अल्ताफ हुसैन हाली | Altaf Hussain Hali


हाली उर्दू भाषा के एक बहुत बड़े कवि थे। उन्होंने उर्दू कविता को पुरानी डगर से हटा कर नई डगर पर डाला और उसमें नई जान डाली। हाली ने उर्दू कविता को समाज सुधार का भी प्रबल साधन बनाया। जिस जमाने में हाली का जन्म हुआ था, उसमें उर्दू काव्य एक ऐसी जगह पर आकर रुक गया था, जिसमें नई शाखाए फूटना बंद हो गई थीं। उर्दू कविता थोड़े से लोगों के मन बहलाव का साधन बन गई थी। उसमें बहुत ही कठिन और उलझी हुई भाषा का प्रयोग किया जाता था। परिणाम यह हुआ कि आम लोगों से उसका संबंध इतना अधिक नहीं रह गया था। भाषा अथवा साहित्य की कोई भी धारा जब साधारण लोगों से दूर हो जाती है तो वह धीरे-धीरे सूखने और सिमटने लगती है।

हाली ने अपनी रचनाओं में वर्तमान की घटनाओं को सीधे-सादे शब्दों में और प्रभावित करने वाली में भाषा प्रस्तुत किया। इस तरह उर्दू कविता की धारा नई दिशा में बह निकली।


हाली का जन्म


हाली का नाम अल्ताफ हसैन था। हाली उनका उपनाम था। उनका जन्म पंजाब के प्रसिद्ध शहर पानीपत में ११ नवंबर १८३७ में हुआ था। हाली के पिता का नाम ख्वाजा ईंजाद बख्श था। उनकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब रहती थी। गृहस्थी के भार को वह अच्छी तरह संभाल नहीं पाते थे। हाली परिवार में सबसे छोटे थे, इसलिए उनकी ओर और भी कम ध्यान दिया जाता था | किसी जमाने में हाली के घराने की हालत खासी अच्छी थी। हाली के एक पूर्वज हजरत मलक अली की गयासुद्दीन बल्बन ने बड़ी आवभगत की और पानीपत के निकट कुछ गांव उन्हें जागीर के तौर पर दे दिए तथा उन्हें वहां का काजी भी नियुक्त कर दिया, लेकिन हाली के पिता की स्थिति बहुत खराब हो गई थी।

रुपये-पैसे की तंगी तो थी ही, वैसे भी हाली का बचपन बहुत अधिक कठिनाइयों और कष्टो मे गुजरा | उनके जन्म के कुछ समय बाद ही उनकी माता के दिमाग का संतुलन बिगड़ गया। इसके बाद जब उनकी आयु केवल नौ वर्ष की थी, तभी उनके पिता का साया भी उनके सिर पर नहीं रहा।


हाली की शिक्षा


हाली को ढंग से शिक्षा नहीं मिली। उन्होंने अपने बचपन में उस समय के रिवाज के अनुसार कुरान पढ़ी। धीरे-धीरे उन्होंने फारसी और अरबी की पुस्तकें पढ़नी आरंभ की लेकिन उनकी यह तालीम भी अधूरी रह गई। सत्रह वर्ष की आयु में उनकी शादी कर दी गई, लेकिन हाली की शिक्षा में बहुत अधिक रुचि थी। वह विवाह को शिक्षा के रास्ते के रुकावट समझते थे | विवाह तो उन्होंने बुजुर्गों के कहने पर कर लिया, लेकिन विद्या प्राप्ति की उनकी लालसा बराबर बनी रही । वह इसी उधेड़बुन में रहने लगे कि किसी तरह शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले। उन्होंने सोचा कि पत्नी के मायके वाले धनी हैं और लड़की का खर्च कुछ समय के लिए जरूर बर्दाश्त कर सकेंगे, इसलिए बिना किसी को कुछ बताए वह चुपके से दिल्ली चले आए।

दिल्ली में वह उस समय के प्रसिद्ध शिक्षक मौलवी निवाज़िश अली से डेढ़ वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करते रहे। उस समय तक अंग्रेजों का अधिकार लगभग सारे भारत पर हो चुका था। अंग्रेज़ी शिक्षा का भी रिवाज़ हो चला था। दिल्ली कॉलेज का खूब नाम था और जो लोग अंग्रेजों की नौकरी करना चाहते थे और तरक्की की इच्छा रखते थे | वे दिल्ली कॉलेज में खिंच कर आते थे। मगर हाली ने अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त न की। उन दिनों पुराने विचारों के मुसलमान अंग्रेज़ी स्कूलों को कुछ घृणा की दृष्टि से देखते थे। वे ज्ञान का वास्तविक भंडार अरबी और फारसी भाषाओं को समझते थे ।

हाली ने दिल्ली में हुए उर्दू के प्रसिद्ध कवि मिर्जा गालिब से भेंट की। गालिब ने हाली की कविताएं देख कर अंदाजा लगाया कि इस व्यक्ति में अच्छी कविता लिखने के गुण मौजूद है, इसलिए उन्होंने हाली को अपना शागिर्द बना लिया और उनको बढ़ावा दिया। समय आने पर हाली उर्दू के ऊंचे शायर हो गए और इस तरह उनके बारे में गालिब का अनुमान सही निकला | थोड़े दिनों बाद ही हाली के संबंधियों को उनके दिल्ली में रहने का पता चल गया और वे आकर उन्हें पानीपत बुला ले गए।

पानीपत लौटकर भी उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई नहीं छोड़ी और शिक्षा में लगे रहे। कुछ समय शायरी का शौक पैदा करने से अधिक हाली पर गालिब का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। कुछ समय पश्चात उन्होंने हिसार के कलेक्टर के कार्यालय में मामूली सी तनख्वाह पर नौकरी कर ली, किंतु अभी साल भर भी नहीं हुआ था कि १८५७ का विद्रोह हो गया, जिसके झमेले से बचने के लिए वह छोड़कर पानीपत चले आए। पानीपत में वह फिर से ज्ञान-अर्जन में जुट गए।


हाली और मुस्तफा खान शेफ्ता


धीरे-धीरे जब १८५७ के विद्रोह की हलचल मिटने लगी, तब वह फिर पानीपत से दिल्ली आए। उन जैसी क्षमता और महत्वाकांक्षा वाले व्यक्ति के लिए पानीपत उपयुक्त स्थान नहीं था। उनकी प्रतिभा तो दिल्ली जैसे नगरों में ही विकास पा सकती थी | सौभाग्य से इस बार आने पर उनको जहांगीराबाद के रईस नवाब मुस्तफा खान शेफ्ता के पास नौकरी मिल गई। यहां हाली को अपनी कविता के लिए उचित वातावरण मिल गया। शेफ्ता खुद अच्छे कवियों में गिने जाते थे। वह उर्दू तथा फारसी दोनों भाषाओं में कविता करते थे। उनके संपर्क में हाली को अपने अंदर छिपे हुए गुणों को दिखाने का अवसर मिला। हाली शेफ्ता की मृत्यु तक उनके साथ रहे। इस बीच मिर्जा ग़ालिब की मृत्यु हो गई। हाली ने उनकी मृत्यु पर बहुत सुंदर शोक-गीत लिखा। उर्दू भाषा में शोकगीत को मरसिया कहते हैं। जब नवाब मुस्तफा खां शेफ्ता भी चल बसे तो हाली को फिर से कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और नौकरी की तलाश में पंजाब की उन दिनों की राजधानी लाहौर चले गए। उनको गवर्नमेंट बुक डिपो, लाहौर में नौकरी मिल गई। इस संस्था से अंग्रेज़ी पुस्तकों के उर्दू अनुवाद प्रकाशित हुआ करते थे। हाली को इस तरह के प्रकाशनों को शुद्ध करके छपवाने का काम मिला था | यह काम करते हुए हाली को अंग्रेज़ी भाषा के साहित्य का परिचय मिला। उनको स्वयं तो अंग्रेज़ी आती नहीं थी, लेकिन जिन अनुवादों की भाषा वह सुधारते थे, उनसे उनको अंग्रेज़ी साहित्य के विचारों की झलक मिलती थी। अंग्रेज़ी साहित्य का प्रभाव उस समय भारत की अन्य भाषाओं पर भी होने लगा था, जिसके फलस्वरूप सारे भारतीय समाज में एक नई चेतना आने लगी थी | पश्चिम के विचारों ने और वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक उन्नति ने यहां के लोगों को नया प्रकाश दिया था। हाली एक जागरूक व्यक्ति थे भला फिर वह इन नए प्रभावों से अछूते किस प्रकार रहते।

हाली ने उर्दू कविता में पश्चिमी विचारधारा की झलकियां देनी आरंभ की। इस प्रकार उर्दू काव्य को नई दिशा मिली। सच तो यह है कि आधुनिक उर्दू काव्य का आरंभ तभी से मानना चाहिए जबसे उस पर पश्चिमी विचारों का रंग चढ़ने लगा। उन दिनों पश्चिमी विचारों और आदर्शों को मुसलमानों और उर्दू भाषा में लोकप्रिय बनाने का सबसे जोरदार प्रयत्न अलीगढ़ के सैयद अहमद खां कर रहे थे |

लाहौर में हाली चार वर्ष तक काम करते रहे, लेकिन वहां उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता था। इसलिए हाली फिर से दिल्ली चले आए। दिल्ली में वह एंग्लो-अरेबिक कॉलेज में शिक्षक बने। लाहौर में रहते हुए हाली ने सैयद अहमद खां के बारे में दूर से ही सुना था। दिल्ली में सैयद अहमद खां के निकट संपर्क में आकर हाली भारत में इस्लामी पुनर्जागरण के कवि बन गए।


मुसद्दसे हाली


“मुसद्दसे हाली” नामक उनकी पुस्तक की भूमिका ने भारी हलचल मचा दी। उसकी इतनी मांग हुई कि थोड़े से समय में उसके छः संस्करण निकालने पडे। “मुसद्दसे हाली” ने हाली को भारत बाहर मे प्रसिद्ध कर दिया | इसके बाद ही उनको साहित्य सेवा के लिए हैदराबाद रियासत की ओर से ७५ रु. माहवार का वजीफा मिलने लगा। हाली ने कॉलेज की नौकरी छोड़ दी। बाद में हाली का वजीफा भी बढ़ कर १०० रुपये हो गया और वह सुखी जीवन बिताने लगे।


हाली की मृत्यु


सब चिंताओं से मुक्त होकर वह अपना सारा समय साहित्य सेवा में ही लगाने लगे। पद्य के अतिरिक्त उन्होंने उर्दू गद्य में भी बहुत कुछ लिखा है। उन्होंने साहित्यिक और सामाजिक लेख भी लिखे | जो समय-समय पर प्रकाशित होते रहते थे। अपने जीवन के अंतिम दिनों में हाली पानीपत में थे और वहीं ३० सितंबर १९१४ में ७० साल की आयु में इस महान कवि का देहांत हो गया।


हाली की रचनाएं


हाली ने उर्दू काव्य की जो सेवा की उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। “मुसद्दसे हाली” उनकी सर्वश्रेष्ठ पुस्तक मानी जाती है। इसमें उन्होंने इस्लाम के उत्थान और पतन के कारण बताए हैं। “मुसद्दसे हाली” का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ। हिंदी के प्रसिद्ध कवि मैथिलीशरण गुप्त ने “भारतभारती” हाली की इस पुस्तक से प्रभावित होकर ही लिखी थी। गद्य में हाली की कृति “मुकदमा शेर-ओ-शायरी” उर्दू आलोचना की पहली पुस्तक मानी जाती है। उन्होंने सादी, गालिब और सैयद अहमद खां की जीवनियां भी लिखी थीं।

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