सिन्धु घाटी सभ्यता | सिन्धु घाटी सभ्यता का इतिहास । Sindhu Ghati Sabhyata | Sindhu Ghati Sabhyata Kya Hai


१९वीं शताब्दी में हर देश रेल की पटरियों का जाल बिछाने के काम में लगा था । इंग्लैंड ने भी अपने तत्कालीन उपनिवेश भारत में कराची से लाहौर तक रेल की पटरियां बिछाने का काम जॉन तथा विलियम ब्रन्टन नामक दो भाइयों को सौंपा । अपने काम के दौरान की गयी खुदाई से उन्हें एक ऐसी महान् संस्कृति का पता चला जो इस उप-महाद्वीप (Sub-continent) में २००० वर्ष पूर्व फली फूली थी ।

यद्यपि दोनों भाई अनुभवी इंजीनियर थे लेकिन सिन्धु घाटी की रेतीली और कछारी मिट्टी पर रेल की पटरी बनाना एक समस्या था । वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि उसके लिए कंकड़-रोड़ी कैसे प्राप्त की जाए । उस समय जॉन को बर्मीनाबाद नामक रेल मार्ग के निकट एक प्राचीन नगर के मिलने की जानकारी मिली । वह उस स्थान पर गया और उसने देखा कि उस नगर के भवन आदि अच्छी तरह पकायी गयी सख्त ईंटों से बने हुए थे । इस जानकारी से उसे मदद मिली । वहां कंकड़-रोड़ी के लिए एक खदान थी । इस प्रकार जॉन ने बर्मीनाबाद को ही अपने कार्य के लिए चुना ।

इसी दौरान उत्तर में जॉन का भाई विलियम प्रागैतिहासिक नगर हड़प्पा में रोड़ी प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील था । इस स्थान पर मजदूरों को खुदाई के दौरान कुछ वस्तुएं प्राप्त हुई, जिनमें कुछ मुद्राएं भी थीं । सर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम (Sir Alexander Cunningham) नामक पुरातत्त्ववेत्ता ने जब सन् १८५६ में हड़प्पा का दौरा किया तो इनमें से एक मुद्रा (Seal) ने उनका ध्यान आकर्षित किया । उस मुद्रा पर एक बैल की आकृति खुदी हुई थी तथा एक ऐसी लिपि लिखी हुई थी, जिसे पढ़ा नहीं जा सकता था । जनरल अलैक्ज़ेण्डर ने उस मुद्रा को अपने पास रख लिया था और जब सन् १८७२ में वे भारतीय पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण के महानिदेशक बने तो उन्होंने अपनी यह खोज प्रकाशित की ।

उस समय इसकी ओर किसी ने भी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया । ये मुद्राएं सन् १९२० तक उपेक्षित पड़ी रहीं, किन्तु जब सर जॉन मार्शल भारत के पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण के महानिदेशक बने, तब उन्होंने जनरल कन्निघम के द्वारा दी गयी मुद्रा तथा हड़प्पा में प्राप्त अन्य मुद्राओं का तुलनात्मक अध्ययन किया । इन मुद्राओं में उन्हें अनोखी समानता मिली । जनरल कन्निघम का विश्वास था कि हड़प्पा में एक सभ्यता हुआ करती थी । इस विश्वास की सत्यता को परखने के लिए सर मार्शल ने एक भारतीय पुरातत्त्ववेत्ता राय बहादुर दयाराम साहनी को खुदाई कार्य के लिए हड़प्पा भेजा । राय बहादुर साहनी के द्वारा की गयी खोजों के द्वारा मार्शल के इस विश्वास की पुष्टि हो गयी कि सिकन्दर द्वारा ३२७ ई.पू. में इस उप-महाद्वीप पर किये गये आक्रमण से भी पूर्व सिन्धु घाटी में सचमुच एक सभ्यता विकसित हुई थी ।

दो वर्ष बाद सन् १९२२ में मार्शल ने एक अन्य पुरातत्त्ववेत्ता को हड़प्पा से ३५० मील दक्षिण में मोहेंजोदड़ो भेजा । हड़प्पा तथा मोहेंजोदड़ो में खुदाई का कार्य कई वर्षों तक चलता रहा । खुदाई में प्राप्त वस्तुओं से यह सिद्ध हो गया कि दोनों नगरों के अवशेषों में आश्चर्यजनक समानता है । इस समानता से इस बात का संकेत मिला कि यहां कभी ऐसी सभ्यता भी हुआ करती थी, जो इस उप-महाद्वीप के इतिहास में दिये गये अब तक के विवरण से भिन्न थी । सिन्धु घाटी की सभ्यता (यह नाम सिन्धु नदी के नाम के आधार पर रखा गया था) २५०० ई.पू. में विकसित हुई होगी तथा १५०० ई.पू. तक लुप्त हो गयी होगी । इस सभ्यता के पतन के कारण आज भी रहस्य ही बने हुए हैं ।

आज की तरह प्राचीन काल में भी मनुष्य ने नए-नए प्रदेश खोजे, समुद्री यात्राएं की तथा साम्राज्यों की स्थापना की । आज से लगभग ५००० वर्ष पूर्व फली-फूली सिन्धु घाटी की सभ्यता इसका जीता-जागता उदाहरण है । उन्होंने न केवल अपनी सभ्यता का विकास किया, बल्कि नगर-नियोजन, जल निकासी व्यवस्था तथा सड़कों के सुनियोजित निर्माण के श्रेष्ठ उदाहरण भी प्रस्तुत किये । सिन्धु घाटी के निवासी केवल नगर-निर्माण से ही संतुष्ट नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपने राज्य क्षेत्र का विस्तार कर एक संपूर्ण साम्राज्य की स्थापना की । फिर भी उनकी सामाजिक एवम् धार्मिक प्रथाएं आज भी एक रहस्य बनी हुई हैं और तब तक रहस्य ही बनी रहेंगी, जब तक हम उनकी अनोखी चित्र-लिपि को पढ़ने में समर्थ नहीं हो जाते ।

इस सभ्यता के संबंध में परेशान करने वाले कुछ पहलू थे - इसका विस्तार, एकरूपता तथा इसकी धीमी प्रगति । बेबीलोनिया की सभ्यता एक क्रमिक विकास का प्रतिफल थी । इसके विपरीत संभवतः सिन्धु घाटी की सभ्यता किसी सैद्धांतिक विस्फोट (Ideological Explosion) के फलस्वरूप अस्तित्व में आयी थी । किन्तु दूसरी ओर सिन्धु घाटी के नगरों तथा बेबीलोनिया के नगरों में एक समानता भी है । दोनों ही ऐसे स्थानों पर स्थित थे जो अब बंजर तथा पूर्णतः उपेक्षित हैं । यही नहीं ग्रीष्म ऋतु में तो सिन्धु घाटी का तापमान १२०० फा. तक पहुंच जाता है और सिन्धु नदी इस भीषण गर्मी के कारण सूख गयी है तथा इसने अपना मार्ग तक बदल लिया है । अब यह नदी इस गर्म प्रदेश से मीलों दूर बह रही है फिर भी इतिहासकार तथा पुरातत्त्ववेत्ता यह मानते हैं कि सिन्धु घाटी की सभ्यता मोहेंजोदड़ो तथा हड़प्पा नामक स्थानों पर ही विकसित हुई थी क्योंकि ये स्थान पकायी गयी ईंटों से बने हुए हैं । इन ईंटों को पकाने के लिए ईंधन के रूप में लकड़ी की प्रचुर मात्रा में आवश्यकता अनुभव की गयी होगी । जाहिर है यहां हरे-भरे जंगल रहे होंगे । इसके अतिरिक्त हड़प्पा में प्राप्त मुद्राओं से हमें ज्ञात होता है कि वे लोग गैंडे, भालू, बन्दर, गिलहरी, तोते, हिरण आदि पशुओं से परिचित थे ।

इन दो प्रमुख नगरों के अतिरिक्त १०० और ऐसे ही अन्य स्थान भी खोजे गये थे । इनमें से अधिकांश नगर अब पाकिस्तान में हैं । इन नगरों में हुए विकास में एक समानता पायी गयी है और इसी समानता से सिन्धु घाटी की सभ्यता की एकता के संकेत मिलते हैं ।


सिन्धु घाटी सभ्यता की विशेषता


सिन्धु घाटी के निवासी बहुत अच्छे नियोजक (Planner) थे । उनके नगर कुशलतापूर्वक नियोजित थे । अधिक बड़े नगरों तथा कस्बों को जिलों में बांट दिया गया था । प्रत्येक जिले में किसी विशिष्ट व्यवसाय को करने वाले कारीगरों का एक विशिष्ट समुदाय रहता था । आजकल की आवासीय समितियों की आवासीय परियोजनाओं (Housing projects) के समान नगरों तथा कस्बों को बनाने से पूर्व उनके निर्माण की एक योजना तैयार जाती थी । मकान काफी बड़े होते थे तथा उनमें एक मुख्य आंगन होता था लेकिन सड़क की ओर खुलने वाली खिड़कियां नहीं होती थीं । मकान में एक छोटी झोंपड़ी भी बनायी जाती थी, जो संभवतः चौकीदार के लिए होती थी । यहां किसी भी प्रकार का फर्नीचर नहीं मिल पाया है । वहां से प्राप्त चित्रों को देखकर, जिनमें वे लोग आलथी-पालथी मारकर जमीन पर बैठे हुए हैं, हम यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि वे लोग फर्नीचर का प्रयोग नहीं करते थे ।


मोहनजोदड़ो का इतिहास । मोहनजोदड़ो की खोज


हड़प्पा तथा मोहेंजोदड़ो के नगरों के नियोजन में प्रायः काफी समानता है । हां, मोहेंजोदड़ो में कुछ सर्वथा भिन्न प्रकार के भवन भी पाये गये थे । इन भवनों में एक विशाल स्नानागार तथा अनाज रखने का एक गोदाम विशेष रूप से देखने योग्य हैं । यह स्नानागार एक आयताकार तालाब के रूप में है तथा इसका आकार 20 x 40 फुट है । इस तालाब को भरने तथा खाली करने की भी व्यवस्था है । इसका तल बहुत सावधानीपूर्वक पकी ईंटों से बनाया गया है । ये ईंटें बिट्युमैन (Bitumen) की एक परत से ढकी हुई हैं और फिर इस परत पर और ईंटें लगी हुई हैं । इस प्रकार से सिन्धु घाटी के निवासी उस विशाल स्नानागार में जल जमा करते थे । इसके चारों ओर उन्होंने बहुत से नहाने के कमरे बनाए हुए थे । ये सभी स्नानागार बहुत कुशलतापूर्वक एक मुख्य नाली से जुड़े हुए थे ।

पुरातत्त्ववेत्ताओं की धारणा थी कि इन स्नानागारों का सम्बन्ध केवल स्नान से न होकर किसी धार्मिक अनुष्ठान से भी रहा होगा । सिन्धु घाटी के नगरों में नालियों की व्यवस्था थी । छोटी नालियां बड़ी नालियों में जाकर मिलती थीं और भली-भांति ढकी हुई थीं, जबकि आज भी इस उप-महाद्वीप में अनेक भागों में ये नालियां खुली हुई पायी जाती हैं । इन नगरों में धार्मिक स्मारक नहीं थे । नगरों की खुदाई में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं । फिर भी पुरातत्त्ववेत्ताओं ने यह मान लिया है कि निश्चय ही एक ऐसा भवन रहा होगा, जो मंदिर के रूप में प्रयुक्त होता होगा ।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि इस सभ्यता का जन-जीवन कैसा था ?

निःसंदेह वहां का जीवन कठोर था, जिसमें ललित कलाओं की अपेक्षा व्यवसाय तथा श्रम करने पर अधिक बल दिया जाता था । हालांकि उस समय की मुद्राएं, अमूल्य रत्न तथा कांसे के आभूषण अद्वितीय कारीगरी का उदाहरण भी प्रस्तुत करते हैं । अस्त्र-शस्त्रों का अभाव इस बात की ओर संकेत करता है कि युद्ध में उन लोगों की कोई रुचि नहीं थी ।

अगला प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि वे लोग देखने में कैसे लगते थे ?

हम उनके शरीर की बनावट तथा मुख-मुद्राओं के विषय में खुदाई के द्वारा प्राप्त अनेक मूर्तियों, खिलौनों तथा धार्मिक वस्तुओं के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । अनेक स्त्री-प्रतिमाएं हीरों-जवाहरातों से सजी हुई हैं तथा उनके केश भी ढंग से संवरे हुए हैं । इन स्त्री-प्रतिमाओं के संबंध में हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं । ये प्रतिमाएं या तो किन्हीं देवियों की हैं या फिर नर्तकियों की । पुरुष प्रायः अर्द्धनग्न अवस्था में ही दर्शाए गये हैं ।

सिन्धु घाटी में मुद्राएं क्या है

सिन्धु घाटी में मुद्राएं इतनी अधिक मात्रा में प्राप्त हुई हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः प्रत्येक परिवार की अपनी-अपनी अलग मुद्रा थी । केवल मोहेंजोदड़ो में ही सेलखडी (Steatite) से निर्मित लगभग १२०० मुद्राएं मिली हैं । ये मुद्राएं वर्गाकार हैं । प्रत्येक मुद्रा पर किसी एक पशु की आकृति बनी हुई है तथा कुछ लिखा हुआ भी है । यह पशु प्रायः बैल होता था । शायद बैल को वैसे ही पूज्य माना जाता रहा होगा, जिस प्रकार कि मिनोअन तथा क्रीट सभ्यता में माना जाता था । कुछ मुद्राओं पर आसन की मुद्रा में बैठे हुए एक सींगधारी पुरुष को दिखाया गया है । यह पुरुष हिन्दुओं के देवता शिव का ही प्रतिरूप जान पड़ता है ।

इन मुद्राओं पर लिखित भाषा को अब तक पढ़ा नहीं जा सका है, न ही इसके विषय में कोई संकेत मिल सका है । सिन्धु घाटी की सभ्यता के निवासी क्या सोचते थे; इनके विश्वास क्या थे; वे किस देवता की पूजा करते थे; हमारे आज के जाति-विभाजन तथा धर्म से कुछ समानता थी या नहीं आदि इन सब पहलुओं के संबंध में हम आज भी अंधेरे में ही हैं । फिर भी इन मुद्राओं ने एक पहेली को तो सुलझा दिया है ।

यह हम निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि सिन्धु घाटी तथा उर (Ur) के मध्य व्यापार हुआ करता था क्योंकि उर में सिन्धु घाटी की मुद्राएं पायी गयी हैं । इसी प्रकार मोहेंजोदड़ो में बेबीलोनिया के मिट्टी के बर्तन पाये गये हैं । इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि बेबीलोनिया तथा सिन्धु घाटी के मध्य भी व्यापारिक संबंध थे ।

सिन्धु घाटी के नगर कई दृष्टियों से आज भी रहस्यमय बने हुए हैं । कुछ इतिहासकारों के अनुसार सिन्धु नदी में आयी बाढ़ के कारण यह सभ्यता पूरी तरह से नष्ट हो गयी । जबकि कुछ लोग १५०० ई.पू. आर्यों द्वारा किये आक्रमण को इसका कारण मानते हैं । दूसरी ओर कुछ पुरातत्त्ववेत्ता जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि को ही इस सभ्यता के विनाश का कारण मानते हैं ।


मोहेंजोदड़ो का पतन


मोहेंजोदड़ो के पतन की कहानी अत्यधिक दुःखद तथा सनसनीखेज है । ऐसा प्रतीत होता है कि इसके नगरों पर पहले आक्रमण किया गया तथा फिर उन्हें जला दिया गया । पुरुषों, स्त्रियों तथा बच्चों को बड़ी संख्या में घरों तथा सड़कों पर मार दिया गया । एक सड़क पर ९ अस्थि-पंजर प्राप्त हुए हैं, जिनमें से ५ अस्थि-पंजर बच्चों के हैं । अन्य स्थानों पर सीढ़ियों पर अनेक लोग मृतावस्था में पाये गये हैं, जिनके सिर पीछे की ओर लुढ़के हुए हैं । शायद वे लोग अपने प्राण बचाने के लिए सीढ़ियों के द्वारा ऊपर की ओर भाग रहे होंगे, तभी उनको मार डाला गया होगा । इन सबसे इस विश्वास की पुष्टि होती है कि आर्यों ने सिन्ध घाटी पर आक्रमण किया था ।

यदि यह सत्य है तो इसका अर्थ यह हुआ कि सिन्धु घाटी की सभ्यता २५०० ई.पू. में अस्तित्व में आयी तथा १५०० ई.पू. में नष्ट हो गयी । वास्तव में ये सभी धारणाएं तभी तक उचित मानी जाएंगी, जब तक हम उनकी लिपि को पढ़ने में असमर्थ हैं ।

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