महाराजा रणजीत सिंहMaharaja Ranjit Singh


महाराजा रणजीत सिंह को "पंजाब का सिंह" कहा जाता था। उनकी गर्जना से आसपास के राजे महाराजे और भारत मे उस समय के अंग्रेज शासक भी थर्राते थे।

सन १७८० में जब उन्होंने जन्म लिया था पंजाब छोटे-छोटे राज्य में बांटा था। उनमें सिखों के बारह राज्य थे। उनके पिता महासिंह इन्हीं बारह राज्यों में से एक के सरदार थे। वह इन सब को एक मे  मिलाकर एक विशाल सिख राज्य स्थापित करना चाहते थे। परंतु इस काम में वह सफल न हो सके।

महाराजा रणजीत सिंह १२ वर्ष के थे, तभी उनके पिता महासिंह का स्वर्गवास हो गया। इस छोटी आयु में ही पिता ने उनके मन में योद्धा बनने की जो इच्छा पैदा कर दी थी |

महाराजा रणजीत सिंह देखने में बिल्कुल सुंदर ना थे। उनका कद छोटा था। मुख पर चेचक के दाग थे। चेचक से एक आंख भी जाती रही थी। उनके पिता से जो लोग मिलने आते थे वे जब इस पर दुख प्रकट करते थे तब महासिंह ललकार का कहते थे मुझे इस बात का जरा भी दुख नहीं है कि मेरा बेटा सुंदर नहीं है। सुंदरता तो लड़की में देखी जाती हैं। लड़के को वीर होना चाहिए और मेरा बेटा वीर होगा।

वह पुत्र रणजीत सिंह को अपने साथ घोड़े पर चढ़ा कर ले जाते थे और स्वयं बंदूक से निशाना लगाना सिखाते थे। लड़कपन का यह खेल वह जीवन भर खेलते रहे। पढ़ना-लिखना सीखने की उन्हें फुर्सत ही ना मिली। उन दिनों योद्धाओं के लिए पढ़ना-लिखना आवश्यक भी ना समझा जाता था।

पिता के मरने के बाद लखपत राय दीवान हुए और रणजीत सिंह की माता उनकी संरक्षिका हुई। बचपन में ही उनकी शादी भी करा दी गई। उनकी माता, सास, दीवान सभी रणजीत सिंह को अपने हाथ का गुड्डा बनाकर रखना चाहते थे। परंतु पांच वर्ष बाद ही जब वह सत्रह वर्ष के हुए इन सब से स्वतंत्र होकर अपना राजकाज चलाने लगे।

उन्हीं दिनों शाहजमां अफगानिस्तान की राजगद्दी पर बैठा। उसने पंजाब पर चढ़ाई कर दी और लाहौर ले लिया। तब सिखों में अफगानीयो से खुलकर लड़ने की ताकत न थी। फिर भी रणजीत सिंह ने उसकी बारह तोपें, जो झेलम नदी में बाढ़ आ जाने से डूब गई थी, उसे वापस कर दी। इससे शाहजमां ने सोचा कि आज नहीं तो कल रणजीत सिंह उससे अवश्य लड़ेंगे अतः वह उन्हें लाहौर सौंप कर वापस चला गया।

रणजीत सिंह ने लाहौर को अपनी राजधानी बनाया और जल्दी ही पंजाब के समस्त छोटे राज्यों को मिलाकर एक बड़ी सिक्ख राज्य की रचना कर डाली। अब तो उनसे अंग्रेज, मराठे और काबुली सभी घबराने लगे। अंग्रेजों की ओर से लॉर्ड मिंटो ने १८०९ में उनसे अमृतसर में संधि की। उसके अनुसार यह तय हुआ कि महाराजा रणजीत सिंह सतलुज नदी के पूर्व में अपना राज्य न बढ़ाएं। महाराजा रणजीत सिंह ने आजन्म इस संधि का पालन किया। पूर्व की ओर तो वह नहीं बड़े परंतु पश्चिम और उत्तर में उन्होंने काफी प्रदेश जीते।

अफगानिस्तान का बादशाह शाहजमां १८०९ में गद्दी से उतार दी जाने के कारण उनकी शरण में आया। रणजीत सिंह ने उसकी सहायता की। बदले में उन्हें उसने कोहिनूर हीरा दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अटक, कांगड़ा, मुलतान, कश्मीर और पेशावर तक अपना राज्य बढ़ा लिया।

बिल्कुल न पढ़े होने पर भी महाराजा रणजीत सिंह इतने सफल इसलिए हुए क्योंकि वह वीर योद्धा होने के साथ-साथ सभी मनुष्य और सभी धर्मों का आदर करते थे। सिक्ख हिंदू मुसलमान सबको समान समझते थे। उनके दरबार में सब प्रकार के लोग थे। सबको दरबार में जाने और अपनी विपत्ति सुनाने की छूट थी।

उनके दरबारियों में सबसे बड़ा नाम जमादार खुशाल सिंह को प्राप्त था । वह गौड़ ब्राम्हण था और मेरठ जिले का रहने वाला था । जीविका चलाने के लिए लाहौर गया था और महाराजा रणजीत सिंह की फ़ौज में भर्ती हो गया । एक रात को जब वह पहरे पर था, महाराजा महलों के बाहर अकेले ही घूम रहे थे । उसने उन्हें पहचाना नहीं और गिरफ्तार कर लिया । दूसरे दिन सवेरा होने पर पहचाना  तब वह बहुत डरा । परंतु महाराजा उससे बहुत प्रसन्न हुए क्युकी उसने अपने कर्तव्य का पालन किया था। इतना ही नहीं, उसे उन्होंने अपना प्रधान ड्योढ़ीवान और दरबारी नियुक्त किया ।

हिंदुओं की भांति ही उनके दरबारियों में मुसलमान भी आदर के स्थान पर बैठाए जाते थे। मुसलमान दरबारियों में फकीर अजीजुद्दीन मुख्य थे ।महाराजा उसका इतना विश्वास करते थे कि एक बार उसे अंग्रेज़ो के पास अपना राजदूत बनाकर भेजा था ।

प्रजा की भलाई का भी उन्हें ख्याल रहता था । एक बार वह एक किसान के खेत के बीच से घोड़ा दौड़ाते चले जा रहे थे । जरूर ही उससे फसल को कुछ हानि पहुंची थी । किसान ने उन्हें पहचाना नहीं और आगे बढ़कर टोका – “ऐ सवार ! क्या तू जनता नहीं कि इस देश में महाराजा रणजीत सिंह का राज्य हैं जो किसानों को हानि पहुंचाने वाले को कठोर दंड देते हैं।“

महाराजा किसान के मुख से ऐसा सुनकर वापस लौट आए।

उन्होंने अपनी फ़ौज का संगठन यूरोपियन ढंग से किया था और इस कार्य ने फ्रांसीसी जनरल वेंटुरा और अंग्रेज़ जनरल एलार्ड और कोर्ट से सहायता ली थी । उनकी फ़ौज में ५० हजार घुड़सवार, इतने ही पैदल सिपाही थे और ३०० तोपे थी ।

एक ऐसे समय में, जबकि पूर्व से अंग्रेज़ और पश्चिम से काबुली पंजाब पर अधिकार जमाने में पूरा मे ज़ोर लगा रहे थे, महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी वीरता, सैनिक संगठन और कूटनीति के बल से दोनों को विफल किया और पंजाब को एक शक्तिशाली राज्य बना लिया । यह उनकी बहुत बड़ी सफलता थी । इसी कारण उनकी गिनती भारतीय इतिहास के महापुरुषों में की जाती हैं ।

अंत में वह लकवा के रोगी हुए । उनका सम्पूर्ण शरीर बेकार हो गया और वह बोलने में असमर्थ हो गए, परंतु उस दशा में भी पालकी मे बैठकर वह अपनी फ़ौज की परेड देखते थे क्युकी वह देश की रक्षा के लिए सैनिक संगठन को बहुत महत्व देते थे ।

इसी रोग के आक्रमण से २७ जून १८३९ को वह स्वर्गवासी हुए ।

उनके पश्चात सिख समाज की एकता को कायम न रख सके ।एक दूसरे के प्रति अविश्वास और आपसी बैर के कारण सिख राज्य समाप्त हो गया । यदि सिक्खों ने पंजाब की उस एकता को, जो महाराजा रणजीत सिंह ने स्थापित कि थी, बनाए रखा होता तो भारत से अंग्रेज़ १८५७ में ही चले गए होते ।        

Post a Comment

और नया पुराने

LISTEN ON "SUNTERAHO.COM" :

LISTEN ON "SUNTERAHO.COM" :