आधुनिक युग मे विवाह का महत्त्व

Marriage In The Modern Era

इक्कीसवी सदी मे आने के बाद भी मानव विवाह विधि का विकल्प खोज नहीं पाया है । इसी बात से इसकी महत्ता सिद्ध होती है। मानव यहा केवल अस्तित्व हीं नही पाता, पालित-पोषित तथा संस्कार पाता है ।

भारत मे प्राचीनकाल में सर्वाधिक प्रचलित रूप “स्वयंवर” रहा है, पर उसमें पति को स्वयं वरने के स्थान पर एक शर्त रहती थी, जिसे पूरा करने पर ही वर वधू को प्राप्त कर सकता था जैसे राम ने शिव धनुष तोड़ा, तो सीता को पाया | ऐसे पाने मे विजय की अनुभूति तो होती थी, पर वधू केवल वस्तु बनकर रह जाती थी| इसके साथ ही साथ वधू को स्वयं वर चुनने का अधिकार था |

शर्तवाले विवाह में स्त्री एक बेजान वस्तु रहती है जिसे खरीदा, बेचा या जुए में हारा (जैसा द्रौपदी के साथ हुआ) भी जा सकता है परंतु प्रेम में संबंध सहभागिता पर टिके रहते है। सूर्यासावित्री ने अपने मंत्रों में इसी प्रेम-भाव को महत्व दिया है तथा स्त्री-पुरुष की समानता के विशिष्ट आयाम दिये हैं । दोनों भिन्न होते हुए भी असमान नहीं, समान हैं। दोनों में से कोई यहां किसी से छोटा बड़ा नहीं है।

सूर्यसावित्री नाम की महिला ऋषी ने ऋग्वेद तथा अथर्वेद मे विवाह जैसी महत्त्वपूर्ण ठोस आधार खोजने का प्रयत्न किया है । सूर्या, सूर्य को प्रभा के समान तेजस्विनी तथा सावित्री अर्थात प्रेरणादायिनी थी । यही कारण है सूर्यासावित्री के मंत्र पिछले तीन-साढ़े-तीन हजार वर्षों से भारत में आज तक विवाह संस्कार विधि में प्रयुक्त होते रहे हैं |

विवाह मे समाज में बुराईया


आज के त्वरित जीवन में जब हर चीज के शॉर्टकट ढूँढने का प्रयत्न रहता है तब विवाह संस्कार मैं परंपरा का निर्वाह करने के लिए मंत्रो को विभिन्न रस्मों - जैसे सप्तपदी, धुव दर्शन, अश्मारोहण या प्रतिज्ञावचनों में प्रयुक्त तो किया जाता है । परंतु प्राय: जो पुरोहित विवाह करवाते हैं वे सदैव इतने विद्वान नहीं होते कि ठीक से वर-वधू को उनके अर्थ समझा सके | यदि भाग्य से विद्वान पुरोहित उपलब्ध हो भी, तो वधू-पक्ष तथा वर पक्ष दोनों को इतनी जल्दी रहती है, कि विवाह की रस्मे खानापूर्ति भर रह जाती हैं | सूर्यासावित्री के कुछ मंत्रों एवं मंत्रांशों को विवाह-संस्कार में प्रयुक्त करने के साथ-साथ उनके अर्थों को जीवन में अनूदित करने का प्रयत्न बहुत सार्थक हो सकता है। आज जो विकृतियां परिवार तथा समाज में व्याप्त हैं उनका समाधान यहां उपलब्ध है बशर्तें हम उन सिद्धांतों को समझने और अपनाने को तैयार हों ।

विवाह का आदर्श


सूर्यासावित्री के विवाह-संबंधी मंत्रों में विवाह का आदर्श आधारित है । आदर्श और यथार्थ में अंतर सदा रहा है, आज भी है। परंतु आदर्श जब सामने रहता है तो कुछ न कुछ प्रयत्न उस तक पहुंचने का किया जाता है । इन मंत्रों में विवाह 'सत्य' और 'ऋत' ऋजुता या सरलता के सिद्धांतों पर आधृत है। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राचीन समय से दहेज में धनस्वर्ण, गाय आदि दी जातीं थीं । परंतु वह भी वधू-पक्ष की इक्छा से न कि वर-पक्ष की मांग पर | सूर्या के संदर्भ में देखें तो सूर्या का तेज, उसके गुण, उसकी सर्जना शक्ति, मंत्र-रचना, सामर्थ्य तथा हजारो ऋचाए ही उसका दहेज बतायी गयी हैं।

वधू जब अपने पितृकुल के प्रिय संबंधीजनों को छोड़कर पति-गृह में आती है तब पति उसे दृढता से प्रेमबंधन में बांध लेता है - सुबद्धामुतस्करम्' (ऋग्वेद १०.८५.२४) तथा स्वयं भी स्नेह के बंधनों में बंध जाता है- "पतिबंधेषु बध्यते' (ऋ्वेद १०.८५.१८) इसी लिए अवसर पर निम्न मंत्र वर परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वधू के संबंधों को मजबूत बनाता है- साम्राज्ञी श्रुवशुरे भव, सम्राज्ञी श्रश्रुवां भव ननांदरि सप्राज्ञी भव, सम्राज्ञी अधि देवृषु (ऋम्वेद १०.८५.४६)

अर्थात 'हे वधू । तुम श्वसुर, सास, ननद तथा देवर सबकी महारानी बनो । यहां पतिकुल में वर्णित स्त्री हीनभावनाग्रस्त नहीं है अपितु आत्म-सम्मान, आत्मगौरव से उसका व्यक्तित्व आलोकित है।

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