विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे | Vishwanath Kashinath Rajwade


विदेश से आने वाली हर चीज उन्हें अच्छी लगती है और अगर देश परतंत्र हो फिर तो | विदेशी शासक गुलाम देश की संस्कृति को अपने देश की संस्कृति से हीन दिखाना चाहता है और इस काम में गुलाम देश के लोग ही उसकी सहायता करते हैं।

ऐसी ही परिस्थिति भारत में पिछली शताब्दी में थी। अंग्रेज़ी राज्य कायम हो चुका था और भारतीय इतिहास पर जो पुस्तकें छपती थीं, उनमें घटनाओं को इस प्रकार तोड़ा-मरोड़ा जाता था, जिससे लोगों में यह भावना फैले कि उनके इतिहास में कोई बात गौरवशाली नहीं और वे अंग्रेज़ शासकों से हर प्रकार से हीन हैं।



इस प्रयास को रोकने के लिए आवश्यक था कि भारतीय इतिहास पर अनुसंधान किया जाय, जो कागज-पत्र उपलब्ध हों उनको पढ़ा जाए और जिन जगहों पर ऐतिहासिक घटनायें हुई है, जाकर इतिहास नये सिरे से और वास्तविकता के आधार पर लिखा जाए। यह काम कठिन था और इससे आर्थिक लाभ की भी आशा न थी। कोई देश प्रेमी ही इसे कर सकता था यह व्यक्ति था विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे।

अपने ६३ वर्ष के जीवन में विश्वनाथ काशीनाथ ने भारतीय इतिहास, खासकर मराठों के इतिहास पर व्यापक अनुसंधान किया। उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले, वे बाईस खंडों में प्रकाशित किये गये| इनकी पृष्ठ संख्या ग्यारह हजार से अधिक है। इसके अतिरिक्त मराठी और संस्कृत भाषा तथा मराठी संत वाड् मय पर भी उन्होंने महत्वपूर्ण लेखन किया, विशेष बात यह है कि उन्होंने यह काम ऐसे समय किया जब अधिकतर शिक्षित व्यक्ति सरकारी नौकरी प्राप्त करना चाहते थे, सरकारी नौकरी आसानी से मिलती थी और उसमें सुख और आराम था। इसके विपरीत संशोधन कार्य में पैसा तो था ही नहीं, कष्ट ही कष्ट था | पर राजवाडे ने सुख और आराम का जीवन छोड़ कष्ट और त्याग का रास्ता पकड़ा।


विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे का जन्म


विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे का जन्म २४ जून १८६३ में कोंकण के बरसई गांव में हुआ। उनके दादा पूना जिले में लोहगढ़ किले के किलेदार थे। बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई।


विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे की शिक्षा


उनकी प्राथमिक शिक्षा बड़गांव, जिला पूना में हुई। पढ़ाई में वह तेज थे पर उससे कहीं तेज वह खेलकूद, तैराकी और उपद्रव में थे। कसरत का उनको बचपन से ही शौक था। उनकी माध्यमिक और उच्च शिक्षा पूना में हुई। उनकी बुद्धि के विकास के लिए उचित वातावरण शिक्षा संस्थाओं में न मिला। कारण यह था कि इन संस्थाओं की सारी पढ़ाई परीक्षा पास करने के लिए होती थी और राजवाडे चाहते थे विद्या प्राप्त करना। विद्यार्थी दशा में ही उन्होंने यह निश्चय कर लिया था कि सरकारी नौकरी तो वह करेंगे ही नहीं।

१८८२ में बंबई विश्वविद्यालय की मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद वह बंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में भरती हुए, पर पैसे की कमी के कारण उन्हें महीने के अंदर ही कॉलेज छोड़ना पड़ा। तब उन्होंने एक छोटा-सा स्कूल चलाया। १८८४ में उनके बड़े भाई बैजनाथ काशीनाथ राजवाडे फर्ग्यूसन कॉलेज में नियुक्त हो गये, तब वह भी उस कॉलेज में पढ़ने लगे। कॉलेज की पढ़ाई में भी उन्होंने वही स्वतंत्र वृत्ति दिखाई जिसके कारण वह बाद में इतिहास संशोधन के क्षेत्र में प्रसिद्ध हुए।

पाठ्यक्रम में नियत बहुत-सी पुस्तकों को वह बेकार समझते थे और अपना समय इतिहास, साहित्य, समाजशास्र आदि के अध्ययन और व्यायाम में लगाते थे। बुद्धिमान होने के कारण जब मन होता था तब नियत पाठ्यक्रम का एक-दो महीने अध्ययन कर परीक्षा में पास हो जाते थे | जब मर्जी नहीं होती थी तो परीक्षा में नहीं बैठते थे इस प्रकार राजवाडे ने फर्ग्यूसन कॉलेज के छः वर्ष के अध्ययन काल में अपने जीवन कार्य के लिए आवश्यक सारा ज्ञान प्राप्त किया और १८९० में वह बी.ए. हुए।


भाषांतर नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन


शिक्षा पूर्ण होते ही उनका विवाह हो गया, लेकिन उनकी पत्नी का शीघ्र ही देहांत हो गया। राजवाडे कौटुंबिक बंधन से मुक्त थे और उन्होंने अपना सारा जीवन अपने प्रिय कार्य में व्यतीत किया। उन्होंने “भाषांतर” नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। उनका उद्देश्य था कि इस पत्रिका में प्लेटो, अरस्तू आदि विदेशी मनीषियों तथा प्रसिद्ध भारतीय मनीषियों के ग्रंथों का अनुवाद प्रकाशित किया जाए।


विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे का इतिहास संशोधन कार्य


पत्रिका बंद होने के बाद राजवाडे ने इतिहास संशोधन का काम आरंभ किया और “मराठों के इतिहास के साधन” ग्रंथ का पहला खंड प्रकाशित किया। पत्रिका और ग्रंथ दोनों का एक ही उद्देश्य था जनता में अपने इतिहास के प्रति आस्था उत्पन्न करना, यूरोप और अमरीका में प्राप्त ज्ञान उसके लिए मातृभाषा में उपलब्ध कराना और इस प्रकार भारत का पुनरुत्थान करना।

इतिहास संशोधन के अपने कार्य में राजवाडे ने बड़ी लगन और निष्ठा का परिचय दिया। मराठी, संस्कृत और अंग्रेज़ी तो उन्हें पहले से ही आती थी, फ्रेंच, फारसी और पुर्तगाली भाषाएं उन्होंने बाद में सीखी। तब मराठा राज्य को नष्ट हुए सत्तर वर्ष ही हुए थे और महाराष्ट्र की रियासतों में और प्रमुख परिवारों के पास पुराने कागज-पत्रों का भंडार मौजूद था। ये कागज-पत्र दीमक की बलि चढ़ कर नष्ट होते जा रहे थे जब कभी उन्हें पता चलता था कि कहीं ऐसा संग्रह है तो वह वहां जा पहुंचते और मालिक को समझा-बुझा कर उसे ले लेते। अगर वह राजी हो जाता तो कागजों को किसी ऐसी जगह ले जाते जहां पर उनको पढ़ने, अनुवाद करने और उसकी सूची तैयार करने की सुविधा हो। अक्सर उन्हें इसकी आज्ञा न मिलती तब वह वहीं टिक जाते और अपना काम पूरा करते। परिवार का बंधन तो था ही नहीं, चावल पका कर दूध के साथ खा लेते थे रात को केवल दूध या फल ले लेते थे।

ऐतिहासिक महत्व की जगहों पर वह बार-बार जाते और जो देखते उसका इतिहास में दिए वर्णन से मेल बैठाते थे। पैदल लंबी यात्रा करते थे और देखते थे कि पुराने काल में लोग किस रास्ते से एक जगह से दूसरी जगह जाते थे। उनका कहना था कि दक्षिण में तंजावुर से उत्तर में ग्वालियर तक के सारे प्रदेश की उन्होंने पैदल यात्रा की थी। वह कहते थे कि इससे इतिहास के वर्णित यात्रा विवरण और घटनाओं का क्रम निश्चित करने में उन्हें बड़ी सहायता मिलती थी।

उन्होंने इस प्रकार लगभग तीस वर्ष तक इतिहास की सेवा की। कभी-कभी उनको अप्रत्याशित कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। एक बार जब उनके एक ग्रंथ की प्रतियां छप कर तैयार हो चुकी थीं, तब प्रेस में आग लग गई और प्रतियां और पांडुलिपि दोनों नष्ट हो गई। दूसरी प्रति थी नहीं और उन्होंने दोबारा सारा काम नए सिरे से करके फिर पांडुलिपि तैयार की और छपवाई। जब उनके एक मित्र ने उनके स्वास्थ्य के बारे में चिंता व्यक्त की तो उन्होंने कहा – “मनुष्य काम से नहीं मरता, आलस से मरता है।“

बाईस बड़े-बड़े ग्रंथों में अपने संशोधन के परिणामों को प्रकाशित करने के बाद भी राजवाडे के पास काफी सामग्री बाकी रही। यह उन्होंने पूना के “भारत इतिहास संशोधक मंडल” को दे दी। यह संस्था उन्होंने ही १९१० में स्थापित की थी। इसके बाद जो कागज-पत्र उन्होंने इकट्ठे किए वे उनकी मृत्यु के बाद धूलिया में स्थापित “राजवाडे संशोधन मंडल” में रखे गए।

राजवाडे के प्रयत्न के कारण मराठा इतिहास की ऐसी कई घटनाएं प्रकाश में आई, जिनके बारे में तब तक इतिहासकारों को पता ही न था। १९२५ में उन्होंने अपनी एक पुस्तक में यह सिद्ध किया कि शिवाजी का उद्देश्य केवल मुगलों के विरुद्ध विद्रोह करना नहीं वरन् भगवान् की कृपा प्राप्त करके स्वराज्य की स्थापना करना था। इसके लिए उन्होंने रायरीश्वर के मंदिर में मावलों को एकत्र कर उन्हें स्वराज्य प्राप्ति के लिए सर्वस्व त्याग की शपथ दिलाई थी।

इतिहास के अलावा उन्होंने संत वाड्, मय पर भी बहुमूल्य अनुसंधान किया। मुकुंदराज, मुक्तेश्वर, दासोपंत, रघुनाथ पंडित आदि संतों के बारे में उनका कार्य महत्वपूर्ण था महाराष्ट्र और पंजाब के प्रसिद्ध महानुभाव पंथ का पुराना मराठी साहित्य गुप्त सांकेतिक लिपि में लिखा था, राजवाडे ने इस लिपि की कुंजी ढूंढ़ निकाली और यह साहित्य भंडार जनता को उपलब्ध करा दिया। उनके काल तक संत ज्ञानेश्वर के प्रसिद्ध ग्रंथ “ज्ञानेश्वरी” की जितनी प्रतियां प्राप्त थीं, वे सब संत एकनाथ के समय या उसके बाद की थी। उन्होंने पहली बार इसकी पहले की प्रति ढूंढ निकाली, उसके व्याकरण का अभ्यास किया और यह सिद्ध किया कि वही संत-ज्ञानेश्वर कालीन मराठी भाषा का व्याकरण था।

विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे का नाम इतिहास के क्षेत्र में अद्वितीय समझा जाता है। उन्होंने जो कार्य किया या जो पुस्तकें लिखीं उनकी व्यापकता या पृष्ठ संख्या ही उन्हें महानता देने के लिए काफी है, पर इससे भी बड़ी बात यह है कि उन्होंने पहली बार इतिहास संशोधन के कार्य और इतिहास लेखन की प्रणाली को नई दिशा दी। उनके समय में प्रचलित भारतीय इतिहास की पुस्तकें अंग्रेज़ और अन्य विदेशी लेखकों की थीं और उनमें जान-बूझकर या गलती से घटनाओं को तोड़ा-मरोड़ा गया था | राजवाडे ने पुराने कागज-पत्रों के आधार पर इन बातों को झुठ साबित किया और कई भ्रांतियों का खंडन किया।

इतिहास लिखने का उनका दृष्टिकोण वास्तविकतावादी और व्यापक था, उनके समय तक कम-से-कम भारत में तो इतिहास लेखन शासकों के कार्यकलाप और घटनाओं के वर्णन तक ही सीमित था । उसमें अद्भुत व कल्पित बातों की मिलावट तो थी ही, पर ऐसी मिलावट करना गलत है, यह भी लोगों को मालूम न था। इसके विपरीत राजवाडे का कहना था कि बड़े आदमी और छोटे आदमियों के चरित्र मिलकर समाज का इतिहास बनता है। समाज में बड़े लोग थोड़े से होने के कारण उनके चरित्र और छोटे लोगों के चरित्र सम्मिलित किए बिना समाज का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता। इस प्रकार उनका कहना था कि किसी देश का इतिहास सारे समाज का इतिहास है, केवल शासकों की लडाइयों का वर्णन मात्र नहीं।


विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे की मृत्यु


इतिहास और साहित्य की लगभग छत्तीस वर्ष सेवा करने के बाद ३१ दिसंबर १९२६ को उनकी मृत्यु हुई।


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