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अग्नि स्तंभन बंगाली मंत्र | अग्नि बांधने का मंत्र | यात्रा स्तम्भन यंत्र | वीर्य स्तम्भन तंत्र | Stambhan Yantra

अग्नि स्तंभन बंगाली मंत्र | अग्नि बांधने का मंत्र | यात्रा स्तम्भन यंत्र | वीर्य स्तम्भन तंत्र | Stambhan Yantra

वीर्य स्तम्भन तंत्र


(१) सोमवार को सायंकाल लाल अपामार्ग (लटजीरा) की जड़ को निमन्त्रण दे आये और मंगल को प्रातः उखाड़ कर लावे और उसे कमर में बाँध मैथुन करे तो वीर्य स्तम्भन होता है ।

(२) घुग्घू नामक पक्षी की जीभ (जुबान) को एक रत्ती गोरोचन के साथ पीस कर ताँबे के ताबीज में भर मुख में रख स्त्री प्रसंग करने से वीर्य स्तम्भन होता है ।

(३) इमली के चियाँ को दो दिन जल में भिंगोकर छिलका उतार दे और बराबर का पुराना गुड़ मिला गोली बना एक गोली खाने से वीर्य स्तम्भन होता है ।

(४) श्याम क्रौंच की जड़ को मुख में रख स्त्री प्रसंग करने से वीर्य स्तम्भन होता है ।

(५) शनिवार के दिन आंक के वृक्ष को निमन्त्रण दे तथा रविवार को उसके फल तोड़ लावे और उस फल की रूई निकाल बत्ती बना दीप जलावे तो जब तक दीप जलता रहेगा वीर्य स्तम्भन होगा ।

यात्रा स्तम्भन यंत्र


विधि – इस यंत्र को एक पत्थर के टुकड़े पर कुमकुम, हरताल, मैनसिल और गोरोचन से लिखकर फूलों से पूजा करे और धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाकर उस पत्थर पर लिखे यंत्र को बराबर की भूमि में खोद कर गाड़ दें तो उसकी यात्रा बन्द हो जायेगी ।

नोट – जहाँ देवदत्त नाम लिखा है, वहाँ पर उस व्यक्ति का नाम लिखना चाहिये ।

अग्नि स्तंभन यंत्र


विधि – इस यन्त्र को दीपावली को सिद्ध कर लें और केशर, हल्दी की स्याही से भोजपत्र पर लिखकर विधिवत् पूजन करके ब्राह्मण भोजन करावे फिर इसे पृथ्वी में गाड़ दे और उस पर पानी की धार छोड़ते जावे तो अग्नि ठण्डी हो जावेगी ।

अग्नि स्तंभन बंगाली मंत्र


अपार बांधौ विज्ञान बांधौ घोरा घाट अरु कोटि
वैसन्दर बांधौ हस्त हमारे भाई आनाहि देखे
झझके मोंहि देखे बुझाइ हनुमन्त बांधौं पानी होइ
जाइ अग्नि भवने के भवै जस मदमाती हाथी हो
वैसन्दर बांधौ नारायण भाषी मेरी भक्ति गुरु
की शक्ति फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।

विधि – इस मन्त्र को विधिवत् (विधान पूर्वक) १० हजार बार जप कर सिद्ध कर ले । सिद्ध हो जाने पर जहाँ कहीं अग्नि का स्तम्भन करना हो वहाँ इस मन्त्र को पढ़कर सात बार पानी के छींटे मारे तो अग्नि शान्त हो जावे ।

ओम् अहो कुम्भकर्ण महाराक्षस कैकसी गर्भ
सम्भूत परसैन्य भंजन महारुद्रो भगवान रुद्र
आज्ञा अग्नि स्तम्भन ठः ठः ।

विधि – इस मन्त्र को शिशिर ऋतु में दो लक्ष (दो लाख) जप कर सिद्ध कर ले, फिर जहाँ काम पड़े इस मन्त्र से जल अभिमन्त्रित करके मारे तो जलती हुई अग्नि रुके ।

ओम् नमो नमो ह्रीं ह्रीं अग्निरूपाय स्तम्भनं मल शरीरे कुरु स्वाहा ।।

विधि – यह अग्नि स्तम्भन मन्त्र दीपावली की रात में विधिपूर्वक दस हजार बार जप कर सिद्ध कर लें और जब प्रयोग करना हो तो १०८ बार जप करे तो अग्नि बँध जावेगी ।

ओम् नमो अग्नेय ज्वालामुखी मनाय, शंकर
सहाय, अग्नि शीतल हो जाय, पार्वती जी की
दोहाई, नोना चमारिन की दोहाई, गुरु गोरखनाथ
शब्द साँचा फुरो मन्त्र ईश्वरो वाचा ।

विधि – इस मन्त्र को शिशिर ऋतु में बृहस्पति के दिन एक हजार जप कर विधिवत् सिद्ध कर ले । फिर जहाँ आग लगी हो नहा-धोकर शुद्ध पवित्र एक लोटा जल कुएँ से इस विधि से खींचे कि रस्सी तथा लोटा जमीन में न लगने पावे । फिर लोटे को हाथ धोकर मन्त्र पढ़ता जावे और जल का छींटा जोर से फेंकता रहे तो जहाँ तक जल का छींटा पहुँचेगा अग्नि ठण्डी होती जावेगी ।

जल बांधौ थल बांधौ आगी की लपट बांधौ
दोहाई हनुमान की, दोहाई महावीर की, दोहाई
नोना चमारिन की।

विधि – इस मन्त्र को दीपावली की रात में एक हजार बार जप कर सिद्ध कर ले । जब आग बाँधना हो तो मन्त्र पढ़ता जावे और जहाँ आग लगी हो चारों तरफ परिक्रमा करे तो अग्नि ठण्डी हो जावेगी ।

अग्नि बांधने का मंत्र


ओम् मतक ढीटे छय घने भेक टीय
भूलोयसी आलिम्य प्रख शनक बोले मन्दी ह्रीं फट्
ओम् ह्रीं महिषवाहिनी स्तम्भन मोहन भेदये
अग्नि स्तम्भय ठः ठः ।

विधि – इस मन्त्र को शिशिर ऋतु में एक लाख जप कर सिद्ध कर ले । फिर ग्वारपाठे (घीकुआर) के रस को हथेली में खूब मल कर अग्नि रक्खे तो हाथ नहीं जले ।

अग्नि शीतल करने का मंत्र


ओम् नमो कोरा करिया, जलसों भरिया,
लै गोरा के सिर पर धरिया, ईश्वर वाले गौर
नहाय, जलती अग्नि शीतल हो जाय, शब्द साँचा
पिंड काँचा फुरो मन्त्र ईश्वरोवाचा सत्य नाम
आदेश गुरु को ।

विधि – इस मन्त्र को शिशिर ऋतु में विधिपूर्वक एक लाख जप कर सिद्ध कर ले । फिर काम पड़ने पर एक मिट्टी का कोरा कलश जल से भर कर मँगवाले और स्नान करके २१ बार मन्त्र पढ़कर उसी कलशे के जल से छींटा मारे । जहाँ-जहाँ पर छींटे लगेंगे आग ठण्डी हो जावेगी । अग्नि के शान्ति हो जाने पर २१ ब्राह्मणों को भोजन करावे और १० ८ मन्त्र की आहुति देवे ।

अग्नि भय निवारण मंत्र


उत्तर स्याम दिग्वभोग, मारी चौनाका
राक्षसः तस्य मूत्र-पुरीषाभ्यां हुतः वह्निः स्तम्भः स्वाहा ।

विधि – पहले इस मन्त्र को शिशिर ऋतु में दस हजार बार जप कर सिद्ध कर ले । जब काम पड़े तब इस मन्त्र को गरम जल से एक अंजुली जल अग्नि के बीच में डाले तो अग्नि का निवारण हो ।

अग्नि निवारण मंत्र


मन्त्र- ॐ फः फः फः ।

विधि – इस मन्त्र को शिशिर ऋतु में एक हजार बार विधिवत् जप कर सिद्ध करे । जब काम पड़े तब कुलीर पक्षी की चोंच को इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करके उस चोंच को अग्नि में डालने से अग्नि का निवारण होता है ।

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