यदुनाथ सरकार | Jadunath Sarkar


भारत जैसे विशाल देश का इतिहास लिखना कोई आसान काम नहीं। यहां अनेक साम्राज्य बने-बिगड़े, अनेक सल्तनतें खड़ी हुई और गर्क हुई। तत्कालीन इतिहास लेखकों ने अपने-अपने बादशाहों या राजाओं का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया। बहुत-सी ऐतिहासिक सामग्री समय के साथ नष्ट हो गई। इस कारण हमारे देश का इतिहास परस्पर विरोधी विवरणों से इतना भर गया है कि सत्य क्या है, इसका पता लगाना बहुत कठिन हो गया है। मध्ययुगीन भारतीय इतिहास के बारे में यह बात और भी ज्यादा लागू होती है। सर यदुनाथ सरकार उन गिने-चुने इतिहासकारों में से हैं, जिन्होंने अपनी खोजों और प्रयत्नों से परस्पर विरोधी बातों में से सच्चाई खोज निकाली और भारतीय इतिहास के अनेक अनजाने सत्यों को पहली बार पाठकों के सामने रखा।


यदुनाथ सरकार का जन्म


यदुनाथ सरकार का जन्म १० दिसंबर १८७० को बंगाल के करचामारिया नामक गांव के एक धनाढ्य कायस्थ परिवार में हुआ था। करचामारिया पश्चिम बंगाल के वर्तमान राजशाही नगर के ८० मील उत्तर-पूर्व में आत्रेयी रेलवे स्टेशन से १० मील पूर्व में स्थित है। उनके पिता राजकुमार सरकार एक प्रगतिशील जमींदार थे।


यदुनाथ सरकार की शिक्षा


यदुनाथ की प्रारंभिक शिक्षा राजशाही में ही हुई। उन्होंने कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कालिज से अंग्रेजी में एम ए. किया। वह बड़े मेधावी छात्र थे और उन्होंने कई छात्रवृत्तियां और पदक जीते। एम.ए. की परीक्षा में वह विश्वविद्यालय-भर में प्रथम रहे और उन्होंने ९२ प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किए।


यदुनाथ सरकार के कार्य


यदुनाथ सरकार ने अपना जीवन १८९३ में अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक के रूप में शुरू किया। अग्रेजी साहित्य पर उन्हें पूर्ण अधिकार प्राप्त था। अपनी योग्यता के बल पर वह शीघ्र ही प्रसिद्ध हो गए। छात्रों में उनकी लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि विज्ञान तथा अन्य विषयों के विद्यार्थी, जिन्हें साहित्य से कोई रुचि न थी, उनका लेक्चर सुनने के लिए उनकी कक्षा में आ बैठते थे।

सन् १८९८ में वह सरकारी नौकरी में आए और प्रेसिडेंसी कालिज, कलकत्ता में लेक्वरर नियुक्त हुए। इसके एक वर्ष बाद वह पटना चले गए। वहां वह अंग्रेजी के अतिरिक्त, इतिहास भी पढ़ाते थे ।

इसके बाद जब उस कालिज में इतिहास विभाग खुल गया, तो वह उसके अध्यक्ष बना दिए गए। १९१७ से १९१९ तक वाराणसी हिंदू विश्वविद्यालय ने उनकी सेवाओं से लाभ उठाया | इसके बाद इंपीरियल एजूकेशन कालिज में लिए जाने पर उनका तबादला कटक के रेवनशा कालिज में इतिहास के वरिष्ठ प्राध्यापक के रूप में हो गया| इस पद पर वह चार साल तक रहे। १९२६ में वह सेवानिवृत्त हुए।

फिर तत्कालीन वायसराय लार्ड लिटन ने उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय का उपकुलपति नियुक्त किया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय के सभी क्षेत्रों में सुधार किया। परंतु इससे उन्हें स्वतंत्र शोध तथा लेखन के लिए पर्याप्त समय न मिल पाता था। अतः दो वर्ष की अवधि समाप्त होते ही उन्होंने इस पद से अवकाश ग्रहण कर लिया। तब से मृत्यु-पर्यन्त वह इतिहास के शोघ, अन्वेषण तथा लेखन में व्यस्त रहे।

यदुनाथ सरकार एक आदर्श अध्यापक थे वह मेधावी तथा जरूरतमंद छात्रों की, जो अध्ययन में रुचि दिखाते थे, पूरी-पूरी सहायता करते थे |

एक बार एक युवक प्राध्यापक के शोधपत्र को प्रकाशित करने की उन्होंने सिफारिश की थी। विश्वविद्यालय द्वारा इस विषय में उत्साह न दिखाने पर उन्होंने स्वयं अपने खर्च पर इसे छपवाया, इसके प्रूफ पढ़े तथा पुस्तकें तैयार करवाकर उक्त प्राध्यापक को लाहौर भेज दी। बाद में बहुत ज़ोर देने पर भी उन्होंने केवल कागज और जिल्दबंदी का ही व्यय उससे लेना स्वीकार किया। इतिहास के कई शोध छात्र उनके घर रहते और उनके द्वारा एकत् प्राचीन ऐतिहासिक सामग्री, हस्तलिपियों, पुस्तकों आदि का अध्ययन करके लाभ उठाते थे | छात्रों के प्रति उनकी उदारता एवं प्रेम का पारावार न था और वह उनकी सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखते, उनकी पढ़ाई का निरीक्षण करते और उनकी प्रगति का ब्यौरा लेते।

उनके एक छात्र ने उन्हें (उनका तबादला तब पुनःपटना हो चुका था) बी ए. की परीक्षा में सफल होने की सूचना दी। उन्होंने उसे बधाई देते हुए लिखा कि एम.ए. करने के लिए पटना ज्यादा अच्छा रहेगा। युवक ने अपनी विधवा मां को अपने पटना पढ़ने जाने के लिए मना लिया और यदुनाथजी को इसकी सूचना दी। उत्तर में यदुनाथ ने उसे अपने घर पहुंचन तक का रास्ता, किराया आदि सब जानकारी लिख भेजी और उसे सीधा अपने घर पहुंचने को कहा।

घर पहुंचने पर उसे रहने के लिए अपने घर का एक कमरा दे दिया। वह इकट्ठे खाना खाते, इकट्ठे रहते और पढ़ाई में उसका पथ-प्रदर्शन करते।


यदुनाथ सरकार की इतिहास मे रूचि


यदुनाथजी साहित्य के क्षेत्र को छोड़कर, इतिहास की ओर कैसे आकर्षित हुए और अंततः एक महान इतिहास लेखक के रूप में कैसे प्रसिद्ध हुए, इसकी भी एक कहानी है।

उन्होंने प्रेमचंद-रायचंद छात्रवृत्ति प्रतियोगिता के लिए तैयारी शुरू की। यह छात्रवृत्ति केवल मेधावी छात्रों को दी जाती थी और इसके लिए मुकाबला काफी कड़ा होता था। उन्होंने अपना विषय “औरंगजेब का जीवन और शासन काल” चुना। इस प्रतियोगिता की तैयारी करते समय इतिहास में शोधकार्य और लेखन की ओर उनकी जो रुचि हुई, वह आयु-पर्यन्त कम न हुई। अँग्रेजी और संस्कृत के विद्वान तो वह थे ही, अब उन्हें फारसी भाषा भी पढ़नी पड़ी, क्योंकि उस समय के अधिकतर मूल स्त्रोत फारसी भाषा में थे | वह छात्रवृत्ति पाने में सफल रहे। वह इस विषय से इतने आकर्षित हुए कि अब उन्होंने औरंगजेब का संपूर्ण इतिहास लिखने का निश्चय किया | इसके लिए आवश्यक सामग्री तो उन्होंने छात्रवृत्ति प्रतियोगिता के सिलसिले में इकट्ठी कर ली थी। इसके लिए उन्हें मराठी भी पढ़नी पड़ी, क्योंकि औरंगजेब से संबद्ध कई स्त्रोत मराठी लेखकों के थे। अथक परिश्रम के बाद उन्होंने पांच खंडों में एक ग्रंथ हिस्ट्री आफ औरंगजेब (औरंगजेब का इतिहास) नामक ग्रंथ लिखा। वह इससे मराठा इतिहास की ओर भी आकृष्ट हुए और एकत्रित सामग्री का उपयोग उन्होंने शिवाजी एंड हिज टाइम्स (शिवाजी और उनका काल) नामक पुस्तक लिखने में किया। यह इस विषय पर अपने ढंग की पहली पुस्तक थी।

इसके बाद यदुनाथ सरकार ने इरविन की पुस्तक लेटर मुगल्ज का संपादन किया। इस कार्य के लिए उन्होंने बहुत-सी संदर्भ-सामग्री एकत्र की थी। इसलिए लगे हाथ उन्होंने इसका उपयोग फाल आफ मुगल एपायर नामक पुस्तक लिखने में किया। इस पुस्तक ने १८वीं शताब्दी के इतिहास को एक नई तरतीब दी।

इनके अलावा, उन्होंने भारतीय इतिहास पर अनेक पुस्तकें, निबंध आदि लिखे। एनक्डोट्स आफ औरंगजेब, स्टडीज इन मुगल इंडिया, इंडिया थू दि एजिज (भाषणमाला), हिस्ट्री आफ बंगाल थी |


यदुनाथ सरकार को प्राप्त सम्मान


१९२३ में “रायल ऐशियाटिक सोसायटी आफ ग्रेट ब्रिटेन एड आयरलैंड” ने उन्हें अपना आनरेरी सदस्य बनाया। यह सम्मान विश्व के गिने-चुने विद्वानों को ही दिया जाता है।

इंग्लैंड की रायल हिस्टोरिकल सोसायटी ने भी उन्हें सम्मानित किया। १९२६ में रायल एशियाटिक सोसायटी के मुंबई तथा बंगाल के बोर्डों ने भी उन्हें सम्मानित किया।

अमरीका के अमरीकन हिस्टोरिकल एसोसिएशन ने उन्हें आजीवन सदस्य नियुक्त कर सम्मानित किया। यदुनाथ सरकार इस सम्मान को पाने वाले एकमात्र एशियाई थे। पटना और ढाका विश्वविद्यालयों ने उन्हें डी.लिट. की उपाधियों से विभूषित किया। ब्रिटिश सरकार ने १९२६ में उन्हें सी.आई.ई. की उपाधि दी।

१९२९ में उन्हें सर की उपाधि से विभूषित किया गया।


यदुनाथ सरकार की मृत्यु


भारत के इस महान सपूत तथा विश्व-ख्याति के इतिहासकार का देहांत १९५८ में हुआ।

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