ताश के पत्तों से भविष्य कैसे जाने | ताश के पत्तों से भविष्य बताने के नियम | Taash Ke Patto Se Bhavishya Batane Ke Niyam

ताश के पत्तों से भविष्य कैसे जाने | ताश के पत्तों से भविष्य बताने के नियम | Taash Ke Patto Se Bhavishya Batane Ke Niyam

ताश के पत्तों के प्रयोगकर्ता/जिज्ञासु के लिए अपेक्षित अर्हतायें ताश के पत्तों से भविष्य के गहन अंधेरों में छुपे जीवन और जीवन की विविध सम्भावित घटनाओं के बारे में जानकारी हासिल करने की प्रक्रिया, एक मजेदार खेल भी है, जो कभी-कभी ही नहीं, अधिकांशतया आश्चर्यजनक भविष्यवाणियाँ करके प्रश्नकर्ता को अचम्भे में डाल देने में पूरी तरह सक्षम है । इसकी यह क्षमता प्रश्नकर्त्ता की गम्भीरता पर आश्रित होती है, उसके ‘मूड’ पर निर्भर करती है । प्रश्नकर्त्ता अपने सवाल को जितनी गम्भीरता से लेगा, जवाब भी वैसा ही, उतनी ही गम्भीरता से युक्त होगा ।

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ताश के पत्ते से भविष्य कथन की अनेक विधियां हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश आज के समय में भ्रामक और अर्थहीन हो चुकी हैं । इसलिए आगे के पृष्ठों में कुछ उन्हीं विधियों को विस्तार दिया गया है, जो विगत में अपनी विश्वसनीयता को प्रमाणित कर चुकी हैं, जो सरल भी हैं, स्पष्ट भी है, सीधी उलझावरहित हैं, जिनमें न तो भ्रम के लिए कोई जगह है, न कोई उलझाव व अस्पष्टता की गुंजाइश । इसलिए आइये देखें — इस कला की वे कौन-सी खास बातें हैं जो एक जिज्ञासु के लिए आवश्यक हैं –

सबसे पहली और खास बात तो यह है कि जिज्ञासु को यह बहुत अच्छी तरह से जान लेना चाहिए कि ताश के प्रत्येक पत्ते की अपनी अलग अहमियत है, अपना अलग अस्तित्व है, अलग संकेत अथवा प्रतिकार्य है; अर्थात् ताश के हर पत्ते का अलग-अलग परम्परागत अर्थ निर्धारित तो है लेकिन इस बदले हुये युग में इस दिशा में भी परिवर्तन और शोध के उपरान्त संशोधन हेतु सतत् प्रयास किया जाना चाहिए । उनमें संशोधन की गुंजाइश नहीं है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए । जिज्ञासु को हर ताश के पत्ते का अर्थ पूरी तरह जान लेना चाहिए |

जिज्ञासु के लिए यह भी जान लेना आवश्यक है कि ताश के हर पत्ते का अर्थ पूर्व निश्चित’ है, लेकिन उससे प्रतिध्वनित अर्थ की व्याख्या करने के लिए जिज्ञासु को साथ के कुछ अन्य पत्तों की भी सहायता लेनी होगी, तभी प्रश्नकर्त्ता के प्रश्न का सही विश्लेषित अर्थ निकल सकेगा । उदाहरण के लिए, मान लीजिए, प्रश्नकर्त्ता द्वारा निकाला गया पत्ता कहता है कि आपको शीघ्र ही ‘कुछ’ मिलने वाला है; तो वह ‘कुछ’ क्या हो सकता है, इसके लिए साथ का खींचा दूसरा पत्ता संकेत करेगा । अब अगर यह पत्ता ‘प्रेम’ प्रतिध्वनित करता है तो पूर्वोक्त पहले पत्ते से ध्वनित शब्दों शीघ्र ही कुछ मिलने वाला है’ का संशोधित अर्थ-संकेत सगाई या शादी के माध्यम से मिलने वाली धनराशि भी हो सकती है । लेकिन अगर साथ का यह पत्ता प्रेम के स्थान पर व्यवसाय की ओर संकेत करता है । तो वह ‘कुछ मिलने वाली वस्तु’ के रूप में व्यवसाय में होने वाले लाभ की ओर संकेत करेगा । प्रायः इस ‘कुछ की व्याख्या प्रश्नकर्त्ता स्वयं कर देता है ।

जिज्ञासु के लिए एक और सावधानी अनिवार्यतः अपेक्षित है, दूसरे शब्दों में आप इसे इस कला के जिज्ञासु के लिए अनिवार्य अर्हता भी कह सकते हैं, कि यह कोई ‘प्रदर्शनकारी कला’ नहीं है । अतः जिज्ञासु से अपेक्षित है कि वह ‘महज खेल या प्रदर्शन करने के लिये, दूसरों को प्रभावित करने या चमत्कार के लिए इस कला का कतई उपयोग न करे – यह वर्जित है।’ क्योंकि मूलतः घुमन्तू जाति के लोगों ने और बाद में फ्रांस में इस कला के जानकारों-आचार्यों ने इस कला को सदैव भविष्य-कथन-कला के रूप में ही स्वीकारा है । मात्र मनोरंजन, प्रदर्शन या रौब गांठने या बाजीगरी दिखाने वाली कला मानकर, इसकी दिव्यता, रहस्यमता को भुलाकर अगर इसका उपयोग करेंगे तो विश्वास मानिए, निराशा ही हाथ आयेगी । इसलिए जिज्ञासु तथा प्रश्नकर्त्ता दोनों ही के लिए गम्भीरता, कला के प्रति दांछित सम्मान, श्रद्धा, विश्वास का होना अनिवार्यतः अपेक्षित है । रहस्यों के प्रति श्रद्धा, विश्वास और जिज्ञासाओं की गठरी अगर आपके पास नहीं है तो कृपया इस कला का उपयोग न करें – अन्यथा अन्धे के हाथ बटेर ही लगेगी ।

अब प्रश्न उठता है कि एक प्रश्नकर्त्ता एक बार में कितनी बार और कितने प्रश्नों के लिए ताश खींच सकता है ? इसके लिए कोई बन्दिश नहीं है । आप एक बैठक में जितने चाहे प्रश्नों के लिए ताश खींचे – लेकिन सावधानी यह रहनी चाहिए कि प्रश्नकर्त्ता अपने प्रश्न को दोहराये नहीं । प्रश्न को दोहराने या दुबारा एक ही प्रश्न के लिए पत्ता निकालते समय यह याद रखना चाहिए कि दुबारा खींचा गया पत्ता मात्र पहले पत्ते का स्पष्टीकरण ही करेगा – मूल पत्ते द्वारा दिये गये संकेत को काट सकना, खींचे गये दूसरे पत्ते के वश से बाहर होता है । कभी-कभी दूसरी बार भी वही, अर्थात् एक प्रश्न के लिए पहली बार खींचा गया पत्ता ही निकलता है तो उसे एक महत्त्वपूर्ण ‘अपशकुन’ या ‘शुभ शकुन’ (जैसा पत्ता हो उसी के अनुरूप) समझना चाहिए । यह नियम या प्रतिबन्ध, सामान्यतः १५ दिन अथवा दो सप्ताह के लिए होता है । इसलिए आवश्यक है, प्रश्नकर्त्ता एक सवाल के लिए दुबारा पत्तों का उपयोग कम से कम १५ दिन न करे ।

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