बार्थोलोम्यू डियाज | Bartholomew Diaz in Hindi | Bartholomew Diaz History

बार्थोलोम्यू डियाज

बार्थोलोम्यू डियाज | Bartholomew Diaz in Hindi | Bartholomew Diaz History

बार्थोलोम्यू डियाज को कोलंबस से पहले अज्ञात देशों की यात्रा करने वाले खोज यात्रियों मे सबसे महान माना जाता था | उसने अनेक कठिनाईयो का सामना करते हुए आशा अंतरीप (Cape of Good Hope) का पता लगाया था । उसकी यात्रा की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है ।

१५वीं शताब्दी में पुर्तगाली राजाओं और समुद्री कप्तानों के दिलों में एक महान अभिलाषा थी कि समुद्री रास्तों से होते हुए विश्व के उन पूर्वी देशों का पता लगाया जाए, जहां से मसाले, रेशम, हीरे-जवाहरात भारी मात्रा में लाये जा सकें ।

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इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुर्तगाल के राजा प्रिंस हेनरी (Prince Henry) ने समुद्री खोज-यात्रियों को अत्यधिक बढ़ावा दिया । उसने समुद्री यात्राओं से जुड़ी सभी गतिविधियों में इतनी अधिक रुचि प्रदर्शित की कि लोग उसे हेनरी नाविक के नाम से पुकारने लगे ।

उसने नाविकों के प्रशिक्षण, मानचित्र बनाने, जलयान बनाने और अज्ञात रास्तों के संबंध में प्रशिक्षण देने के लिए पुर्तगाल के सागरेस (Sagres) नामक स्थान पर एक कॉलेज की स्थापना भी की थी । उसके शासन काल में जलयान अफ्रीका के दक्षिण की ओर हर वर्ष आगे ही आगे बढ़ते गये ।

उसकी मृत्यु के बाद सन् १४६० में जॉन द्वितीय (John II) ने उसके कार्य को आगे बढ़ाया तथा पुर्तगाल के बार्थोलोम्यू डियाज को अफ्रीका महाद्वीप के साथ-साथ यात्रा करते हुए भारत पहुंचने का आदेश दिया ।

बार्थोलोम्यू डियाज का जन्म सन् १४५० में एक नाविक परिवार में हुआ था । बचपन से ही उसे नाविक बनने का शौक था । इसके एक संबंधी जोआओ डियास (Goao Dias) ने बोजाडोर अंतरीप (Cape of Bojador) की परिक्रमा सन् १४३४ में की और उसके एक दूसरे संबंधी डिनिस डियास (Dinis Dias) ने सन् १४४५ में वर्डे अंतरीप (Cape of Verde) की खोज की थी । सन् १४८६ में जॉन द्वितीय ने बार्थोलोम्यू डियाज को ढेर सारा धन दिया और तीन जलयानों का इंतजाम करने के लिए कहा । अगस्त, १४८६ में वह भारत की यात्रा के लिए रवाना हुआ ।

उसकी मनोइच्छा थी, वह भारत के लिए कोई नया मार्ग खोज निकाले । वह अफ्रीका के दक्षिणी तट की ओर आगे बढ़ा लेकिन रास्ते में भयंकर आंधियों और तूफानों में फंस कर वह लगातार १३ दिन तक समुद्र में भटकता रहा । जब तूफान कम हो गया तो उसने अपने बेड़े को पूर्व की ओर घुमाने का आदेश दिया । तीन दिन तक उनका बेड़ा उसी दिशा में चलता रहा, लेकिन उन्हें धरती के चिह्न कहीं भी नहीं दिखायी दिये ।

डियास ने सोचा शायद उनका बेड़ा अफ्रीका के दक्षिणी सिरे को पार कर चुका है । मानचित्रों के अनुसार इसके बाद उसे उत्तर की ओर मुड़ना था । अतः उसने जहाजों को उत्तर की ओर मुड़ने का निर्देश दिया । चलते-चलते ३ फरवरी, १४८८ को उन्हें मोसल की खाड़ी (Mossel Bay) की जमीन दिखायी दी । वहां से उसने बेड़े को पूर्व की ओर चलने का आदेश दिया । यात्रा में उसके सभी साथी कठिनाइयों का सामना करते-करते तंग आ चुके थे, इसलिए उन्होंने उसे वापस लौटने पर मजबूर कर दिया ।

लौटते समय उनका बेड़ा उस अंतरीप से गुजरा, जो उन्होंने तूफानों के कारण जाते समय नहीं देखा था । डियास ने उस अंतरीप का नाम तूफानी अंतरीप रखा क्योंकि वहां तूफानों के कारण वह भटक गया था । इधर पुर्तगाल के राजा को इस बात की चिंता हो रही थी कि जहाजी बेड़ा कहीं नष्ट तो नहीं हो गया । डियास ने पुर्तगाल वापस पहुंचकर राजा को अपनी यात्रा का वर्णन सुनाते हुए तूफानी अंतरीप के विषय में भी बताया । वर्णन सुनकर राजा जॉन द्वितीय ने कहा – “हमें तो तुम्हारे लौटने की आशा ही नहीं रही थी और चूंकि तुम सकुशल वापस आ गये हो, अतः इस तूफानी अंतरीप का नाम हम आशा अंतरीप रखते हैं।” तभी से इसका नाम आशा अंतरीप रख दिया गया ।

बार्थोलोम्यू डियाज आशा अंतरीप तक पहुंचने वाला सबसे पहला व्यक्ति था लेकिन वह भी भारत न पहुंच पाया । सन् १५०० में उसने १३ जहाजों के साथ एक और यात्रा की । इस बार भी उसका जहाज अपने रास्ते से भटक गया और ब्राजील जा पहुंचा । इस प्रकार उसने ब्राजील की खोज की । ब्राजील से उनका जहाजी बेड़ा भारत की ओर जाना था लेकिन आशा अंतरीप के तूफानों में उसके बेड़े के चार जहाज फंस गये । इनमें से एक जहाज में डियास भी था । उसका जहाज सागर के गर्भ में विलीन हो गया और उसके साथ ही डियास भी समाप्त हो गया ।

यद्यपि डियास पहला समुद्री यात्री था, जिसने पूर्व की ओर जाने का समुद्री रास्ता खोजा लेकिन यह अभागा यात्री भारत पहुंचने का सपना अपनी आंखों में लिए हमेशा-हमेशा के लिए सो गया ।

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