भैरवी मंत्र | भैरवी देवी मंत्र | भैरवी कवच | Bhairavi Sadhana | Bhairavi Mantra | Bhairavi Kavach

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भैरवी मंत्र | भैरवी देवी मंत्र | भैरवी कवच | Bhairavi Sadhana | Bhairavi Mantra | Bhairavi Kavach

यहा भैरवी साधन के मंत्र, ध्यान, यंत्र, जप, होम, स्तव एवं कवच का वर्णन किया जाता है ।

भैरवी – मन्त्र


हसरैं हसकलरीं हसरौः ।
हसरैं हसकलरीं हसरौः ।

इस मंत्र से भैरवी की पूजा और जपादि करना चाहिये ।

भैरवी ध्यान


भैरवी के ध्यान की विधि, विधान निम्न मूल श्लोक (संस्कृत) में दिया जाता है । साधकों को चाहिये कि वह ध्यान करते समय मूल श्लोक का ही प्रयोग करें ।

उद्यद्भानुसहस्रकान्तिमरुणक्षौमां शिरोमालिकां
रक्तालिप्तपयोधरां जपवटीं विद्यामभीतिं वरम् ।
हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्रविलसद्रक्तारविन्दश्रियं
देवीं बद्धहिमांशुरक्तमुकुटां वन्दे समन्दस्मिताम् ।।

टीका – देवी के देह की कान्ति उदय हुए सहस्र सूर्य की भाँति है । वे रक्त वर्ण, क्षौम वस्त्र धारण किये हुए हैं । उनके कण्ठ में मुण्डमाला तथा दोनों स्तन रक्त से लिप्त हैं । इनके चारों हाथों में जपमाला, पुस्तक, अभयमुद्रा तथा वर मुद्रा और ललाट में चन्द्रकला विराजती है, इनके तीनों नेत्र लाल कमल की भाँति हैं । मस्तक में रत्न-मुकुट और मुख में मृदु हास्य सुशोभित है ।

पद्ममष्टदलोपेतं नवयोन्याढ्यकर्णिकम् ।
चतुर्द्वारसमायुक्तं भूगृहं विलिखेत्ततः ।।

नव योनिमय कर्णिका अंकित कर के फिर उसके बाहर अष्टदल पद्म एवं बाहर चतुर्द्वार और भूगृह अंकित करके यन्त्र निर्माण करे । यंत्र को अष्टगंध से भोजपत्र पर लिखना चाहिये ।

उक्त पूजा का जप-होम


दीक्षां प्राप्य जपेन्मन्त्रं तत्त्वलक्षं जितेन्द्रियः ।
पुष्पैर्भानुसहस्राणि जुहुयाद् ब्रह्मवृक्षजैः ।।

दश लाख मंत्र जप से इसका पुरश्चरण होता है और ढाक के फूलों से बारह हजार की संख्या में होम करना चाहिये ।

भैरवी – स्तव


स्तुत्याऽनया त्वां त्रिपुरे स्तोष्येऽभीष्टफलाप्तये ।
यया व्रजन्ति तां लक्ष्मीं मनुजाः सुरपूजिताम् ।।

टीका – हे त्रिपुरे ! मैं वांछित फल प्राप्त होने की आशा से तुम्हारी स्तुति- स्तवन करता हूँ । इस स्तुति के द्वारा मनुष्यगण देवताओं से पूजित कमला को प्राप्त होते हैं ।

ब्रह्मादय: स्तुतिशतैरपि सूक्ष्मरूपां
जानन्ति नैव जगदादिमनादिमूर्त्तिम् ।
तस्माद्वयं कुचनतां नवकुंकुमाभां
स्थूलां स्तुमः सकलवाङ्मयमातृभूताम् ।।

टीका – हे जननी ! तुम जगत् की आद्या हो, तुम्हारा आदि नहीं है, इसी कारण ब्रह्मादि देवतागण भी सैकड़ों स्तुति करके सूक्ष्मरूपिणी तुमको जानने में समर्थ नहीं है । अर्थात् उनकी ऐसी वाक्सम्पत्ति नहीं है, जो तुम्हारी स्तुति करने में समर्थ हो । इस कारण हम नवकुंकुम की भाँति कांतिवाली वाक्य रचना से जननिस्वरूपिणी पुष्ट कुचवाली (स्तनवाली) तुम्हारी स्तुति करते हैं ।

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सद्यः समुद्यतसहस्रदिवाकराभां
विद्याक्षसूत्रवरदाभयचिह्नहस्ताम्
नेत्रोत्पलैस्त्रिभिरलंकृतवक्त्रपद्मां
त्वां हारभाररुचिरां त्रिपुरे भजामः ।।

टीका – हे त्रिपुरे ! तुम्हारी देह की कांति नये उदित हजार सूर्य के समान समुज्जवल है, तुम अपने चारों हाथों में विद्या, अक्षसूत्र, वर और अभय धारण किये हो । तुम्हारे तीनों नेत्रकमलों से मुखकमल अलंकृत है और तुम्हारा गला तारहार (तार के भार) से शोभायमान है, ऐसे स्वरूप वाली, तुम्हारी मैं आराधना करता हूँ ।

सिन्दूरपूररुचिरं कुचभारमनम्र
जन्मान्तरेषु कृतपुण्यफलैकगम्यम् ।
अन्योन्यभेदकलहाकुलमानसास्ते
जानन्ति किं जडधियस्तव रूपमम्ब ।।

टीका – हे जननि ! तुम्हारा रूप सिन्दूर के समान लालवर्ण का है, तुम्हारा देहांश (शरीर) कुचभार से झुका है, जिन्होंने जन्मान्तर में बहुत पुण्य संचय किया है वही उस पुण्य के प्रभाव से तुम्हारा ऐसा रूप देखने में समर्थ होते हैं, और जो पुरुष निरन्तर परस्पर कलह से कुंठित मन हैं, वह जड़मति पुरुष तुम्हारा ऐसा रूप किस प्रकार जान व समझ सकते हैं ?

स्थूलां वदन्ति मुनयः श्रुतयो गृणन्ति
सूक्ष्मां वदन्ति वचसामधिवासमन्ये ।
त्वां मूलमाहुरपरे जगतां भवानि
मन्यामहे वयमपारकृपाम्बुराशिम् ।।

टीका – हे भवानी ! मुनिगण तुमको स्थूल कहकर स्तुति करते हैं, और श्रुतियाँ तुमको स्थूल कहकर स्तुति करती हैं, कोई जन तुमको वाक्य की अधिष्ठात्री देवी कहते हैं, और अपरापर अनेक विद्वान् पुरुष जगत् का मूल कारण कहते हैं, किन्तु मैं तुम्हें केवलमात्र दयासागरी जानता व समझता हूँ ।

चन्द्रावतंसकलितां शरदिन्दुशुभ्रां
पञ्चाशदक्षरमयीं हृदि भावयन्ति ।
त्वां पुस्तकं जपवटीममृताढ्यकुम्भं
व्याख्याञ्च हस्तकमलैर्द्दधतीं त्रिनेत्रम् ।।

टीका – हे जननि ! तुम चन्द्रभूषण से विभूषित हो, तुम्हारे शरीर की कान्ति शरद् के चन्द्रमा की भाँति शुभ्र है, तुम्हीं पचास वर्णोंवाली वर्णमाला हो, तुम्हारे चारों हाथ में पुस्तक, जपमाला, सुधापूर्ण कलश और व्याख्यानमुद्रा विद्यमान है, तुम्हीं त्रिनेत्रा हो, साधकगण इस प्रकार से तुमको अपने हृदय- कमल में तुम्हारा ध्यान करते हैं ।

शम्भुस्त्वमद्रितनय कलितार्द्धभागो
विष्णुस्त्वमन्यकमलापरिबद्धदेहः
पद्मोद्भवस्त्वमसि वागधिवासभूमि:
येषां क्रियाश्च जगति त्रिपुरे त्वमेव ।।

टीका – हे जननि ! तुम्हीं अर्द्धनारीश्वर शंभुरूप से शोभायमान हो, तुम्हीं कमलाश्लिष्टा विष्णु-रूपिणी, तुम्हीं कमलयोनि ब्रह्मस्वरूपिणी हो, तुम्हीं वागाधिष्ठात्री देवी, और तुम्हीं ब्रह्मादिक की सृष्टिक्रियाशक्ति भी हो ।

आकुञ्च्य वायुमवजित्य च वैरिषट्क-
मालोक्य निश्चलधियो निजनासिकाग्रम् ।
ध्यायन्ति मूर्ध्नि कलितेन्दुकलावतंसं
तद्रूपमम्ब कृतितस्तरुणार्कमन्त्रम् ।।

टीका – हे अम्बे ! विद्वान पुरुष वायु निरोधपूर्वक काम-क्रोधादि छह शत्रुओं को जीतकर अपनी नासिका का अग्रभाग देखते हुए चन्द्रभूषण, नये उदय हुए सूर्यरूपी, तुम्हारे रूप का सहस्र कमल में ध्यान करते हैं ।

त्वं प्राप्य मन्मथरिपोर्वपुरर्द्धभागं
सृष्टिं करोषि जगतामिति वेदवाद: ।
सत्यं तदद्रितनये जगदैकमात-
र्नोयेदशेषजगतः स्थितिरेव न स्यात् ।

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हे पर्वतराज-पुत्री ! तुमने मदन दहनकारी महादेव के शरीर का अर्द्धाशि अवलम्बन करके जगत् को पैदा किया है, वेदों में जो इस प्रकार का वर्णन है, वह सत्य ही जान पड़ता है । हे विश्वजननि! यदि ऐसा न होता, तो कभी जगत् की स्थिति संभव नहीं होती ।

पूजां विधाय कुसुमैः सुरपादपानां
पीठ तवाम्ब कनकाचलगहृरेषु ।
गायन्ति सिद्धवनिता:सह किन्नरीभि-
रास्वादितामृतरसारुणपद्मनेत्राः॥

टीका – हे जननि ! जो सिद्धों की स्त्रियों ने किन्नरीगणों के सहित एकत्र मिलकर (एकत्र होकर) आसव रस पान किया, इस कारण उनके नेत्रकमलों ने लोहित कांति धारण की है । यह पारिजातादि सुरतरु के फूलों से तुम्हारी पूजा करती हुई कैलाश पर्वत की कन्दराओं में तुम्हारे नाम का यशोगान करती हैं ।

विद्युदि्वलासवपुषां श्रियमुद्वहन्तीं
यान्तीं स्ववासभवनाच्छिवराजधानीम् ।
सौन्दर्यराशिकमलानि विकाशयन्तीं
देवीं भजे हृदि परामृतसिक्तगात्राम् ।।

टीका – हे देवी ! जिसने बिजली की रेखा के समान दीप्तिमान् देह धारण किया है, जो अतिशय शोभायुक्त है, जो अपने वासस्थान मूलाधार पद्म से सहस्रवार कमल में जाने के समय सुषुम्णा में स्थित पद्मसमूह को विकसित करती है, जिनका शरीर परम अमृत से अभिषिक्त है, वह देवी तुम्हीं हो । मैं तुम्हारी आराधना करता हूँ ।

आनन्दजन्मभवनं भवनं श्रुतीनां
चैतन्यमात्रतनुमम्ब तवाश्रयामि ।
ब्रह्मेशविष्णुभिरुपासितपादपद्मां
सौभाग्यजन्मवसतीं त्रिपुरे यथावत् ।।

टीका – हे त्रिपुरे ! तुम्हारा शरीर आनन्द भवन है, तुम्हारे शरीर से ही श्रुतियाँ उत्पन्न हुई हैं, यह देह चैतन्यमय है, ब्रह्मा, विष्णु और महादेव तुम्हारे चरणकमलों की आराधना करते हैं, सौभाग्य तुम्हारे शरीर का आश्रय करके शोभा पाता है, मैं तुम्हारे ऐसे शरीर का आश्रय लेता हूँ ।

सर्वार्थभावि भुवनं सृजतीन्दुरूपा
या तद्विभर्त्ति पुरनर्कतनुः स्वशक्त्या ।
ब्रह्मात्मिका हरति तत् सकलं युगान्ते
तां शारदां मनसि जातु न विस्मरामि ।।

टीका – हे जननि ! जो चन्द्रमा से भवनों की सृष्टि, सूर्यरूप से पालन और प्रलयकाल में अग्निरूप से उस सबको ध्वंस करती है, उन शारदा देवी को मैं कभी न भूलूँ ।

नारायणीति नरकार्णवतारिणीति
गौरीति खेदशमनीति सरस्वतीति ।
ज्ञानप्रदेति नयनत्रयभूषितेति
त्वामद्रिराजतनये विवुधा वदन्ति ।।

टीका – हे पर्वतराज कन्ये ! साधकगण तुम्हारी नारायणी, नरकार्णवतारिणी (नरकरूपी सागर से तारनेवाली), गौरी, खेदशमनी (दुःखनाशिनी), सरस्वती, ज्ञानदाता, और तीन नेत्रों से भूषिता इत्यादि अनेक रूप में आराधना करते हैं ।

ये स्तुवन्ति जगन्मातः श्लोकैर्द्वादशभिः क्रमात् ।
त्वामनुप्राप्य वाक्सिद्धिं प्राप्नुयुस्ते परां गतिम् ।।

टीका – हे जगन्माता ! जो पुरुष इन बारह श्लोकों से तुम्हारी स्तुति करते हैं वह तुमको प्राप्त करके वाक्सिद्धि प्राप्त करते हैं, और देह के अन्त में परमगति को प्राप्त होते हैं ।

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भैरवी-कवच


अब भैरवी कवच के मूल मंत्र को मूल श्लोक संस्कृत में निम्न दिया जा रहा है और उसकी टीका हिन्दी में की गई है । साधक को चाहिए कि पाठ करते समय मूल श्लोक का ही प्रयोग करें ।

भैरवी कवचस्यास्य सदाशिव ऋषिः स्मृतः ।
छन्दोऽनुष्टुब् देवता च भैरवी भयनाशिनी ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्त्तितः ।।

टीका – भैरवी कवच के ऋषि सदाशिव हैं, छंद अनुष्टुप् हैं, देवता भयनाशिनी भैरवी हैं और धर्मार्थ-काममोक्ष की प्राप्ति के लिए इसका विनियोग कहा गया है ।

हसरैं मे शिरः पातु भैरवी भयनाशिनी ।
हसकलरीं नेत्रञ्च हसरौश्च ललाटकम् ।।
कुमारी सर्वगात्रे च वाराही उत्तरे तथा ।।
पूर्वे च वैष्णवी देवी इन्द्राणी मम दक्षिणे ।
दिग्विदिक्षु सर्वत्रैव भैरवी सर्वदाऽवतु ।
इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद्देवि भैरवीम् ।
कल्पकोटिशतेनापि सिद्धिस्तस्य न जायते ।।

टीका – हसरैं मेरे मस्तक की, हसकलरीं नेत्रों की, हसरौः ललाट की, तथा कुमारी सर्वगात्र की रक्षा करें । वाराही उत्तर दिशा में, वैष्णवी पूर्व दिशा में, इन्द्राणी दक्षिण दिशा में, और भैरवी दिशा-विदिशा में सर्वत्र सदा रक्षा करें। इस कवच को बिना जाने जो कोई भैरवी मंत्र का जप करता है, करोड़ कल्प में भी उसको सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

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