Ganesh Stotram

|| गणेश स्त्रोतम ||

धन लाभ के लिए लक्ष्मी के साथ ही भगवान गणेश की आराधना भी अवश्य करनी चाहिए। भगवान गणेश देवताओं में प्रथम पूजन के अधिकारी हैं। वे बुद्धि विधाता हैं। उनकी कृपा से साधक को ऐसी शुभ प्रेरणा मिलती है, जिसके बल पर वह धन लाभ कर सकता है। धन लाभ का कोई जरिया होना चाहिए। नये विचार और नयी कल्पनाओं से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त होता है। इस प्रकार की प्रेरणा देने वाले भगवान गणेश हैं। उनकी कृपा के बिना धन या तो प्राप्त नहीं होता या फिर अचानक धन मिल जाने पर वह स्थिर नहीं रहता। वैसे लक्ष्मी का नाम ही चंचला है और वह बहुत दिनों तक किसी भी स्थान पर स्थिर नहीं रह पातीं। जब तक भगवान गणेश की कृपा से साधक की बुद्धि पवित्र और स्थिर रहती है, तब तक लक्ष्मी को उपासक के पास रहना ही पड़ता है। यह नियम हमारे शास्त्रों में कहा गया है।

बुद्धि विवेक के अस्थिर होने पर मन अनैतिकता, विलासिता और पापों की ओर भटक जाता है। इस भटकाव के नतीजे में धन नष्ट हो जाता है। साधक के परिवार में रोग, कुबुद्धि, हिंसा और दूसरी अनैतिकताएं घर बना लेती हैं। यही धन नाश का कारण बन जाता है।

गणेश जी की उपासना के लिए एक स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह सिद्ध स्तोत्र है। इसे पाठ करने से भगवान गणेश, देवाधिदेव शंकर और माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है –

ॐ कारमाघ प्रवदंति संतो वाच: श्रुतीनामपि ये गृणंति |
गजाननं देव-गणानतांघ्रिं भजेऽहमर्द्देन्दु-कृतावतंसम् ।।
पादारविंदार्चन तत्पराणां संसार-दावानल भंगदक्षम् ।
निरंतरं निर्गत-दानतोयैस्तं नौमि विघ्नेश्वम्बुजांभम् ।।
कृतांग-रागं नव-कुंकुमेन, मत्तालि-मालां मद-पड़कग्नाम् ।
निवारयंतं निज-कर्ण-तालैः, को विस्मरेत् पुत्र मतंग शत्रो: ।।
शंभोर्जटा-जूट-निवासि-गंगा-जलं समानीय कराम्बुजेन ।
लीलाभिराराच्छिवमर्चयंतं, गजाननं भक्ति युता भजंति ।।
कुमार-भुक्तौ पुनरात्म-हेतोः, पयोधरो पर्वत-राज-पुत्र्या: ।
पक्षालयंतं कर-शीकरेण, मौग्ध्येन तं नाग-मुखं भजामि ||
त्वया समुद्धृत्य गजास्य हस्तं, शीकराः पुष्कर-रंध्र मुक्ताः ।
व्यामाड्ग्ने ते विचरन्तिताराः, कालात्मना मौक्तिक तुल्य भासः।।
क्रीडा-रते वारि निधौ गजास्ये वेलामतिक्रामति वारि पूरे।
कल्पावसानं परिचिंत्य देवाः कैलाश नाथं श्रुतिभिः स्तुवंति ।।
नागानने नागकृतोत्तरीये क्रीडारते देव कुमार संघै:।
त्वयिक्षणं काल गतिं विहाय तौ प्रापतुः कंदुकतामिनेंदु ।।
मदोल्लसत्-पंच-मुखैअजस्र अध्यापयंतं सकलागमांधनि।
देवान् ऋषिन् भकत जंनैक मित्रं हेरंब मर्कारुण माश्रयामि ।।
पादाम्बुजाभ्यामति कोमलाभ्याम् कृतार्थ यंतं कृपया धरित्रीम् ।
अकारणं कारणमाप्तवाचाम् तन्नाग वक्त्रं न जहाति चेतः ।।
येनार्पितं सत्यवती सुताय पुराणमालिख्य विषाण कोट्या ।
तं चंद्र मौलेस्तनयं तपोभि आराध्य आनंद पनं भजामि ||
पद्य श्रुतीनामपदं स्तुतीनां लीलावतारं परमात्म मूर्तेः ।
नागात्मको वा पुरुषात्मको वेत्य भेद्रयमाध्यम भज विघ्न राजम् ।।
पाशांकुशो भग्नरदं त्व भीष्टम् करैर्दधानम् कर-रंध्र भुक्तेः ।
मुक्ता फलाभैः पूथु शीकरोधै: सिन्चंत्मगं शिवयोर्भजामि ।।
अनेकमेक गजमेक दंतं चैतन्य रूपं जगदादिबीजं ।
ब्रहोति यं ब्रह्म-विदो वदंति, तं शंभु सूनुं सततं भजामि ।
अड़ंगे स्थिताया निज-वल्लभाया मुखारम्बुजालोकन लोल नेत्रम्।
स्मेरात्राब्जं मद वैभवेन रुद्धं भजे विश्व विमोहनं तं ।।
ये पूर्वमाराध्य गजाननत्वां सर्वाणि शास्त्राणि पठंति तेषां ।
तवत्तों न चान्यत् प्रतिपाध्यामस्ति तदस्ति चत् सत्यमसत्य कल्पं ।।
हिरण्य वर्णं जगदीशितारं कविं पुराणं रवि मंडलस्यं ।
गजाननं यं प्रवदन्ति सन्तस्तत् काल योगैस्टमहं प्रपध्ये ।।
वेदान्त गीतं पुरुषं भजेऽहं आत्मान आनन्द धनं हृदिस्थं |
गजाननं यन्महसा जनानां विघ्नांधकारो विलयं प्रयाति ।।
शंभो: शमालोक्य जटाकलापे शशाक्ड खंडं निज पुष्करेण ।
स्वभग्न दंतं प्रविचिन्त्य मौग्ध्यादाकष्र्टु-कामः श्रियमातनोतु ।।
विप्रार्गलानां विनिपातनार्थं यं नारिकेलैः कदली फलाध्ये:।
प्रभावयंतो मदवारणास्यं प्रभुं सदाभिष्टमहं भजेतम् ||
यज्ञैः अनेकैः बहुभिस्तपोभि राराध्यमाध्यं गजराज वक्त्रम् ।
स्तुत्याऽन्या ये विधिना स्तुवन्ति ते सर्व-लक्ष्मी-निधयो भवंति ।।


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