कबीर के दोहे | Kabir’s couplets – 5

कबीर के दोहे | Kabir Ke Dohe

कबीर के दोहे का संकलन | Kabir Ke Dohe Ka Sankalan

हम वासी उस देश कौ

हम वासी उस देश कौ, जहाँ अविनाशी की आन ।
सख-दुख कोइ ब्यापै नहीं, सब दिन एक समान ॥

हम वासी उस देश कौ, जहाँ बारा मास बिलास ।
प्रेम झरै बिलसै कँवल, तेज पुंज परकास ॥

%25E0%25A4%2595%25E0%25A4%25AC%25E0%25A5%2580%25E0%25A4%25B0%2B%25E0%25A4%2595%25E0%25A5%2587%2B%25E0%25A4%25A6%25E0%25A5%258B%25E0%25A4%25B9%25E0%25A5%2587
हम वासी उस देश कौ, जहँवाँ नहिं मास बसन्त ।
नीझर झरै महा अमी, भींजत है सब अंग।।

हम वासी उस देश कौ, जहाँ जाति बरन कुल नाहि |
शब्द मिलावा होय रहा, देह मिलावा नाहिं ॥

हम वासी उस देश कौ, जहाँ गगनि-धरनि दोऊ नाहिं ।
भॅवरा बैठा पंख बिनु, देखा पलकों माहिं ॥

हम वासी उस देश कौ, जहाँ पार ब्रम्ह का खेल ।
दीपक जरै अगम्य का, बिन बाती बिन तेल ॥

हम वासी उस देश कौ, जहाँ पार ब्रह्म का कूप ।
अविनाशी विनशै नहीं, आवै जाय सरूप ॥

FAQ`s

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *