रघुनाथ पुरुषोत्तम परांजपे | Raghunath Purushottam Paranjape


आजकल सैकड़ों प्रतिभाशाली और होशियार छात्रों को विदेश जाकर पढ़ने के लिए सरकार की ओर से छात्रवृत्ति मिलते हैं। परंतु आज से लगभग ७५ वर्ष पूर्व यह हालत नहीं थी। उन दिनों इक्के-दुक्के विद्यार्थियों को ही भारत सरकार के छात्रवृत्ति मिलते थे और वह भी कड़े मुकाबले के बाद। इसके साथ ही लोग विदेश जाना भी पसंद नहीं करते थे। सर रघुनाथ पुरुषोत्तम परांजपे उन्हीं इक्के-दुक्के विद्यार्थियों में से थे, जो उन दिनों भारत सरकार का छात्रवृत्ति पाकर कैम्ब्रिज गए। वहां भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का सिक्का जमा दिया और वहां गणित की सबसे बड़ी परीक्षा ट्राइपास प्रथम श्रेणी में पास की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सीनियर रेंग्लर की उपाधि प्राप्त की।

इस कारण उनका बड़ा नाम हुआ। भारत छोड़ने से पहले ही उन्होंने यह प्रण किया कि वह अपना सारा जीवन शिक्षा के क्षेत्र में लगाएंगे। इसी कारण वह पूना की सुप्रसिद्ध डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के आजीवन सदस्य बन गए थे।

उन दिनों आई.सी.एस. की तरह ही इंडियन एजुकेशन सर्विस होती थी, जिसके अधिकतर सदस्य अंग्रेज होते थे। सरकार में इस बात पर विचार हुआ कि उनकी आई.ई.एस. में नियुक्ति की जाए। अनौपचारिक रूप से डेक्कन एज़केशन सोसाइटी तक यह बात पहुंचाई गई कि अगर वह परांजपे को अपने वचन से मुक्त कर दे, तो उनकी नियुक्ति की बात सोची जा सकती है।

सोसाइटी के आजीवन सदस्य के रूप में परांजपे को केवल ७५ रुपये मासिक वेतन मिलता था । आई.ई.एस. के अफसर के रूप में उनको पैसा तो कई गुना अधिक मिलता ही, सम्मान और अधिकार की कोई सीमा न होती।

सोसाइटी के अध्यक्ष गोपालकृष्ण गोखले ने परांजपे को लिखा कि अगर आप सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहें तो सोसाइटी को आपत्ति न होगी। पर परांजपे के मन में कोई दुविधा न थी। उन्होंने तत्काल सूचित किया कि मैं सोसाइटी के सदस्य के रूप में अध्यापन का ही काम करूंगा। उनके यश और इस निर्णय के कारण, सोसाइटी ने उन्हें अपने सुप्रसिद्ध फर्ग्युसन कालेज, पूना का प्रिंसिपल नियुक्त कर दिया, यद्यपि वह प्रिंसिपल बनने के लिए कतई उत्सुक न थे।

रघुनाथ पुरुषोत्तम परांजपे का जन्म १६ फरवरी १८७६ को रत्नागिरी जिले के मु्डी गांव में हुआ था। उनके माता-पिता की तेरह संतानें थीं जिनमें रघुनाथ सातवें थे। जब वह पैदा हुए तो उनमें जीवन का कोई चिह्न न था, परंतु जब दाई ने उनकी मां से कहा कि बच्चा पहले ही मर चुका है तो वह बड़ी नाराज हुई। उन्होंने दाई से कहा, "तुम बेवकूफ हो। बच्चा मरा कैसे हो सकता है? उस पर ठंडा पानी डालो, एक-दो यप्पड़ लगाओ और उसे झकझोरो, अभी रोने लगेगा।" दाई ने वैसे ही किया और वास्तव में बच्चा रोने लगा।

परांजपे के पिता धार्मिक विचारों वाले थे। उन्होंने रघुनाथ को लिखना-पढ़ना और गणित घर पर सिखाया । अक्षर ज्ञान कराने का उनका तरीका भी अनूठा था। प्रतिदिन प्रातःकाल वह रघुनाथ की पीठ पर उंगली से अक्षर बनाकर उसका उच्चारण बताते थे। रघुनाथ की प्राथमिक शाला के अध्यापक उनकी कुशाग्रता से बहुत प्रभावित हुए।


प्रसिद्ध समाज सुधारक और शिक्षा शास्त्री महर्षि धोंडो केशव कर्वे, रघुनाथ के फुफेरे भाई थे। १८८५ की गर्मी में कर्वे अपने मामा से मिलने गए और वह भी बालक रघुनाथ की बुद्धि से प्रभावित हुए। क्योंकि गांव में आगे पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए वह रघुनाथ को अपने गांव मुरुड ले गए और वहां के स्कूल में उन्हें दाखिल कर दिया।

रघुनाथ अपनी बुआ-कर्वे की मां के साथ रहने लगे। मुरुड और दापोली के स्कूलों में पढ़ने के बाद कर्वे रघुनाथ को जनवरी १८८८ में अपने साथ बंबई ले गए। तीन वर्ष बाद बंबई के मराठा हाईस्कूल से परांजपे ने मैट्रिक की परीक्षा दी और वह सारे विश्वविद्यालय में प्रथम आए।

इसी बीच महर्षि कर्वे फर्ग्युसन कालेज में गणित के प्राध्यापक नियुक्त हो गए। इसलिए वह बंबई से पूना चले आए। १८९२ में परांजपे ने भी इसी कालेज में अपना नाम लिखवाया ।

१८९६ में उन्होंने वी.एस.सी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की, उन दिनों बंबई विश्वविद्यालय में एम.एस.सी. की व्यवस्था न थी और भारत सरकार की ओर से विदेश में अध्ययन के लिए जो छात्रवृत्ति दी जाती थी, उसमें लगभग डेढ़ वर्ष की देरी थी। परांजपे ने यह समय बिताने का एक अनूठा तरीका निकाला। कालेज में वह इंटरमीडिएट और बी. ए. की कक्षाओं को कुछ समय परांजपे प्राध्यापक की कुर्सी से उतरकर विद्यार्थियों के बीच जा बैठते। कालेज में उनका गणित पढाने लगे और साथ-साथ इंटर आर्ट्स कक्षा में अपना नाम लिखाया। इसका परिणाम मनोरंजक होता था। इंटरमीडिएट के विद्याथियों को गणित पढ़ाने के बाद घंटा समाप्त होते ही गोपालकष्ण गोखले से संपर्क हुआ। उन दिनों गोखले उदार दल के नेता के रूप में प्रसिद्ध थे। इस दल का कहना था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने से पहले समाज सुधार आवश्यक है दुसरी ओर लोकमान्य तिलक और उनके अनुयायियों का कहना था कि विदेशी राज्य सारी बुराइयों की जड़ है और स्वतंत्रता प्राप्त करना सबसे बड़ी आवश्यकता है। समाज सुधार उसके बाद हो सकेगा।

पयांजपे का रुझान गोखले और समाज सुधारवादियों की तरफ था। संभवतः इसका कारण महर्षि के का प्रभाव था। कर्वे ने १८९३ में सारी रूढ़ियों को तोड़कर एक विधवा से विवाह किया था, हालांकि इस कारण उन्हें बहुत अधिक कष्ट झेलने पड़़े और अपमान सहने पड़े।

सन १८९६ में परांजपे को विदेश में अध्ययन करने के लिए सरकारी छात्रवृत्ति मिली और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ने लगे। यहीं से गणित की सर्वोच्च परीक्षा मेथिमैटिकल ट्राइपास प्रथम श्रेणी में पास की। पेरिस और गोटिन्जेन विश्वविद्यालयों में कुछ समय अध्ययन करने के बाद परांजपे १९०२ में भारत लौट आए और उन्होंने फर्ग्युसन कालेज के प्रिंसिपल का कार्यभार संभाला। उस समय कालेज के विद्यार्थियों की संख्या ३०० थी पर कुछ ही वर्षों में वह चौगुनी हो गई। परीक्षाफल में भी सुधार हुआ और उनके कई विद्यार्थियों ने विदेश जाकर वहां भी नाम कमाया। खेलकूद में अब तक इस कालेज का कोई नाम न था, पर अब इस क्षेत्र में भी कालेज ने प्रगति की। लड़कियों के लिए छात्रावास स्थापित हुआ, पर सबसे बड़ी बात यह हुई कि हरिजन और अन्य पिछड़े वर्ग के लड़के-लड़कियों के लिए छात्रवृत्तियों की व्यवस्था की गई।

हरिजनों को कालेज और छात्रावास में वही अधिकार प्राप्त थे, जो अन्य विद्यार्थियों को थे | सन् १९१३ में बंबई के गवर्नर ने परांजपे को प्रदेश कौंसिल का सदस्य मनोनीत किया। परंतु सरकारी सदस्य होने के बावजूद तीन वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने कौसिल में सत्रह बार मतदानों में भाग लिया और इनमें से सोलह बार उन्होंने अपना मत विरोधी दल के साथ दिया | १९१६ में उन्होंने ग्रेजुएट मतदाता संघ से कौंसिल का चुनाव लड़ा और विजयी हुए।

१९२१ में मांटेगू-चेम्सफोर्ड सुधार लागू किए गए। इनके अंतर्गत सभी प्रांतों का शासन दो भागों में बंट गया। शिक्षा, आबकारी, स्वायत्त शासन आदि विभाग निर्वाचित मंत्रियों के अंतर्गत थे और पुलिस, राजस्व, वित्त आदि महत्व के विभागों का संचालन गवर्नर के आदेशानुसार उसकी कार्यकारिणी परिषद के सदस्य करते थे। परांजपे बंबई प्रदेश में शिक्षा, चिकित्सा और स्वास्थ्य विभागों के सदस्य नियुक्त हुए। जनता समझती थी कि यह योजना उसकी आकांक्षाओं के साथ खिलबाड़ है। इसलिए इन सदस्यों को जनता के उपहास और सरकारी अधिकारियों के विरोध, दोनों का सामना करना पड़ता था। परंतु परांजपे के मंत्रित्वकाल में कई अवसर ऐसे आए जब उन्होंने गवर्नर का डटकर विरोध किया और अपने अधिकारों को बनाए रखा।

शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। इनमें अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की योजना और पिछड़े वर्ग तथा हरिजन विद्यार्थियों के लिए पूना में छात्रावास की स्थापना प्रमुख थे। उन्होंने यह भी आदेश जारी किया कि किसी सार्वजनिक स्कूल में हरिजनों के विरुद्ध कोई भेदभाव न बरता जाए।

सन् १९२३ में कौसिल के चुनाव हुए स्वराज पार्टी ने परांजपे के विरुद्ध डा. जयकर को खड़ा किया। जयकर सफल वकील और प्रभावी वक्ता तो थे ही, जनता की भी कांग्रेस और स्वराज पार्टी के ही साथ सहानुभूति थी। परिणाम यह हुआ कि परांजपे चुनाव हार गए और उन्होंने मत्रिपरिषद से त्यागपत्र दे दिया। वह पुना चले गए और उन्होंने पुनः फर्गुयसन कालेज के प्रिंसिपल का कार्यभार संभाल लिया।

सन् १९२६ में परांजपे ने फिर कौंसिल का चुनाव लड़ा और वह निर्वाचित हो गए और पुनः मंत्री नियुक्त किए गए। तब उन्होंने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी से त्यागपत्र दे दिया| अब इसमें कोई बाधा न थी क्योंकिं उन्होंने कम से कम बीस वर्ष की सेवा की शर्त पूरी कर ली थी, इस बार उन्हें सहकारिता, आबकारी, वन, कृषि आदि विभाग मिले। पर शीघ्र ही उन्हें लंदन में सेक्रेटरी आफ स्टेट फार इंडिया की कौसिल का सदस्य नियुक्त किया गया | वह लंदन चले गए और वहां पांच वर्ष रहे।

सन् १९५२ में परांजपे भारत लौट आए और लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति बने। १९३८ तक वह लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। वहां अनुशासन बनाए रखना एक बड़ी समस्या थी। दूसरी समस्या वहां गुटबंदी की थी। परांजपे ने इन दोनों का सामना दृढ़ता से किया। सरकार या तालुकेदारों के दबाव के आगे वह झुके नहीं, अनुशासन-भंग विशेषतः परीक्षा में नकल करने के लिए उन्होंने सदैव कठोर दंड दिया और विश्वविद्यालय में किसी की भी नियुक्ति करते समय केवल उम्मीदवार के गुणों को प्रधानता दी, जाति या गुट को नहीं ।

सन् १९३८ में परांजपे लखनऊ से पूना चले गए। शीघ्र ही दूसरा महायुद्ध छिड़ गया। पहले महायुद्ध की तरह दूसरे महायुद्ध में भी परांजपे और उनका उदार दल इस मत का था कि भारत की जनता को ब्रिटिश सरकार से सहयोग करना चाहिए, कांग्रेस के असहयोग आंदोलन के वह विरोधी थे | पूना लौटकर उन्होंने नवयुवकों को प्रेरित किया कि वे सेना में अधिकारी बनें, पर साथ-साथ वह सरकार की भी भारत की जनता की उपेक्षा करने के लिए बराबर आलोचना करते रहे।

१९४४ में भारत सरकार ने उन्हें आस्ट्रेलिया में उच्चायुक्त नियुक्त किया। अपनी तीन वर्ष की कार्यावधि पूरी कर वह १९४७ में भारत लौटे। १९४२ में उन्हें “सर” का खिताब मिला था। अब परांजपे सत्तर वर्ष से ऊपर थे, परंतु पूना लौटने के बाद वह बैठे न रहे। पूना विश्वविद्यालय स्थापित होने के बाद उन्होंने उसके कार्य में बड़ी रुचि ली। डा. जयकर के बाद १९५६ में परांजपे को सर्वसम्मति से विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया | वह इस पद पर १९५९ तक रहे। उनके कार्यकाल में प्राध्यापकों के वेतन में वृद्धि की गई और शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाने के लिए कई कदम उठाए गए |

६ मई १९६६ को ९० वर्ष की आयु में परांजपे की मृत्यु हो गई।


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