कविता | Poems

रचयिता - श्री योगेश शर्मा "योगी"


सूखे घाट की प्यास, बुझेगी अबकी बार |
सियासत के सावन, बरसेंगे अबकी बार ||

काल की कुटिया मे, गीत लिखे जाएगे |
कलम की काया भी, कापेंगी अबकी बार ||

वायदो के व्यंजन से, हमने जो पेट भरा |
शुद्ध नीर मिलेगा, नेजे पर अबकी बार ||

वो बोले मैं अच्छा, ये बोले मैं अच्छा हू |
अच्छों को अच्छा, मिलेगा अबकी बार ||

श्रम के शरीर पर, शाहजहा की गठरी है |
मुमताज़ को मोक्ष मिलेगा अबकी बार ||

झूठ के करतबो ने, बहुत कुछ बदला है |
सच्चाई को स्वीकार करेंगे अबकी बार ||

लालकिले की ललकारे, ललकार रही है |
सच्चाई को स्वीकार करेंगे अबकी बार ||

शहंशाही किस्सो मे, हम खुद को ढूंढ रहे |
फिर कर्जो की किस्त बटेंगी, अबकी बार ||


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