रीयों मे से किसी में नहीं थी। विशेषता यह थी कि माता कस्तूरबा संपूर्ण रूप से एक आम स्त्री थीं। बिल्कुल साधारण, फिर भी एकदम असाधारण। गांव की एक किसान स्त्री या शहर की एक मजदूरनी यह आशा नहीं कर सकती कि वह सरोजिनी, विजयलक्ष्मी या अमृतकौर हो जाएगी, पर वह माता कस्तूरबा होने की चेष्टा कर सकती है। जैसे लंगोटी वाले दुबले-पतले गांधी जी भारतीय साधारण जन के प्रतीक थे, वैसे ही माता कस्तूरबा साधारण भारतीय नारी की प्रतीक थीं।


संक्षिप्त विवरण(Summary)[छुपाएँ]
कस्तूरबा गांधी जीवन परिचय
पूरा नामकस्तूरबा गांधी
जन्म तारीख११ अप्रैल १८६९
जन्म स्थानपोरबंदर (गुजरात)
धर्म हिन्दू
पति का नाममोहनदास करमचंद गांधी
(महात्मा गांधी)
पिता का नामगोकुलदास मकनजी
संतान४ पुत्र हरीलाल गांधी, रामदास गांधी,
देवदास गांधी और मनीलाल गांधी
पिता का कार्यसाधारण व्यापारी
शिक्षानही
कार्यस्वतन्त्रता संग्राम सेनानी,
पति महात्मा गांधी के साथ
स्वतन्त्रता संग्राम मे भाग लेना
आमतौर पर लिए जाने वाला नामबा
मृत्यु तारीख२२ फरवरी, १९४४
मृत्यु स्थानआगाखां महल, पुणे(महाराष्ट्र)
उम्र७५ वर्ष
मृत्यु की वजहहृदय की बीमारी

उनका जन्म ११ अप्रैल १८६९ में पोरबंदर (गुजरात) में हुआ था। उस अनुसार वह गांधीजी से लगभग ६ माह बड़ी थी | वह एक बिल्कुल साधारण लड़की थीं। जिस समय उनका विवाह गांधी जी के साथ हुआ, उस समय गांधी जी बारह-तेरह साल के बालक थे और कस्तूरबा की अवस्था भी लगभग उतनी ही थी।

यद्यपि सारी उम्र में महात्मा जी को अपनी पत्नी से यानी माता कस्तूरबा से शिकायत का कोई मौका नहीं आया, फिर भी उन्होंने दूसरों के उपदेश के लिए इस प्रकार लिखा कि “बाल-विवाह यानी कम उम्र में विवाह किसी भी हालत में उचित नहीं है। इस समय भी बहुत से ऐसे पोंगापंथी मौजूद हैं, जो कहते हैं कि बच्चों की बचपन में ही शादी कर देनी चाहिए।“ जब इस जमाने की यह हालत है तब उस युग की कल्पना की जा सकती है, जब गांधी जी तथा माता कस्तूरबा की उम्र तेरह वर्ष की थी।

जिस समय कस्तूरबा की शादी हुई, उस समय वह कुछ भी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। गांधी जो यह चाहते थे कि वह पढ़-लिख जाएं, पर संसार के जंजाल में फंस जाने के कारण वह उस समय पढ़-लिख नहीं सकी। बाद में उन्होंने बड़ी मुश्किल से गुजराती पढ़ना-लिखना सीखा था।

माता कस्तूरबा विशेष पढ़ी-लिखी तो नहीं थीं, पर वह स्वभाव से बहुत स्वतंत्र थीं। वह अपनी खुशी से गुजराती लड़कियों की तरह मंदिर आदि में चली जाती थीं। इसके लिए वह किसी की इजाजत नहीं लेती थीं।

गांधी जी को यह बात बुरी लगती थी। यह याद रहे कि उस समय गांधी जी एक साधारण गुजराती नौजवान थे। अभी वह महात्मा नहीं हुए थे। उन्होंने कई बार कस्तूरबा को रोका कि तुम मेरी इजाजत के बगैर मंदिर आदि में मत जाया करो । पर कस्तूरबा ने उनकी इस बात को मानने से इंकार किया। इस पर दोनों में काफी खटपट रही। बाद में गांधी जी ने अपनी गलती समझ ली।

माता कस्तूरबा का स्वभाव सरल और स्वतंत्र था। वह जिस परिवार में पैदा हुई थीं, वह धनी न होने पर भी सम्पन्न था । जब वह गांधी के साथ आईं, तो यहां भी अच्छा खाता-पीता परिवार था। वह बराबर घर के सब काम-काज में पूरा हाथ बटाती थीं। वह कठिन परिश्रम से भी नहीं घबराती थीं।

इसके बाद गांधी जी बैरिस्टरी पढ़ने के लिए विलायत गए। पहली बार तो अकेले गए, पर जब वह वहां से लौटे तब से लेकर माता जी के स्वर्गवास तक दोनों में बड़ा प्रेम-संबंध रहा। यह तय हुआ कि गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में बैरिस्टरी करें। कस्तूरबा भी उनके साथ गईं। इस बीच उनके एक लड़का हुआ। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की बड़ी दुर्दशा थी। गांधी जी को यह बात पसंद नहीं आई और वह सोचने लगे कि किस प्रकार इसके विरुद्ध लड़ा जाए। यहीं पर उन्होंने पहले-पहल सत्याग्रह आरंभ किया, जिससे उनका नाम धीरे-धीरे फैलने लगा।

उनके अच्छे व्यवहार के कारण उन्हे “बा” के भी नाम से जाना जाता था |

बा (कस्तूरबा) ने भी उनका पूरी तरह साथ दिया। यों तो प्रत्येक पुरुष और स्त्री में आरामतलबी की इच्छा होती है, पर उनमें सादगी की तरफ अधिक रूचि रही। जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका गए तो उन्होंने यह चाहा कि उनकी स्त्री तथा बच्चे अच्छे कपड़े पहनें। बा को इस संबंध में कोई अधिक शौक न था, पर गांधी जी के कहने पर उन्हें पोशाक परिवर्तन स्वीकार करना पड़ा।

गांधी जी को बा और बच्चों के केवल पोशाक-परिवर्तन से संतोष नहीं हुआ, उन्होंने बा को विवश किया कि वह अंग्रेजों की तरह भोजन के समय छुरी-कांटे का इस्तेमाल करें माता कस्तूरबा तथा उनके बच्चों को गांधी जी के इन नए हुक्मों से कष्ट तो जरूर होता, पर बा एक आदर्श पत्नी की तरह कष्ट सहकर भी गांधी जी की आज्ञा का पालन करतीं। और जब गांधी जी का मोह उतरा, तब फिर उन्हें अच्छे कपड़े, छुरी-कांटे इत्यादि छोड़ने पड़े। बा को यह परिवर्तन जिस प्रकार दुखकर था, उसी प्रकार एक बार आदत पड़ जाने के बाद उसको छोड़ना भी दुखदायी था, पर वह हमेशा दिखावट की दुनिया से दूर हटकर सादगी की ओर बढ़ती गई। महात्मा गांधी ने लिखा है – “उनमें एक गुण बहुत बड़ा था। हर एक हिंदू पत्नी में वह कमोबेश होता ही है। इच्छा से या अनिच्छा से अथवा जाने-अनजाने वह मेरे पदचिंहों पर चलने में धन्यता का अनुभव करती थीं।“

यह बात नहीं कि बा ने केवल महात्मा गांधी जी के सिर से घर की चिंता का भार उतारा, उन्हें तंग नहीं किया, तथा उन्हें देश सेवा करने से नहीं रोका, बल्कि बा ने स्वयं आगे आकर राजनीति में भी भाग लिया।

एक दिन की बात है। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा जी अपने खोले हुए फिनिक्स आश्रम में स्त्रियों के सम्मुख सत्याग्रह की लड़ाई पर भाषण दे रहे थे, सत्याग्रह की सभी बातें समझाने के बाद बापू ने समस्त स्त्रियों से अपील की कि वे सत्याग्रह संग्राम में भाग ले सकती हैं और उन्हें देशवासियों की भलाई के लिए अवश्य ही इस लड़ाई में भाग लेना चाहिए और इस प्रकार वे प्रवासी भारतीयों के मोर्चे को मजबूत बनाएं। कस्तूरबा भी उस सभा में उपस्थित थीं सभा के समाप्त हो जाने के पश्चात महात्मा जी को उलाहना देते हुए बा ने पूछा – “आप मुझकों सत्याग्रह के युद्ध में शामिल होने के लिए क्यों नहीं कहते ? मुझे इस बात से बड़ा क्लेश होता है। बताइए, मुझमें ऐसी कौन सी कमी है, जिसके कारण मैं जेल जाने के योग्य नहीं समझी जाती।“

गांधी जी ने बा का उत्तर देते हुए कहा – “तुम्हारी जेल यात्रा से मुझे प्रसन्नता होगी। परंतु इसके लिए तुम्हारे अंदर साहस होना चाहिए, यदि तुम अदालत में घबरा गईं अथवा जेल में होने वाली तकलीफों से डर गई, तो उस समय मेरी हालत कैसी होगी, यह स्वयं सोच सकती हो।“

परंतु बड़ी-बड़ी कठिनाइयों को हंसते-हंसते पार करने वाली बा इस बात से कैसे डरतीं ? गांधी जी के साथ उन्होंने अनेक कष्ट हंसते-हंसते झेले थे और जब उनके पति गांधी जी जेल की तकलीफों को सह सकते थे, तो बा में भी उन तकलीफों को बरदाश्त करने की शक्ति थी। बा ने उन्हें अपने स्वभाव के मुताबिक उत्तर दिया – “यदि मैं जेल के भय से घबरा के माफी मांगने लगू तो आप मुझसे किसी प्रकार का सबंध रखने से इंकार कर दें। यदि आप तकलीफ सह सकते हैं, मेरे लड़के भी कष्ट झेल सकते हैं, तो मैं भी दुख क्यों नहीं उठा सकती। मैं सत्याग्रह में जरूर भाग लूगी।“

कस्तूरबा के साहस को देखकर महात्मा गांधी बहुत खुश हुए और उन्होंने बा को यह अधिकार दिया कि चाहें तो सत्याग्रह में भाग लें, चाहे न ले। जब सत्याग्रह का युद्ध शुरू हो गया और धड़ाधड़ गिरफ्तारियां शुरू हो गईं, तो बा को संग्राम में भाग लेने से रोकने की किसकी हिम्मत थी? वह भी मैदान में कूद पड़ीं और बापू के साथ ही गिरफ्तार भी कर ली गई। बा को यह प्रथम जेलयात्रा बड़ी दुखदायी थी। दक्षिण अफ्रीका में उस समय जेल के भी बाहर पशुओं जैसा व्यवहार होता था, और उसी के खिलाफ तो यह जंग छिड़ी थी | फिर जेल के भीतर भारतीयों पर ढहाए जाने वाले जुल्मों की कल्पना की जा सकती है।

कस्तूरबा इस सजा में बिलकुल सूख गई और अवधि समाप्त होने के बाद जब उन्हें जेल से छुटकारा मिला, तो उनका शरीर हड्डियों का ढांचा भर रह गया था |बा को यातनाएं डरा नहीं सकी और उनके साहस को तकलीफें घटा नहीं सरीं, बल्कि उन्होंने माता कस्तूरबा के अंदर कष्ट सहने की शक्ति को बढ़ा दिया।

जब महात्मा जी १९१५ में भारत लौटे और उन्होंने भारत में स्वतंत्रता संग्राम की तैयारी आरंभ की, तो बा ने भी उनका साथ दिया। १९१७ में महात्मा जी ने बिहार में चंपारन के किसानों की मुसीबतों को दूर करने के लिए सत्याग्रह संग्राम छेड़ दिया। यद्यपि जल्दी ही समझौता हो जाने के कारण बा जेल जाने का सौभाग्य प्राप्त न कर सकीं, फिर भी उन्होंने चंपारन में जिस उत्साह, लगन और साहस से काम किया, उसे देखकर स्वयं बापू को बड़ा आश्चर्य हुआ और उनके पारखी हृदय को यह मानना पड़ा कि बा में सफल सत्याग्रही होने की योग्यता है। अकेले बापू ही क्यों, समस्त जनता ने के उन गुणों की सदा प्रशंसा की और कस्तूरबा ने भी समय-समय पर यह सिद्ध कर दिया कि उनकी ख्याति केवल बापू की पत्नी होने के नाते नहीं, बल्कि उस सराहना की वह सहज अधिकारिणी थीं।

चंपारन में आंदोलन समाप्त होने के पश्चात गांधी जी कुछ दिनों के लिए चंपारन में ही रह गए और वहां पर उन्होंने एक आश्रम-सा स्थापित कर लिया। जब महात्मा जी ने इस आश्रम के आस-पास रहने वाले ग्रामीणों का जीवन देखा तो उनकी गंदगी से बापू को दुख हुआ और वह अपने सहायकों के साथ गांव की गंदगी दूर करने की कोशिश करने लगे।

माता कस्तूरबा हमेशा झाडू लिए सफाई के काम मे खो जाती थी और उन्हे खाने-पीने और पढ़ने की याद भी न रहती थी। स्त्रियों और बच्चों की शिक्षा के लिए गांधी जी द्वारा स्थापित एक पाठशाला की झोंपड़ी में किसी ने आग लगा दी, इससे कस्तूरबा को बहुत दुख हुआ और उन्होंने अपने प्रयत्न से उस पाठशाला को पक्का बनवाकर ही चैन लिया।

उन्नीस सौ इक्कीस में जब असहयोग आंदोलन प्रारंभ हुआ, तो कस्तूरबा जेल तो नहीं जा सकीं, पर उन्होंने गांधी जी की गिरफ्तारी के बाद देश को जो संदेश दिया था वह इतिहास के पन्नों पर सोने के अक्षरों में लिखा जाएगा। उन्होंने देश की जनता से अपील की – “मेरे पति गिरफ्तार कर लिए गए हैं। इस घटना से मुझे रंज तो अवश्य हुआ है, पर मुझे इस बात का पूरा भरोसा है कि यदि हम सब दृढ़तापूर्वक लगन से काम करते रहें, तो हम उन्हें उनकी सजा की अवधि पूरी होने से पहले ही जेल से छुडा सकेंगे। मैं उन सभी स्त्री और पुरुषों से, जिन्हें मेरे तथा मेरे पतिदेव के प्रति हमदर्दी है, अपील करती हूं कि वे ठोस कार्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करने में कोई कमी न रखें।“

बा के इस संदेश ने बा को बापू के साथ देश के उच्चतम सिंहासन पर बैठा दिया। असहयोग आंदोलन समाप्त होने के पश्चात कांग्रेस के नेताओं ने बा के त्याग को देखते हुए १९२२ में होने वाले कांग्रेस के गया अधिवेशन के अध्यक्ष पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया, पर बा को तो नेतागिरी से घृणा थी, उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। १९३०-१९३२ के सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह आंदोलनों में बा ने आगे बढ़ कर मोर्चा संभाला। १९३० में जब बापू ने नमक कानून भंग करने को घोषणा की और प्रसिद्ध दांडी यात्रा की, तब बा भी गांधी जी का अनुकरण करती हुई नमक कानून तोड़ने के लिए कमर कसकर तैयार हो गईं। उन्होंने स्त्रियों के एक जत्थे के साथ नमक बनाया और इस अपराध में उन्हें गिरफ्तार होने के पश्चात छः महीने के लिए जेल की सजा दी गई। इसी प्रकार १९३२ में जब व्यक्तिगत सत्याग्रह आरंभ हुआ, बा भी बापू के साथ ही जेल जा पहुंची।

बा कभी भी बापू का साथ न छोड़ सकती थी। यदि बापू जेल यात्रा करते, तो बा भी उस पुण्य से वंचित नहीं होना चाहती थीं। अगस्त, १९४२ में जब बापू कांग्रेस महासमिति के अधिवेशन में भाग लेने के लिए बंबई जाने लगे, तो बा ने उनका साथ छोड़ने से इंकार कर दिया। वह उनके साथ ही बंबई जा पहुंचीं और नौ अगस्त को प्रात:काल बापू के साथ ही सरकार की मेहमान बन गई। उन्हें बापू तथा प्राइवेट सेक्रेटरी महादेव देसाई के साथ आगाखां महल में रखा गया | नौ अगस्त के बाद एक ही सप्ताह के अंदर अनुज तुल्य महादेव देसाई का स्वर्गवास हो गया। और उसके लगभग डेढ़ वर्ष पश्चात हृदय की बीमारी के कारण माता कस्तूरबा भी उसी आगाखा महल में इस जगत को छोड़ अनंत यात्रा के लिए चल पड़ीं। कस्तूरबा ने २२ फरवरी, १९४४ के दिन अपने शरीर को आजादी के कुंड में होम कर दिया। आगाखां महल, पुणे(महाराष्ट्र) में बापू के कर कमलों द्वारा उनका अंतिम संस्कार किया गया और बा का पार्थिव अस्तित्व सदा के लिए मिट गया ।

बा और बापू में कभी-कभी आपस में झगडे भी हो जाया करते थे, पर दोनों इस बात की चेष्टा करते थे कि भविष्य में कलह न हो। उनके गुणों की प्रशंसा करते हुए अपने आत्मचरित्र में गांधी जी ने लिखा है – “बा का जबरदस्त गुण महज अपनी इच्छा से मुझ में समा जाने का था। यह सब कुछ मेरे आग्रह से नहीं हुआ था, बल्कि समय पाकर बा के अंदर ही इस गुण का विकास हो गया था। मैं नहीं जानता था कि बा में यह गुण छिपा हुआ था। मेरे शुरू-शुरू के अनुभव के अनुसार बा बहुत हठीली थीं। मैरे दबाव डालने पर भी वह अपना चाहा शुरू ही करतीं। इसके कारण हमारे बीच थोड़े समय की या लंबी कड़वाहट भी रहती, लेकिन जैसे-जैसे मेरा सार्वजनिक जीवन उज्ज्वल बनता गया, वैसे-वैसे बा खिलती गईं और पुख्ता विचारों के साथ मुझमें यानी मेरे कामों में समाती गईं।“


FAQ`s

Questation :कस्तूरबा गांधी के किस नाम से जाना जाता था?

Answer : कस्तूरबा गांधी को "बा" नाम से भी जाना जाता था |


Questation : कस्तूरबा गांधी का जन्म कब हुआ था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी का जन्म ११ अप्रैल १८६९ को हुआ था |


Questation : कस्तूरबा गांधी का जन्म कहा हुआ था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी का जन्म पोरबंदर (गुजरात) मे हुआ था |


Questation : कस्तूरबा गांधी का जन्म कौन से राज्य मे हुआ था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी का जन्म पोरबंदर गुजरात राज्य मे हुआ था |


Questation : कस्तूरबा गांधी के पिता का क्या नाम था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी के पिता का नाम गोकुलदास मकनजी था | वे एक साधारण व्यापारी थे |


Questation : कस्तूरबा गांधी के पति का क्या नाम था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी के पति का नाम मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) था |


Questation : कस्तूरबा गांधी के बच्चो का क्या नाम था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी के ४ बच्चे थे और वे सभी पुत्र थे उनका नाम - हरीलाल गांधी, रामदास गांधी, देवदास गांधी और मनीलाल गांधी था |


Questation : कस्तूरबा गांधी की बेटी का क्या नाम था ?

Answer : कस्तूरबा गांधी के ४ बच्चे थे और वे सभी पुत्र थे, उनकी कोई भी बेटी नही थी |


Questation : कस्तूरबा गांधी की मृत्यु कब हुई ?

Answer : कस्तूरबा गांधी की मृत्यु २२ फरवरी, १९४४ को आगाखां महल, पुणे(महाराष्ट्र) मे हृदय की बीमारी के कारण हुई |



Post a Comment

और नया पुराने

LISTEN ON "SUNTERAHO.COM" :

LISTEN ON "SUNTERAHO.COM" :