बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय

Bankim Chandra Chattopadhyay


भारत के दो राष्ट्रीय गीत हैं, “जन गण मनजो अक्सर गाया जाता है, और दूसरा वन्दे मातरम्। हमारे देश के सभी बूढे-बच्चे वन्दे मातरम्की धुन से परिचित हैं। भारत के सैकड़ों नौजवानों ने “वन्दे मातरम्” का नारा लगाते हुए अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई और उन्होंने लाठियों और गोलियों की मार को अपने सीनों पर सहा।

 

इतिहास की कहानी कहने वाले इस गीत के रचयिता है बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय |

 

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म २७ जून १८३८ में बंगाल के चौबीस परगना के कांठाल पाड़ा नामक गांव में हुआ था। वह अच्छे घर के थे और उनकी पढ़ाई भी अंग्रेजी, संस्कृत आदि में हुई थी।


बचपन से ही उनमें मातृभाषा और मातृभूमि के प्रति प्रेम था। वह अभी नौजवान ही थे कि उन्हें अपने एक मित्र का पत्र मिला। उन दिनों अंग्रेजी का ही प्रचार था और सब लोग एक दूसरे को पत्र लिखते समय अंग्रेजी का ही प्रयोग करते थे। उनके मित्र का पत्र भी अंग्रेजी में ही था। उन्होंने उसे बिना पढ़े हो लौटा दिया। साथ में यह भी लिख दिया कि भाई अंग्रेजी न तो तुम्हारी मातृभाषा है न मेरी, ऐसी हालत में कोई कारण नहीं कि तुम मुझे अंग्रेजी में पत्र लिखो।

 

बंकिम जैसे लोगों के इस प्रकार के ऊंचे विचारों का ही नतीजा है कि बंगला भाषा का प्रयोग लोकप्रिय हो गया है। यह बात नहीं कि बंकिम अंग्रेजी के विद्वान नहीं थे। सच तो यह है कि वह अंग्रेजी का इतना ज्ञान रखते थे कि यदि चाहते तो और बहुत से भारतीयों की तरह अंग्रेजी लेखक बन सकते थे, पर उन्होंने अपनी मातृभाषा की सेवा करना ही उचित समझा। उनके इस व्रत से बंगला भाषा ही नहीं, सारे भारतीय साहित्य को लाभ पहुंचा।

 

भाषा प्रेम के साथ-साथ बंकिम में देश प्रेम भी कूट-कूट भरा था। वह सारी उम्र सरकारी नौकर रहे, पर कभी अंग्रेजी से दबे नहीं। एक बार की बात है कि कुछ असभ्य गोरों ने उनके छोटे भाई पर अपना कुत्ता छोड़ दिया; इससे वह घबड़ा गया। यह देखकर बंकिम बीच में कूद पड़े और उन्होंने गोरों को इस प्रकार धमकाया कि वे कुत्ते को वापस बुला कर खिसक गए। उस युग में इस प्रकार का साहस बहुत कम लोग कर सकते थे। कहा जाता है कि गोरों के प्रति अपने इस प्रकार के व्यवहार के कारण वह सरकारी नौकर में काफी तरक्की नहीं कर पाए।

 

बंकिम बड़े ही बुद्धिमान थे। पढ़ाई खत्म होते ही वह एक सरकारी नौंकरी में गए थे। उन दिनों सब अच्छे छात्र सरकारी नौकरी में लगने की कोशिश करते थे। नौकरी के साथ-साथ बंकिमचन्द्र साहित्य की सेवा भी करने लगे। सबसे पहले उनके कुछ कविताएं प्रकाशित हुईं। उस समय बंगला साहित्य में अच्छे कवि तो थे, पर गद्य लेखक या उपन्यास तथा कहानी लेखक नहीं के बराबर थे। उन दिनों बंगाल में अंग्रेजी की चर्चा बहुत अधिक थी। शिक्षित युवक अंग्रेजी बोलने, लिखने तथा अंग्रेजी साहित्य पाठ करने में जितनी दिलचस्पी लिया करते थे, उतनी मातृभाषा में नहीं। बंगला भाषा का साहित्य अंग्रेजी के मुकाबले में हीन था, एक तरफ अंग्रेजी वाले और दूसरी तरफ संस्कृत के पंडित बंगला भाषा या साहित्य को कोई महत्व नहीं देते थे।

 

बंकिम नौकरी करते थे, पर नौकरी उनकी साहित्य सेवा में बाधक नहीं हो पाई। वह दफ्तर से बाहर न तो कभी नौकरी के बारे में कुछ आलोचना करते और न उसको कोई महत्व देते थे। यह देखकर आश्चर्य होता है कि कैसे उन्होंने उस जमाने की सरकारी नौकरी करते हुए भी इतने साहित्य की रचना की। साहित्य के बहुत से क्षेत्रों में उन्होंने हाथ डाला और वह सभी में, विशेषकर उपन्यास तथा निबंध साहित्य में बहुत अधिक उन्नति कर सके। उन्होंने अपने निबंध यह सिखाने के लिए लिखे कि हम भारतवासी इस समय भले ही गिर गए हों, पर कभी हम ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आगे भी थे। उनके उपन्यास वीरता और देशभक्ति की मानो पाठ्य पुस्तकें है।

    

उनके पहले उपन्यास का नाम था “दुर्गेशनन्दिनी | यह एक ऐतिहासिक कहानी है। उस समय वह सत्ताईस साल के थे । उपन्यास इतने अच्छे ढंग से लिखा गया था कि लोग पढ़ कर चकित हो गए। जो लोग बंगला को पढ़ने योग्य नहीं समझते थे, वे भी दूसरों के कहने पर उसे पढ़ गए और उनमें एक नया जोश आ गया। नतीजा यह हुआ कि बंकिम के लेखों तथा उपन्यासों के लिए लोग उत्सुक रहने लगे | बंकिम अब एक साहित्यिक पत्र निकालने लगे। उसका नाम था बंगदर्शन” । आज भारत की प्रत्येक भाषा में हजारों पत्र और पत्रिकाएं हैं। बंगाल में अब पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बहुत अधिक है, पर उन दिनों की हालत कुछ और ही थी।

 

“बंगदर्शन” उन दिनों एकमात्र साहित्यिक पत्र था, और वह मामूली ढंग का नहीं था । उसके सम्पादक स्वयं बंकिम थे। उसमें अच्छे-से-अच्छे लिखने वालों के लेख रहते थे, और उसका सबसे बड़ा आकर्षण था बंकिम की अपनी रचनाएं। उसमें उपन्यास, साहित्य,समालोचना और विभिन्न प्रकार के लेख-निबंध आदि प्रकाशित होते थे | लोग बंकिम की रचनाओं की पंक्तियां याद कर लेते थे। बंकिमचन्द्र अपने युग में कितने मशहूर हुए, इसका इस बात से पता लगता है कि उस जमाने में बंकिमचन्द्र के उपन्यास आदि पढ़ कर उसके कुछ अंश मुंह जबानी याद कर लेना लोग पसंद करते थे। जो लोग पत्र आदि में बंकिम की शैली का अनुसरण करते थे, वे विद्वान समझे जाते थे। साहित्यिक क्षेत्र में उनका बड़ा मान था।

 

आधुनिक बंगला के जनक बंकिमचन्द्र ही थे। उनसे पहले राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने बंगला गद्य को संवारा था। महाकवि रवीन्द्रनाथ की साहित्यिक शिक्षा बंकिम के बंगदर्शन की छत्रछाया में हुई। बंकिम पहचान गए थे कि आगे चलकर रवीन्द्रनाथ महान साहित्यकार होंगे। कहा जाता है कि एक शादी के जश्न में बंकिम और रवीन्द्र दोनों थे। उन दिनों बंकिम की उम्र पचाप के लगभग थी लोगों ने उन्हें मालाओं से लाद दिया, पर बंकिम ने अपनी माला उतार कर रवींन्द्रनाथ को पहना दी।

 

रवीन्द्रनाथ बंकिम को गुरु मानते थे उन्होंने कहा – “बंकिम बंगला लेखकों के गुरू, बंगाली पाठकों के मित्र हैं। वह सुजलां सुफलां मलयज शीतलम् बंगभूमि की मातृवत्सल प्रतिभाशाली संतान हैं।“

 

बंकिम के शुरू के उपन्यास अधिकतर नाटकीय हैं, यानी उनमें सनसनी भरी घटनाएँ ज्यादा हैं। उनकी भाषा में भी संस्कृत की प्रधानता है, पर धीरे-धीरे उनकी रचनाएं जीवन के निकट आती गई, और साथ ही साथ उनकी भाषा भी सरल होती गई।

 

“दुर्गेशनन्दिनी”  ऐतिहासिक उपन्यास है। उनका दूसरा उपन्यास है कपाल कुंडलाकपाल कुंडला” उपन्यास के बाद उन्होंने “मृणालिनी” नामक उपन्यास लिखा। फिर तो एक के बाद एक कई उपन्यास निकलते गए – “विषवृक्ष”, कृष्णकान्त का वसीयत नामा”,रजनी”,'चन्द्रशेखर, बंकिम के कई उपन्यास बंगदर्शन में निकले थे । उपन्यास के अलावा बंकिमचन्द्र के विभिन्न विषयों पर निबंध भी रहते थे, जो लेखक के गहरे अध्ययन और चिंतन सामाजिक व दार्शनिक ज्ञान को प्रकट करते थे। विद्वान उन्हें बडे चाव से पढ़ते थे और उस पर आलोचनाएं करते थे। इस तरह से उस समय में बंकिम केवल कथाकार ही नहीं, विद्वान और उदार साथी के रूप में भी पाठक समाज के सामने आए |


राष्ट्रीयता की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण “आनंद मठ” नामक उपन्यास उन्होने लिखा जिसमें सबसे पहले “वन्दे मातरम्” का गीत आता है। बंक्रिम का “आनंद मठ” उपन्यास एक नया राग सुनाने के लिए ही लिखा गया था इस उपन्यास को सामाजिक भी कहा जा सकता है और एक हद तक ऐतिहासिक भी। उपन्यास का असली उद्देश्य कहानी की आड में लोगों को देशभक्ति का पाठ सिखाना था। इस उपन्यास में एक मठ के साधुओं ने देश की रक्षा के लिए शत्रुओं से लड़ाई की और इसी आदर्श के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। उन साधुओं ने दुश्मन के विरुद्ध अस्त्र धारण किया। उनका मंत्र था “वन्दे मातरम्” । वे भारत माता के चरणों में अपना जीवन बलिदान करते हैं। उपन्यास में दुश्मन के विरुद्ध एक, दो, या तीन व्यक्तियों को नहीं बल्कि पूरे समाज में विद्रोह के लिए तैयार होते हुए दिखाया गया है। “आनंद मठ” ही एक ऐसा उपन्यास है जिसने भारतवासियों को पहले-पहल राजनीतिक विद्रोह की कहानी सुनाई, नौजवानों में देश के लिए, विदेशी राजशक्ति के विरुद्ध एक आदर्श प्रस्तुत कर दिया। इस उपन्यास के कारण बंकिम की नौकरी जाते-जाते रह गई।

 

“आनंद मठ” के बाद बंकिम ने “सीताराम” नामक एक उपन्यास लिखा। उनका अंतिम संगठित रूप वीरता का पाठ उपन्यास “राजसिंह” था।

 

बंकिमचन्द्र की एक पुस्तक “कमला कांतेर दफ्तर” अर्थात् कमला कांत का रोजनामचा है। उसमें बंकिम के गम्भीर, राष्ट्रीय, सामाजिक तथा राजनीतिक विचार सामने आते हैं।

 

बंकिम बड़े ही हंसमुख और सज्जन व्यक्ति थे उनके चरित्र में ओजस्विता थी। उनमें एक वास्तविक प्रतिभाशाली लेखक के सभी गुण मौजूद थे वह कठोर परिश्रम करके अध्ययन करते थे। बंगला के अलावा अंग्रेजी और संस्कृत पर उनका विशेष अधिकार था वह जब कभी अंग्रेजी दैनिक पत्रों में लिखा करते तो उनका लेख बहुत ही गम्भीर और तीखा था।  बंकिमचन्द्र ने कृष्ण चरित्र” नाम से कुछ लेख लिखे थे।

 

बंकिम कभी अपने नाम का प्रचार नहीं करना चाहते थे। अपने उपन्यासों के लिए भी उन्होंने शायद ही कभी विज्ञान आदि का सहारा लिया हो। जब भी कोई नया लेख आता था, तो बंकिमचन्द्र उसे हर प्रकार से प्रोत्साहन देते थे। बंगला साहित्य के स्वर्ण में सभी लेखक अपने को बंकिम का ऋणी समझते थे स्वयं लेखक होना और बंकिम के दर्जे का लेखक होना बहुत ही बड़ी बात है, पर बंकिम उन थोड़े से लेखकों में से थे जो दूसरों को लेखक बनाना अपना कर्तव्य मानते थे नए लेखकों के लिए वह बड़ा परिश्रम करते थे।

 

बंकिम के प्राय: सभी उपन्यासों का हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाहो चुका है। कुछ अंग्रेजी में भी अनूदित हैं । भारत की अन्य भाषाओं के साहित्यिकों भी बंकिमचन्द्र की उपन्यास कला का बड़े आदर से अध्ययन किया और उनके ढंग को अपनाया।

बंकिम का देहांत ५६ साल की उम्र में ८ अप्रैल १८९४ को हुआ । 

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