एनी बेसेंट | Annie Besant


अंग्रेज़ अपना व्यापार और हुकूमत कायम करने की लालसा से जिन देशों में गए, उनमें भारत सबसे प्राचीन था। भारत का अपना धर्म व संस्कृति बहुत ऊंची थी। उसके साहित्य का भंडार अगाध था। ज्ञान-विज्ञान में भी उसने विशेष उन्नति की थी। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के सर्व-धर्म सम्मेलन में पहली बार पश्चिम को इसका बोध कराया था। एनी बेसेंट वहां मौजूद थीं। स्वामी विवेकानंद के प्रभावशाली व्यक्तित्व और भारत की महानता और गरिमा की छाप उनके हृदय पर उसी समय पड़ गई थी। इसी कारण उन्हें अपने को भारत के साथ तन्मय करने में अधिक समय नहीं लगा।

 

एनी बेसेंट एक साधारण कुल में १ अक्तूबर १८४७ को लंदन में पैदा हुईं। लिखने, बोलने, विचार करने, संगठन और आंदोलन करने में वह शुरू से ही कुशल थीं। उनके पिता डा० विलियम बेजवुड का जन्म आयरलैंड में हुआ था लेकिन वह लंदन मे बस गए थे। एनी  बेसेंट का जन्म का नाम वुड था। उन्होंने कई भाषाएं सीखी थी | १८६७ में पादरी फ्रैंक बेसेंट के साथ उनका विवाह हो गया | स्वतंत्र विचार रखने और रुढियो में विश्वास न होने से उनकी अपने कट्टर व धर्मान्ध पति के साथ निभ नहीं सकी। अपनी कन्या की बीमारी के कारण उनके हृदय में कुछ ऐसी उथल-पुथल मची कि भगवान से उनका विश्वास उठ गया। वह नास्तिक बन गई। पति गिरजाघर जाने और ईसाई धर्म का पालन करने पर जोर देने लगे। कितु, उनकी स्वतंत्र आत्मा को दबाया न जा सका। रिणाम यह हुआ कि १८७३ में तलाक देकर दोनों एक-दूसरे से अलग हो गए। एनी बेसेंट का पारिवारिक जीवन सुखी नहीं रहा। इसलिए अपना मन दूसरी तरफ लगाने के लिए उन्होंने तभी से लिखना शुरू कर दिया। लेखन कार्य से उन्हें जो पैसा मिलता था उस पर वह बडा गर्व अनुभव करती थीं। एक बार एनी बेसेंट बहुत बीमार पड़ी, यहां तक की उन्होंने आत्महत्या तक करने की बात सोच डाली। पर फिर उनके हृदय से आवाज आई कि इस तरह कायर को मौत न मरो बल्कि काम करते हुए शहीद की मृत्यु मरो। बस फिर क्या था, उनमें आत्मविश्वास आ गया और उन्होंने फिर कभी आत्महत्या की बात नहीं सोची। घर-गृहस्थी और परिवार के झंझटों से छुटकारा पाकर एनी बेसेंट और अधिक विद्रोही हो गई, वह रूढ़ियों और अंधविश्वासों को तोड़ कर सत्य को अपनाने और उसको फैलाने में लग गई। उन्होंने कुरीतियों को दूर करने में अपने को ऐसा लगाया कि ईसाई जगत में खलबली मच गई। समाचार-पत्र में बड़ी आलोचना हुई और सभाओं में विरोध किया जाने लगा। उन पर पत्थर बरसाए गए और धर्म का विरोध करने के आरोप में मुकदमा चलाया  गया। उनकी इकलौती बेटी को उनसे अलग कर पति को दे दिया गया। इतना होने पर भी ह अपने विचारों से टस से मस न हुई। बल्कि और अधिक तेजी से उनके प्रसार में लग गईं। आगे चलकर वह न्यू माल्थूजियन लीग की नेता बन गई।


एक बड़े दल का संगठन करके उन्होंने यह मनवा लिया कि पाल्लियामेंट के सदस्य के लिए ईश्वर की शपथ लेना जरूरी नहीं है। उन्होंने मजदूरों के लिए बड़ा आंदोलन किया तथा सोशलिस्ट डिफेंस एसोसिएशन कायम की; लिंक नाम का पत्र निकाला और भारत तथा आयर के स्वतंत्रता आंदोलनों का पूरी तरह समर्थन किया | १८८२ में उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।

 

“थियोसोफ़िकल सोसाइटी” की संस्थापक मैडम ब्लैवेत्स्की से उनकी मुलाकात हुई। नास्तिकवाद से हटकर वह अध्यात्मवाद की तरफ झुक पड़ीं। नास्तिकों के नेता को आस्तिकों का नेता बनने में अधिक समय नही १८३९ में वह थियोसोफिकल सोसाइटी में शामिल हो गईं। आत्मा परमात्मा का अध्ययन उनका सबसे प्रिय विषय बन गया। मैडम ब्लैवैत्स्की के देहांत के बाद उनका स्थान एनी बेसेंट ने ले लिया। उस जिम्मेदारी को उन्होंने जीवन की अंतिम घड़ी तक बड़ी सच्चाई व ईमानदारी के साथ निभाया |

 

कुछ समय बाद १८९३ में बेसेंट भारत आ गईं। भारत के साथ उनका सम्पर्क नया नही था | १८७८ में ही उन्होंने भारत के विषय में एक पुस्तिका लिखी थी। भारत में बेसेंट ने थियोसोफ़िकल सोसाइटी का मुख्य केंद्र मद्रास के पास अडयार में स्थापित किया |एनी बेसेंट ने हिन्दू धर्मशास्त्रों का गहरा अध्ययन कर कई ग्रंथ लिखे और गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उनकी इन किताबों से भारत के बारे में पश्चिम का भ्रम दूर हो गया| उनके ग्रंथों से भारत के धर्म, अध्यात्मवाद, संस्कृति तथा साहित्य परिचय पाकर पश्चिम के लोग चकित रह गए। बहुत से विद्वानों को भी अपने देश के असली रूप का पता चला | जिन्होंने पश्चिम को ही सब कुछ मान लिया था, उनको भी आंखें खुल गई। भारत के सुप्त गौरव को फिर से जगाने में एनी बेसेंट का यह सहयोग बड़ा कीमती है।

        

एनी बेसेंट कहा करती थीं कि भारत अपने प्राचीन धर्म और दर्शन के सहारे ही ऊंचा उठ सकता है। कुछ समय बाद ह बनारस जाकर रहने लगीं। वहां रहने पर उन्हें हिन्दू धर्म के बारे में बहुत कुछ जानने-समझने का मौका मिला। बनारस मे वह गंगा स्नान करती थीं और भारतीय पोशाक में निकलती थीं| भारत के लिए उनकी ममता दिन-पर-दिन बढ़ती गई । भारत की धार्मिक और सामाजिक उन्नति, शिक्षा की प्रगति और राजनीतिक आज़ादी के साथ उनका नाम जुड़ गया। वह यह भूल गई कि उनका जन्म इंग्लैंड में हुआ था। दीनबंधु एंड्रूज़ और एनी बेसेंट दोनों धर्म गुरु यानी धर्म प्रचारक के रूप में भारत आए थे। यहां आकर दोनों ही उसके बड़े भक्त बन गए। एनी बेंसेंट का सबसे अधिक प्रिय विषय था शिक्षा। उन्होंने अपने मित्रों की सहायता से काशी में 'सैन्ट्रल हिंन्दू स्कूल' खोला, जो कि थोड़े समय बाद कालेज बन गया।

 

पंडित मदनमोहन मालवीय ने इसी कालेज को १९१६ में हिन्दू विश्वविद्यालय का रूप दिया था। शिक्षा के बारे में एनी बेसेंट कहा करती थीं कि शिक्षा ऐसी होनी जो बच्चों को सोचना सिखाए। पर बच्चे क्या सोचें यह त करना शिक्षा का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने सच्चे मन से भारतीयों की भलाई के लिए काम किया। भारत में रहते हुए उन्होंने चारो क्षेत्रो में काम किया - धर्म, शिक्षा, समाज-सुधार और राजनीति।

 

एनी बेसेंट विद्रोही और क्रांतिकारी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से अलग नही रह सकती थी। बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन और अंग्रेज सरकार के दमन की उनके हृदप पर गहरी छाप पड़ी। उन्होंने उसमें दिलचस्पी लेनी शुरू की और १९१३ में कामनवी” नाम से एक साप्ताहिक पत्र निकालता शुरू किया। अगले वर्ष उन्होंने मद्रास से 'न्यू इंडिया नाम का दैनिक पत्र भी निकालना शुरू किया, जिसने जन्म लेने के साथ ही आग बरसाना शुरू कर दी थी। अंग्रेजी दैनिक होते हुए भी उसमें एक कालम हिन्दी में दिया जाता था। अपने समय का वह बड़ा जोरदार और लोकप्रिय पत्र था

        

समाज-सुधार के काम में एनी बेसेंट को बड़ी रुचि थी। इसी से धीरे-धीरे वह राजनीति की ओर खिंचने लगीं और कांग्रेस के काम में भी उन्होंने दिलचस्पी लेनी शुरू किया । सूरमें १९०७ में नरम और गरम दल की जो खाई पैदा हुई थी उसको वह पाटने में लगई। अपने दो-ढाई वर्षों की कोशिश के बाद वह “नरम” और “गरम” दोनों दलों को १९१६ मे लखनऊ कांग्रेस में मिलाने में सफल हुई। इससे राजनीतिक क्षेत्रो में उनका नाम चमक उठा। थियोसोफ़िकल सोसाइटी के कारण उनका नाम सारे संसार में मशहूर था इसलिए भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के लिए विश्व की सहानुभूति उन्हें सहज ही प्राप्त हो गई|

 

१९१७ के कलकत्ता अधिवेशन का उनको सभापति चुना गया। कलकत्ता में उस मौके पर उनका जो सम्मान हुआ वह कांग्रेस के इतिहास में अभूतपूर्व था। बंगाली युवकों ने उनकी गाड़ी के घोड़े खोल दिए और स्वयं उनकी जगह जुत गए। लखनऊ कांग्रेस में लोकमान्य तिलक ने स्वराज्य के महामंत्र का उच्चारण करते हुए देश की स्वतंत्रता के लिए 'होमरूल' शब्द का प्रयोग किया था। इसलिए उन वर्षों में स्वराज के आंदोलन को होमरूल का नाम दे दिया गया था। एनी बेसेंट का नाम तब 'होमरूल' शब्द के साथ जुड़ गया था। सितम्बर १९१६ को उन्होंने होमरूल लीग की स्थापना का। सारे देश में उस लीग की शाखाओं का जाल बिछ गया। लोकमान्य तिलक ने राष्ट्रीय होमरूल लीग नाम से उसका समर्थन किया।

 

अब तक कांग्रेस का अध्यक्ष केवल सालाना जलसे के लिए चुना जाता था । उसमें शाभी और सम्मान की भावना अधिक थी। एनी बेसेन्ट ने एक नई परम्परा डाली। वह यह कि अध्यक्ष वर्ष भर के लिए चुना जाता है अत: सारे वर्ष उसको अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। इसी भावना से उन्होंने अपने कार्यकाल में सारे भारत का दौरा किया और कोने-कोने में स्वतंत्रता के आंदोलन की ज्योति जगा दी।

 

नौकरशाही यह सब सहन न कर सकी। उसने अपनी सारी ताक़त उनके नेतृत्व को कुंचलने में लगा दी। कई प्रांतों में उनका जाना रोक दिया गया। न्यू इंडिया की दस हजार और फिर बीस हजार रुपये की जमानतें जब्त की गई, अंत में १५ जून १९१७ को अंडेल और वाडिया के साथ उनको गिरफ्तार कर लिया गया | गिरफ्तारी के खिलाफ देश में बड़ा रोष फैला। कांग्रेस ने सत्याग्रह करने की तैयारी की। मद्रास में हाईकोट के अवकाश-प्राप्त न्यायाधीश सर सुब्रह्मण्य ऐयर, हिन्दू पत्र के सम्पादक कस्तूरी रंगा आयंगार और सी०पी०रामास्वामी अय्यर सरीखों ने सत्याग्रह के लिए अपने नाम दे दिए। सरकार के लिए मुश्कि पैदा हो गई। शासन सुधारों की मांटेगू घोषणा करके स्थिति को संभाला गया और अपने साथियों सहित रिहा कर दिया गया। तीन वर्षों तक भारत के राजनीति की बागडोर उनके ही हाथों में रही और “बीबी बासन्ती के नाम से भारत मे   उनका नाम फैल गया। १९१८ में उन्होंने यह मांग की कि ब्रिटिश पार्लियामेंट को बिल द्वारा यह स्वीकार करना चाहिए कि १९२३, नहीं तो १९२८ तक भारत को औपनिवेशिक

स्वराज्य दे दिया जाएगा और इस बीच शासन-सत्ता भारतीयों को सौंपने का सिलसिला जाती रखा जाएगा। उसके स्वीकार न किए जाने पर १९२९ में लाहौर कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पूरी आज़ादी के ध्येय का ऐलान किया गया।

 

मांटफ़ोर्ड शासन सुधारों के प्रति आशावादी हो जाने से वह गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में शामिल नहीं हुईं। कांग्रेस से मतभेद होने के कारण अलग हो जाने पर भी अपने ढंग से देश की आज़ादी के लिए वह लगातार कोशिश करती रहीं।

८१ वर्ष की वृद्धावस्था में उग्र और सक्रिय राजनीति से अलग होकर उन्होंने अपने को पूरी तरह थियोसोफ़िकल सोसाइटी के काम में लगा दिया। सितम्बर १९३३ में ८७ वर्ष की अवस्था में वह स्वर्ग सिधार गई और अपनी अमिट छाप भारत के राजनीतिक और विश्व के धार्मिक इतिहास पर छोड़ गई। 

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