दोजख का अर्थ । जहन्नुम का मतलब | Dozakh Ka Arth

दोजख का अर्थ

दोजख का अर्थ । जहन्नुम का मतलब | Dozakh Ka Arth

स्वर्ग में जिस प्रकार आनन्द-सागर तरंगें मार रहा है । नर्क मैं वैसे ही विपत्ति की ज्वाला धाँय धाँव जल रही है । क़ुरान में अनेक स्थानों पर जन्नत वर्णन के पास- पास दोजख या जहन्नुम का भी वर्णन आया है; जिसमें कि पापी पाप करना छोड़ अच्छा कर्म करने वाले बनें, और निर्णय के दिन दोजख की अग्नि में न डाले जायँ । यहाँ कुछ दोजख प्रतिपादक वाक्यों को उद्धृत किया जाता है –

१ – डरो उस अग्नि से जिसके इंधन मनुष्य है । (२:३:४)

२ – जिन्होंने हमारे प्रमाणों पर विश्वास नहीं किया, थोड़ी देर में हम उन्हें अग्नि में फेंक देंगे । जब उनका एक चमड़ा जल दूसरा हम बदलेंगे, जिसमें मजा चखें कष्ट आस्वादन करें। (४:८:६)

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३ – उसके बाद जहन्नुम में पीव का जल पिलाया जायगा । एक-एक कुल्ला लेता है किन्तु घोंट नहीं सकता । उसके पास मृत्यु भी आती है, वह नहीं मरता । उसकी पीठ पर बड़ा डण्डा है। (१४:३:४, ५)

४ – उन सारे शैतान के अनुयायियों के लिये दोजख़ का वचन दिया गया है, उसके सात द्वार हैं, प्रत्येक द्वार में एक झुण्ड बाँटा गया है। (१५:३:१६)

५ – उसे अग्नि के समूह में डाल दे । फिर १४० हाथ लम्बी बेड़ी से बाँध दे । वह महान् परमात्मा पर विश्वास नहीं करता था । याचकों को भोजन देने में दत्तचित्त न होता था । यहाँ इसके सिवाय उसका कोई मित्र नहीं । घाव के धोये जल के सिवाय कोई भोजन नहीं । अपराधी छोड़ दूसरा कोई उसे नहीं खाता । (६६:२:२८-३४)

६ – जन्नत में स्वर्गी लोग पूछते हैं, हे पापियो ! क्या तुम्हें दोजख में डाल दिया ? बोले-हम न नमाजी थे, न गरीबो को भोजन कराने वाले थे । हम निर्णय-दिन झुठलाने वाले थे । इतने ही में विश्वसनीय मृत्यु हमारे पास आ गया, फिर सिफारिश करनेवाले की सिफ़ारिश कोई काम की नहीं। (७४:२:६,१०,१२-१४,१६-१८)

७ – “और उत्तर (उत्तर वाले दोजख और दक्षिण वाले जन्नत मे) वाले, कैसे उत्तर वाले ? ज्वाला में, सन्तप्त जल में, धुएँ की छाँह में, जो न शीतल है न स्थिर जकूम वृक्ष (अरब का एक वृक्ष जो बडा कडवा और गंदा स्वाद वाला होता है ) को खायेंगे । उससे पेटों को भरेंगे । फिर उसके ऊपर गर्म जल पीयेंगे । (५६:२:२-५,१३-१५)

८ – काफ़िरों के लिये आग्नेय वस्त्र बनाये गये हैं । उनके सिर पर गर्म जल डाला जाता है । उससे जो कुछ पेट में है और जो चमड़ा है, सब वह जाता है। उनके लिये लोहे के मुद्गर हैं । कण्ठ रुक जाने से वह बाहर निकलना चाहते हैं, किन्तु फिर भीतर डाल दिए जाते हैं। चक्खो नर्क यातना को ।

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