गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी

Gopal Krishna Gokhale Biography


एक बार अध्यापक ने कक्षा के सब लड़कों को गणित का एक प्रश्न घर से करके लाने के लिए दिया| दूसरे दिन एक विद्यार्थी के सिवाय और कोई लड़का उस सवाल को हल करके नहीं लाया, यह देखकर अध्यापक उस विद्यार्थी से बहुत खुश हुआ और उसे कक्षा में सबसे आगे बैठने को कहा। लेकिन इतना सुनते ही वह विद्यार्थी फूट-फूट कर रोने लगा। अध्यापक को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने पूछा – “तुम तो कक्षा के सबसे होशियार लड़के हो, फिर तुम रो क्यों रहे हो?”

बालक की हिचकियां बंध गईं। उसने कहा – “मैं कक्षा में सबसे आगे बैठने लायक नहीं हूं। यह सवाल मैंने दूसरों की मदद से किया है । आगे बैठकर मैं अपने साथियों का हक नहीं छीनूंगा।“

इस सत्यवादी बालक का नाम था गोपाल कृष्ण गोखले। उनके बचपन की इस छोटी-सी घटना से ही उनके उज्ज्वल चरित्र का पता चल जाता है।


संक्षिप्त विवरण(Summary)[छुपाएँ]
गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन परिचय
पूरा नामगोपाल कृष्ण गोखले
जन्म तारीख९ मई, १८६६
जन्म स्थानकोतलुक ग्राम,चिपलून ताल्लुके,
रल्नागिरी जिला
धर्म ब्राह्मण
पिता का नामकृष्णराव श्रीधर गोखले
माता का नामसत्यभामा बाई
पत्नि का नामसावित्री बाई
भाई व बहनगोविंद गोखले
संतान२, काशीबाई और गोदुबाई
कार्यइंगलिश हाई स्कूल
में सहायक अध्यापक,दक्खन एज्यूकेशन सोसाइटी
के सदस्य,कांग्रेस के सदस्य,
मुंबई प्रांत की धारासभा
के सदस्य,लेजिस्लेटिव कौंसिल
के सदस्य,सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी
की स्थापना
मृत्यु तारीख१९ फरवरी, १९१५
मृत्यु स्थानमुंबई
मृत्यु की वजहडाईबिटीज और असत्मा
उम्र४९ वर्ष
भाषाहिन्दी,अँग्रेजी,मराठी
उपाधिभारत का ग्लेडस्टोन

गोपाल का जन्म ९ मई, १८६६ को चिपलून ताल्लुके (रल्नागिरी जिले) के कोतलुक नामक ग्राम में हुआ था। वह ब्राह्मण कुल में जन्मे थे और उनकी मातृभाषा मराठी थी। उनके पिता का नाम कृष्णराव श्रीधर गोखले और माता का नाम सत्यभामा बाई था। कृष्णराव गरीब होते हुए भी बड़े ईमानदार और स्वाभिमानी थे। उनके इस चरित्र का प्रभाव गोपाल पर शुरू से ही पड़ा था।

एक बार गोपाल स्कूल के मैस में भोजन कर रहे थे। उन्होंने परोसने वाले से दही मांगा तो उसने कहा – “जो लड़के दही के आठ आना महीना देते हैं, दही उन्हीं को परोसा जाता है।“

गोपाल निर्धन होने के कारण आठ आना महीना अधिक नहीं दे सकते थे, लेकिन उनके स्वाभिमान को ठेस लगी। उन्होंने बिना कुछ सोचे-समझे ही कह दिया – “ठीक है, में आठ आने दूंगा, तुम मुझे दही परोसो।“

गोपाल ने कहने को तो कह दिया, लेकिन उन्हें इतना कम पैसा मिलता था कि एक पाई भी इधर-उधर नहीं कर सकते थे। उन्होंने महीने में कई दिन एक वक्त ही खाना शुरू किया और इस तरह दही के पैसे निकाल लिए।

अनुक्रम (Index)[छुपाएँ]

गोपाल कृष्ण गोखले की जीवनी

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म

संक्षिप्त विवरण(Summary)

गोपाल कृष्ण गोखले और स्कूल के मेस का किस्सा

गोपाल कृष्ण गोखले की शिक्षा

गोपाल कृष्ण गोखले की उच्च शिक्षा

गोपाल कृष्ण गोखले के गुरू

गोपाल कृष्ण गोखले का विवाह

भारत का ग्लेडस्टोन

सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना

गोखले बिल

गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु

FAQ`s

प्रारंभिक शिक्षा समाप्त होने पर गोपाल को दस वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई गोविंद गोखले के साथ कोल्हापुर के एक स्कूल में भेज दिया गया। अभी उन्हें यहां पढ़ते तीन ही वर्ष बीते थे कि उनके पिता का देहांत हो गया। अब गोविंद के सामने स्कूल छोड़ने और छोटी-मोटी नौकरी करने के सिवा कोई चारा नहीं था। उन्होंने कोल्हापुर राज्य में १५ रुपये मासिक की नौकरी कर ली। इन १५ रुपयों में से ८ रुपये वह गोपाल की पढ़ाई के लिए भेज देते थे।

इन्हीं आठ रुपयों में गोपाल को अपनी पढ़ाई और भोजन का सारा खर्चा चलाना पड़ता था। वह खुद ही भोजन पकाते थे और दिन में केवल एक बार खाते थे। वह रात को लैंप जलाने के लिए तेल भी नहीं खरीद सकते थे | वह सड़क पर लगे हुए लैंप के नीचे बैठ जाते और वहीं रात-रात भर बैठकर अपना पाठ याद किया करते। उनकी स्मरणशक्ति बड़ी तेज थी, वह जो पाठ एक बार पढ़ लेते थे वह उन्हें तुरंत याद हो जाता था। अंग्रेजी के कई प्रसिद्ध ग्रंथ उन्हें जुबानी याद थे, इसलिए अंग्रेजी भाषा पर भी उनका पूर्ण अधिकार हो गया था।

गोपाल ने मैट्रिक पास किया और कोल्हापुर के राजाराम कालेज में दाखिल हो गए। यहां से उन्होंने पूना के दक्खन कॉलेज में दाखिला लिया और फिर बंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से डिग्री प्राप्त की। वह गणित में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुए और उन्हें २० रुपये प्रतिमास छात्रवृत्ति मिलने लगी। कुछ ही दिनों बाद उन्हे पूना के न्यू इंगलिश हाई स्कूल में सहायक अध्यापक का पद मिल गया। यहाँ उन्हें ३५ रुपये मासिक वेतन मिलता था। अब उनके भाई गोविंद का आर्थिक भार कुछ हल्का हो गया था। गोपाल उन्हें बहुत प्यार करते थे और उनका अहसान कभी नहीं भूलते थे। वह अपने खर्च के लिए थोड़ा-सा रुपया निकाल कर बाकी सब उन्हें भेज देते थे।

इसी समय तिलक और आगरकर आदि देशभक्तों ने पूना में दक्खन एज्यूकेशन सोसाइटी की स्थापना की। इस सोसाइटी के अंतर्गत बहुत से स्कूल थे। जो व्यक्ति इस सोसाइटी में शामिल होता था उसे प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी कि वह २० वर्ष तक इसमें काम करेगा और कभी भी ७५ रुपये प्रतिमास से अधिक वेतन नहीं मांगेगा। गोपाल भी इस सोसाइटी के सदस्य बन गए। कुछ ही दिनों बाद वह फर्ग्यूसन कालेज में अंग्रेजी और गणित भी पढ़ाने लगे। कभी-कभी उन्हें इतिहास और राजनीति भी पढ़ानी पड़ती थी। इससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा का पता चलता है।

जब गोखले न्यू इंगलिश स्कूल में अध्यापक थे, तभी उनका परिचय न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे से हुआ। इसकी भी एक विचित्र कथा है। न्यू इंगलिश स्कूल में एक विशेष समारोह हो रहा था। पूना के सभी प्रमुख नागरिकों को निमंत्रण दिया गया था, गोखले स्कूल के प्रवेश द्वार पर खड़े थे और लोगों से टिकट ले-लेकर उन्हें अंदर जाने देते थे। तभी एक ऐसा व्यक्ति आया जो अपना टिकट घर पर ही भूल आया था। गोखले ने उसे अंदर जाने से रोक दिया। उसने लाख समझाया कि मैंने टिकट खरीदा है, लेकिन गोखले को अपना कर्त्तव्य प्यारा था। उन्होंने उस व्यक्ति को भीतर जाने की आज्ञा नहीं दी। तभी गोखले के एक साथी ने वहां आकर उस व्यक्ति का परिचय कराया। वह न्यायमूर्ति रानडे ही थे। आगे चलकर तो गोखले रानडे के साथी और प्रमुख शिष्य बन गए।

कुछ ही दिनों बाद रानडे ने गोखले को पूना की “सार्वजनिक सभा” का मंत्री बना दिया। उन दिनों “सार्वजनिक सभा” भारत की एक प्रमुख राजनीतिक संस्था थी। उसके पत्रों का बंबई सरकार हमेशा उत्तर दिया करती थी। इन पत्रों का मसविदा भी गोखले ही तैयार किया करते थे।

इतना काम होते हुए भी गोखले सुधारक पत्र के लिए हर सप्ताह अंग्रेजी में लेख लिखा करते थे। जब गोखले को इन लेखों का पारिश्रमिक देने की बात उठी तो उन्होंने उसे लेने से साफ इंकार कर दिया। इस प्रकार उन्होंने शुरू से ही त्याग और नि:स्वार्थ सेवा का परिचय देना शुरू कर दिया था |

१८८० मे गोखले का विवाह सावित्री बाई से हुआ, लेकिन वह काफी कमजोर थी और जन्म से ही किसी बीमारी से ग्रसित थी | जल्द ही उनका देहांत हो गया |

सन १८८५ में कांग्रेस की स्थापना हुई। सार्वजनिक सभा के नाते गोखले का संबंध इस राष्ट्रीय सभा से भी बढ़ने लगा। उनके कार्यो को देखते हुए १९०५ मे उन्हे कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया |

बंबई कांग्रेस में गोखले ने पहली बार भाषण दिया। १८९६ में गोखले सर दिनशा वाचा के साथ वैल्बी कमीशन के सामने गवाही देने इंग्लैंड गए। यह कमीशन हिंदुस्तान के खर्च की जांच करने के लिए बैठाया गया था, अपनी गवाही में गोखले ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि हिंदुस्तान की आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा अफसरों के वेतनों तथा पेंशनों में खर्च हो जाता है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर वहां बहुत कम खर्च होता है। वहां भारतीयों का नहीं, ब्रिटेन के लोगों का ही ध्यान रखा जाता है।

गोखले की गवाही की चारों ओर बड़ी प्रशंसा हुई। अधिकारपूर्ण बहस करने की क्षमता के कारण उन्हे भारत का ग्लेडस्टोन कहा जाता है |

१८९६ में गोखले बंबई प्रांत की धारासभा के सदस्य चुने गए। वहां उन्होंने जो भाषण दिए उससे वह सारे देश में प्रसिद्ध हो गए । उन्होंने किसानों के हित के लिए सहयोगी कर्ज संस्थाएं खोलने का प्रस्ताव किया, जो स्वीकार कर लिया गया| ये संस्थाएं बड़ी सफल हुई और उनसे किसानों को बड़ा लाभ हुआ।

१९०२ में गोखले फीरोजशाह मेहता की जगह वाइसराय की लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य बन गए। इस समय उन्होंने १८ वर्ष की सेवा के बाद फग्ग्युसन कॉलेज से इस्तीफा दे दिया और मृत्युपर्यंत कौसिल में रहकर सरकार से जनता के अधिकारों के लिए लड़ते रहे।

कौसिल में आकर उन्होंने देश में लगे हर कम करने और सेना का खर्चा घटाने पर बहुत जोर दिया। उनका भाषण बड़ा ओजस्वी होता था। गोखले का बजट भाषण सुनकर लार्ड मिंटो ने कहा कि इंग्लैंड में ऐसे बहुत कम लोग मिलेंगे जो ऐसा उत्तम भाषण दे सकें।

गोखले को झूठ से घृणा थी। वह सच्चाई से हमेशा प्रेम करते थे, यह बात उनके जीवन के पग-पग पर प्रकट हो जाती थी। उनके बचपन की एक घटना प्रसिद्ध है। एक बार गांव के सब लड़के इकट्ठे होकर कबड्डी खेल रहे थे | एक डैम मे गोखले थे और दूसरे मे उनके बड़े भाई गोविंद। जब खेल जोरों पर था तो गोविंद ने धीरे से गोखले के कान में कहा – “मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूं, तुम मुझे जीत जाने दो।“ गोखले ने तुरंत उत्तर दिया – “देखो भाई, तुम कहो तो मैं खेल छोड़कर चला जाऊँ, लेकिन मैं अपने साथियों को धोखा नहीं दूंगा।“

न्यायप्रियता की इस भावना ने, जो उनके मन पर बचपन से जमकर बैठ गई थी, मृत्यु तक उनका साथ नहीं छोड़ा |

१९०५ में गोखले ने अपने जीवन का सबसे बड़ा काम किया। उन्होंने १२ जून को भारत सेवक समिति (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी) की स्थापना की। राजनीतिक शिक्षा और आंदोलन, जातीय एकता, दलित जातियों का सुधार, स्त्री शिक्षा और दीन-दुखियों की सेवा आदि इस समिति के मुख्य उद्देश्य थे यह समिति आज भी काम कर रही है।

१९०८ में वाइसराय मिंटो और भारत मंत्री मार्ले के शासन काल में भारत में जो सुधार किए गए वे भी गोखले के प्रयत्नो का ही फल था। शिक्षा प्रचार गोखले के जीवन की सबसे बड़ी काम था। इसलिए उन्होंने कौसिल के सामने अनिवार्य प्रायमरी शिक्षा बिल पेश किया। जिसे गोखले बिल भी कहा जाता है | यह तो पास नहीं हुआ, लेकिन इससे जनता में बड़ी जागृति फैली ।

गोखले ने दक्षिण अफ्रीका के प्रवासी भारतीयों की दुर्दशा के संबंध में भी वाइसराय की कौंसिल में आवाज उठाई |

१९१२ में वह महात्मा गांधी के निमंत्रण पर दक्षिण अफ्रीका भी गए। वहां उन्होंने तीन सप्ताह रह कर भारतीयों की समस्या सुलझाने का घोर प्रयत्न किया। उन्होंने वहां ऐसे जोशीले भाषण दिए की लोग चकित रह गए। अफ्रीका में वह जहां भी जाते महात्मा गांधी उनके साथ रहते। वह गोखले को अपना राजनीतिक गुरू मानने लगे थे | अफ्रीका की सरकार ने गोखले को बहुत से आश्वासन दिए, लेकिन उनके लौट आने के बाद उसने उनका पालन नही किया।

जीवन के अंतिम दिन मे वह डाईबिटीज और असत्मा से ग्रसित थे | अत: १९ फरवरी, १९१५ को इस महान नेता का देहांत हो गया। वह कितने महान थे, यह गांधी जी के शब्दों में सुनिए - "राजनीतिक कार्यकर्ताओ के जितने गुण होने चाहिए, वे सब मैंने उनमें पाए। उनमें बिल्लौर की-सी स्वच्छता, मेमने को-सी नम्रता, शेर की-सी वीरता थी और दया तो इतनी थी कि वह एक प्रकार का दोष हो गई थी | गोखले राजनीतिक क्षेत्र में मेरे सबसे ऊंचे आदर्श थे और अब तक हैं।"


FAQ`s

Questation : गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म ९ मई, १८६६ को चिपलून ताल्लुके (रल्नागिरी जिले) के कोतलुक नामक ग्राम में हुआ था।


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले के पिता का नाम क्या था?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले के पिता का नाम कृष्णराव श्रीधर गोखले था।


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले के माता का नाम क्या था?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले के माता का नाम सत्यभामा बाई था।


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले के बड़े भाई का नाम क्या था?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले के बड़े भाई का नाम गोविंद गोखले था |


Questation : दक्खन एज्यूकेशन सोसाइटी की स्थापना किसने की थी?

Answer : तिलक और आगरकर आदि देशभक्तों ने पूना में दक्खन एज्यूकेशन सोसाइटी की स्थापना की। इस सोसाइटी के अंतर्गत बहुत से स्कूल थे। जो व्यक्ति इस सोसाइटी में शामिल होता था उसे प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी कि वह २० वर्ष तक इसमें काम करेगा और कभी भी ७५ रुपये प्रतिमास से अधिक वेतन नहीं मांगेगा। गोपाल भी इस सोसाइटी के सदस्य बन गए।


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले के गुरू कौन थे?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले के गुरू न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानडे थे |


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले की पत्नी का क्या नाम था?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले की पत्नी का क्या नाम सावित्री बाई था |


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले को भारत का ग्लेडस्टोन क्यो कहाँ जाता है?

Answer : १८९६ में गोखले सर दिनशा वाचा के साथ वैल्बी कमीशन के सामने गवाही देने इंग्लैंड गए। यह कमीशन हिंदुस्तान के खर्च की जांच करने के लिए बैठाया गया था, अपनी गवाही में गोखले ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि हिंदुस्तान की आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा अफसरों के वेतनों तथा पेंशनों में खर्च हो जाता है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर वहां बहुत कम खर्च होता है। वहां भारतीयों का नहीं, ब्रिटेन के लोगों का ही ध्यान रखा जाता है। गोखले की गवाही की चारों ओर बड़ी प्रशंसा हुई। अधिकारपूर्ण बहस करने की क्षमता के कारण उन्हे भारत का ग्लेडस्टोन कहा जाता है |


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले ने किसकी स्थापना की?

Answer : १९०५ में गोखले ने अपने जीवन का सबसे बड़ा काम किया। उन्होंने १२ जून को भारत सेवक समिति (सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी) की स्थापना की। राजनीतिक शिक्षा और आंदोलन, जातीय एकता, दलित जातियों का सुधार, स्त्री शिक्षा और दीन-दुखियों की सेवा आदि इस समिति के मुख्य उद्देश्य थे | यह समिति आज भी काम कर रही है।


Questation : गोखले बिल क्या है?

Answer : १९०८ में वाइसराय मिंटो और भारत मंत्री मार्ले के शासन काल में भारत में जो सुधार किए गए वे भी गोखले के प्रयत्नो का ही फल था। शिक्षा प्रचार गोखले के जीवन की सबसे बड़ी काम था। इसलिए उन्होंने कौसिल के सामने अनिवार्य प्रायमरी शिक्षा बिल पेश किया। जिसे गोखले बिल भी कहा जाता है |


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले कांग्रेस के अध्यक्ष कब बने?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले कांग्रेस के अध्यक्ष १९०५ मे बने |


Questation : गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु कब हुई?

Answer : गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु अत: १९ फरवरी, १९१५ को हुई | जीवन के अंतिम दिन मे वह डाईबिटीज और असत्मा से ग्रसित थे |



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