पारिजात वृक्ष | परिजात वृक्ष | हरसिंगार | Parijat Vriksh



हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्यो, धार्मिक कार्यो तथा अनुष्ठानों मे फूलों को विशेष महत्व दिया गया है। ईश्वर की पूजा तथा उनका श्रृंगार भी फूलों द्वारा ही किया जाता हैं, अर्थात बिना फूलों के ये सभी कार्य अधूरे माने जाते है।

यू तो भगवान की पूजा मे नीचे गिरे हुए फूलों का उपयोग पूर्णतः वर्जित है, परंतु कुछ पुष्प ऐसे है जिन्हें तोड़ना वर्जित है अर्थात इन पुष्पों का तभी उपयोग किया जाता है जब यह स्वयं टूटकर गिरे हो।


पारिजात वृक्ष किसे कहते हैं


हम बात कर रहे है पारिजात वृक्ष की, जिसे हरसिंगार भी कहा जाता हैं। ये फूल दिखने में बेहद ही खूबसूरत, छोटे आकार के सफेद रंग के होते है। पारिजात या हरसिंगार के वृक्ष उन प्रमुख वृक्षों में से एक है, जिनका बड़ा ही धार्मिक महत्व है और जिसके फूल ईश्वर की आराधना में विशेष स्थान रखते है।

पारिजात के पुष्प की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये सिर्फ रात को ही खिलते हैं और सुबह होते ही सारे फूल झड़ जाते है, इसीलिए इन्हे “रात रानी” भी कहा जाता है। इस वृक्ष के उन्ही पुष्पों का इस्तेमाल पूजा मे किया जाता हैं जो स्वयं पेड़ से टूटकर गिरे हो।

धार्मिक मन्यताओ के अनुसार पूजा पाठ के लिए इस वृक्ष से फूलों को तोड़ना पूर्णतः प्रतिबंधित है।


पारिजात की उत्पत्ति


पौराणिक धर्म ग्रंथो में इसे कल्प वृक्ष भी कहा गया है। एक ऐसा वृक्ष जिसके नीचे बैठकर व्यक्ति की सारी थकान दूर हो जाती और साथ ही साथ समस्त मनोकामनाएं भी पूर्ण हो जाती।

कल्प वृक्ष (पारिजात वृक्ष) की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। जब देवताओ और असुरो के बीच अमृत पाने की लालसा मे समुद्र मंथन किया जा रहा था, तो उसमे से हलाहल विष के साथ-साथ अनेक रत्नो की प्राप्ति हुई थी | जिसमे से कामधेनु, अश्व, एरावत, रंभा, लक्ष्मी, वारुणी, चंद्रमा, अमृत इत्यादि थे। उन्ही १४ रत्नो मे से एक रत्न पारिजात वृक्ष भी था। इस वृक्ष का पुष्प इतना सुंदर, मनोरम व सुगंधयुक्त था, कि समस्त देवताओं को पारिजात का पुष्प पसंद आया। समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इंद्र को दे दिया गया।

पौराणिक कथाओ के अनुसार कहा जाता है कि एक बार देवॠषि नारद जी जब भगवान श्री कृष्ण से मिलने धरती पर आये थे, तो वे भगवान श्री कृष्ण को भेंट स्वरूप देने के लिए पारिजात के पुष्प लाये थे। श्री कृष्ण ने नारद जी द्वारा दिया गया अलौकिक पुष्प पास बैठी अपनी पत्नी रुकमणि को दे दिये, लेकिन जैसे ही यह बात भगवान श्री कृष्ण की दुसरी पत्नी सत्यभामा को पता चली कि नारद जी द्वारा स्वर्ग से लाया गये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुकमणि को दे दिये तो उन्होंने क्रोधवश हठ पकड़ ली कि उन्हे भी अपनी वाटिका के लिए पारिजात वृक्ष चाहिए। सत्यभामा के हठ को देखते हुए जब श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र से पारिजात वृक्ष देने की बात की तो इंद्र ने वृक्ष देने से मना कर दिया। क्रोधवध भगवान श्री कृष्ण ने देवराज इंद्र पर आक्रमण कर पारिजात वृक्ष को धरती पर ले आये। इस बात से क्रोधित होकर देवराज इंद्र ने पारिजात वृक्ष को यह श्राप दिया कि यह वृक्ष सदैव के लिए फलो से वंचित हो जायेगा और यही वजह है कि तब से लेकर आज तक पारिजात वृक्ष फल विहीन है। परंतु भगवान श्री कृष्ण ने सत्यभामा को सबक सिखाने के लिए पारिजात वृक्ष को उनकी वाटिका पर ऐसे जगह रोपित किया कि उसके समस्त पुष्प खिलते तो सत्यभामा की वाटिका मे थे, परंतु गिरते रुकमणि की वाटिका मे थे, और यही कारण है कि पारिजात वृक्ष के पुष्प नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते हैं। और इस तरह पारिजात वृक्ष स्वर्ग से धरती पर आया।


किंतुर पारिजात वृक्ष


यू तो पारिजात वृक्ष संपूर्ण भारत में देखने को मिलेंगे, परन्तु किंतुर स्थित पारिजात वृक्ष एक ऐसा वृक्ष माना जाता है जिसका आगमन धरती पर स्वर्ग से हुआ हैं, और आज भी यह वृक्ष विश्व के सबसे प्राचीन वृक्ष के रूप मे हज़ारो वर्षो से स्थित है।

हम बात कर रहे है उत्तरप्रदेश राज्य के बाराबंकी जिले के किंतूर नामक गाँव में स्थित पारिजात वृक्ष की, जो पूरे भारत में सबसे प्राचीन एकमात्र ऐसा पारिजात वृक्ष है, जो अपने आप मे अलौकिक और अनूठा है। इस पारिजात वृक्ष की ऊचांई लगभग ४५ फीट व चौडाई ५० फीट तक है।

किँतुर स्थित पारिजात वृक्ष एक ऐसा वृक्ष है जिसे स्वर्ग लोक से धरती लोक (अर्थात् मृत्यू लोक मे लगाया गया है वह भी एक भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए।

यह घटना महाभारत काल की है जब धृतराष्ट्र ने पांडवो को अज्ञातवास दिया तो वे अपनी माता कुंती सहित यहाँ के वन में वास कर रहे थे, तभी से इस गांव का नाम किँतुर (पांडवो की माँ) कुंती के नाम पर पड़ा। तत्पश्चात पांडवो ने माता कुंती के आग्रह पर वहाँ एक शिव मंदिर की स्थापना की, जो आज कुंतेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुए

कहते है कि एक बार माता कुंती ने भगवान शिव की पूजा करने के लिए पांडवो से पारिजात पुष्प लाने की इच्छा ज़ाहिर की। तब श्री कृष्ण के आज्ञानुसार पांडवो ने सत्यभामा की वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया। तभी से यह पारिजात वृक्ष यहाँ स्थापित हैं। और आज किंतूर स्थित यह पारिजात वृक्ष सरकार द्वारा पूर्ण रूप से संरक्षित है।


पारिजात वृक्ष के औषधीय गुण | पारिजात वृक्ष के फायदे


पारिजात वृक्ष जितना अद्भुत अलौकिक है उतना ही यह औषधीय गुणों से भरपूर हैं। पारिजात के फूलों को हृदय रोग के लिए उत्तम माना जाता हैं। पारिजात की पत्तियों से त्वचा संबंधी रोगों से निजात पाया जा सकता हैं। सुखी खासी के लिए पारिजात के पत्ते पूर्ण रूप से उपयुक्त है, जिसका सेवन शहद के साथ किया जा सकता हैं।

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