शेरशाह सूरी Sher Shah Suri

शेरशाह का जन्म १४७२  ई॰ में वर्तमान पंजाब राज्य के होशियारपुर शहर के पास बांजवाड़ा परगना मे हुआ था |  उनका असली नाम फरीद था  और वह एक साधारण जागीरदार के बेटे थे। "शेर खां" नाम उसने अपनी वीरता से जीता।

शेरशाह के दादा सूर जाति के अफगान थे। वह पेशावर के निकट रहता थे। उसका पेशा सिपाहीगिरी था, इसीलिए वह फौजी नौकरी की खोज में पूर्व की ओर आए थे। उसका बेटा हसन भी उसके साथ था। दोनों वर्तमान पंजाब राज्य के होशियारपुर शहर के पास बांजवाड़ा परगना में रहने लगे। वही फरीद का जन्म हुआ था । फरीद अभी बच्चा ही था की हसन को जौनपुर के सूबेदार के यहां नौकरी मिल गई। उसने हसन को सहसराम की जागीर दी। हसन अपने परिवार सहित सहसराम चले गए

फरीद की एक सौतेली मां भी थी। वह चाहती थी कि पिता की मृत्यु के बाद सहसराम की जागीर उसके बेटे को मिले। इसीलिए फरीद उसकी आंखों में खटकता था। उसका हसन पर भी बहुत प्रभाव था, इसीलिए वह भी फरीद के साथ खराब बर्ताव करने लगा। इससे नवयुवक फरीद का मन खराब रहता था। अंत में वह सहसराम में छोड़कर जौनपुर चला गया। यहीं से उसके जीवन में संघर्ष का आरंभ हुआ |

सबसे पहले उसने अपनी शिक्षा पूरी करने का निश्चय किया। फरीद की प्रतिभा से उसका उस्ताद जमाल इतना प्रसन्न हुआ कि उसने हसन से कहा – “तुम्हारा बेटा बहुत ही काबिल है तो उसकी काबिलियत से फायदा क्यों नहीं उठाते हैं ?”

हसन जमाल खान की बात मानी और फरीद को बुलाकर उसे सहसराम तथा खवासपुर की जागीर के प्रबंध का काम सौंप दिया। फरीद ने जगीरो का इतना अच्छा प्रबंध किया कि देखने वाले दंग रह गए। लेकिन फरीद की सौतेली माता उसकी इस सफलता पर ईर्ष्या से जल उठी। फरीद को फिर सहसराम छोड़कर आगरा जाना पड़ा। पर जब उके पिता की मृत्यु हुई तब फरीद ने एक शाही फरमान द्वारा जागीर पर कब्जा कर लिया। १५२२ ई॰ में उसने बिहार के नवाब बाहर खा लोहानी के पास नौकरी कर ली और शीघ्र ही अपनी मेहनत और ईमानदारी से नवाब को प्रसन्न कर लिया। एक दिन बाहर खा शिकार खेलने निकला, उस समय फरीद उसके साथ था। जब वे जंगल में पहुंचे तब अचानक एक शेर ने आक्रमण कर दिया। शेर नवाब को मार ही डालने वाला था की फरीद वीरता पूर्वक आगे बढ़ा और उसने अकेले ही शेर को मार डाला। बाहर खा ने प्रसन्न होकर उसे शेर खां की उपाधि दी और उस दिन के बाद से वह फरीद के बदले शेरखान कहलाने लगा। इसके अलावा बाहर खा ने उसे अपना वकील और अपने लड़के जलाल खान का अध्यापक भी नियुक्त किया।

फरीद के अनेक शत्रुओं ने नवाब के कान भरे जिसके फलस्वरूप सहसराम की जागीर उससे फिर छीन ली गई। इस समय बाबर दिल्ली का सम्राट था। समय को देखते हुए शेरशाह ने मुगल सेना में नौकरी कर ली।

लगभग कुछ साल बाद बहार खां की मृत्यु हो गई। शेर खां फिर बिहार लौट आया और अपने शिष्य जलाल खान का संरक्षक बनकर उसके नाम से शासन करने लगा। धीरे-धीरे ४ साल में उसने अधिकांश सेना को अपने साथ मिला लिया। इसी बीच में चुनार का शासक ताज खां अपने बेटे के हाथों मारा गया। उसकी विधवा पत्नी लॉड मलिका ने शेर खां से विवाह कर चुनार का किला उसे सौंप दिया।

शेर खां की उन्नति को देखकर खुद जमाल खां घबराया। उसने इस तानाशाह को अलग कर देने का प्रयत्न किया,  पर सफल नहीं हो सका।

जमाल खान घबराकर बंगाल आया और वहां की राजा महमूद शाह से सहायता मांगी। महमूद शाह भी शेर खां की बढ़ती हुई शक्ति से डर रहा था। वह जमाल खान की सहायता को तुरंत तैयार हो गया। दोनों की सेनाओं ने शेर खां पर आक्रमण किया। जिसमें बंगाल के सुल्तान और अफगानी सरदारों की हार हुई।

जब हुमायूं ने गुजरात पर चढ़ाई की और वहां की सुल्तान बहादुर शाह से लड़ने में व्यस्त हो गया उसी समय मौका देख कर शेर खां ने चुपके से बंगाल पर चढ़ाई कर दी। सुल्तान महमूद शाह ने अफगानों का मुकाबला करने की हिम्मत नहीं थी। वह शेर खां की शक्ति पहले देख चुका था। इसीलिए उसने लाखो अशर्फी और बहुत से इलाका देकर समझौता कर लिया। इससे शेर खां की शक्ति और प्रतिष्ठा पहले से भी अधिक बढ़ गई। उधर गुजरात में हुमायूं ने बहादुर शाह को हरा दिया था। नतीजा यह हुआ कि बहुत से अफगान सरदार अपने नए नेता शेर खां से आ मिले।

हुमायूं गुजरात से लौटकर आगरा में आराम करने लगे। लेकिन शेर खां ने अपने नए अफगान सरदारों को लेकर फिर बंगाल पर चढ़ाई कर दी। इस बार शेर खां का इरादा यह था कि बंगाल पर कब्जा करके उसे अपने राज्य में मिला ले। उसने बंगाल की राजधानी गौड़ को घेरा। हुमायूं को इस आक्रमण की सूचना मिली तो वह चौक उठा। शेर खां ने उस समय की परिस्थितियों से लाभ उठाया और अप्रैल १५३८ में गौड़ पर अधिकार कर लिया।

हुमायूं चुनार की विजय करने में असफल रहा और जुलाई १५३८ में गौड़ की ओर चल पड़ा। शेर खां को युद्ध का काफी अनुभव प्राप्त हो चुका था। वह हुमायूं से बंगाल में लड़ना नहीं चाहता था। इसलिए वह आप ही गौड़ से हट गया और उसने बिहार जौनपुर तथा कन्नौज में मुगल इलाकों को जीतना और लूटना शुरू कर दिया।

इसी बीच बरसात शुरू हो चुकी थी। हुमायूं स्वभाव से ही आलसी और विलासी था। वह गौड़ मे विजय का जश्न मनाने लगा और अपनी नींद से उस समय जागा जब शेर खां ने उसके बहुत से इलाकों पर अधिकार कर आगरा लौटने की सब मार्ग बंद कर दिए थे। हुमायूं आगरा लौटने के लिए बंगाल से जल्दी भागा। लेकिन शेर खां ने उसका मार्ग रोका। घमासान युद्ध हुआ। बहुत से मुगल सैनिक या तो पकड़े गए या नदी में डूब गए। हुमायूं ने भी अपना घोड़ा गंगा में डाल दिया। वह डूबने ही वाला था की एक भिश्ती की सहायता से गंगा पर की |

बाद में जब हुमायूं बादशाह हुआ तो कहते हैं कि उसने अपने वचन के अनुसार उस भिश्ती को १  दिन का राज्य दिया। भिश्ती ने उस दिन अपने नाम से चमड़े का सिक्का चलाया।

अब तक शेर खा कन्नौज से असम तक के एक बहुत बड़े इलाके का शासक था। सम्राट की उपाधि धारण करके शेर खां से शेरशाह बन गया। उसने जीते हुए इलाकों का अच्छा प्रबंध कर अपने राज्य को और भी मजबूत बनाया।

हुमायूं बहुत प्रयत्न करने पर भी किसी का सहयोग प्राप्त न कर सका। इसीलिए अगले साल उसने अकेले ही शेरशाह पर चढ़ाई की। मई १५४० को मुगल और अफगान सेनाओं का कन्नौज के पास सामना हुआ। शेरशाह के पास पचास हजार सैनिक थे और हुमायूं के पास एक लाख। लेकिन मुगल सेना का संगठन अच्छा नहीं था, नतीजा यह हुआ की  जीत अफ़गानों के हाथ रहा। हुमायूं प्राण बचाकर भागा और कई र्षों तक इधर-उधर भटकता फिरा और शेरशाह हिंदुस्तान का बादशाह बन गया।

शेरशाह पांच वर्षों तक दिल्ली का बादशाह रहा। उसने थोड़े से समय में इतना काम किया | वह हिंदुस्तानी होने के नाते भारतीय परंपरा से परिचित था वह जानता था किस समय के अनुकूल प्रणाली कैसी होनी चाहिए। उसे अपने पठान-सरदारों के अलावा हिंदुओं का भी विश्वास और सहयोग प्राप्त था। उनकी सहायता से उसने शासन प्रणाली में बड़े-बड़े सुधार किए। आगे चलकर अकबर महान ने इन्हीं सुधारों के आधार पर अपने राज्य की नीव मजबूत की।

शेरशाह ने देश के एक भाग को दूसरे भाग से मिलाने के लिए सड़कों का जाल सा बिछा दिया। इन सड़कों द्वारा ही देश की एकता स्थापित हुई। सड़कों में सबसे बड़ी “ग्रांड ट्रंक रोड” आप अभी भी देख सकते है। यह कोलकाता से पेशावर तक जाती थी। उसने सड़कों के दोनों और छायादार पेड़ लगवाए मुसाफिरों के लिए विश्रामगृह और डाक की चौकियां बनवाईं। इन चौकियों के द्वारा डाक देश के एक भाग से दूसरे भाग में पहुंचती थी। बादशाह के जासूस भी देश भर की खबरें उन्हे भेजते थे। अपने अफसरों की काम की निगरानी शेरशाह खुद करता था।

अत्यंत योग्य और महान शासक बड़ी छोटी सी उम्र में ही मर गया। विधवानों का मानना है की वह एक किले पर घेरा डाले थे तभी अचानक एक सुरंग फट जाने से मई १५४५ ई॰ को शेरशाह की मृत्यु हो गई।

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