दीपावली का महत्व | Deepawali | Diwali


दीपावली पर निबंध | दीपावली क्यो प्रसिद्ध है | दीपावली मे किसकी पूजा करनी चाहिए | दीपावली क्यो मनाई जाती है | दीपावली मे लक्ष्मी पूजन

पौराणिक ग्रंथों में दीपावली पर्व का महत्व बताने के लिए अनेक प्रसंग दिये गये । यह पर्व दैत्यराज बलि के बंदीगृह से देवताओं और देवियों की मुक्ति के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चौदह वर्ष के वनवास और लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का राज्याभिषेक इसी शुभ पर्व पर हुआ था, तामसी शक्तियों के प्रतीक दैत्यराज नरकासुर का वध इसी पर्व पर हुआ था और अत्याचार का शासन समाप्त होने के उपलक्ष्य में दीप जलाये गये थे ।



दीपावली क्यो प्रसिद्ध है


सुख-सौभाग्य, धन, संपदा और ऐश्वर्य देने वाली महालक्ष्मी का पूजन सभी मनुष्यों के लिए अनिवार्य है। समाज और राष्ट्र की शक्ति का आधार ऐश्वर्य और धन संपदा है, इन संपदाओं की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी हैं और उन्हें प्रसन्न किये बिना कोई समाज, कोई देश सुखी नहीं हो सकता।

दीपावली देश के शुभ-लाभ का संकेत देने वाला पर्व है । इस पर्व के मुहूर्त को आधार बनाकर दैवज्ञ ज्योतिषी देश के धन वैभव और सुख की भविष्यवाणी करते हैं।


दीपावली मे किसकी पूजा करनी चाहिए


जगदंबा महालक्ष्मी के उपासकों को इस पर्व के दिन अनेक देवताओं, यंत्रों और उपकरणों की पूजा करनी चाहिए । सिर्फ लक्ष्मी की आराधना करने से पूजा का उद्देश्य पूरा नहीं होता। लक्ष्मी के साथ ही विघ्नकर्ता गणेश, वरूण देवता नवग्रह, सोलह मातृकाओं और सप्तघृत मातृकाओं का पूजन करना चाहिए। महालक्ष्मी के साथ ही महाकाली, महासरस्वती, यक्षराज, कुबेर, तुला (तराजू) और दीप का पूजन भी करना चाहिए


दीपावली क्यो मनाई जाती है


पौराणिक आख्यान है कि दैत्यराज महाबलि को संकल्प के बंधन में बांधने के बाद भगवान विष्णु ने उसके बंदीगृह से सभी देवताओं और देवियों को मुक्त कराया था। दैत्यराज बलि के बंदीगृह में सभी देवताओं के साथ महालक्ष्मी भी कैद थीं । बंदीगृह से मुक्त होने के बाद सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के साथ ही क्षीरसागर जाकर विश्राम किया था। उनके मुक्त होने के उपलक्ष्य में दीपावली का पर्व मनाया गया था। इसलिए दीपावली पर्व पर महालक्ष्मी के साथ ही अनेक देवताओं का पूजन करना चाहिए। मुख्यरूप से गणेश पूजन तो बहुत जरूरी है, भगवान गणेश रिद्धि-सिद्धि और बुद्धि प्रदान करते हैं निर्मल बुद्धि और विवेक के जरिए ही धन प्राप्त किया जा सकता है और उसे सही ढंग से खर्च किया जा सकता है। लक्ष्मी स्वभाव से चंचला हैं इसलिए वे एक स्थान पर टिककर नहीं रहतीं। जिस घर या समाज में बुद्धि विवेक की कमी हो जाती है, जहां तामसी, भावनाएं प्रबल हो जाती हैं वहां से लक्ष्मी कुपित होकर दूसरे स्थान पर चली जातीं हैं।


दीपावली मे लक्ष्मी पूजन


दीपावली पर लक्ष्मी की उपासना का स्थूल अर्थ चाहे जो हो, लेकिन व्यवहारिक रूप में यह उद्योग की पूजा है। सिर्फ उद्योगी पुरुष ही लक्ष्मी की कृपा प्राप्त कर सकते हैं। वही शुभ-लाभ के अधिकारी हैं। जगदंबा महालक्ष्मी ने स्वयं बताया है कि उनका निवास किन स्थानों पर है

वसामि नित्यं शुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने,
अक्रोधने देव परे कृतज्ञे जितेंद्रिये नित्यमुदीर्णसत्वे।
स्व धर्म शीलेषु च धर्मवित्सु वृद्धोपसेवा निरते च दांते,
कृतात्मनि क्षांति परे समर्थेक्षांतासु दांतासु तथा अबलासु ।
वसामि नारीसु पतिव्रतासु कल्याणशीलासु विभूषितासु,
सत्यासु नित्यं प्रिय दर्शनासु सौभाग्य युक्तासु गुणान्वितासु ।

माता महालक्ष्मी कहती हैं – “मैं, उन पुरुषों के घर में रहती हूं जो स्वरूपवान चरित्रवान, कर्मकुशल और तत्परता से अपना कर्तव्य पूरा करते हैं, जो क्रोधी नहीं होते, देवताओं में भक्ति रखते हैं, कृतज्ञ और जितेंद्रिय होते हैं, जो अपने धर्म, कर्तव्य और सदाचरण का सतर्कता से निर्वाह करते हैं जो धर्म का महत्व स्वीकार करते हैं, जो अपने गुरुजनों की सेवा करते हैं, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने पर नियंत्रण रख सकते हैं, जो आत्मविश्वासी क्षमाशील समर्थ होते हैं।“

“जो स्त्रियां क्षमाशील, संयमी, सत्य परश्रद्धा रखनेवाली होती हैं, मैं उनके घर में आनंद से रहती हूं। जिन स्त्रियों को देखकर मन प्रसन्न होता है, जो सौभाग्यवती, गुणवती, पति के प्रति श्रद्धालु, सबका कल्याण चाहनेवाली और सद्गुण संपन्न होती हैं, मैं उन्हीं के घर में निवास करती हूं ।“


जगदंबा महालक्ष्मी ने उन घरों को भी गिनाया हैं, जहां भोग पूजा मिलने के बाद भी वे एक क्षण के लिए रहना पसंद नहीं करतीं -

न कर्मशीले पुरुषे वसामि, न नास्तिके सांकरिके कृतघ्ने,
न भिन्रवृत्ते न नृशंस वर्णे न चापि चौरे न गुरुष्वसूर्ये।
ये चाल्पतेजो बलसत्वमाना क्लिश्यंति कुप्यंति च यत्र-तत्र,
न चैव तिष्ठामि तथा विघेषु नरेषु संगुप्त हीं मनोरथेषु ।
पश्चात्मनि प्रार्थयते न किंचित यश्चसवभावोपहतान्तरात्मा,
तेष्वल्पसंतोषपरेषु नित्यं नरेषु नाहं निवसामि सम्यक।


जगदंबा लक्ष्मी कहती हैं - मैं, ऐसे घरों को कदापि पसंद नहीं करती, जहां अकर्मण्य, आलसी, नास्तिक और कृतघ्न रहते हैं, जहां अपनी प्रतिज्ञा पर कायम नहीं रहने वाले पुरुष रहते हैं। जो पुरुष कठोरवाणी बोलते हैं, चोरी करते हैं, गुरुजनों से ईष्या करते हैं, तेजहीन आत्मगौरव हीन हैं, मैं ऐसे घर में नहीं रहती। जो लोग थोड़ी-सी कठिनाई आने पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं, जरा-सी बात पर क्रोधित हो जाते हैं, कुटिल है, अपने लिए भी कुछ नहीं कर पाते और थोड़े में ही संतुष्ट हो जाते हैं, ऐसे पुरुषों के घर में मैं नहीं रहती।

दीपावली पर आपका और देश का शुभ लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने चरित्र और घर-परिवार को जगदंबा महालक्ष्मी के अनुकूल बनाते हैं या प्रतिकूल! दोनों ही बातें आपके हाथ हैं।

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